UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO): UN एजेंसी, 26 संधियाँ, 2024 की आनुवंशिक संसाधन संधि और भारत की स्थिति

WIPO पर पूरी जानकारी: UN एजेंसी का दर्जा, जिनेवा मुख्यालय, 26 अंतरराष्ट्रीय संधियाँ, 2024 की आनुवंशिक संसाधन और पारंपरिक ज्ञान संधि, बायोपायरेसी, भारत की सदस्यता और TKDL से जुड़ाव।

WIPO Organisational Chart: UN Agency Structure and Treaty Administration

वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गनाइज़ेशन (WIPO) बौद्धिक संपदा (intellectual property) के लिए बना UN का संगठन है। इसकी शुरुआत 1967 में हुई, 1974 में यह UN की विशेष एजेंसी बना, और आज यह दुनिया भर की IP व्यवस्था के केंद्र में बैठा है। मुख्यालय जिनेवा में है, सदस्य देश 193 हैं, और यह 26 अंतरराष्ट्रीय संधियों का संचालन करता है। साथ ही यह वे वैश्विक रजिस्ट्री भी चलाता है जिनके ज़रिए कंपनियाँ और सरकारें कई देशों में एक साथ पेटेंट, ट्रेडमार्क और डिज़ाइन के अधिकार के लिए अर्ज़ी देती हैं।

अपने ज़्यादातर इतिहास में WIPO को अंतरराष्ट्रीय IP व्यवस्था के सचिवालय की तरह देखा जाता रहा। यह ट्रेडमार्क के लिए मैड्रिड सिस्टम चलाता था, पेटेंट के लिए पेटेंट कोऑपरेशन ट्रीटी, और औद्योगिक डिज़ाइन के लिए हेग सिस्टम। यह ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स छापता था। दवाओं तक पहुँच, पौधों की क़िस्मों के अधिकार और पारंपरिक ज्ञान जैसे मुद्दों पर यह विकसित और विकासशील देशों के बीच बीच-बचाव करता था। 2024 में बौद्धिक संपदा, आनुवंशिक संसाधन और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान पर संधि अपनाई गई — दस साल से भी ज़्यादा वक़्त में WIPO की पहली संधि — और इससे यह एजेंसी फिर GS-III पाठ्यक्रम के बीचोबीच आ गई। यह संधि बायोपायरेसी (biopiracy) पर भारत और दूसरे विकासशील देशों की पुरानी शिकायत का कुछ हद तक जवाब देती है।

इस लेख में समझिए कि WIPO है क्या, करता क्या है, उसकी 26 संधियाँ किन चीज़ों को समेटती हैं, 2024 की संधि से क्या बदलता है, और इस एजेंसी में भारत की भूमिका क्या है।

WIPO पर ज़रूरी तथ्य

WIPO का संगठन चार्ट: UN एजेंसी की बनावट और संधियों का संचालन

WIPO संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक विशेष एजेंसी है, जिसका मुख्यालय स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा में है। इसे 1967 की WIPO कन्वेंशन से बनाया गया और 1974 में यह UN की विशेष एजेंसी बना। अभी इसके 193 सदस्य देश हैं। भारत 1975 से इसका सदस्य है।

WIPO का मूल काम है देशों के आपसी सहयोग से, और जहाँ ज़रूरी हो वहाँ दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर, पूरी दुनिया में बौद्धिक संपदा की सुरक्षा को बढ़ावा देना। इस काम की तीन शाखाएँ हैं। पहली है संधियों का संचालन, जिसमें WIPO 26 अंतरराष्ट्रीय IP संधियों का डिपॉज़िटरी और सचिवालय है। दूसरी है सेवाएँ देना, जिसमें WIPO पेटेंट, ट्रेडमार्क और डिज़ाइन के लिए अंतरराष्ट्रीय रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था चलाता है। तीसरी है नीति और क्षमता बढ़ाना, जिसमें WIPO विकासशील देशों को अपना IP ढाँचा खड़ा करने में मदद करता है और वैश्विक IP बहस के मंच चलाता है।

WIPO का शासन ढाँचा तीन चीज़ों पर टिका है — सभी सदस्य देशों की महासभा, समन्वय समिति और WIPO कॉन्फ़्रेंस। रोज़मर्रा का कामकाज इंटरनेशनल ब्यूरो देखता है, जिसका मुखिया महानिदेशक (Director General) होता है।

WIPO असल में करता क्या है

WIPO का सबसे ठोस काम रजिस्ट्री का है। पेटेंट कोऑपरेशन ट्रीटी, जिस पर 1970 में दस्तख़त हुए और जो 1978 से लागू है, किसी आवेदक को एक ही अंतरराष्ट्रीय पेटेंट अर्ज़ी देने देती है, और उसका क़ानूनी असर 158 सदस्य देशों में से हर एक में अलग-अलग अर्ज़ी देने जैसा ही होता है। ट्रेडमार्क के अंतरराष्ट्रीय रजिस्ट्रेशन के लिए मैड्रिड सिस्टम यही काम करता है। हेग सिस्टम औद्योगिक डिज़ाइन को देखता है। लिस्बन सिस्टम मूल स्थान के नाम (appellations of origin) और भौगोलिक संकेतों को।

भारतीय आवेदक इन व्यवस्थाओं का ख़ूब इस्तेमाल करते हैं। 2024 में भारतीय आविष्कारकों ने बीस हज़ार से ज़्यादा PCT अर्ज़ियाँ दीं। भारतीय कंपनियों और लोगों ने मैड्रिड के ज़रिए हज़ारों ट्रेडमार्क डेज़िग्नेशन दर्ज कराए। हेग सिस्टम का इस्तेमाल भारत में कम रहा है, कुछ हद तक इसलिए कि भारत इसमें देर से जुड़ा, लेकिन भागीदारी बढ़ रही है।

दूसरा काम है विवाद निपटाना। WIPO का आर्बिट्रेशन एंड मीडिएशन सेंटर दुनिया भर के डोमेन नाम विवादों का बड़ा हिस्सा Uniform Domain Name Dispute Resolution Policy के तहत निपटाता है। भारतीय अधिकार-धारक अपने नाम पर बने ग़लत डोमेन वापस लेने के लिए इस केंद्र में नियमित रूप से जाते हैं।

तीसरा काम है आँकड़े और शोध। WIPO हर साल ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स छापता है, जिसमें देशों को नवाचार के प्रदर्शन पर रैंक दी जाती है। इस इंडेक्स पर भारत लगातार ऊपर चढ़ा है — 2015 में 81वें नंबर से 2024 में 39वें नंबर तक।

चौथा काम है नीति का मंच। पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और पारंपरिक ज्ञान पर बनी WIPO की स्थायी समितियाँ संधियों का असल मसौदा तय करती हैं। आनुवंशिक संसाधन, पारंपरिक ज्ञान और लोकसंस्कृति पर बनी अंतर-सरकारी समिति, जो 2000 में बनी, वही निकाय है जिसने 2024 की संधि तैयार की।

WIPO जिन 26 संधियों को चलाता है

26 संधियों का आँकड़ा WIPO के अपने दस्तावेज़ों में यही दिया जाता है और इसे याद रखना काम आता है। ये संधियाँ तीन समूहों में बँटती हैं।

पहला समूह बौद्धिक संपदा के असल मानक तय करता है। औद्योगिक संपदा की सुरक्षा के लिए पेरिस कन्वेंशन, जिस पर 1883 में दस्तख़त हुए, पेटेंट, ट्रेडमार्क और औद्योगिक डिज़ाइन को समेटता है। साहित्यिक और कलात्मक कृतियों की सुरक्षा के लिए बर्न कन्वेंशन, जिस पर 1886 में दस्तख़त हुए, कॉपीराइट को देखता है। 1961 का रोम कन्वेंशन कलाकारों, फ़ोनोग्राम बनाने वालों और प्रसारण संस्थाओं को कवर करता है। 1996 की WIPO कॉपीराइट ट्रीटी और WIPO परफ़ॉर्मेंसेज़ एंड फ़ोनोग्राम्स ट्रीटी, दोनों इन सुरक्षाओं को डिजिटल दुनिया तक ले जाती हैं।

दूसरा समूह वैश्विक रजिस्ट्रेशन व्यवस्थाएँ खड़ी करता है। पेटेंट कोऑपरेशन ट्रीटी, मैड्रिड एग्रीमेंट और प्रोटोकॉल, हेग एग्रीमेंट और लिस्बन एग्रीमेंट इसी समूह में हैं। हर एक कई देशों में एक साथ अर्ज़ी देने का एक ही अंतरराष्ट्रीय रास्ता देती है।

तीसरा समूह वर्गीकरण व्यवस्थाओं का है। अंतरराष्ट्रीय पेटेंट वर्गीकरण पर स्ट्रासबर्ग एग्रीमेंट, ट्रेडमार्क के लिए सामान और सेवाओं के वर्गीकरण पर नीस एग्रीमेंट, और औद्योगिक डिज़ाइन के वर्गीकरण पर लोकार्नो एग्रीमेंट — इनसे हर देश का दफ़्तर एक ही तकनीकी वर्गीकरण इस्तेमाल कर पाता है।

बौद्धिक संपदा, आनुवंशिक संसाधन और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान पर 2024 की संधि अब असल मानकों वाले पहले समूह का हिस्सा है, हालाँकि यह लेख लिखे जाने तक वह लागू नहीं हुई थी।

आनुवंशिक संसाधन और पारंपरिक ज्ञान पर 2024 की संधि

2024 की संधि WIPO की पहली ऐसी संधि है जिसमें ख़ास तौर पर आदिवासी और स्थानीय समुदायों के लिए अलग नियम रखे गए हैं। यह पहली WIPO संधि भी है जो बायोपायरेसी से सीधे निपटती है। इसे मई 2024 में जिनेवा के एक राजनयिक सम्मेलन में अपनाया गया, अंतर-सरकारी समिति में दो दशक से ज़्यादा चली बातचीत के बाद।

इसका मुख्य नियम है ख़ुलासा करने की शर्त (disclosure requirement)। अगर पेटेंट अर्ज़ी में जिस आविष्कार का दावा किया गया है वह आनुवंशिक संसाधनों पर टिका है, तो आवेदक को बताना होगा कि वे संसाधन किस देश से आए या उनका स्रोत क्या है। और अगर आविष्कार आनुवंशिक संसाधनों से जुड़े पारंपरिक ज्ञान पर टिका है, तो आवेदक को उन आदिवासी या स्थानीय समुदायों का नाम बताना होगा जिन्होंने वह ज्ञान दिया, और ऐसा न कर पाने पर उसका स्रोत बताना होगा।

यह ख़ुलासा संधि से जुड़ने वाले देशों के लिए ज़रूरी है। जो देश इसमें शामिल होगा, उसे इसे लागू कराने के लिए अपना घरेलू क़ानून बनाना होगा। ख़ुलासा न करने पर और झूठा ख़ुलासा करने पर सज़ा का इंतज़ाम भी ज़रूरी है। संधि सिर्फ़ ख़ुलासे की कमी के आधार पर पेटेंट रद्द करने तक नहीं जाती, लेकिन वह दस्तावेज़ों का वह आधार तैयार कर देती है जिस पर आगे की कार्रवाई टिक सके।

यह संधि बायोपायरेसी पर भारत और विकासशील देशों की शिकायत को छूती है। भारतीय वार्ताकार दो दशकों से हल्दी, नीम और बासमती के पेटेंट जैसे मामले गिनाते रहे हैं, जिनमें भारतीय पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल विदेशी पेटेंट अर्ज़ियों में हुआ, न श्रेय दिया गया और न फ़ायदे में कोई हिस्सा मिला। WIPO में कूटनीतिक कोशिश के साथ-साथ भारत का जवाब रही है पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी, जो भारतीय पारंपरिक ज्ञान को उन भाषाओं में दर्ज करती है जिन्हें पेटेंट जाँचने वाले पढ़ते हैं, और इस तरह ग़लत पेटेंट मिलने से पहले ही रोक देती है।

भारत और WIPO का रिश्ता

भारत और WIPO: IPR से जुड़ाव और संधियों की सदस्यता की समयरेखा

भारत 1975 में WIPO से जुड़ा। यह WIPO की ज़्यादातर बड़ी संधियों का हिस्सा है। भारत 1998 से पेरिस कन्वेंशन, 1928 से बर्न कन्वेंशन, 1998 से पेटेंट कोऑपरेशन ट्रीटी, 2013 से मैड्रिड प्रोटोकॉल और 2018 से WIPO कॉपीराइट ट्रीटी का सदस्य है। औद्योगिक डिज़ाइन के लिए बने हेग सिस्टम में भारत अभी शामिल नहीं है, लेकिन उसने जुड़ने का इरादा जताया है।

भारत की अपनी IP व्यवस्था चरणों में WIPO के मानकों के क़रीब आई है। 1970 का पेटेंट एक्ट, जिसमें दवाओं पर उत्पाद पेटेंट नहीं मिलता था, इसकी बुनियाद था। 2005 के संशोधन ने TRIPS समझौते के मुताबिक़ उत्पाद पेटेंट शुरू किए। पेटेंट संशोधन नियम 2024 ने जाँच की प्रक्रिया और पेटेंट मिलने से पहले की आपत्ति के नियम और साफ़ किए।

2016 की राष्ट्रीय IPR नीति ने पहली बार एक पूरा राष्ट्रीय ढाँचा सामने रखा। इसमें IP बनाना, क़ानूनी और विधायी सुधार, प्रशासन और प्रबंधन, व्यावसायिक इस्तेमाल, अमल और न्याय-निर्णय, और मानव संसाधन का विकास — सब शामिल है। इसे लागू करने का काम उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग के तहत आने वाला सेल फ़ॉर IPR प्रमोशन एंड मैनेजमेंट देखता है।

आनुवंशिक संसाधन और पारंपरिक ज्ञान के मामले में भारत WIPO की अंतर-सरकारी समिति के अंदर सबसे आगे रहने वाले वार्ताकारों में रहा है। 2024 की संधि काफ़ी हद तक भारत, अफ़्रीकी देशों और लैटिन अमेरिकी देशों की दो दशक लंबी पैरवी का नतीजा है। उम्मीद है कि घरेलू क़ानून बन जाने के बाद भारत इस संधि की पुष्टि कर देगा।

WIPO और TRIPS का रिश्ता

WIPO और विश्व व्यापार संगठन के उस समझौते का रिश्ता, जो बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार-संबंधी पहलुओं को देखता है और TRIPS कहलाता है, परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है। WIPO TRIPS से पुराना है। मानक WIPO तय करता है। TRIPS, जिस पर 1994 में उरुग्वे दौर के हिस्से के तौर पर दस्तख़त हुए, ने WIPO के ज़्यादातर असल मानकों का पालन WTO की सदस्यता की शर्त बना दिया और उसमें अमल कराने की ज़िम्मेदारियाँ भी जोड़ीं।

दोनों व्यवस्थाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। नियम WIPO लिखता है। TRIPS उन नियमों को WTO के विवाद निपटारे के ज़रिए लागू कराने लायक़ बनाता है। भारत दोनों के अंदर है। भारत का पेटेंट क़ानून, कॉपीराइट क़ानून और ट्रेडमार्क क़ानून, तीनों TRIPS के रास्ते आए WIPO मानकों को दिखाते हैं।

WIPO और WTO के बीच 1995 में हुए औपचारिक सहयोग समझौते में तकनीकी सहयोग, विकासशील देशों के लिए क़ानूनी मदद और IP अफ़सरों के लिए साझा ट्रेनिंग कार्यक्रम शामिल हैं। 2013 की मराकेश संधि, जिसे WIPO चलाता है, असल मानकों वाले समूह में हाल में जुड़ी संधियों में से एक है, और भारत में इसे कॉपीराइट एक्ट के 2017 के संशोधन से लागू किया गया।

ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स और भारत की छलाँग

ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स, जिसे WIPO हर साल पोर्टुलंस इंस्टीट्यूट और भारतीय उद्योग परिसंघ के साथ मिलकर छापता है, अर्थव्यवस्थाओं को नवाचार के इनपुट और आउटपुट पर रैंक देता है। 2024 के संस्करण में भारत 133 अर्थव्यवस्थाओं में 39वें नंबर पर रहा — भारत के लिए अब तक की सबसे ऊँची रैंक, और निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ऊपर। 2015 में भारत 81वें नंबर पर था। नीतिगत भाषणों में इस चढ़ाई को राष्ट्रीय IPR नीति और अटल इनोवेशन मिशन की कामयाबी का सबूत बताया जाता है।

यह इंडेक्स सात स्तंभों के तहत 78 संकेतकों का इस्तेमाल करता है। भारत ज्ञान और तकनीक के आउटपुट, बाज़ार की परिपक्वता और रचनात्मक आउटपुट में ख़ास तौर पर अच्छा करता है। कमज़ोर कड़ियाँ हैं बुनियादी ढाँचा और मानव संसाधन। WIPO का यह विश्लेषण देश के अंदर IP नीति बनाने में ख़ूब इस्तेमाल होता है।

UPSC पाठ्यक्रम के लिहाज़ से यह क्यों ज़रूरी है

WIPO की बड़ी संधियाँ: पेटेंट, कॉपीराइट, GR-TK और उससे आगे

प्रीलिम्स के लिए पक्के तथ्य ये हैं: WIPO संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी है, मुख्यालय जिनेवा में, स्थापना 1967 में, 193 सदस्य देश, और 26 अंतरराष्ट्रीय संधियों का संचालन। भारत 1975 से सदस्य है। आनुवंशिक संसाधन और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान पर 2024 की संधि सबसे नई है, और आदिवासी समुदायों के लिए अलग नियम रखने वाली पहली भी।

मुख्य परीक्षा में WIPO वैश्विक IP शासन, बायोपायरेसी, पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा, भारत की राष्ट्रीय IPR नीति और WIPO-WTO के आपसी रिश्ते वाले जवाबों में आता है। इसके साथ पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी, भौगोलिक संकेत व्यवस्था और धारा 3(d) की एवरग्रीनिंग-रोधी ढाल भी जुड़ती हैं।

सामान्य प्रश्न

WIPO क्या है?

वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गनाइज़ेशन संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है। इसका मुख्यालय जिनेवा में है, स्थापना 1967 में हुई, इसके 193 सदस्य देश हैं, और यह बौद्धिक संपदा से जुड़ी 26 अंतरराष्ट्रीय संधियों का संचालन करता है।

आनुवंशिक संसाधनों पर 2024 की WIPO संधि क्या करती है?

यह ख़ुलासा करने की शर्त लाती है। पेटेंट के आवेदकों को बताना होगा कि आविष्कार में इस्तेमाल हुए आनुवंशिक संसाधन किस देश से आए, और जहाँ लागू हो वहाँ उन आदिवासी या स्थानीय समुदायों का नाम भी, जिनके पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल हुआ। यह पहली WIPO संधि है जिसमें ख़ास तौर पर आदिवासी समुदायों के लिए नियम रखे गए हैं।

क्या भारत WIPO का सदस्य है?

हाँ। भारत 1975 से WIPO का सदस्य है और WIPO की ज़्यादातर बड़ी संधियों का हिस्सा है, जिनमें पेरिस कन्वेंशन, बर्न कन्वेंशन, पेटेंट कोऑपरेशन ट्रीटी, मैड्रिड प्रोटोकॉल और WIPO कॉपीराइट ट्रीटी शामिल हैं।

WIPO कितनी संधियाँ चलाता है?

WIPO 26 अंतरराष्ट्रीय संधियाँ चलाता है, जो बौद्धिक संपदा के असल मानकों, वैश्विक रजिस्ट्रेशन व्यवस्थाओं और तकनीकी वर्गीकरण को समेटती हैं।

WIPO की आनुवंशिक संसाधन संधि बायोपायरेसी से कैसे निपटती है?

पेटेंट अर्ज़ियों में आनुवंशिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का स्रोत बताना ज़रूरी करके। यह ख़ुलासा दस्तावेज़ों का वह आधार तैयार करता है जिससे ग़लत पेटेंट को चुनौती दी जा सके, और जो देने वाले देशों और समुदायों के साथ फ़ायदे में हिस्सेदारी के इंतज़ाम को सहारा देता है।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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