हममें से ज़्यादातर लोग शुक्र को सूरज डूबने के बाद दिखने वाला चमकदार “सांझ का तारा” ही मानते हैं। ISRO के लिए यह सोच-समझकर चुना गया अगला ग्रह है। सितंबर 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने Venus Orbiter Mission को मंजूरी दी। आम बोलचाल में इसे शुक्रयान कहते हैं। करीब ₹1,236 करोड़ की लागत वाली इस योजना का लक्ष्य 2028 में यान भेजना है। चंद्रमा और मंगल के बाद भारत अब पृथ्वी के सबसे नज़दीकी ग्रह-पड़ोसी की कक्षा में यान रखकर कई साल तक उसका अध्ययन करने की तैयारी कर रहा है।
शुक्र को चुनना कोई संयोग नहीं है। उसका आकार लगभग पृथ्वी जितना है और दोनों शायद एक जैसे मूल पदार्थ से बने थे। फिर भी शुक्र एक भट्ठी जैसा ग्रह बन गया: सतह का तापमान करीब 465 डिग्री सेल्सियस रहता है और वायुदाब पृथ्वी से लगभग 92 गुना है। इसलिए मिशन के पीछे असली सवाल यह है कि एक चट्टानी ग्रह रहने लायक कैसे रहा, जबकि उसका लगभग जुड़वां इतना डरावना क्यों बन गया। यह जलवायु विज्ञान, पृथ्वी के बाहर जीवन की खोज और गहरे अंतरिक्ष में भारत की क्षमता, तीनों के लिए अहम है। इसी वजह से UPSC के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी वाले हिस्से में इसका महत्व बनता है।
Venus Orbiter Mission असल में क्या है
पहले नाम साफ कर लें, क्योंकि यहीं गड़बड़ होती है। इसका आधिकारिक नाम Venus Orbiter Mission है, छोटा नाम VOM भी लिखा जाता है। “शुक्रयान” जनता और मीडिया में चलने वाला नाम है। यह संस्कृत के शुक्र और यान से बना है, ठीक जैसे चंद्रमा के लिए चंद्रयान और मंगल के लिए मंगलयान। ISRO आम तौर पर इसे Venus Orbiter Mission ही कहता है। इसलिए शुक्रयान कोई अलग परियोजना नहीं, इसी मिशन का प्रचलित नाम है।
यह लैंडर (lander) नहीं, ऑर्बिटर (orbiter) है। वजह बहुत सीधी है: शुक्र की सतह पर उतरा कोई भी सामान्य यान गर्मी और दबाव में कुछ घंटों के भीतर नष्ट हो जाएगा। इसलिए कम जोखिम वाला तरीका यह है कि सही उपकरणों वाला यान ऊपर से ग्रह की परिक्रमा करे। इसे पहले शुक्र की एक बड़ी, लंबी-खींची कक्षा में डाला जाएगा और फिर धीरे-धीरे कक्षा छोटी की जाएगी, ताकि विस्तृत अध्ययन हो सके। वहां से यान सतह, घने वायुमंडल और ऊपर की विद्युत-आवेशित परतों को लंबे समय तक देखेगा। 1970 और 80 के दशक में सोवियत Venera लैंडर शुक्र पर केवल कुछ मिनट से कुछ घंटे टिक पाए थे। इसी अनुभव से पता चलता है कि कई वर्षों तक काम करने वाला ऑर्बिटर आज की समझदार पसंद क्यों है।
ISRO कई वर्षों से इस विचार पर काम कर रहा था। 2010 के दशक के बीच से इसकी चर्चा होती रही, लेकिन चंद्रयान और Aditya-L1 जैसी प्राथमिकताओं के कारण योजना एक से अधिक बार आगे खिसकी। 2024 में फर्क यह आया कि इसे पैसा और आधिकारिक मंजूरी दोनों मिले। मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) और ISRO को यान बनाने, प्रक्षेपित करने और चलाने का साफ निर्देश मिला। उत्तर में यह फर्क लिखना चाहिए: बहुत-सी ग्रह-योजनाएं अभी प्रस्ताव हैं, जबकि शुक्रयान के पास मंजूर कार्यक्रम, बजट और तय प्रक्षेपण वर्ष है।
मिशन की योजना: पैसा, रॉकेट और समय
इस हिस्से के आंकड़े ठीक रखना ज़रूरी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 18 सितंबर 2024 को मिशन के लिए करीब ₹1,236 करोड़ मंजूर किए। इसमें से लगभग ₹824 करोड़ अंतरिक्ष यान के लिए हैं। इसी रकम में यान का विकास, वैज्ञानिक पेलोड (payloads) और कुछ नई तकनीकों को तैयार करना शामिल है। बाकी पैसा प्रक्षेपण और यान को उड़ाने व नज़र रखने वाले ज़मीनी तंत्र पर जाएगा। इसलिए कुल लागत लिखते समय ₹1,236 करोड़ लिखें; यान वाला हिस्सा उसका बड़ा भाग है।
शुक्रयान को अंतरिक्ष तक LVM-3 ले जाएगा। यह ISRO का सबसे भारी चालू रॉकेट है। चंद्रयान-3 इसी Launch Vehicle Mark-3 से गया था और Gaganyaan के मानव अंतरिक्ष उड़ान काम के लिए भी इसे चुना गया है। शुक्र तक जाने के लिए यान और उसका ईंधन भारी होंगे, इसलिए मज़बूत लॉन्चर चाहिए। ISRO ने प्रक्षेपण की तारीख 29 मार्च 2028 रखी है। यान को दोनों ग्रहों के बीच की दूरी तय करने में करीब 112 दिन लगेंगे और वह लगभग 19 जुलाई 2028 को शुक्र के पास पहुंचेगा। योजना पहले बड़ी दीर्घवृत्ताकार कक्षा में जाने की है, जिसमें निकटतम दूरी करीब 500 किलोमीटर और दूर वाला सिरा कई हजार किलोमीटर तक हो सकता है। इसके बाद महीनों में कक्षा कम की जाएगी।
कक्षा कम करने के लिए एरोब्रेकिंग (aerobraking) का इस्तेमाल होगा। यह मिशन की बड़ी तकनीकी बात है। महंगा ईंधन जलाकर कक्षा छोटा करने के बजाय यान हर चक्कर में शुक्र के ऊपरी वायुमंडल को बहुत हल्के से छुएगा। वहां की हवा का छोटा-सा ड्रैग (drag) उसकी गति कम करेगा और कई चक्करों के बाद कक्षा कसती जाएगी। इस तरह यान कुछ सौ किलोमीटर ऊंची विज्ञान कक्षा तक आ सकता है। ईंधन बहुत बचता है, लेकिन काम नाज़ुक है: यान को ऐसे वायुमंडल के पास ले जाना है जो मदद भी करेगा और जोखिम भी पैदा करेगा।
एक और आसान लेकिन अहम बात: शुक्र के लिए कभी भी प्रक्षेपण नहीं किया जा सकता। पृथ्वी और शुक्र दोनों लगातार चल रहे हैं, इसलिए कम ईंधन वाला रास्ता तभी मिलता है जब उनकी स्थिति अनुकूल हो। ऐसे अवसर करीब हर 19 महीने में आते हैं और सबसे अच्छे अवसरों में कई साल का अंतर हो सकता है। यही कारण है कि तारीख 2028 पर टिकी है, “जब यान तैयार हो तब” पर नहीं। देरी सिर्फ कुछ हफ्तों की नहीं होगी, बेहतर अवसर निकल जाने पर लगभग दो साल तक असर पड़ सकता है। ISRO का शुरुआती लक्ष्य 2020 के दशक के आरंभ का था, लेकिन इंजीनियरिंग के साथ ग्रहों की चाल ने भी इसे मौजूदा अवसर तक पहुंचाया।


शुक्रयान क्या देखेगा और शुक्र इतना अलग क्यों है
तो यान असल में क्या खोजेगा? ISRO ने तीन बड़े लक्ष्य रखे हैं: सतह और सतह के नीचे की बनावट को समझना, घने और लगातार बदलते वायुमंडल को पढ़ना, और देखना कि सूर्य शुक्र की बाहरी विद्युत-आवेशित परतों से कैसे जुड़ता है। इसके लिए ऑर्बिटर में करीब 19 वैज्ञानिक पेलोड होंगे। अधिकतर भारत में बने हैं, कुछ सहयोगी और अंतरराष्ट्रीय उपकरण भी होंगे। पूरी सूची रटने के बजाय यह समझिए कि हर उपकरण किस सवाल का जवाब देगा।
सबसे अहम उपकरण सिंथेटिक एपर्चर रडार (synthetic aperture radar) है। भारत में बना S-बैंड रडार शुक्र की सतह का नक्शा तैयार करेगा। कैमरा क्यों नहीं? क्योंकि शुक्र हमेशा बादलों की मोटी चादर में ढका रहता है और साधारण कैमरा को नीचे कुछ नहीं दिखता। रडार की तरंगें बादलों को पार कर जमीन से लौटती हैं। इससे पहाड़, मैदान और संभावित ज्वालामुखियों का नक्शा बन सकता है और सतह में बदलाव भी पकड़ा जा सकता है, जो सक्रिय ज्वालामुखीयता का संकेत होगा। दूसरे पेलोड वायुमंडल की रासायनिक बनावट और गति, ऊंचाई पर मौजूद धुंध और बिजली को देखेंगे। प्लाज़्मा पैकेज सूर्य से आने वाले कणों और उनके कारण ऊपरी वायुमंडल से गैस निकलने को मापेगा। यानी लक्ष्य चट्टान से लेकर अंतरिक्ष की सीमा तक शुक्र को एक पूरी व्यवस्था की तरह पढ़ना है।
जिस ग्रह को पढ़ना है, वह सचमुच अजीब है। शुक्र का आकार और द्रव्यमान पृथ्वी के करीब हैं, लेकिन उसका वायुमंडल रनअवे ग्रीनहाउस (runaway greenhouse) की चरम मिसाल है। कार्बन डाइऑक्साइड की परत पृथ्वी के वायुमंडल से करीब 90 गुना भारी है और ऊपर पानी के बादल नहीं, सल्फ्यूरिक अम्ल के घने बादल हैं। यह कार्बन डाइऑक्साइड गर्मी को इतनी मजबूती से रोकती है कि सतह करीब 465 डिग्री सेल्सियस तक तपती है। यह सीसा पिघलाने जितना तापमान है और सूर्य से दूर होने पर भी शुक्र बुध से ज्यादा गर्म रहता है। और भी विचित्र बात यह है कि वायुमंडल लगभग 4 पृथ्वी-दिन में पूरे ग्रह का चक्कर लगा लेता है, जबकि ठोस ग्रह खुद एक बार घूमने में करीब 243 दिन लेता है। इस तेज बहाव को सुपर-रोटेशन (super-rotation) कहते हैं और वैज्ञानिक अभी इसे पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं।
मिशन का सबसे गहरा कारण तुलना है। पृथ्वी और शुक्र शायद लगभग एक जैसे भाई-बहन थे। एक जीवन के लिए अनुकूल बना रहा, दूसरा ग्रीनहाउस की आग में फंस गया। इस पर बहस जारी है कि क्या शुक्र पर कभी तरल पानी के महासागर और अनुकूल तापमान था, फिर कार्बन डाइऑक्साइड ने जलवायु को ऐसे मोड़ पर पहुंचा दिया जहां से वापसी नहीं हुई। उसके बादलों में फॉस्फीन (phosphine) मिलने के दावे भी हुए हैं, हालांकि वे विवादित हैं; पृथ्वी पर यह गैस जीवन से जुड़ी मानी जाती है। कोई ऑर्बिटर अकेले इन बहसों का अंतिम जवाब नहीं देगा, लेकिन सतह के बेहतर नक्शे और वायुमंडल की करीबी जांच इनके लिए जरूरी साक्ष्य देंगे। यह जानना कि दोनों ग्रह अलग रास्तों पर क्यों चले गए, पृथ्वी की जलवायु-सीमाओं को समझने में मदद करता है। इससे पृथ्वी जितने आकार वाले एक्सोप्लैनेट (exoplanets) का आकलन भी बेहतर होगा, क्योंकि तारे से सही दूरी पर ग्रह होने पर भी वह पृथ्वी नहीं, शुक्र जैसा निकल सकता है।
ISRO की बड़ी अंतरिक्ष-कहानी में शुक्रयान की जगह
शुक्रयान अचानक नहीं आया। यह उस ग्रहीय कार्यक्रम का अगला कदम है जो करीब दो दशकों से बन रहा है। 2013 में Mars Orbiter Mission, यानी मंगलयान, ने ISRO को अंतरग्रहीय कार्यक्रमों में पहचान दिलाई। वह पहले प्रयास में मंगल पहुंचा और कम लागत के कारण दुनिया भर में चर्चा हुई। चंद्रयान श्रृंखला ने चंद्रमा का कार्यक्रम आगे बढ़ाया और 2023 में चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग की, जो उस इलाके में किसी देश ने पहले नहीं की थी। सूर्य की ओर करीब 1.5 मिलियन किलोमीटर दूर देखने वाली जगह पर रखा Aditya-L1 इस सूची में सौर अध्ययन जोड़ता है। शुक्र इस नक्शे का छूटा हुआ सबसे करीबी पड़ोसी था और शुक्रयान वही कमी भरता है।
यह एक बड़ी राष्ट्रीय रूपरेखा का हिस्सा भी है। भारत ने Gaganyaan मानव-अंतरिक्ष-उड़ान कार्यक्रम के तहत लगभग 2027 में पहली चालक दल वाली उड़ान का लक्ष्य रखा है और उससे पहले बिना चालक दल की परीक्षण उड़ानें होंगी। आगे भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksha Station) है, भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन, जिसे लगभग 2035 तक चरणों में बनाने की योजना है। Chandrayaan-4 नमूना वापस लाने वाला मिशन और 2040 तक भारतीय चालक दल वाला चंद्रमा पर उतरना, इस लंबी अवधि वाले लक्ष्य भी इसी रूपरेखा में हैं। शुक्रयान इस कहानी का रोबोटिक गहरे अंतरिक्ष विज्ञान वाला हिस्सा है। जब मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम आगे बढ़ेगा, तब भी यह ISRO की ग्रहीय क्षमता को सक्रिय रखेगा।
दुनिया में शुक्र पर लौटती दिलचस्पी भी याद रखने लायक है। हाल के वर्षों में शुक्र बहुत भीड़भाड़ वाला लक्ष्य नहीं रहा, लेकिन अब रुचि फिर बढ़ रही है। जापान की अंतरिक्ष एजेंसी JAXA का Akatsuki 2015 से शुक्र की कक्षा में है। यूरोप का Venus Express 2000 के दशक में ग्रह का अध्ययन कर चुका है। अब NASA की DAVINCI मिशन वायुमंडल में नीचे उतरने वाली जांच है और VERITAS रडार से सतह का नक्शा बनाने वाली मिशन है। ESA EnVision की तैयारी कर रही है। भारत का शुक्रयान इस नई दौड़ में एक स्वतंत्र ऑर्बिटर जोड़ेगा। इसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी है: स्वीडन का Institute of Space Physics एक कण उपकरण दे रहा है और फ़्रांसीसी, जर्मन व दूसरे साझेदार भी जुड़े हैं। लागत बांटकर विज्ञान करने का यही तरीका मंगलयान और चंद्रयान जैसे कार्यक्रमों में उपयोगी रहा है।
महत्व और मुश्किलें
शुक्रयान के पक्ष में सबसे मजबूत बात केवल जिज्ञासा नहीं, क्षमता बनाना है। शुक्र तक पहुंचना और वहां यान चलाना ISRO को कई ऐसे कौशल सिखाएगा जो हर गहरे अंतरिक्ष मिशन में काम आएंगे: 100 से ज्यादा दिनों की यात्रा में सटीक नेविगेशन, दूर के ग्रह के पास सही कक्षा-प्रवेश बर्निंग, सूर्य के पास ताप प्रबंधन और खासकर एरोब्रेकिंग। भारत ने किसी दूसरे ग्रह पर पहले एरोब्रेकिंग नहीं किया है। इसलिए इसे तकनीक दिखाने वाले मिशन (technology demonstrator) की तरह भी देखना चाहिए, जहां कक्षा कम करने और यान को बचाए रखने की तकनीक खुद एक उपलब्धि है। साथ ही, यह काम समान पश्चिमी मिशनों की तुलना में बहुत कम लागत पर करके भारत की किफायती और भरोसेमंद अंतरिक्ष इंजीनियरिंग की छवि को मजबूत कर सकता है।
इसका दूसरा फायदा भी है। मंजूर शुक्र मिशन अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को आधार देता है, भारतीय विश्वविद्यालयों और बढ़ते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को वास्तविक ग्रहीय-विज्ञान काम देता है, और ग्रीनहाउस की चरम स्थिति को समझने वाले जलवायु शोध से जुड़ता है। जो देश खुद को विज्ञान और तकनीक में अगुआ के रूप में पेश कर रहा है, उसके लिए पृथ्वी के जुड़वां ग्रह तक पहुंचना शोध के साथ इरादे का संकेत भी है।
लेकिन चुनौती को हल्के में नहीं लेना चाहिए। शुक्र के पास काम करना मुश्किल है। गर्मी, दबाव और संक्षारक बादल ऑर्बिटर के लिए भी मंगल की तुलना में कठिन माहौल बनाते हैं। उस वायुमंडल में एरोब्रेकिंग करना वास्तविक जोखिम है। 2028 का प्रक्षेपण ग्रहीय खिड़की से जुड़ा है। अगर उपकरणों के निर्माण और परीक्षण में देरी हुई तो पूरा मिशन करीब 19 महीने पीछे जा सकता है, और यह कार्यक्रम पहले भी खिसक चुका है। कई पेलोड अभी विकास में हैं और ऑर्बिटर उतना ही उपयोगी है जितने उसके उपकरण। इसलिए संतुलित निष्कर्ष यह है कि शुक्रयान महत्वाकांक्षी और विश्वसनीय योजना है, पर सफलता अपने-आप तय नहीं है। मार्च 2028 की इस छोटी खिड़की तक पहुंचने के लिए इंजीनियरिंग अनुशासन जरूरी होगा।
मेन्स उत्तर में कैसे लिखें
यह विषय GS पेपर 3 में सीधे बैठता है, खासकर “developments in science and technology” और “achievements of Indians in science and technology; indigenisation of technology and developing new technology” के तहत। अंतरिक्ष कार्यक्रम इसका साफ केंद्र है। साझेदारी के कारण GS पेपर 2 में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का कोण भी बन सकता है। विज्ञान, महत्वाकांक्षा या वैश्विक स्थिति पर निबंध में भी यह अच्छा उदाहरण है। इसे केवल खबर की तरह नहीं, भारत की पूरी अंतरिक्ष रणनीति के एक हिस्से की तरह लिखिए।
उत्तर की रूपरेखा कैसे बनाएं
शुरुआत में मिशन क्या है, उसकी तारीख और लागत लिखें। फिर वैज्ञानिक लक्ष्य, ISRO के ग्रहीय कार्यक्रम में इसकी जगह, शुक्र का वैज्ञानिक महत्व, और अंत में महत्व व चुनौतियां रखें। ₹1,236 करोड़, LVM-3, 2028 का प्रक्षेपण, एरोब्रेकिंग और सिंथेटिक एपर्चर रडार जैसे ठोस विवरण दें। सामान्य प्रशंसा के बजाय जानकारी पर टिका उत्तर ज्यादा असरदार होता है।
इन गलतियों से बचें
शुक्रयान को लैंडर या नमूना वापस लाने वाला मिशन मत लिखिए। यह ऑर्बिटर है। रकम में भी गड़बड़ न करें: कुल लागत करीब ₹1,236 करोड़ है, ₹824 करोड़ केवल यान वाला हिस्सा है। शुक्र को सिर्फ “सुबह का ग्रह” कहकर न छोड़ें; रनअवे ग्रीनहाउस की वजह बताएं। और मिशन को त्रुटिहीन न दिखाएं। देरी, कठिन वातावरण और उपकरणों की तैयारी न लिखने पर उत्तर एकतरफा लगेगा।
उत्तर की छोटी रीढ़
2024 में मंजूर शुक्र ऑर्बिटर (₹1,236 करोड़, LVM-3, 2028 प्रक्षेपण) → लक्ष्य: सतह, वायुमंडल और सूर्य-शुक्र की परस्पर क्रिया → शुक्र क्यों: पृथ्वी जैसा आकार, लेकिन रनअवे ग्रीनहाउस, 465 डिग्री सेल्सियस, 92 बार → ISRO की श्रृंखला: मंगलयान, चंद्रयान, Aditya-L1 और Gaganyaan से अंतरिक्ष स्टेशन तक की रूपरेखा → महत्व: कम लागत वाली अंतरग्रहीय क्षमता, एरोब्रेकिंग, गहरे अंतरिक्ष का नेविगेशन, जलवायु व रहने लायकता का विज्ञान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग → चुनौतियां: कठोर वातावरण, सीमित प्रक्षेपण खिड़की, देरी का खतरा → निष्कर्ष: क्षमता बढ़ाने वाला बड़ा कदम, जिसकी सफलता अमल पर निर्भर है।
चित्र या फ्लोचार्ट का विचार
पृथ्वी से शुक्र तक एक साधारण उड़ान-पथ का तीर बनाइए: पृथ्वी (मार्च 2028) → शुक्र (जुलाई 2028, 112 दिन)। शुक्र के पास चौड़ी दीर्घवृत्ताकार कक्षा से छोटी विज्ञान कक्षा तक जाती सर्पिल बनाकर उस पर “एरोब्रेकिंग” लिखें। एक बाजू के बॉक्स में तीन लक्ष्य रखें: सतह, वायुमंडल और सूर्य से क्रिया। ऐसा छोटा प्रक्रिया चित्र समझ दिखाता है और जल्दी बन जाता है।
संतुलित निष्कर्ष की एक लाइन
आप लिख सकते हैं: “शुक्रयान लंबे समय से चली आ रही इच्छा को मंजूर मिशन में बदलता है। अगर ISRO 2028 की प्रक्षेपण खिड़की और एरोब्रेकिंग की चुनौती पार कर लेता है, तो यह भारत की अंतरग्रहीय क्षमता और पृथ्वी के जुड़वां ग्रह के बारे में दुनिया की समझ, दोनों को आगे ले जाएगा।”
आंकड़े कैसे इस्तेमाल करें
तीन या चार आंकड़े चुनकर उनके मतलब के साथ लिखें: ₹1,236 करोड़ (लागत), 2028 (प्रक्षेपण), 465 डिग्री सेल्सियस और करीब 92 बार (शुक्र की चरम स्थिति), 19 महीने (प्रक्षेपण-खिड़की का चक्र)। हर संख्या एक बात साबित करे: लागत किफायत दिखाती है, तापमान वैज्ञानिक जरूरत बताता है, और खिड़की बताती है कि समय इतना सख्त क्यों है। हर पेलोड का नाम गिनाने से यह तरीका बेहतर है।
सामान्य प्रश्न
Venus Orbiter Mission (शुक्रयान) क्या है? यह ISRO की योजना है जिसमें शुक्र की कक्षा में अंतरिक्ष यान भेजकर सतह, वायुमंडल और सूर्य के साथ उसकी परस्पर क्रिया का अध्ययन किया जाएगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे सितंबर 2024 में करीब ₹1,236 करोड़ की लागत के साथ मंजूरी दी। “शुक्रयान” इसका प्रचलित नाम है, जो शुक्र और यान से बना है।
शुक्रयान कब प्रक्षेपित होगा और शुक्र तक कैसे पहुंचेगा? ISRO ने LVM-3 से 29 मार्च 2028 को प्रक्षेपण का लक्ष्य रखा है। यान के करीब 112 दिन में शुक्र तक पहुंचने और लगभग 19 जुलाई 2028 को वहां पहुंचने की उम्मीद है। इसके बाद यह ऊपरी वायुमंडल को हल्के से छूते हुए एरोब्रेकिंग करेगा, जिससे ज्यादा ईंधन जलाए बिना उसकी कक्षा धीरे-धीरे छोटी होगी।
ISRO शुक्र पर ही क्यों जा रहा है? शुक्र आकार में पृथ्वी के बहुत करीब है, लेकिन वहां रनअवे ग्रीनहाउस के कारण सतह करीब 465 डिग्री सेल्सियस और वायुदाब पृथ्वी से लगभग 92 गुना है। दोनों ग्रहों के अलग-अलग भविष्य को समझने से पृथ्वी की जलवायु और रहने लायक दुनिया खोजने के विज्ञान, दोनों में मदद मिलती है। इसलिए शुक्र सबसे उपयोगी नजदीकी वैज्ञानिक लक्ष्यों में है।
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में शुक्रयान की जगह क्या है? यह Mars Orbiter Mission (मंगलयान, 2013), चंद्रयान चंद्र मिशनों और Aditya-L1 के बाद ISRO के ग्रहीय कार्यक्रम का अगला कदम है। यह Gaganyaan मानव अंतरिक्ष उड़ान, प्रस्तावित भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और Chandrayaan-4 वाली बड़ी रूपरेखा के साथ चलेगा। इससे मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम आगे बढ़ने के दौरान भारत की गहरे अंतरिक्ष और रोबोटिक विज्ञान क्षमता भी बढ़ती रहेगी।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
- ISRO के Venus Orbiter Mission (जिसे आम तौर पर शुक्रयान कहा जाता है) के बारे में निम्न कथनों पर विचार कीजिए: इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2024 में मंजूरी दी; इसे PSLV से प्रक्षेपित करने की योजना है; और इसका मुख्य उद्देश्य शुक्र की सतह पर लैंडर उतारना है।
ऊपर दिए गए कथनों में कितने सही हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) सभी तीन
(d) कोई नहीं
उत्तर: (a) केवल 2024 की मंत्रिमंडलीय मंजूरी सही है। मिशन PSLV नहीं, LVM-3 से जाएगा और यह लैंडर नहीं, ऑर्बिटर है। - Venus Orbiter Mission को किस भारतीय प्रक्षेपण यान से भेजने का लक्ष्य है?
(a) PSLV-XL
(b) GSLV Mk-II
(c) LVM-3
(d) SSLV
उत्तर: (c) ISRO ने अपने सबसे भारी चालू लॉन्चर LVM-3 को इस मिशन के लिए चुना है। - शुक्र ग्रह के बारे में निम्न कथनों पर विचार कीजिए: उसकी सतह का तापमान करीब 465 डिग्री सेल्सियस है; उसका वायुमंडल मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड का है और उसमें सल्फ्यूरिक-अम्ल बादल हैं; उसकी सतह का दबाव पृथ्वी से करीब 92 गुना है।
कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d) तीनों कथन सही हैं और साथ मिलकर शुक्र की रनअवे-ग्रीनहाउस स्थिति बताते हैं। - Venus Orbiter Mission के संदर्भ में “एरोब्रेकिंग” का मतलब क्या है?
(a) सतह पर उतरने के लिए पैराशूट इस्तेमाल करना
(b) वायुमंडलीय ड्रैग से अंतरिक्ष यान की कक्षा को धीरे-धीरे छोटा और कसा हुआ बनाना
(c) ग्रह के गुरुत्व से निकलने के लिए इंजन चलाना
(d) यान पर लगे रेडिएटर से उपकरण ठंडे करना
उत्तर: (b) एरोब्रेकिंग में यान ऊपरी वायुमंडल से कई बार गुजरता है। ड्रैग उसकी कक्षीय गति कम करता है और ईंधन बचता है। - कौन-सा ISRO मिशन और उसके लक्ष्य का सही युग्म है?
(a) मंगलयान – चंद्रमा
(b) Aditya-L1 – मंगल
(c) चंद्रयान-3 – चंद्रमा
(d) शुक्रयान – सूर्य
उत्तर: (c) चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरा था। मंगलयान मंगल पर गया, Aditya-L1 सूर्य का अध्ययन करता है और शुक्रयान का लक्ष्य शुक्र है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- “भारत का Venus Orbiter Mission विज्ञान मिशन होने के साथ एक तकनीक दिखाने वाला मिशन भी है।” मिशन जिन प्रमुख तकनीकी क्षमताओं को विकसित करना चाहता है, उनकी चर्चा कीजिए और भारत के भविष्य के गहरे अंतरिक्ष कार्यक्रम में उनका महत्व बताइए। (15 अंक, 250 शब्द)
- शुक्र के अध्ययन के वैज्ञानिक आधार की जांच कीजिए। यह बताइए कि पृथ्वी के “जुड़वां” ग्रह को समझना जलवायु विज्ञान और रहने योग्य दुनियाओं की खोज में कैसे मदद कर सकता है। (15 अंक, 250 शब्द)
- Mars Orbiter Mission से Venus Orbiter Mission तक भारत के ग्रहीय खोज कार्यक्रम के विकास का पता लगाइए और आकलन कीजिए कि ये मिशन वैश्विक अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की स्थिति को कैसे आगे बढ़ाते हैं। (15 अंक, 250 शब्द)
- भारत के कम लागत वाले अंतरग्रहीय मिशनों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की केंद्रीय भूमिका रही है। Venus Orbiter Mission और ISRO के लागत-कुशल अंतरिक्ष खोज तरीके के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- Venus Orbiter Mission के सामने महत्वपूर्ण तकनीकी और समय-सारणी की चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और बताइए कि ISRO शत्रुतापूर्ण ग्रह तक जाने वाले अंतरग्रहीय मिशन के जोखिम कैसे संभाल सकता है। (10 अंक, 150 शब्द)