हिंदी का शब्द-भंडार चार धाराओं से समृद्ध हुआ है — संस्कृत से सीधे ग्रहण किए गए शब्द, संस्कृत से क्रमिक परिवर्तन द्वारा विकसित शब्द, भारत की लोकभाषाओं से उपजे शब्द, और विदेशी भाषाओं से आए शब्द। उद्गम (व्युत्पत्ति) के इसी आधार पर हिंदी के शब्दों को चार वर्गों में बाँटा जाता है — तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी (आगत)।
यह विषय अनिवार्य हिंदी की परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है — किसी तत्सम शब्द का तद्भव रूप, किसी तद्भव का तत्सम मूल, अथवा दिए गए शब्दों का वर्गीकरण। नीचे प्रत्येक वर्ग की परिभाषा, तत्सम से तद्भव बनने के सामान्य ध्वनि-नियम, 60 से अधिक जोड़ों की तालिका तथा देशज व विदेशी शब्दों की सुव्यवस्थित सूची दी गई है।
चारों वर्गों की परिभाषा और पहचान
तत्सम (तत् + सम = “उसके समान”) वे शब्द हैं जो संस्कृत से बिना किसी ध्वनि-परिवर्तन के ज्यों-के-त्यों हिंदी में ले लिए गए हैं। इनमें प्रायः संयुक्ताक्षर (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र) और संस्कृत प्रत्यय मिलते हैं। जैसे — अग्नि, जल, पुष्प, सूर्य, वायु, मातृ, हस्त।
तद्भव (तत् + भव = “उससे उत्पन्न”) वे शब्द हैं जो संस्कृत से पालि → प्राकृत → अपभ्रंश की यात्रा करते हुए, ध्वनि-सरलीकरण के बाद, बदले रूप में हिंदी में आए हैं। जैसे — आग (अग्नि से), आँख (अक्षि से), हाथ (हस्त से), काम (कर्म से)।
देशज (देश + ज = “देश में ही उत्पन्न”) वे शब्द हैं जो भारत की लोकभाषाओं/बोलियों में जन्मे और जिनका कोई स्पष्ट संस्कृत अथवा विदेशी मूल नहीं ढूँढ़ा जा सका। इन्हें अनुकरणमूलक या अज्ञातमूलक भी कहते हैं। जैसे — लोटा, कटोरा, खिचड़ी, झाड़ू, गड़बड़।
विदेशी / आगत वे शब्द हैं जो विदेशी भाषाओं — अरबी, फ़ारसी, तुर्की, अंग्रेज़ी, पुर्तगाली, फ्रेंच आदि — से हिंदी में आए और अब बोलचाल का अंग बन गए हैं। जैसे — कानून (अरबी), कुर्सी (फ़ारसी), कैंची (तुर्की), साबुन (पुर्तगाली), स्टेशन (अंग्रेज़ी)।
संक्षेप में पहचान: तत्सम कठिन व शास्त्रीय लगते हैं और संयुक्ताक्षर रखते हैं; तद्भव सरल व बोलचाल के होते हैं; देशज पूर्णतः लोक-प्रचलित होते हैं; विदेशी शब्द की पहचान उनके अपरिचित मूल और ‘क़, ख़, ग़, ज़, फ़’ जैसी नुक़्तेदार ध्वनियों से होती है।
तत्सम से तद्भव बनने के सामान्य ध्वनि-नियम
संस्कृत (तत्सम) से तद्भव रूप यूँ ही नहीं बने; इनके पीछे कुछ सुनिश्चित ध्वनि-प्रवृत्तियाँ हैं। प्रमुख नियम इस प्रकार हैं —
| क्रम | ध्वनि-परिवर्तन का नियम | उदाहरण (तत्सम → तद्भव) |
|---|---|---|
| 1 | संयुक्त व्यंजन का सरलीकरण (एक व्यंजन का लोप) | कर्म → काम; सर्प → साँप; सत्य → सच |
| 2 | ‘क्ष’ का ‘ख’/’छ’ हो जाना | क्षेत्र → खेत; अक्षि → आँख; क्षीर → खीर |
| 3 | ‘ष/श’ का ‘स’ तथा ‘स’ का बना रहना | शत → सौ; श्वेत → सफेद; मास → महीना |
| 4 | ‘य’ का ‘ज’ हो जाना | यश → जस; यमुना → जमुना; यज्ञ → जज्ञ |
| 5 | ‘व’ का ‘ब’ हो जाना | वानर → बानर/बंदर; विवाह → ब्याह |
| 6 | ‘र’ का लोप या परिवर्तन | कर्ण → कान; धर्म → धरम; गर्भ → गाभ |
| 7 | महाप्राण का अल्पप्राण होना (ध्वनि-कोमलता) | दुग्ध → दूध; मेघ → मेह; हस्त → हाथ |
| 8 | अनुनासिकता का जुड़ना (स्वर पर चंद्रबिंदु) | दंत → दाँत; अक्षि → आँख; ग्राम → गाँव |
| 9 | ‘त’ का लोप या ‘य/र’ में बदलना | प्रिय → पिया; सूत्र → सूत; पत्र → पत्ता |
| 10 | आदि स्वर का दीर्घीकरण | उष्ट्र → ऊँट; उच्च → ऊँचा; अग्नि → आग |
| 11 | विसर्ग/’ह’ का लोप या परिवर्तन | दुःख → दुख; ग्रह → घर; गृह → घर |
| 12 | अंत्य ‘अ/अं’ का ‘आ’ होना | अंध → अंधा; मूल्य → मोल; कुब्ज → कूबड़ |
इन नियमों को रटना आवश्यक नहीं; इन्हें उदाहरणों के साथ समझ लेने पर अनजाने जोड़े भी पहचान में आ जाते हैं।
तत्सम-तद्भव की बड़ी तालिका (60+ जोड़े)
नीचे वर्णक्रम में चुने हुए तत्सम शब्द और उनके तद्भव रूप दिए गए हैं। परीक्षा-दृष्टि से ये सबसे अधिक पूछे जाने वाले जोड़े हैं।
| तत्सम | तद्भव | तत्सम | तद्भव |
|---|---|---|---|
| अग्नि | आग | अक्षि | आँख |
| अक्षर | अच्छर | अमृत | अमिय |
| अंध | अंधा | आम्र | आम |
| आश्चर्य | अचरज | उष्ट्र | ऊँट |
| उच्च | ऊँचा | उलूक | उल्लू |
| काक | कौआ | कर्म | काम |
| कर्ण | कान | कार्य | काज |
| कपोत | कबूतर | कटु | कड़वा |
| क्षत्रिय | खत्री | क्षेत्र | खेत |
| क्षीर | खीर | कुष्ठ | कोढ़ |
| कूप | कुआँ | कृष्ण | किसन/कान्ह |
| गृह | घर | गोधूम | गेहूँ |
| गौ | गाय | ग्राम | गाँव |
| घट | घड़ा | घृत | घी |
| घोटक | घोड़ा | चंद्र | चाँद |
| चर्म | चाम | चतुर्थ | चौथा |
| छत्र | छाता | जिह्वा | जीभ |
| ज्येष्ठ | जेठ | ज्योति | जोत |
| तप्त | तपा | दंत | दाँत |
| दुग्ध | दूध | दुर्बल | दुबला |
| धैर्य | धीरज | धूम्र | धुआँ |
| नव | नया | निद्रा | नींद |
| नासिका | नाक | पक्ष | पाख |
| पर्ण | पत्ता | पाषाण | पाहन |
| पिपासा | प्यास | पुत्र | पूत |
| पुष्प | फूल | पक्व | पका |
| फाल्गुन | फागुन | बंधु | बाँधव |
| बधिर | बहरा | बालुका | बालू |
| भक्त | भगत | भगिनी | बहन |
| भ्राता | भाई | मक्षिका | मक्खी |
| मृत्यु | मौत | मध्य | मँझला |
| मुख | मुँह | मुक्ता | मोती |
| यज्ञ | जज्ञ | यमुना | जमुना |
| युवा | जवान | रज्जु | रस्सी |
| रात्रि | रात | लक्ष्मण | लखन |
| लवण | नमक/लोन | लौह | लोहा |
| शत | सौ | शर्करा | शक्कर |
| शुष्क | सूखा | श्वेत | सफेद |
| सत्य | सच | सर्प | साँप |
| सप्त | सात | सूर्य | सूरज |
| स्वर्ण | सोना | स्तन | थन |
| हस्त | हाथ | हरिद्रा | हल्दी |
| क्षण | छिन | वत्स | बछड़ा |
(कुल 86 जोड़े) — परीक्षा में जब तद्भव माँगा जाए तो सरल/बोलचाल वाला रूप लिखें, और तत्सम माँगा जाए तो संस्कृत वाला शुद्ध रूप।
देशज शब्दों की सूची
देशज शब्दों का न तो संस्कृत मूल है, न विदेशी। ये लोकजीवन से उपजे हैं और प्रायः वस्तुओं, ध्वनियों या क्रियाओं के अनुकरण से बने हैं।
- घर-गृहस्थी: लोटा, कटोरा, थाली, खटिया, चूल्हा, झाड़ू, टोकरी, गगरी
- खान-पान: खिचड़ी, पकौड़ी, रोटी, ठोकर, चटनी
- वस्त्र-शरीर: पगड़ी, धोती, जूता, ठेस, पेट, टाँग, घुटना
- प्रकृति-पशु: चिड़िया, कौड़ी, ढोर, लकड़ी, झाड़, पत्थर
- ध्वनि/भाव-अनुकरण: गड़बड़, खटखट, धड़ाम, टुकड़ा, झाँकना, खटपट, फटाफट, लुढ़कना, ढक्कन
विदेशी (आगत) शब्दों की भाषा-वार सूची
| स्रोत भाषा | प्रचलित आगत शब्द |
|---|---|
| अरबी | कानून, किताब, अदालत, मालिक, तारीख़, औरत, हुक्म, अमीर, ग़रीब, कलम, नक़ल, मुक़दमा, हिसाब, इलाज, ख़बर |
| फ़ारसी | आराम, कागज़, कुर्सी, ख़राब, ज़बान, बाज़ार, दुकान, दीवार, गुलाब, चश्मा, नमक, पुल, मज़दूर, रोज़, सब्ज़ी, हफ़्ता |
| तुर्की | तोप, चाकू, कैंची, बेगम, लाश, उर्दू, चमचा, कुली, क़ुरमा/क़ोरमा, बारूद, तमग़ा, दारोग़ा |
| अंग्रेज़ी | स्टेशन, ट्रेन, कॉलेज, डॉक्टर, टिकट, बटन, रेडियो, टेलीविजन, बस, अफ़सर, बोतल, कप, पेंसिल, स्कूल, मोटर |
| पुर्तगाली | आलू, तंबाकू, चाबी, साबुन, कमरा, बाल्टी, पादरी, गिरजा, अलमारी, इस्तरी, फीता, संतरा, तौलिया, नीलाम |
| फ्रेंच | कारतूस, काजू, अंग्रेज़, बूट, मेयर, कूपन |
| अन्य | चाय, लीची (चीनी); रिक्शा (जापानी) |
ध्यान दें — विदेशी शब्द हिंदी में इतने रच-बस गए हैं कि सामान्य प्रयोक्ता उन्हें विदेशी नहीं मानता। फिर भी व्युत्पत्ति की दृष्टि से इनका वर्गीकरण आवश्यक है।
सामान्य अशुद्धियाँ और परीक्षा-दृष्टि
- तत्सम और तद्भव को परस्पर पर्याय मान लेना भूल है — ‘अग्नि’ और ‘आग’ एक ही शब्द के दो रूप हैं, पर्याय नहीं।
- विदेशी शब्द को देशज समझ लेना — ‘कुर्सी’ फ़ारसी आगत है, देशज नहीं; ‘साबुन’ पुर्तगाली है।
- तद्भव शब्द में तत्सम प्रत्यय जोड़ देना — ‘गाँवीय’ अशुद्ध है; शुद्ध रूप ‘ग्रामीण’ (तत्सम मूल + तत्सम प्रत्यय) है।
- एक ही वाक्य में बिना कारण तत्सम-तद्भव का बेमेल मिश्रण (‘सूर्य का सूरज जैसा प्रकाश’) से बचें।
- परीक्षा में पूछा जा सकता है — “निम्न में तत्सम/तद्भव छाँटिए”, “तद्भव रूप लिखिए”, “मूल भाषा बताइए” (विदेशी शब्दों के लिए)।
अभ्यास प्रश्न
(अ) निम्न तत्सम शब्दों के तद्भव रूप लिखिए — उष्ट्र, क्षेत्र, दुग्ध, रात्रि, हस्त, श्वेत, मक्षिका, गृह।
(ब) निम्न तद्भव शब्दों के तत्सम मूल लिखिए — काम, आँख, दाँत, कान, साँप, सोना, घी, सात।
(स) बताइए ये शब्द किस वर्ग के हैं — कुर्सी, लोटा, स्वर्ण, ट्रेन, खिचड़ी, कानून, कबूतर, साबुन।
(द) रिक्त स्थान भरिए — क्ष का सरलीकरण होकर तद्भव में प्रायः ______ बनता है; ‘गोधूम’ का तद्भव ______ है; ‘चाय’ शब्द ______ भाषा से आया है।
(य) अति-लघु उत्तरीय — देशज शब्द किसे कहते हैं? पाँच उदाहरण दीजिए। तत्सम और तद्भव में अंतर एक-एक उदाहरण सहित लिखिए।
—
उत्तर:
(अ) उष्ट्र → ऊँट; क्षेत्र → खेत; दुग्ध → दूध; रात्रि → रात; हस्त → हाथ; श्वेत → सफेद; मक्षिका → मक्खी; गृह → घर।
(ब) काम → कर्म; आँख → अक्षि; दाँत → दंत; कान → कर्ण; साँप → सर्प; सोना → स्वर्ण; घी → घृत; सात → सप्त।
(स) कुर्सी — विदेशी (फ़ारसी); लोटा — देशज; स्वर्ण — तत्सम; ट्रेन — विदेशी (अंग्रेज़ी); खिचड़ी — देशज; कानून — विदेशी (अरबी); कबूतर — तद्भव (कपोत से); साबुन — विदेशी (पुर्तगाली)।
(द) क्ष → ख (अथवा छ); गोधूम → गेहूँ; चाय → चीनी।
(य) देशज वे शब्द हैं जिनका कोई संस्कृत या विदेशी मूल नहीं — जैसे लोटा, कटोरा, खिचड़ी, झाड़ू, गड़बड़। अंतर — तत्सम संस्कृत से ज्यों-के-त्यों आते हैं (जैसे ‘अग्नि’), जबकि तद्भव संस्कृत से ध्वनि-परिवर्तन के बाद बदले रूप में आते हैं (जैसे ‘आग’)।
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