UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

सुगौली की संधि: आंग्ल-नेपाल युद्ध, छोड़े गए इलाके और काली नदी की सीमा

सुगौली की संधि: 1814-16 का आंग्ल-नेपाल युद्ध, दिसंबर 1815 में दस्तखत और मार्च 1816 में अनुमोदित नौ अनुच्छेद, और आज की काली नदी सीमा।

A tall red obelisk rises behind a dark stairway and memorial panels at the Khalanga War Memorial, framed by tall trees.

सुगौली की संधि वह शांति समझौता है जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल राज्य के बीच 1814-16 के आंग्ल-नेपाल युद्ध (गोरखा युद्ध) को खत्म किया। इस पर आज के बिहार में स्थित सुगौली में 2 दिसंबर 1815 को दस्तखत हुए। लेकिन इसका अनुमोदन (ratification) 4 मार्च 1816 को हुआ, जब अंग्रेजों का दूसरा अभियान काठमांडू की ओर बढ़ चुका था। इस संधि के तहत नेपाल ने तराई का निचला इलाका छोड़ा, काली नदी के पश्चिम के हर दावे से हाथ खींच लिया और अपने दरबार में एक ब्रिटिश रेजिडेंट को स्वीकार किया। यह संधि दो वजहों से अहम है। पहली, इसने काली नदी को नेपाल की पश्चिमी सीमा बनाया। दूसरी, यही रेखा आज कालापानी और लिपुलेख को लेकर भारत-नेपाल सीमा के सवाल के ठीक बीच में है।

इस संधि के बारे में दो बातें अक्सर थोड़ी गलत बताई जाती हैं। पहली बात साल की है। नोट्स में एक ही संधि के लिए कहीं 1815 लिखा मिलता है, कहीं 1816, और दोनों सही हैं। वजह यह है कि दस्तावेज पर तारीख दिसंबर 1815 की है, जबकि नेपाल ने इसका अनुमोदन मार्च 1816 में किया। दूसरी बात गोरखा सैनिकों की है। कई नोट्स कहते हैं कि संधि की किसी धारा ने अंग्रेजों को गोरखाओं की भर्ती की इजाजत दी। लेकिन एचिसन के संधि-संग्रह (Aitchison’s Collection of Treaties), यानी भारत सरकार के अपने संकलन, में दर्ज आधिकारिक पाठ में नौ अनुच्छेद हैं, और उनमें से किसी में भर्ती का जिक्र तक नहीं है। यह नोट अनुच्छेदों को वैसे ही रखता है जैसे वह पाठ उन्हें बताता है। और आज के सीमा-प्रश्न को सिर्फ उतना ही रखता है जितना हर सरकार ने आधिकारिक तौर पर कहा है।

सुगौली की संधि एक नजर में

सुगौली की संधि ने उस युद्ध को खत्म किया जो नेपाल जमकर लड़ा और दो चरणों में हारा। पहले 1815 में पश्चिमी पहाड़ियाँ हाथ से गईं, फिर 1816 में काठमांडू पर ही खतरा आ गया। नीचे की तालिका में सारी तारीखें और नाम एक जगह रखे गए हैं।

तथ्यविवरण
युद्धआंग्ल-नेपाल युद्ध, जिसे गोरखा युद्ध भी कहते हैं; 1 नवंबर 1814 को औपचारिक रूप से घोषित
गवर्नर-जनरलफ्रांसिस रॉडन-हेस्टिंग्स, अर्ल ऑफ मोइरा और बाद में मार्क्विस ऑफ हेस्टिंग्स; अक्टूबर 1813 से पद पर
दस्तखत2 दिसंबर 1815, सुगौली में (संधि के पाठ में इसकी वर्तनी Segowlee है)
दस्तखत करने वालेकंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट-कर्नल पेरिस ब्रैडशॉ; राजा गीर्वाण युद्ध विक्रम शाह की ओर से गुरु गजराज मिश्र और चंद्रशेखर उपाध्याय
अनुमोदन4 मार्च 1816, जब नेपाल के प्रतिनिधि ने दस्तखत की हुई संधि मकवानपुर घाटी में डेविड ऑक्टरलोनी को सौंपी
छोड़ी गई जमीनतराई का निचला इलाका, मेची के पूर्व की पहाड़ियाँ और काली के पश्चिम का हर दावा
पश्चिमी सीमाकाली (महाकाली) नदी, अनुच्छेद 5 के तहत
राजनयिक शर्तदोनों दरबारों में एक-दूसरे के मान्यता-प्राप्त मंत्री रहेंगे (अनुच्छेद 8); एडवर्ड गार्डनर काठमांडू में पहले ब्रिटिश रेजिडेंट बने
बाद के बदलावकोसी और राप्ती के बीच की तराई दिसंबर 1816 में लौटाई गई; काली से गोरखपुर तक का निचला इलाका 1 नवंबर 1860 की संधि से लौटा

आंग्ल-नेपाल युद्ध शुरू क्यों हुआ?

आंग्ल-नेपाल युद्ध इसलिए शुरू हुआ क्योंकि फैलती हुई दो ताकतें एक लंबी और ठीक से न खिंची सीमा पर आमने-सामने आ गईं। गोरखा राज्य आधी सदी से पहाड़ों के साथ-साथ आगे बढ़ रहा था। कंपनी के जिले उन्हीं पहाड़ों की तलहटी में फैले थे। और तराई की जिन पट्टियों पर दोनों दावा करते थे, वही झगड़े की जड़ बन गईं।

गोरखा पक्ष की कहानी पृथ्वी नारायण शाह (शासन 1742-75) से शुरू होती है। वे गोरखा नाम के पहाड़ी राज्य के शासक थे। उन्होंने 1769 में नेपाल घाटी जीती और अपनी राजधानी काठमांडू ले गए। उनके उत्तराधिकारियों की नजर भूटान से कश्मीर तक की पूरी पहाड़ी पट्टी पर थी। फिर भीमसेन थापा के संरक्षक-शासन (regency) के दौरान नेपाली शासन पश्चिम में काली से सतलुज तक फैला दिया गया।

मैदानों में झगड़ा जमीन का था। एचिसन सीमा के मामलों को एक के बाद एक गिनाते हैं:

  • 1804 में नेपाल ने बुटवल और शिवराज (Sheoraj) के परगनों पर कब्जा कर लिया। ये परगने अवध के वजीर ने कंपनी को सौंपे थे। नेपाल का तर्क था कि ये पाल्पा के थे, जो एक पहाड़ी राज्य था और जिसे नेपाल ने अभी-अभी अपने अधीन किया था।
  • 1808 में मोरंग के नेपाली गवर्नर ने पूर्णिया की सीमा पर भीमनगर की पूरी जमींदारी ले ली। जून 1809 में एक ब्रिटिश टुकड़ी वहाँ पहुँची, और 1810 में नेपाल ने वे जमीनें छोड़ दीं।
  • 1811 में बुटवल और बेतिया की सीमाओं पर नए कब्जे हुए, और इन्हीं से सीमा पर पहली झड़प हुई।

इसके बाद एक संयुक्त आयोग ने दोनों के दावों की जाँच की और फैसला कंपनी के पक्ष में दिया। लेकिन नेपाल ने जमीनें वापस नहीं कीं। लॉर्ड हेस्टिंग्स (मोइरा) ने एक समय-सीमा तय की, कोई जवाब नहीं आया, और अप्रैल 1814 के मध्य में उन्होंने विवादित जिलों पर कब्जा कर लिया। देहरादून गजेटियर यह भी जोड़ता है कि इस विवाद का अंत गोरखपुर जिले में एक पुलिस अफसर की हत्या के साथ हुआ। युद्ध की औपचारिक घोषणा 1 नवंबर 1814 को हुई।

यहाँ एक नाम पर लगभग हर कोई अटकता है। इस युद्ध वाले हेस्टिंग्स फ्रांसिस रॉडन-हेस्टिंग्स हैं, जो अक्टूबर 1813 में अर्ल ऑफ मोइरा के रूप में भारत आए थे। ये वॉरेन हेस्टिंग्स नहीं हैं, जो पहले गवर्नर-जनरल थे। गवर्नर-जनरल और वायसरायों की सूची दोनों को उनकी सही जगह पर रखती है।

आंग्ल-नेपाल युद्ध कैसे लड़ा गया

कंपनी ने एक साथ चार मोर्चों पर हमला किया। दो टुकड़ियाँ नाकाम रहीं और दो कामयाब हुईं। युद्ध का फैसला 1815 में पश्चिमी पहाड़ियों में हो गया, और नेपाल को अनुमोदन के लिए मजबूर करने के लिए 1816 में एक छोटा दूसरा अभियान चलाना पड़ा। देहरादून गजेटियर पूरी योजना इस तरह बताता है:

  • मेजर-जनरल मार्ले, बिहार में लगभग 8,000 सैनिकों के साथ, जिन्हें काठमांडू की ओर कूच करने का आदेश था;
  • मेजर-जनरल जे. एस. वुड, गोरखपुर से लगभग 4,000 सैनिकों के साथ;
  • मेजर-जनरल गिलेस्पी, 3,500 सैनिकों के साथ, दून (देहरादून घाटी) को खाली कराने के लिए;
  • मेजर-जनरल डेविड ऑक्टरलोनी, सुदूर पश्चिम में, सतलुज और यमुना के बीच।

एचिसन के मुताबिक पूर्व की दोनों टुकड़ियों को कोई सफलता नहीं मिली। जबकि पश्चिम की दोनों टुकड़ियों ने एक मुश्किल अभियान के बाद काली और सतलुज के बीच का इलाका जीत लिया। इस अभियान में नेपाली सैनिक बड़े कौशल से लड़े।

नालापानी (खलंगा), अक्टूबर से नवंबर 1814

पहली लड़ाई खलंगा की घेराबंदी थी। खलंगा देहरा से लगभग साढ़े तीन मील उत्तर-पूर्व में एक पहाड़ी धार पर बना किला था। इसे कलंगा भी कहते थे, और पास के सोते के नाम पर नालापानी भी। इसे बलभद्र थामे हुए थे, जिन्हें नेपाल में बलभद्र कुंवर के नाम से जाना जाता है और ब्रिटिश गजेटियर में जिनका नाम बलभद्र सिंह थापा लिखा है। उनके साथ नियमित नेपाली सैनिक और गढ़वाली लड़ाके (levies) थे। गिलेस्पी 26 अक्टूबर 1814 को देहरा पहुँचे और चार हमलावर दलों से धावा बोलने का आदेश दिया। लेकिन असल में सिर्फ एक टुकड़ी और रिजर्व ही गंभीरता से लड़ाई में उतर पाए, और खुद हमले की अगुवाई करते हुए गिलेस्पी के दिल में गोली लगी

24 नवंबर को दिल्ली से भारी तोपों का दस्ता (battering train) पहुँचा, और उसने 26 तारीख को दीवार में दरार बना दी। फिर भी दूसरा धावा भी नाकाम रहा। गजेटियर बताता है कि तभी जाकर अंग्रेजों को पता चला कि किले के अंदर पानी है ही नहीं, और सैनिक दीवारों के बाहर के एक सोते से पानी लाते हैं। पानी काट दिया गया। फिर 30 नवंबर 1814 की रात बलभद्र अपने 70 सैनिकों के साथ बाहर निकले। पूरी सेना में से बस इतने ही बचे थे। वे ब्रिटिश चौकियों को चीरते हुए निकल गए। गजेटियर का अपना फैसला दो टूक है: जिस कदम से घेराबंदी खत्म हुई, वह एक महीना पहले ही उठाया जा सकता था।

संख्याओं पर स्रोत एकमत नहीं हैं। 1911 का गजेटियर किले की सेना को तीन या चार सौ नियमित सैनिक और साथ में लड़ाके बताता है। वहीं पर्यटन मंत्रालय का इस जगह वाला पेज 3,000 अंग्रेजों के खिलाफ 600 गोरखाओं की बात करता है। इसलिए किसी एक आँकड़े को सावधानी से लीजिए।

अंग्रेजों ने बाद में यहाँ जुड़वाँ स्तंभ (obelisks) खड़े किए। एक गिलेस्पी और उनके सैनिकों के लिए है, और दूसरा बलभद्र और उनके सैनिकों के लिए। खलंगा युद्ध स्मारक अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की देखरेख में है।

मलांव और अमर सिंह थापा का आत्मसमर्पण, 1815

पश्चिमी अभियान ऑक्टरलोनी के हाथ में था। वे सतलुज और यमुना के बीच की पहाड़ियों में धीरे-धीरे ऊपर बढ़ते गए। मलांव के आसपास की लड़ाई के बाद उन्होंने पश्चिम में नेपाली सेनापति अमर सिंह थापा को 15 मई 1815 को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया। अमर सिंह ने हर नेपाली सैनिक को काली के पूर्व में वापस बुला लिया, और कुमाऊँ से सतलुज तक नेपाल के सारे इलाके छोड़ दिए।

कुमाऊँ एक ब्रिटिश जिला बन गया। दून का प्रशासन अंग्रेजों ने संभाला और बाद में उसे औपचारिक रूप से अपने राज में मिला लिया। बाकी पहाड़ी इलाका उन राजाओं और सरदारों को लौटा दिया गया जिनसे गोरखाओं ने उसे छीना था।

1816 का मकवानपुर की ओर अभियान

पश्चिम हाथ से निकलने के बाद नेपाल बातचीत को तैयार था। लेकिन तराई छोड़ने के सवाल पर बातचीत दो बार टूटी। तराई पहाड़ियों की तलहटी में फैली उपजाऊ निचली पट्टी है। हेस्टिंग्स ने पेशकश की कि तराई की अनुमानित कीमत के बराबर रकम नेपाल को हर साल दी जाएगी। इसी आधार पर नेपाल के आयुक्तों ने 2 दिसंबर 1815 को सुगौली में दस्तखत कर दिए।

काठमांडू दरबार ने अनुमोदन से इनकार कर दिया, और फरवरी 1816 की शुरुआत में कहा कि वह फिर से युद्ध छेड़ेगा। ऑक्टरलोनी काठमांडू की ओर बढ़े और 28 फरवरी 1816 को मकवानपुर के पास नेपालियों को हरा दिया। इसके बाद नेपाल के प्रतिनिधि चंद्रशेखर उपाध्याय वही संधि, अब दस्तखत के साथ, 4 मार्च 1816 की दोपहर मकवानपुर घाटी में ऑक्टरलोनी के शिविर में लेकर आए।

सुगौली की संधि में क्या लिखा था?

सुगौली की संधि छोटी है: लगभग दो छपे पन्नों पर कुल नौ अनुच्छेद। नीचे सुगौली की संधि के अनुच्छेद वैसे ही दिए गए हैं जैसे एचिसन का पाठ उन्हें बताता है। जगहों के नाम आज की वर्तनी में लिखे गए हैं:

  • अनुच्छेद 1: कंपनी और नेपाल के राजा के बीच स्थायी शांति और मित्रता।
  • अनुच्छेद 2: युद्ध से पहले जिन जमीनों पर विवाद था, उन पर नेपाल हर दावा छोड़ता है और उन पर कंपनी की संप्रभुता मानता है।
  • अनुच्छेद 3: नेपाल हमेशा के लिए ये इलाके सौंपता है: (i) काली और राप्ती के बीच का निचला इलाका, (ii) बुटवल खास को छोड़कर राप्ती और गंडक के बीच का निचला इलाका, (iii) गंडक और कोसी के बीच का वह निचला इलाका जहाँ ब्रिटिश सत्ता लागू हो चुकी थी या हो रही थी, (iv) मेची और तीस्ता के बीच का निचला इलाका, और (v) मेची के पूर्व का पहाड़ी इलाका, जिसमें नगरी का किला और नगरकोट दर्रा शामिल हैं; गोरखा सैनिक 40 दिनों के भीतर ये इलाके खाली कर देंगे।
  • अनुच्छेद 4: सौंपे गए इलाकों से आमदनी खोने वाले सरदारों और बारहदारों (दरबारियों) के लिए कुल दो लाख रुपये सालाना की पेंशन।
  • अनुच्छेद 5: नेपाल काली के पश्चिम के देशों पर हर दावा छोड़ता है, और वादा करता है कि उनसे या उनके लोगों से कभी कोई वास्ता नहीं रखेगा।
  • अनुच्छेद 6: नेपाल सिक्किम के राजा को परेशान नहीं करेगा, और सिक्किम से कोई भी विवाद ब्रिटिश मध्यस्थता (arbitration) के पास जाएगा।
  • अनुच्छेद 7: नेपाल ब्रिटिश सहमति के बिना किसी ब्रिटिश प्रजा को, या किसी यूरोपीय या अमेरिकी राज्य की प्रजा को, नौकरी पर नहीं रखेगा।
  • अनुच्छेद 8: दोनों राज्यों के मान्यता-प्राप्त मंत्री एक-दूसरे के दरबार में रहेंगे।
  • अनुच्छेद 9: राजा 15 दिनों के भीतर और गवर्नर-जनरल 20 दिनों के भीतर संधि का अनुमोदन करेंगे।

अब सूची को एक बार फिर पढ़िए, इस बार यह देखने के लिए कि इसमें क्या नहीं है। इसमें नेपाल के खर्च पर रहने वाली कोई ब्रिटिश सेना नहीं है, कोई खिराज (tribute) नहीं है और भर्ती की कोई धारा नहीं है। अनुच्छेद 8 से कंपनी को काठमांडू में ब्रिटिश रेजिडेंट मिला। और इस पर ब्रिटानिका की व्याख्या बिल्कुल सटीक है: उसका दर्जा किसी स्वतंत्र देश में राजदूत का था, किसी आश्रित भारतीय रियासत पर नियंत्रण रखने वाले एजेंट का नहीं।

अनुच्छेद 7 का मकसद यह था कि कोई प्रतिद्वंद्वी यूरोपीय ताकत नेपाल की सेना को प्रशिक्षण न दे सके। अनुच्छेद 6 ने कंपनी को सिक्किम के मामलों में दखल का हक दे दिया। अनुच्छेद 3 के तहत छोड़े गए मेची के पूर्व के इलाके, और मेची और तीस्ता के बीच की तराई, सिक्किम को सौंप दिए गए।

नेपाल ने क्या खोया और क्या वापस पाया

काली के पश्चिम में नेपाल ने कुमाऊँ, गढ़वाल और सतलुज तक के पहाड़ी राज्य खो दिए। अमर सिंह ये इलाके पहले ही छोड़ चुके थे, और अनुच्छेद 5 ने इस नुकसान को स्थायी बना दिया। दक्षिण और पूर्व में उसने तराई की पट्टियाँ और मेची के पार की पहाड़ियाँ खोईं। लेकिन तराई का नुकसान टिका नहीं, और यही वह हिस्सा है जिसे ज्यादातर नोट्स छोड़ देते हैं।

दिसंबर 1816: तराई की वापसी

8 दिसंबर 1816 को रेजिडेंट एडवर्ड गार्डनर ने पेशकश की कि कोसी, गंडक और राप्ती के बीच की ज्यादातर तराई, बुटवल और शिवराज समेत, नेपाल को लौटा दी जाएगी। शर्त यह थी कि नेपाल अनुच्छेद 4 के तहत मिलने वाली दो लाख रुपये की पेंशन छोड़ दे। नेपाल ने 11 दिसंबर 1816 को यह मान लिया। यानी सौदा पैसे के बदले जमीन का था। और आगे पश्चिम में, काली की ओर की तराई, अवध को चली गई।

इस ज्ञापन (memorandum) में यह भी माना गया कि दोनों राज्यों की सीमाएँ सर्वे के बिना तय नहीं हो सकतीं। इसलिए इसमें दोनों तरफ के आयुक्तों से एक सीधी सीमा-रेखा खींचने को कहा गया।

1860: 1857 का इनाम

दूसरी वापसी 1857 में नेपाल की मदद का इनाम थी। तब नेपाल ने सीमावर्ती जिलों के लिए सैनिक दिए थे, और लखनऊ को फिर से जीतने में मदद के लिए एक फौज भी भेजी थी। 1 नवंबर 1860 की संधि पर रेजिडेंट जॉर्ज रैमसे और जंग बहादुर राणा ने दस्तखत किए। इसके जरिए अंग्रेजों ने काली से गोरखपुर जिले तक का वह निचला इलाका लौटा दिया, जिसे नेपाल ने 1815 में छोड़ा था। काली (शारदा) से पूर्व की ओर खंभों से चिह्नित एक रेखा अवध के साथ सीमा बनी, और लॉर्ड कैनिंग ने 15 नवंबर 1860 को संधि का अनुमोदन किया।

दस्तावेजतारीखइसने क्या किया
सुगौली की संधिदस्तखत 2 दिसंबर 1815, अनुमोदन 4 मार्च 1816युद्ध खत्म किया; तराई और काली के पश्चिम की जमीनें लीं; काठमांडू में रेजिडेंट
ज्ञापन और नेपाल की स्वीकृति8 और 11 दिसंबर 1816कोसी और राप्ती के बीच की ज्यादातर तराई लौटाई; अनुच्छेद 4 की पेंशन खत्म
नेपाल के साथ संधि1 नवंबर 1860काली से गोरखपुर तक का निचला इलाका लौटाया; अवध के साथ खंभों वाली रेखा तय की

गोरखा सैनिक और कंपनी की सेना

कंपनी ने गोरखा सैनिकों की भर्ती युद्ध के दौरान ही शुरू कर दी थी, संधि की वजह से नहीं। विंचेस्टर का गुरखा म्यूजियम बताता है कि भर्ती से जुड़ी शर्तें 1815 में अमर सिंह थापा के आत्मसमर्पण समझौते में ही आ गई थीं, और 1816 के अंत तक चार गुरखा बटालियनें बन चुकी थीं। भारतीय सेना की 1 गोरखा राइफल्स आज भी ‘द मलांव रेजिमेंट’ का खिताब रखती है।

राणा परिवार के शासन में भर्ती एक नियमित बात बन गई। ब्रिटानिका 1860 के बाद के एक व्यावहारिक (de facto) गठबंधन का जिक्र करती है। इसमें काठमांडू ने ब्रिटिश भारतीय सेना की गुरखा टुकड़ियों के लिए भर्ती की इजाजत दी और विदेश नीति पर ब्रिटिश सलाह मानी। बदले में अंग्रेजों ने राणा शासन की गारंटी दी। फिर 1923 में एक औपचारिक आंग्ल-नेपाल संधि हुई।

गोरखा उस पहाड़ी राज्य का नाम है, और गुरखा उसी शब्द की ब्रिटिश वर्तनी है। भारतीय रेजिमेंटें पहला रूप इस्तेमाल करती हैं और ब्रिटिश सेना दूसरा। गोरखा बटालियनें उस बड़ी कहानी का हिस्सा हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने ज्यादातर भारतीय सैनिकों से बनी सेना कैसे खड़ी की।

सुगौली की संधि क्यों अहम थी?

सुगौली की संधि ने अगली एक सदी के लिए कंपनी और नेपाल के रिश्तों की शर्तें तय कर दीं:

  • नेपाल के लिए: उसने कुमाऊँ से सतलुज तक सब कुछ खो दिया, और इसके साथ हिमालयी साम्राज्य की उम्मीद भी। लेकिन उसने अपनी आजादी और अपनी सरकार बचाए रखी, और उसे जो रेजिडेंट मिला वह राजदूत था, नियंत्रक नहीं।
  • कंपनी के लिए: उसे काली और सतलुज के बीच की पहाड़ियाँ मिलीं, कुमाऊँ और दून ब्रिटिश शासन में आ गए, और मराठों से हेस्टिंग्स के युद्ध से पहले उत्तरी सीमा स्थिर हो गई।
  • नक्शे के लिए: इसने काली को कागज पर नेपाल की पश्चिमी सीमा के रूप में दर्ज किया। उस सीमा पर बाद की हर चर्चा इसी को आधार मानती है।

संधि की कमजोरी उसके छोटे होने का ही दूसरा पहलू है। यह नदियों के नाम तो लेती है, पर उनके उद्गम नहीं बताती। यह निचले इलाकों का वर्णन करती है, पर सर्वे की हुई रेखाओं के बिना। इसीलिए 1816 के ज्ञापन को ही जमीन पर सीमा तय करने के लिए आयुक्तों की जरूरत पड़ गई थी।

सुगौली सीमा आज: कालापानी और लिपुलेख

यह संधि अनुच्छेद 5 के एक वाक्य की वजह से फिर खबरों में है। यह वाक्य काली नदी को सीमा बनाता है। आज भारत और नेपाल की सरकारें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा के आसपास के इलाके को लेकर असहमत हैं, और दोनों अपनी स्थिति के लिए इतिहास का हवाला देती हैं। यह नोट हर सरकार की स्थिति उसी के आधिकारिक शब्दों में रखता है और किसी का पक्ष नहीं लेता। यहाँ जान-बूझकर कोई नक्शा नहीं दिया गया है।

नेपाल की स्थिति, जैसा उसके विदेश मंत्रालय (MoFA) ने मई 2020 में कहा, यह है कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार काली (महाकाली) नदी के पूर्व के सारे इलाके, जिनमें लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपु लेख शामिल हैं, नेपाल के हैं। नेपाल का कहना है कि भारत के नया राजनीतिक नक्शा जारी करने के बाद उसने 20 नवंबर 2019 के एक राजनयिक नोट में यह बात भारत को बता दी थी। मई 2020 में नेपाल ने एक संशोधित आधिकारिक नक्शा जारी किया। और 13 जून 2020 को उसकी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) ने उस नक्शे को राष्ट्रीय चिह्न में शामिल करने के लिए एक संविधान संशोधन पारित किया।

भारत की स्थिति विदेश मंत्रालय (MEA) के कई बयानों में सामने आई है:

  • भारत के नए नक्शे पर MEA ने कहा कि इसमें नेपाल के साथ सीमा को किसी भी तरह से संशोधित नहीं किया गया है, और सीमा निर्धारण (delineation) का काम मौजूदा तंत्र के तहत जारी है।
  • 20 मई 2020 को उसने नेपाल के संशोधित नक्शे को एकतरफा कार्रवाई कहा, जो ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित नहीं है। उसने यह भी कहा कि क्षेत्रीय दावों का ऐसा कृत्रिम विस्तार स्वीकार नहीं किया जाएगा।
  • 13 जून 2020 को, नेपाल के निचले सदन से संशोधन पारित होने के बाद, उसने कहा कि दावों का यह विस्तार ऐतिहासिक तथ्य या साक्ष्य पर आधारित नहीं है और टिकने योग्य नहीं है।
  • अगस्त 2025 में, भारत और चीन के लिपुलेख के रास्ते सीमा व्यापार फिर शुरू करने पर सहमत होने के बाद, उसने कहा कि यह व्यापार 1954 में शुरू हुआ था। उसने नेपाल के दावों को न तो उचित बताया और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित, और कहा कि भारत नेपाल के साथ रचनात्मक बातचीत के लिए खुला है।
  • 4 मई 2026 को, जब नेपाल ने लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा पर आपत्ति जताते हुए भारत और चीन को राजनयिक नोट भेजे, तो उसने क्षेत्रीय दावों के ऐसे एकतरफा कृत्रिम विस्तार को टिकने योग्य नहीं बताया।

दोनों सरकारें कहती हैं कि यह सवाल बातचीत से सुलझना चाहिए। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने बाद में संसद में कहा है कि इसे एकतरफा नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, जैसा कि भारत-नेपाल संबंधों के नए दौर वाला नोट बताता है। सीमा प्रबंधन का काम साथ-साथ चलता रहता है। 14वीं भारत-नेपाल संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group) की बैठक 20 और 21 अगस्त 2026 को देहरादून में हुई, यानी उसी शहर में जहाँ इस युद्ध की पहली लड़ाई हुई थी। यह बात संयुक्त कार्य समूह की रिपोर्ट में दर्ज है।

सीमा अपने आप में खुली है। यह उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम से होकर 1,751 किलोमीटर चलती है, और भारत की ओर से इसकी निगरानी सशस्त्र सीमा बल करता है। बड़े रिश्ते की पूरी बात भारत-नेपाल संबंधों पर और खुद नेपाल पर लिखे नोट्स में है।

परीक्षा के लिए सुगौली की संधि कैसे पढ़ें

आधुनिक भारतीय इतिहास में आंग्ल-नेपाल युद्ध ब्रिटिश सत्ता के विस्तार वाले हिस्से में आता है, मराठा और मैसूर युद्धों के साथ। और सुगौली की संधि GS पेपर II के भारत-नेपाल वाले हिस्से में फिर से लौटती है। प्रीलिम्स तथ्य पूछता है, और Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 सवालों में से 184 इतिहास के हैं।

मुख्य परीक्षा शायद ही कभी सिर्फ नेपाल पर सवाल पूछती है। वह यह पूछती है कि कंपनी बार-बार जीतती क्यों रही। मुख्य परीक्षा 2022 के GS पेपर I में पूछा गया था “ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाएँ, जिनमें ज्यादातर भारतीय सैनिक थे, तत्कालीन भारतीय शासकों की संख्या में ज्यादा और बेहतर हथियारों से लैस सेनाओं के खिलाफ लगातार क्यों जीतती रहीं? कारण बताइए।” इस जवाब के लिए नालापानी एक सटीक उदाहरण है। वहाँ कंपनी की टुकड़ी ने अपना जनरल खो दिया, फिर भी पानी काटकर जीत गई।

ये सात तथ्य तब तक दोहराइए जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएँ:

  • युद्ध की औपचारिक घोषणा 1 नवंबर 1814 को, लॉर्ड हेस्टिंग्स (अर्ल ऑफ मोइरा) के समय।
  • खलंगा (नालापानी): गिलेस्पी मारे गए; बलभद्र ने 30 नवंबर 1814 को किला छोड़ा।
  • अमर सिंह थापा ने 15 मई 1815 को ऑक्टरलोनी के सामने हथियार डाले।
  • संधि पर दस्तखत 2 दिसंबर 1815 को, और मकवानपुर अभियान के बाद 4 मार्च 1816 को अनुमोदन।
  • अनुच्छेद 5: नेपाल काली (महाकाली) के पश्चिम का सब कुछ छोड़ता है।
  • अनुच्छेद 8: दोनों दरबारों में मान्यता-प्राप्त मंत्री; एडवर्ड गार्डनर पहले रेजिडेंट।
  • तराई दिसंबर 1816 में लौटी, और फिर 1 नवंबर 1860 की संधि से।

भ्रम जोड़ों में आते हैं, और इन्हें अलग-अलग रखना आधा काम है:

  • मार्क्विस ऑफ हेस्टिंग्स (नेपाल युद्ध, 1814-16) और वॉरेन हेस्टिंग्स (पहले गवर्नर-जनरल)।
  • 1815 में दस्तखत और 1816 में अनुमोदन; दोनों साल एक ही संधि के हैं।
  • काली (पश्चिमी सीमा) और मेची (नेपाल-सिक्किम व्यवस्था का पूर्वी छोर)।
  • गोरखा भर्ती (मलांव के बाद 1815 में शुरू) और संधि के नौ अनुच्छेद (भर्ती की कोई धारा नहीं)।

सबसे तीखी तुलना उन संधियों से है जो कंपनी ने भारतीय शासकों के साथ कीं। इस तालिका का दूसरा आधा हिस्सा सहायक संधि वाले नोट में मिलेगा:

बिंदुसुगौली की संधि (1815-16)सहायक संधि वाली कोई संधि
राज्य के अंदर ब्रिटिश सेनाकोई नहींशासक के खर्च पर तैनात ब्रिटिश सेना
रेजिडेंट की भूमिकामान्यता-प्राप्त मंत्री, राजदूत के दर्जे के साथदरबार पर नियंत्रण रखने वाला असर
नौकरी में यूरोपीयब्रिटिश सहमति के बिना मनाही (अनुच्छेद 7)ब्रिटिश सहमति के बिना मनाही
विदेश संबंधनेपाल ने अपने पास रखे, सिक्किम को लेकर कुछ पाबंदियों के साथकंपनी को सौंप दिए गए
जमीनतराई और पश्चिमी पहाड़ियाँ छोड़ी गईं; बाद में तराई का बड़ा हिस्सा लौटासेना का खर्च चुकाने के लिए अक्सर इलाका सौंपा गया

सुगौली की संधि को कंपनी का वह युद्ध मानिए जो किसी सहायक राज्य के बने बिना खत्म हुआ। अगर आप यह समझा सकें कि अपना पश्चिमी साम्राज्य खोकर भी नेपाल ने अपनी आजादी कैसे बचाई, और 1815 का नदी वाला एक खंड आज के सीमा-प्रश्न तक कैसे पहुँचता है, तो वही दो पन्ने इतिहास के पेपर और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के पेपर, दोनों में काम आएँगे।

सामान्य प्रश्न

सुगौली की संधि क्या है?

सुगौली की संधि वह शांति संधि है जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच 1814-16 के आंग्ल नेपाल युद्ध को खत्म किया। नेपाल ने तराई का निचला इलाका, मेची के पूर्व की पहाड़ियाँ और काली नदी के पश्चिम का हर दावा छोड़ दिया। उसने मान्यता-प्राप्त मंत्रियों की अदला-बदली भी मानी, जिससे काठमांडू में एक ब्रिटिश रेजिडेंट आया। नेपाल की आजादी बनी रही।

सुगौली की संधि पर दस्तखत और अनुमोदन कब हुए?

आज के बिहार में स्थित सुगौली में इस पर 2 दिसंबर 1815 को दस्तखत हुए, और 4 मार्च 1816 को इसका अनुमोदन हुआ। नेपाल ने पहले अनुमोदन से इनकार कर दिया था। वह तभी राजी हुआ जब फरवरी 1816 में ऑक्टरलोनी के नेतृत्व में दूसरा ब्रिटिश अभियान काठमांडू की ओर बढ़ा। इसीलिए एक ही संधि के लिए 1815 और 1816, दोनों साल लिखे मिलते हैं।

आंग्ल-नेपाल युद्ध के समय गवर्नर-जनरल कौन था?

गवर्नर-जनरल फ्रांसिस रॉडन-हेस्टिंग्स थे, जो उस समय अर्ल ऑफ मोइरा थे और बाद में मार्क्विस ऑफ हेस्टिंग्स बने। उन्होंने अक्टूबर 1813 में पद संभाला था। वे पहले गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स से अलग व्यक्ति हैं, जो इससे बहुत पहले भारत छोड़ चुके थे।

सुगौली की संधि के तहत नेपाल ने कौन-से इलाके खोए?

नेपाल ने काली नदी के पश्चिम की जमीनें खोईं, जिनमें कुमाऊँ, गढ़वाल और सतलुज तक के पहाड़ी राज्य थे। इनके साथ तराई का निचला इलाका और मेची के पूर्व की पहाड़ियाँ भी गईं। मेची के पूर्व की जमीनें, और मेची और तीस्ता के बीच की तराई, सिक्किम को सौंप दी गईं।

नालापानी के युद्ध में क्या हुआ?

नालापानी का युद्ध, जिसे खलंगा की लड़ाई भी कहते हैं, अक्टूबर और नवंबर 1814 में देहरादून के पास एक पहाड़ी किले की घेराबंदी थी, और यही इस युद्ध की पहली लड़ाई थी। पहले धावे की अगुवाई करते हुए मेजर-जनरल गिलेस्पी मारे गए। बलभद्र के नेतृत्व में किले की सेना तब तक डटी रही जब तक अंग्रेजों ने उसका पानी नहीं काट दिया। 30 नवंबर 1814 की रात बलभद्र 70 सैनिकों के साथ किला छोड़कर निकल गए। अंग्रेजों ने बाद में वहाँ जुड़वाँ स्मारक बनाए, दोनों पक्षों के लिए एक-एक।

क्या सुगौली की संधि ने अंग्रेजों को गोरखा भर्ती की इजाजत दी थी?

नहीं। एचिसन के आधिकारिक संग्रह में संधि के पाठ में नौ अनुच्छेद हैं, और उनमें से कोई भी भर्ती से जुड़ा नहीं है। कंपनी ने गोरखा सैनिकों की भर्ती युद्ध के दौरान ही, 1815 में मलांव में अमर सिंह थापा के आत्मसमर्पण के बाद, शुरू कर दी थी। और 1816 के अंत तक उसके पास चार गुरखा बटालियनें थीं।

सुगौली की संधि का कालापानी विवाद से क्या संबंध है?

कालापानी विवाद की जड़ संधि के अनुच्छेद 5 में है, जो काली नदी को नेपाल की पश्चिमी सीमा बनाता है। नेपाल सरकार का मानना है कि इस संधि के तहत काली के पूर्व के सारे इलाके, जिनमें लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख शामिल हैं, नेपाल के हैं। भारत सरकार कहती है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित नहीं हैं और टिकने योग्य नहीं हैं। दोनों पक्ष कहते हैं कि यह सवाल बातचीत से सुलझना चाहिए।

क्या सुगौली की संधि के बाद नेपाल को कोई जमीन वापस मिली?

हाँ, दो बार। दिसंबर 1816 में अंग्रेजों ने कोसी और राप्ती के बीच की ज्यादातर तराई लौटा दी, और बदले में नेपाल ने अनुच्छेद 4 में वादा की गई पेंशन छोड़ दी। फिर 1 नवंबर 1860 की संधि से उन्होंने काली से गोरखपुर जिले तक का निचला इलाका लौटाया। यह 1857 के विद्रोह के दौरान नेपाल की मदद का इनाम था।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. सुगौली की संधि के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस पर दिसंबर 1815 में सुगौली में दस्तखत हुए थे। 2. नेपाल ने 1816 में दूसरे ब्रिटिश अभियान के बाद ही इसका अनुमोदन किया। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c) संधि पर 2 दिसंबर 1815 की तारीख है, और नेपाल ने ऑक्टरलोनी के काठमांडू की ओर बढ़ने के बाद 4 मार्च 1816 को इसका अनुमोदन किया।

2. सुगौली की संधि के तहत कौन-सी नदी वह पश्चिमी सीमा बनी, जिसके आगे के सभी दावे नेपाल ने छोड़ दिए?

  • (a) मेची
  • (b) काली
  • (c) गंडक
  • (d) तीस्ता

उत्तर: (b) अनुच्छेद 5 के तहत नेपाल ने काली (महाकाली) के पश्चिम के देशों पर सभी दावे छोड़ दिए।

3. सुगौली की संधि की शर्तों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. नेपाल काठमांडू में एक ब्रिटिश सहायक सेना रखने पर सहमत हुआ। 2. नेपाल ब्रिटिश सहमति के बिना किसी यूरोपीय या अमेरिकी प्रजा को नौकरी पर न रखने पर सहमत हुआ। 3. नेपाल सिक्किम के साथ अपने विवाद ब्रिटिश मध्यस्थता को सौंपने पर सहमत हुआ। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) अनुच्छेद 7 और 6 में कथन 2 और 3 की बातें हैं; संधि ने नेपाल में कोई ब्रिटिश सेना नहीं रखी।

4. 1814-16 के आंग्ल-नेपाल युद्ध के समय भारत का गवर्नर-जनरल कौन था?

  • (a) लॉर्ड वेलेजली
  • (b) लॉर्ड मिंटो
  • (c) लॉर्ड मोइरा (मार्क्विस ऑफ हेस्टिंग्स)
  • (d) लॉर्ड एमहर्स्ट

उत्तर: (c) फ्रांसिस रॉडन-हेस्टिंग्स, अर्ल ऑफ मोइरा, ने अक्टूबर 1813 में पद संभाला और यही युद्ध चलाया।

5. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. नालापानी: बलभद्र द्वारा खलंगा किले की रक्षा 2. मलांव: अमर सिंह थापा का ऑक्टरलोनी के सामने आत्मसमर्पण 3. मकवानपुर: मेजर-जनरल गिलेस्पी की मृत्यु। ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 1 और 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) गिलेस्पी 1814 में नालापानी में मारे गए थे, मकवानपुर में नहीं, जहाँ ऑक्टरलोनी ने 1816 में जीत हासिल की।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाएँ, जिनमें ज्यादातर भारतीय सैनिक थे, तत्कालीन भारतीय शासकों की संख्या में ज्यादा और बेहतर हथियारों से लैस सेनाओं के खिलाफ लगातार क्यों जीतती रहीं? कारण बताइए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2022, GS पेपर I।
  2. 1814-16 का आंग्ल-नेपाल युद्ध पश्चिमी पहाड़ियों में जीता गया, लेकिन उसका निपटारा तराई के सवाल पर हुआ। चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  3. सुगौली की संधि उन सहायक संधियों से कैसे अलग थी जो ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय शासकों के साथ कीं? परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  4. 1816 और 1860 में सुगौली व्यवस्था में हुए बदलावों को क्रम से बताइए। ये हिमालय में कंपनी की सीमांत नीति के बारे में क्या बताते हैं? (15 अंक, 250 शब्द)
  5. 1815 में हुई एक संधि आज भी भारत-नेपाल संबंधों को आकार देती है। कालापानी और लिपुलेख के सवाल और दोनों सरकारों की आधिकारिक स्थितियों के संदर्भ में इसका परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

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Written by

Ashish Shrivastav Sir

Ashish Shrivastav teaches Art and Culture and History at Anantam IAS. He works through temple architecture, painting, dance and the UNESCO sites the way Prelims actually asks about them, and links ancient and medieval material to GS I Mains answers.

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