INTUC, यानी इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस, मई 1947 में कांग्रेस के मजदूर संगठन के रूप में बनी केंद्रीय यूनियन है। भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन की कहानी में यह ठीक बीच में खड़ी है। इससे पहले AITUC आई, जिसकी स्थापना अक्टूबर 1920 में बॉम्बे में हुई। इसके बाद 1948 से 1970 के बीच समाजवादी, RSS से जुड़े और मार्क्सवादी महासंघ आए। इन सबको मिलाकर देखें तो पता चलता है कि भारतीय मजदूरों ने खुद को कैसे संगठित किया। यह सफर 1890 में मिल मजदूरों की एक अर्जी से शुरू होता है और उन चार श्रम संहिताओं तक पहुंचता है जो 21 नवंबर 2025 से लागू हुईं।
ज्यादातर पाठक दो गलत धारणाओं के साथ यह विषय पढ़ना शुरू करते हैं। पहली धारणा यह है कि INTUC भारत की पहली यूनियन थी। असल में वह एक टूटकर बना संगठन था: पुराना महासंघ कम्युनिस्ट नेतृत्व के हाथ में जा रहा था, इसलिए कांग्रेस ने अपना अलग महासंघ बना लिया। दूसरी धारणा यह है कि AITUC जन्म से ही कम्युनिस्ट थी। जबकि उसके पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे, जो एक राष्ट्रवादी नेता थे। यह नोट दोनों भ्रम दूर करता है, और हर केंद्रीय यूनियन की तारीख वैसे ही बताता है जैसे स्रोत बताते हैं।
एक नजर में भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन
ट्रेड यूनियन मजदूरों का एक स्थायी संगठन है, जो मजदूरी और काम की शर्तों पर मालिकों से मोलभाव करने के लिए बनता है। भारत में यह आंदोलन तीन दौर से गुजरा। 1918 से पहले कल्याण संघ थे। 1920 से 1947 तक राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े महासंघ रहे। और आजादी के बाद राजनीतिक दलों से जुड़ी केंद्रीय यूनियनें बनीं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| मजदूरों का पहला संघ | बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन, 1890, एन. एम. लोखंडे के नेतृत्व में |
| पहली संगठित यूनियन | मद्रास लेबर यूनियन, 1918, बी. पी. वाडिया के नेतृत्व में |
| पहला केंद्रीय महासंघ | AITUC, बॉम्बे, अक्टूबर 1920; पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय |
| यूनियनों का पहला कानून | ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 (1926 का अधिनियम संख्या 16), 1 जून 1927 से लागू |
| INTUC | 3 मई 1947 को नई दिल्ली में कांग्रेस के मजदूर संगठन के रूप में स्थापित |
| बाद की केंद्रीय यूनियनें | HMS 1948, UTUC 1949, BMS 1955, CITU 1970 |
| संवैधानिक आधार | अनुच्छेद 19(1)(c), संघ या यूनियन बनाने का अधिकार |
| आज लागू कानून | औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, 21 नवंबर 2025 से लागू |
| आखिरी पूरा हुआ सदस्यता सत्यापन | गणना की तारीख 31 दिसंबर 2002; नतीजे जनवरी 2008 में प्रकाशित |
ट्रेड यूनियन क्या है और कानून उसे कैसे देखता है
ट्रेड यूनियन सामूहिक सौदेबाजी (collective bargaining) के लिए होती है। इसका मतलब है कि मजदूर एक-एक करके नहीं, बल्कि एक समूह के रूप में बात करते हैं। अकेला मिल मजदूर वेतन बढ़ाने की मांग करे, तो उसकी जगह गेट पर खड़े अगले आदमी को रखा जा सकता है। लेकिन पांच सौ मजदूर एक साथ मांग करें, तो ऐसा नहीं हो सकता। मोलभाव की ताकत का यही फर्क यूनियनों के होने की असली वजह है।
यूनियन बनाने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 19(1)(c) नागरिकों को संघ या यूनियन बनाने की आजादी देता है, जिस पर उचित प्रतिबंध लग सकते हैं। हड़ताल का अधिकार अलग मामला है। ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन बनाम नेशनल इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल मामले का फैसला 28 अगस्त 1961 को हुआ और 1962 में रिपोर्ट हुआ। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 19(1)(c) को उदार ढंग से पढ़ें, तब भी यूनियनों को असरदार सामूहिक सौदेबाजी या हड़ताल का गारंटीशुदा अधिकार नहीं मिलता।
पंजीकरण ही मजदूरों के एक समूह को कानूनी संस्था बनाता है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत सात या उससे ज्यादा सदस्य आवेदन कर सकते हैं। लेकिन यूनियन का पंजीकरण तभी होता है जब 10 प्रतिशत मजदूर या 100 मजदूर, इनमें से जो भी कम हो, उसके सदस्य हों। पंजीकरण के बाद तीन सुरक्षाएं मिलती हैं:
- पंजीकृत संस्था के रूप में कानूनी दर्जा, जिससे यूनियन संपत्ति रख सकती है और मुकदमा कर सकती है;
- व्यापार विवाद से पैदा हुए कुछ मामलों में दीवानी मुकदमों से छूट;
- यूनियन के वैध उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए किए गए समझौतों पर आपराधिक षड्यंत्र के आरोप से सुरक्षा।
कारखाने के स्तर की यूनियन के ऊपर महासंघ होता है। केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन (Central Trade Union Organisation) ऐसा महासंघ है जिसे श्रम और रोजगार मंत्रालय उसकी सदस्यता जांचने के बाद मान्यता देता है। यही दर्जा तय करता है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय मजदूरों की ओर से कौन बोलेगा।
भारत का पहला ट्रेड यूनियन कौन-सा था?
जवाब इस पर टिका है कि आप यूनियन किसे मानते हैं। इसीलिए पाठ्यपुस्तकों में दो नाम मिलते हैं। एन. एम. लोखंडे के नेतृत्व वाला 1890 का बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन आंदोलन की शुरुआत माना जाता है। बी. पी. वाडिया के नेतृत्व में बनी 1918 की मद्रास लेबर यूनियन पहली संगठित ट्रेड यूनियन मानी जाती है।
लोखंडे का संगठन एक संघ था, यूनियन नहीं। उसने मिल मजदूरों की शिकायतों का एक ज्ञापन तैयार किया। अप्रैल 1890 में बॉम्बे में एक बड़ी सभा की। और इन शिकायतों को अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए दीनबंधु नाम का अखबार चलाया। इस विषय पर IGNOU की इकाई साफ कहती है कि यह “किसी भी अर्थ में ट्रेड यूनियन नहीं” था। उससे पहले भी मजदूर चुप नहीं बैठे थे: 1882 से 1890 के बीच बॉम्बे और मद्रास में 24 हड़तालें हुईं।
बदलाव पहले विश्व युद्ध के साथ आया। तीन दबावों ने मजदूरों को अर्जियों से आगे बढ़ाकर स्थायी संगठन की ओर धकेला:
- युद्ध के दौरान बढ़ती कीमतें, जिनसे मजदूरी की मांग सबकी साझा मांग बन गई;
- 1917 की रूसी क्रांति, जिसने वर्ग चेतना के विचार फैलाए;
- 1919 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना, जिसने मजदूरों को एक अंतरराष्ट्रीय मंच दिया।
1918 और 1919 में वाडिया की यूनियन के बाद करीब 14 और यूनियनें बनीं। उसी साल, यानी 1918 में, गांधी ने अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों के काम की शर्तों से जुड़े एक विवाद में दखल दिया। यह उन तीन स्थानीय अभियानों में से एक था (चंपारण और खेड़ा के साथ) जिनसे जन आंदोलनों से पहले ही गांधी का नाम बना। अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन से गांधी करीब से जुड़े थे। इस संगठन ने औद्योगिक विवादों में अहिंसा को अपनाया, और 1930 के दशक की शुरुआत में प्रतिद्वंद्वी महासंघों से अलग रहा।
AITUC की स्थापना 1920 में कैसे हुई
AITUC प्रतिनिधित्व के एक सवाल से शुरू हुई। 1919 में वॉशिंगटन में ILO का पहला सम्मेलन हुआ। उसके लिए औपनिवेशिक सरकार ने यूनियनों से पूछे बिना भारत के मजदूर प्रतिनिधि को नामित कर दिया। इसके जवाब में 1,40,854 सदस्यों वाले 64 मजदूर संघ बॉम्बे में जुटे और उन्होंने एक केंद्रीय संस्था के रूप में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस बनाई।
तारीख को लेकर स्रोतों में एक दिन का फर्क है। भारतीय श्रम अभिलेखागार (Archives of Indian Labour) 31 अक्टूबर 1920 बताता है, और ज्यादातर पाठ्यपुस्तकें यही तारीख लेती हैं। वहीं IGNOU की एक इकाई 30 अक्टूबर बताती है। तारीख जो भी हो, संस्थापक राष्ट्रवादी थे: लाला लाजपत राय पहले अध्यक्ष चुने गए, और जोसेफ बैप्टिस्टा, एन. एम. जोशी और दीवान चमन लाल संस्थापकों में थे। मोतीलाल नेहरू, सी. आर. दास और वल्लभभाई पटेल जैसे कांग्रेस नेताओं ने इस कदम का साथ दिया।
समय पर ध्यान दीजिए। AITUC उन्हीं महीनों में बनी जब असहयोग आंदोलन चल रहा था। 1920-21 के दौरान गांधी ने मजदूरों की मांगों का समर्थन किया, और इसका असर नए-नए मजदूर आंदोलन पर पड़ा। 1924 तक AITUC के अपने रिकॉर्ड में 167 यूनियनें और करीब 2.23 लाख सदस्य दर्ज थे।
ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 और 1929 से 1941 तक के विभाजन
ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 भारत का पहला यूनियन कानून था। इसे 25 मार्च 1926 को मंजूरी मिली और यह 1 जून 1927 से लागू हुआ। इसने पंजीकृत यूनियनों को कानूनी दर्जा दिया। साथ ही जायज यूनियन गतिविधियों के लिए दीवानी मुकदमों और आपराधिक कार्रवाई से छूट भी दी। कानून लागू होने के बाद पंजीकरण बढ़ने लगे।
फिर एक के बाद एक तीन झटके लगे। जे. एच. व्हिटली की अध्यक्षता में शाही श्रम आयोग (व्हिटली आयोग) ने 1929 से 1931 तक काम की शर्तों की जांच की। 1929 में सरकार ने कम्युनिस्ट और ट्रेड यूनियन नेताओं के एक समूह को गिरफ्तार किया, जिनमें तीन अंग्रेज भी थे। यह मेरठ षड्यंत्र केस था। उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 121A के तहत सम्राट की संप्रभुता के खिलाफ साजिश का आरोप लगा, और 1933 की शुरुआत में मुकदमा खत्म होने पर 27 लोगों को दोषी ठहराया गया। इस मुकदमे ने आरोपियों को एक सार्वजनिक मंच दे दिया, और भारतीय राजनीति में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिति मजबूत की। तीसरा झटका AITUC के भीतर से आया।
विभाजन और फिर एकता
विचारधारा ने तीन साल में दो बार महासंघ को तोड़ा, और मजदूरी में कटौती ने उसे फिर जोड़ दिया। IGNOU के मुताबिक पूरा क्रम यह है:
- 1929, नागपुर अधिवेशन: नरमपंथी बाहर निकल गए और एन. एम. जोशी के नेतृत्व में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन फेडरेशन बनाया (भारतीय श्रम अभिलेखागार इसके नेता के रूप में वी. वी. गिरि का नाम लेता है)। AITUC के पास 21 यूनियनें और करीब 94,000 सदस्य बचे।
- 1931, कलकत्ता अधिवेशन: कम्युनिस्ट अलग हो गए और बी. टी. रणदिवे और एस. वी. देशपांडे के नेतृत्व में रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस बनाई।
- 1933: नरमपंथी महासंघ और रेलवे यूनियनें मिलकर नेशनल ट्रेड यूनियन फेडरेशन बन गईं।
- 1935: रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस AITUC में लौट आई।
- 1938 से 1940: वी. वी. गिरि की कोशिश से नेशनल ट्रेड यूनियन फेडरेशन नागपुर में AITUC से जुड़ा, और 1940 में पूरी तरह उसमें मिल गया।
- 1941: एम. एन. रॉय के कट्टरपंथी, जो ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का समर्थन करते थे, अलग हो गए और इंडियन फेडरेशन ऑफ लेबर बनाया।
यह पैटर्न याद रखने लायक है। फूट की कीमत मजदूरों को भारी पड़ी: 1933 में अकेले बॉम्बे शहर में 50,000 से ज्यादा मजदूरों की नौकरी गई और मजदूरी की दरें तेजी से गिरीं। एकता इसलिए लौटी क्योंकि बंटा हुआ आंदोलन मजदूरी नहीं बचा पा रहा था।
INTUC 1947 में क्यों बनी
INTUC इसलिए बनी क्योंकि कांग्रेस को ऐसा महासंघ चाहिए था जिस पर वह भरोसा कर सके। 1920 के दशक से AITUC में कम्युनिस्टों की पकड़ बढ़ रही थी, और IGNOU के अनुसार 1949 तक AITUC पर कम्युनिस्टों का दबदबा हो चुका था। 1945 में कांग्रेस कार्य समिति के एक प्रस्ताव के बाद पार्टी के मजदूर नेताओं ने अपना अलग केंद्र बनाया। स्थापना सम्मेलन नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में 3 और 4 मई 1947 को हुआ। इसकी अध्यक्षता वल्लभभाई पटेल ने की, और करीब 200 यूनियनों के प्रतिनिधि पहुंचे। INTUC का पूरा नाम इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस है।
आजादी के बाद हर नए दल ने अपनी यूनियन बनाई, और हर दल के टूटने से यूनियन भी टूटी। नीचे स्थापना के वही साल दिए गए हैं जो यूनियनें और IGNOU बताते हैं, और राजनीतिक जुड़ाव वैसे ही लिखे गए हैं जैसे स्रोतों में दर्ज हैं:
| केंद्रीय यूनियन | स्थापना | स्रोतों में राजनीतिक जुड़ाव |
|---|---|---|
| AITUC | 1920, बॉम्बे | राष्ट्रवादी संस्थापक; 1949 तक कम्युनिस्ट नेतृत्व; 1970 के बाद CPI के साथ रही |
| INTUC | मई 1947, नई दिल्ली | कांग्रेस का मजदूर संगठन |
| HMS (हिंद मजदूर सभा) | 1948 | INTUC छोड़ने वाले समाजवादियों ने बनाई, इंडियन फेडरेशन ऑफ लेबर इसमें मिल गया |
| UTUC (यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस) | 1949 | रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के नेतृत्व में |
| BMS (भारतीय मजदूर संघ) | 23 जुलाई 1955, भोपाल | RSS के कहने पर दत्तोपंत ठेंगड़ी ने स्थापना की |
| CITU (सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस) | मई 1970, कलकत्ता | कम्युनिस्ट विभाजन के बाद CPI(M) ने बनाई |
CITU का पहला सम्मेलन कलकत्ता में 28 से 31 मई 1970 तक हुआ, और बी. टी. रणदिवे इसके अध्यक्ष बने। 1972 में खुद INTUC टूटी। मोरारजी देसाई, एस. निजलिंगप्पा और के. कामराज के गुट ने नेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन बना लिया। IGNOU इस दौर को एक पंक्ति में समेटता है: भारत में किसी राजनीतिक दल के टूटने से उसके नियंत्रण वाली यूनियन भी उसी तरह टूटी है।
केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का सत्यापन और गिनती कैसे होती है
सदस्यों की गिनती एक सामान्य सत्यापन (general verification) से होती है। मंत्रालय के निर्देश पर इसे मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय) करते हैं। इसका मकसद व्यावहारिक है: इसके नतीजे से तय होता है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिषदों, समितियों और सम्मेलनों में हर महासंघ को कितना प्रतिनिधित्व मिलेगा।
अब तक सिर्फ तीन सामान्य सत्यापन पूरे हुए हैं। उनकी गणना की तारीखें 31 दिसंबर 1980, 1989 और 2002 थीं, और नतीजे 1985, दिसंबर 1996 और जनवरी 2008 में प्रकाशित हुए। केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन बनने के लिए किसी महासंघ के पास कम से कम पांच लाख सत्यापित सदस्य होने चाहिए थे, जो कम से कम चार राज्यों और चार उद्योगों में फैले हों। 2002 के दौर में तेरह महासंघ इस शर्त पर खरे उतरे।
सदस्यता सत्यापन की सबसे ताजा गिनती 2002 की ही है:
- BMS 62,15,797 सदस्यों के साथ पहले स्थान पर रहा, और यही आंकड़ा BMS भी देता है और IGNOU में छपी मंत्रालय की तालिका भी;
- INTUC करीब 39 लाख सदस्यों के साथ दूसरे स्थान पर रही;
- उसके बाद AITUC, HMS और CITU आए, हर एक के सदस्य मोटे तौर पर 26 से 35 लाख के बीच।
मंत्रालय के आंकड़े दोहराने वाली तालिकाओं में कुछ संख्याएं एक लाख तक अलग-अलग हैं, INTUC की संख्या भी इनमें है, हालांकि क्रम वही रहता है। इसलिए पहले स्थान वाले BMS के आंकड़े को पक्का मानिए और बाकी को अनुमानित।
एक नया दौर शुरू हुआ, जिसकी गणना की तारीख 31 दिसंबर 2011 थी। इसमें शर्त बढ़ाकर आठ राज्यों और आठ उद्योगों में आठ लाख सदस्य कर दी गई, और यूनियनों से 31 जनवरी 2013 तक दावे जमा करने को कहा गया। मुख्य श्रम आयुक्त के प्रकाशित रिकॉर्ड में इस दौर के अंतिम नतीजे नहीं हैं। अखबारों में इस दौर के जो आंकड़े छपे, वे यूनियनों के अपने दावे थे। यही वजह है कि 2002 आज भी संदर्भ वर्ष बना हुआ है।
आज श्रम संहिताओं के तहत ट्रेड यूनियनें
हर यूनियन की कानूनी जमीन 21 नवंबर 2025 को बदल गई। उस दिन सरकार ने चारों श्रम संहिताएं लागू कीं और 29 केंद्रीय कानूनों की जगह ले ली, जैसा उस दिन की PIB विज्ञप्ति बताती है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 इनमें से तीन कानून खत्म करती है: ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926, औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947। 1926 के अधिनियम के तहत पंजीकृत यूनियनें संहिता के तहत पंजीकृत मानी जाती हैं।
यूनियनों के लिए संहिता का सबसे बड़ा बदलाव मान्यता का कानूनी रास्ता है। अब तक कारखाने के स्तर पर मान्यता किसी केंद्रीय कानून पर नहीं, बल्कि स्वैच्छिक अनुशासन संहिता (Code of Discipline) पर टिकी थी। इसे नैनीताल में भारतीय श्रम सम्मेलन में मंजूरी मिली थी, और यह 1 जून 1958 से लागू थी। धारा 14 दो सीमाएं तय करती है:
- मस्टर रोल पर दर्ज 51 प्रतिशत या उससे ज्यादा मजदूरों के समर्थन वाली यूनियन एकमात्र वार्ताकार यूनियन (sole negotiating union) बन जाती है;
- अगर कोई यूनियन 51 प्रतिशत तक नहीं पहुंचती, तो कम से कम 20 प्रतिशत समर्थन वाली हर यूनियन को मिलाकर एक वार्ताकार परिषद (negotiating council) बनती है।
धारा 27 केंद्र और राज्यों को किसी यूनियन या महासंघ को केंद्रीय या राज्य ट्रेड यूनियन के रूप में मान्यता देने की छूट देती है, और इसकी कसौटी नियमों पर छोड़ी गई है। औद्योगिक संबंध (केंद्रीय) नियम, 2026 को 8 मई 2026 को अधिसूचित किया गया।
हड़ताल के नियम सख्त हुए। 1947 के अधिनियम के तहत सिर्फ लोक उपयोगी सेवाओं के मजदूरों को हड़ताल से पहले नोटिस देना होता था। संहिता ने यह नियम हर औद्योगिक प्रतिष्ठान पर लागू कर दिया। अब हड़ताल से पहले 60 दिनों के भीतर नोटिस देना जरूरी है, और नोटिस के 14 दिनों के भीतर हड़ताल शुरू नहीं हो सकती। PRS ने बताया कि संसद की स्थायी समिति चाहती थी कि यह रोक सिर्फ लोक उपयोगी सेवाओं तक सीमित रहे।
यूनियनों ने सड़क पर जवाब दिया। दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के एक साझा मंच ने, जिसमें INTUC और AITUC भी थीं, संहिताओं को वापस लेने की मांग के साथ 12 फरवरी 2026 को देशव्यापी आम हड़ताल बुलाई। BMS इस मंच का हिस्सा नहीं था। अदालत में, सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने 20 अगस्त 2026 को फैसला दिया कि संहिता के तहत “उद्योग” को संहिता की अपनी शर्तों में ही पढ़ा जाना चाहिए, जैसा इस फैसले पर करंट अफेयर्स नोट समझाता है। वहीं पुराने अधिनियम के मामलों में 1978 की कसौटी ही चलती है। संहिताओं पर बड़ी बहस चार श्रम संहिताओं वाले नोट में है।
आंदोलन ने क्या हासिल किया और कहां पीछे रह गया
आंदोलन की उपलब्धियां कानून की किताबों में दर्ज हैं: 1926 में यूनियन का पंजीकरण और छूट, 1942 से भारतीय श्रम सम्मेलन के जरिए त्रिपक्षीय सलाह, और 1919 में ILO के पहले सम्मेलन से ही वहां मजदूरों की सीट। यूनियनें दबाव समूहों की तरह भी काम करती हैं। इसीलिए सरकारें असहमत होने पर भी श्रम नीति पर उनसे सलाह करती हैं।
कमजोरी भी उतनी ही साफ है। दलों से जुड़ाव और गुटबाजी ने यूनियनों की संख्या बढ़ा दी। नतीजा यह कि एक ही कारखाने में कई प्रतिद्वंद्वी यूनियनें हो सकती थीं, और हर एक अलग दल को जवाब देती थी। काम का स्वरूप भी बदल गया है। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 अब गिग और प्लेटफॉर्म मजदूरों तक सामाजिक सुरक्षा पहुंचाती है। यह ऐसा वर्ग है जिस तक 1926 का कारखाना-स्तर वाला यूनियन मॉडल कभी पहुंचने के लिए बना ही नहीं था।
परीक्षा के लिए भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन कैसे पढ़ें
यह विषय तीन जगह आता है। GS पेपर I में राष्ट्रीय आंदोलन और मजदूर वर्ग के उदय के तहत। GS पेपर II में अनुच्छेद 19 और दबाव समूहों के तहत। और GS पेपर III में श्रम सुधारों के तहत।
इतिहास वैकल्पिक विषय इसे सीधे पूछता है। 2020 में पेपर II ने इस कथन पर टिप्पणी मांगी: “भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन ने नाजुक मोड़ों पर राष्ट्रीय संघर्ष के आह्वान का साथ ही नहीं दिया, बल्कि कई तरह से उसकी दिशा और स्वरूप पर असर भी डाला।” और 2021 में पेपर II ने इस पर: “1920 के दशक में भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के उदय ने ट्रेड यूनियन आंदोलन को उग्र और क्रांतिकारी तेवर दिए।” मुख्य परीक्षा 2024 के GS पेपर III ने आधुनिक पक्ष लिया और चार श्रम संहिताओं के गुण-दोष पूछे (नीचे मुख्य परीक्षा अभ्यास में प्रश्न 1)। प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 184 इतिहास के हैं, और इनमें आम तौर पर स्थापना की तारीखें और पहले अध्यक्ष पूछे जाते हैं।
दोहराने के लिए पक्के तथ्य:
- बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन, 1890, एन. एम. लोखंडे; मद्रास लेबर यूनियन, 1918, बी. पी. वाडिया।
- AITUC, अक्टूबर 1920, बॉम्बे; पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय।
- ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926, 1 जून 1927 से लागू।
- विभाजन: 1929 नागपुर (नरमपंथी), 1931 कलकत्ता (कम्युनिस्ट); फिर एकता 1935 और 1940 में।
- INTUC मई 1947, HMS 1948, UTUC 1949, BMS 1955, CITU 1970।
- औद्योगिक संबंध संहिता: वार्ताकार यूनियन के लिए 51 प्रतिशत, वार्ताकार परिषद में सीट के लिए 20 प्रतिशत, पंजीकरण के लिए 10 प्रतिशत या 100 मजदूर।
- संहिताएं 21 नवंबर 2025 से लागू; आखिरी पूरे सत्यापन की गणना 31 दिसंबर 2002 को।
आम भ्रम जोड़ियों में आते हैं। AITUF (1929, नरमपंथी) AITUC नहीं है, और बाद का इंडियन फेडरेशन ऑफ लेबर (1941, एम. एन. रॉय) भी नहीं। INTUC (1947) इंडियन नेशनल कांग्रेस (1885) का मजदूर संगठन है, खुद कांग्रेस नहीं। तीनों प्रतिशत अलग रखने के लिए पूछिए कि हर एक क्या तय करता है: पंजीकरण, अकेले सौदेबाजी का हक या परिषद में सीट।
इस विषय को घेरने वाले कानून साथ-साथ रखकर देखें तो याद रखना आसान होता है:
| कानून | यूनियनों के लिए क्या किया | स्थिति |
|---|---|---|
| ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 | पंजीकरण, कानूनी दर्जा और छूट | औद्योगिक संबंध संहिता ने खत्म किया |
| औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 | सुलह और न्यायनिर्णयन; लोक उपयोगी सेवाओं में हड़ताल का नोटिस | औद्योगिक संबंध संहिता ने खत्म किया |
| औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 | पंजीकरण, वार्ताकार यूनियन या परिषद, हर जगह हड़ताल का नोटिस | 21 नवंबर 2025 से लागू |
ट्रेड यूनियन आंदोलन उस अभ्यर्थी का साथ देता है जो इसे संक्षिप्त नामों की सूची नहीं, बल्कि राजनीतिक इतिहास की तरह पढ़ता है। ऊपर की तालिका का हर विभाजन किसी दल के टूटने के पीछे चलता है। और आखिरी तालिका का हर कानून किसी ऐसे सवाल का जवाब है जो आंदोलन ने उठाया था। अगर आप समझा सकें कि INTUC 1947 में अलग क्यों हुई, तो आप श्रम संहिताओं पर भी मुख्य परीक्षा का उत्तर लिख सकते हैं।
सामान्य प्रश्न
INTUC का पूरा नाम क्या है?
INTUC का पूरा नाम इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस है। इसकी स्थापना 3 और 4 मई 1947 को नई दिल्ली में हुए एक सम्मेलन में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मजदूर संगठन के रूप में हुई। केंद्रीय ट्रेड यूनियन सदस्यता के आखिरी पूरे सत्यापन में, जिसकी गणना 31 दिसंबर 2002 को हुई, यह दूसरे स्थान पर रही।
भारत की पहली ट्रेड यूनियन कौन-सी थी?
बी. पी. वाडिया के नेतृत्व में 1918 में बनी मद्रास लेबर यूनियन को आम तौर पर भारत की पहली संगठित ट्रेड यूनियन माना जाता है। एन. एम. लोखंडे के नेतृत्व वाला 1890 का बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन इससे पहले आया, लेकिन वह मिल मजदूरों का एक संघ था, जिसमें यूनियन जैसा ढांचा नहीं था। परीक्षा की उत्तर कुंजियां आम तौर पर 1890 को आंदोलन की शुरुआत और 1918 को पहली यूनियन मानती हैं।
AITUC के पहले अध्यक्ष कौन थे?
लाला लाजपत राय ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के पहले अध्यक्ष थे, जिसकी स्थापना अक्टूबर 1920 में बॉम्बे में हुई। जोसेफ बैप्टिस्टा, एन. एम. जोशी और दीवान चमन लाल बाकी संस्थापकों में थे। यह महासंघ तब बना जब सरकार ने यूनियनों से पूछे बिना ILO के पहले सम्मेलन के लिए भारत के मजदूर प्रतिनिधि को नामित कर दिया।
AITUC और INTUC में क्या अंतर है?
AITUC पुरानी संस्था है, जिसे 1920 में राष्ट्रवादियों ने बनाया, और 1940 के दशक तक यह कम्युनिस्ट नेतृत्व में आ गई। INTUC को कांग्रेस ने 1947 में अपने मजदूर संगठन के रूप में बनाया, क्योंकि AITUC अब उसके नियंत्रण में नहीं थी। जब कम्युनिस्ट CPI और CPI(M) में बंटे, तो AITUC CPI के साथ रही और CPI(M) ने 1970 में CITU बनाई।
भारत की सबसे बड़ी केंद्रीय ट्रेड यूनियन कौन-सी है?
आखिरी पूरे सदस्यता सत्यापन में, जिसकी गणना 31 दिसंबर 2002 को हुई, भारतीय मजदूर संघ 62,15,797 सत्यापित सदस्यों के साथ सबसे बड़ा था। INTUC दूसरे स्थान पर रही। 31 दिसंबर 2011 की गणना तारीख के साथ एक नया सत्यापन शुरू हुआ, लेकिन मुख्य श्रम आयुक्त के प्रकाशित रिकॉर्ड में उसके अंतिम नतीजे नहीं मिलते।
औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 किसी ट्रेड यूनियन को मान्यता कैसे देती है?
किसी प्रतिष्ठान के मस्टर रोल पर दर्ज 51 प्रतिशत या उससे ज्यादा मजदूरों के समर्थन वाली यूनियन एकमात्र वार्ताकार यूनियन बन जाती है। अगर कोई यूनियन इस स्तर तक नहीं पहुंचती, तो कम से कम 20 प्रतिशत मजदूरों के समर्थन वाली सभी यूनियनों को मिलाकर एक वार्ताकार परिषद बनती है। पंजीकरण के लिए खुद 10 प्रतिशत मजदूर या 100 मजदूर, जो भी कम हो, चाहिए।
क्या भारत में हड़ताल का अधिकार मौलिक अधिकार है?
नहीं। अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत संघ या यूनियन बनाने का अधिकार मौलिक अधिकार है। लेकिन 1961 में तय हुए ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें हड़ताल का गारंटीशुदा अधिकार शामिल नहीं है। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 भी किसी भी औद्योगिक प्रतिष्ठान में हड़ताल से पहले नोटिस जरूरी बनाती है।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन 1890 में एन. एम. लोखंडे के नेतृत्व में बना था। 2. मद्रास लेबर यूनियन 1918 में बी. पी. वाडिया के नेतृत्व में बनी थी। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c) दोनों कथन सही हैं; 1890 के संघ से आंदोलन शुरू हुआ और 1918 की यूनियन पहली संगठित यूनियन थी।
2. ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के पहले अध्यक्ष कौन थे?
- (a) एन. एम. जोशी
- (b) लाला लाजपत राय
- (c) वी. वी. गिरि
- (d) दीवान चमन लाल
उत्तर: (b) अक्टूबर 1920 में बॉम्बे में AITUC की स्थापना के समय लाला लाजपत राय अध्यक्ष चुने गए।
3. औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मस्टर रोल पर दर्ज 51 प्रतिशत या उससे ज्यादा मजदूरों के समर्थन वाली ट्रेड यूनियन को एकमात्र वार्ताकार यूनियन की मान्यता मिलती है। 2. जहां कोई यूनियन 51 प्रतिशत तक नहीं पहुंचती, वहां कम से कम 10 प्रतिशत मजदूरों के समर्थन वाली यूनियनें वार्ताकार परिषद बनाती हैं। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) वार्ताकार परिषद में सीट की सीमा 20 प्रतिशत है, 10 प्रतिशत नहीं।
4. निम्नलिखित केंद्रीय ट्रेड यूनियनों को उनकी स्थापना के कालक्रम में व्यवस्थित कीजिए: 1. भारतीय मजदूर संघ 2. सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस 3. हिंद मजदूर सभा 4. इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a) 4-3-1-2
- (b) 3-4-1-2
- (c) 4-1-3-2
- (d) 3-4-2-1
उत्तर: (a) INTUC 1947, HMS 1948, BMS 1955 और CITU 1970।
5. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 वर्ष 1927 में लागू हुआ। 2. भारत में शाही श्रम आयोग की अध्यक्षता जे. एच. व्हिटली ने की थी। 3. मेरठ षड्यंत्र केस का मुकदमा 1933 में खत्म हुआ। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d) अधिनियम 1 जून 1927 को लागू हुआ, व्हिटली ने 1929-31 के आयोग की अध्यक्षता की और मेरठ का मुकदमा 1933 की शुरुआत में खत्म हुआ।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- भारत में श्रम बाजार सुधारों के संदर्भ में चार ‘श्रम संहिताओं’ के गुण-दोषों की चर्चा कीजिए। इस दिशा में अब तक कितनी प्रगति हुई है? (15 अंक, 250 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2024, GS पेपर III।
- भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन के साथ-साथ बढ़ा, लेकिन दलों की रेखाओं पर बंट गया। 1920 से 1970 के दौर के संदर्भ में इसका परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ट्रेड यूनियनों की मान्यता और वैध हड़ताल की शर्तों को कैसे बदलती है? सामूहिक सौदेबाजी पर इसके असर का मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- त्रिपक्षीय निकायों के लिए केंद्रीय ट्रेड यूनियन सदस्यता का सत्यापन क्यों मायने रखता है, और इसे अद्यतन न करने से क्या समस्याएं पैदा होती हैं? (10 अंक, 150 शब्द)
- क्या भारत में ट्रेड यूनियनें गिग और प्लेटफॉर्म मजदूरों को संगठित कर सकती हैं? इसकी कानूनी और व्यावहारिक बाधाओं की चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)