छायावाद आधुनिक हिंदी कविता का वह दौर है जो आम तौर पर 1918 से 1936 तक माना जाता है, और जिसमें खड़ी बोली की कविता पहली बार अपने कलात्मक शिखर पर पहुँची। इसके चार स्तंभ हैं: जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा। प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति, वेदना और रहस्य इसकी पहचान हैं, और प्रसाद की कामायनी इसका सबसे बड़ा काव्य है।
छायावाद को अक्सर रहस्यवाद का दूसरा नाम मान लिया जाता है, या फिर ‘जो समझ में न आए वही छायावाद’ वाला पुराना मजाक सच मान लिया जाता है। दोनों बातें अधूरी हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ही लिखा था कि ठेठ रहस्यवाद वाले अर्थ में केवल महादेवी वर्मा छायावादी हैं; बाकी कवि अपनी चित्र जैसी भाषा और प्रतीकों वाली शैली के कारण छायावादी कहलाए। और यह नाम कवियों ने खुद नहीं चुना था; पंत तो इससे खुश भी नहीं थे।
छायावाद एक नजर में
पूरे आंदोलन का नक्शा पहले देख लीजिए। तारीखें इतिहासकार के हिसाब से थोड़ी बदलती हैं, इसलिए दोनों रूप दिए गए हैं।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| समय | आम तौर पर 1918 से 1936; कुछ इतिहास 1920 से 1936 देते हैं |
| शुक्ल के ढाँचे में | आधुनिक काल की नई धारा का तृतीय उत्थान, संवत 1975 यानी 1918 से |
| नाम का पहला प्रयोग | मुकुटधर पांडेय का निबंध ‘हिंदी में छायावाद’, शारदा पत्रिका (1920) |
| चार स्तंभ | जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा |
| सबसे बड़ी रचना | कामायनी (प्रसाद), महाकाव्य |
| मुख्य प्रवृत्तियाँ | आत्माभिव्यक्ति, प्रेम और सौंदर्य, प्रकृति का सजीव चित्रण, वेदना, रहस्य, प्रतीक, नए छंद |
| पहले और बाद का युग | पहले द्विवेदी युग, बाद में प्रगतिवाद (1936 से) |
| प्रवर्तक पर मत | शुक्ल: मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पांडेय; कई आलोचक: प्रसाद |
छायावाद क्या है: परिभाषा और नाम की कहानी
सीधी परिभाषा: छायावाद खड़ी बोली की वह स्वच्छंदतावादी (romantic) कविता है, जिसमें कवि बाहरी घटनाओं के बयान की जगह अपने भीतर की अनुभूति, सौंदर्य और वेदना को प्रतीकों और चित्रों के जरिए कहता है। द्विवेदी युग की कविता नैतिकता, आदर्श और कथा कहने पर टिकी थी; आलोचक इसे इतिवृत्तात्मकता, यानी बातों का सीधा बयान, कहते हैं। छायावाद ने इसी स्थूल बयान की जगह सूक्ष्म अनुभूति रखी।
नाम की कहानी दिलचस्प है। हिंदी में ‘छायावाद’ शब्द का पहला प्रयोग मुकुटधर पांडेय के निबंध ‘हिंदी में छायावाद’ में मिलता है, जो 1920 में शारदा पत्रिका में छपा। उसी साल सरस्वती में सुशीलकुमार का भी इसी नाम से लेख आया। पांडेय ने यह शब्द उन कविताओं के लिए इस्तेमाल किया था जिनमें उन्हें भावों का धुँधलापन दिखा। बाद में कुछ आलोचकों ने इसे तंज में भी चलाया। पंत ने साफ कहा कि वे इस नाम से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि उनकी नजर में यह द्विवेदी युग के आलोचकों के उपहास का सूचक था। फिर भी नाम चल पड़ा और रूढ़ हो गया।
शुक्ल ने बताया कि यह शब्द दो अर्थों में समझना चाहिए:
- पहला अर्थ, रहस्यवाद: जहाँ कवि अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर चित्रमयी भाषा में प्रेम कहता है। शुक्ल के मुताबिक बंगाल में ब्रह्मसमाज के आध्यात्मिक गीत ‘छायावाद’ कहलाने लगे थे, और रवींद्रनाथ की धूम के साथ यह शब्द हिंदी में आया।
- दूसरा अर्थ, काव्यशैली: 1885 में फ्रांस के प्रतीकवादी कवियों की तरह, प्रस्तुत की जगह अप्रस्तुत प्रतीक लेकर बात कहना। शुक्ल के शब्दों में छायावाद का सामान्य अर्थ हुआ ‘प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करनेवाली छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन’।
हजारीप्रसाद द्विवेदी ने शुक्ल की इस बात का कड़ा खंडन किया कि छायावाद बंगला की नकल से आया। अलग-अलग विद्वानों ने इसे अपने ढंग से परिभाषित किया है, और परीक्षा में यही परिभाषाएँ नाम के साथ पूछी जाती हैं:
| विद्वान | परिभाषा या कथन |
|---|---|
| रामचंद्र शुक्ल | प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करनेवाली छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन |
| रामचंद्र शुक्ल | छायावाद स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म की प्रतिक्रिया है |
| जयशंकर प्रसाद | कविता में जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगी, तब उसे छायावाद कहा गया |
| महादेवी वर्मा | प्रकृति में चेतना का आरोप, सूक्ष्म सौंदर्य-सत्ता का उद्घाटन और असीम के प्रति अनुरागमय आत्म-विसर्जन, गीतात्मक नई शैली में |
| रामकुमार वर्मा | परमात्मा की छाया आत्मा में पड़ने लगती है और आत्मा की परमात्मा में, यही छायावाद है |
| डॉ. नगेंद्र | छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है |
छायावाद क्यों और कैसे आया
छायावाद अचानक नहीं आया; इसकी जमीन द्विवेदी युग में ही तैयार हो रही थी। प्रकृति, नारी के प्रति करुणा और कल्पना, ये सब द्विवेदी युग की कविता में शुरुआती रूप में मौजूद थे। फर्क यह आया कि छायावाद ने रहस्य और प्रतीकों को इतना आगे बढ़ाया कि कविता एक अलग भावभूमि पर खड़ी हो गई। इसलिए कई आलोचक इसे द्विवेदी युग की प्रतिक्रिया कहने के बजाय उसी कविता का विकसित रूप मानते हैं।
राजनीति और समाज का माहौल भी इसके पीछे था। डॉ. नगेंद्र का तर्क है कि ब्रिटिश सत्ता और समाज की कड़ी सुधारवादी नैतिकता युवाओं के असंतोष को बाहर निकलने की जगह नहीं देती थी, इसलिए ये भावनाएँ भीतर मुड़ गईं और कविता में ‘छायाचित्र’ बनकर निकलीं। बाहरी असर भी कम नहीं थे:
- अंग्रेजी रोमांटिक कवि: वर्ड्सवर्थ का प्रकृति-वर्णन, शेली का विद्रोह, कीट्स की सौंदर्य-दृष्टि।
- रवींद्रनाथ ठाकुर की रहस्य भावना।
- हिंदी की अपनी परंपरा: रीतिमुक्त कवि घनानंद की आत्मपरक कविता, जिसका असर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने खुलकर माना; श्रीधर पाठक का प्रकृति-चित्रण।
छायावाद का प्रवर्तक कौन है, इस पर कोई एक राय नहीं है। शुक्ल ने श्रेय मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पांडेय को दिया। इलाचंद्र जोशी ने प्रसाद को प्रवर्तक माना, क्योंकि उनकी कविताएँ 1909 से ‘इंदु’ पत्रिका में छपने लगी थीं और ‘झरना’ 1918 में आया। विनयमोहन शर्मा और प्रभाकर माचवे ने माखनलाल चतुर्वेदी का नाम लिया, और रायकृष्णदास ने पंत का। परीक्षा के लिए सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि प्रश्न में जिस आलोचक का नाम हो, उसका मत लिखिए; अपनी ओर से एक नाम पक्का मत कीजिए।
छायावाद के चार स्तंभ और उनकी रचनाएँ
छायावाद के चार स्तंभ प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी हैं। चारों की आवाज अलग है: प्रसाद में दर्शन और इतिहास, पंत में प्रकृति, निराला में विद्रोह और संगीत, महादेवी में वेदना। नीचे की तालिका में उनकी मुख्य काव्य-रचनाएँ हैं।
| कवि | जीवनकाल | प्रमुख काव्य-रचनाएँ | पहचान |
|---|---|---|---|
| जयशंकर प्रसाद | 1889 से 1937 (वाराणसी) | झरना, आँसू, लहर, कामायनी | कामायनी महाकाव्य; कई आलोचक प्रवर्तक मानते हैं |
| सुमित्रानंदन पंत | 1900 से 1977 (कौसानी) | वीणा, ग्रंथि, पल्लव (1926), गुंजन, युगांत, युगवाणी, ग्राम्या, चिदंबरा | प्रकृति के सुकुमार कवि; चिदंबरा पर ज्ञानपीठ (1968) |
| सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ | 1896 से 1961 | अनामिका, परिमल, गीतिका, अणिमा, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते | मुक्त छंद; राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, तुलसीदास |
| महादेवी वर्मा | 1907 से 1987 | नीहार (1930), रश्मि (1932), नीरजा (1934), सांध्यगीत (1935), दीपशिखा (1942); संकलन यामा (1940) | वेदना की कवयित्री; यामा पर ज्ञानपीठ (1982) |
जयशंकर प्रसाद
प्रसाद छायावाद के सबसे बड़े कवि माने जाते हैं। ‘झरना’ से उनकी नई शैली दिखी, ‘आँसू’ में निजी वेदना आई, और ‘लहर’ में शुक्ल के अनुसार उन्होंने छायावाद की चित्रमयी शैली को इतिहास के प्रसंगों पर आजमाया। उनकी अंतिम बड़ी कृति कामायनी है, जिसमें प्रलय के बाद बचे मनु, श्रद्धा और इड़ा की कथा के सहारे मनुष्य के मन की वृत्तियों का विकास दिखाया गया है। इसका पहला संस्करण 1935 का बताया जाता है, हालाँकि कई इतिहास 1936 लिखते हैं। कामायनी चिंता से शुरू होती है:
‘हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह / एक पुरुष, भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह।’ (जयशंकर प्रसाद, कामायनी)
सुमित्रानंदन पंत
पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है। उनकी कविता ‘मोह’, जिसका रचनाकाल जनवरी 1918 दर्ज है, छायावाद के शुरुआती स्वर का अच्छा नमूना है, जहाँ कवि प्रकृति को किसी भी दूसरे आकर्षण से ऊपर रखता है: ‘छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, / बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?’ (सुमित्रानंदन पंत, पल्लव)। शुक्ल ने पंत की यात्रा यों पढ़ी: ‘पल्लव’ में कवि अपने व्यक्तित्व के घेरे में है, ‘गुंजन’ में कभी-कभी उसके बाहर, और ‘युगांत’ में लोक के बीच। यही यात्रा आगे ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्या’ तक जाती है।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
निराला ने छंद के बंधन तोड़े और मुक्त छंद का रास्ता खोला; उनकी ‘जूही की कली’ को इस दिशा का पहला कदम माना जाता है। ध्यान दीजिए, निराला मुक्त छंद के प्रवर्तक हैं, छंदहीन कविता के नहीं; उनकी कविता में लय बनी रहती है। मात्रा और लय के नियम समझने हों तो छंद के भेद और मात्रा गिनने के नियम देखिए। शुक्ल ने लिखा कि संगीत को काव्य के और काव्य को संगीत के करीब लाने की सबसे ज्यादा कोशिश निराला ने की। ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘सरोज स्मृति’ उनकी सबसे गहरी कविताएँ हैं, और ‘तोड़ती पत्थर’ में वे सीधे मेहनतकश की जिंदगी तक आ जाते हैं: ‘वह तोड़ती पत्थर; / देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर।’ (निराला, अनामिका)
महादेवी वर्मा
शुक्ल के अनुसार छायावादी कहे जाने वाले कवियों में केवल महादेवी सच में रहस्यवाद के भीतर रहीं। उस अज्ञात प्रियतम के लिए वेदना ही उनकी कविता का केंद्र है, और मिलन से ज्यादा वे विरह को चुनती हैं। शुक्ल उनकी यह पंक्ति उद्धृत करते हैं: ‘मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ’ (महादेवी वर्मा)। शुक्ल ने यह भी माना कि गीत लिखने में जैसी सफलता महादेवी को मिली, वैसी किसी और को नहीं। उनके पहले के संग्रहों का एक बड़ा संकलन ‘यामा’ (1940) है, जिस पर उन्हें 1982 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
इन चारों के अलावा माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, मुकुटधर पांडेय, रामकुमार वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, नरेंद्र शर्मा और रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ भी छायावादी कवियों में गिने जाते हैं। इनमें से कई आगे चलकर दूसरी धाराओं से जुड़ गए।
छायावाद की विशेषताएँ
छायावाद की सबसे बड़ी विशेषता है आत्माभिव्यक्ति: कवि अपनी निजी अनुभूति को सीधे कविता का विषय बनाता है। बाकी विशेषताएँ इसी से निकलती हैं। नीचे की तालिका में बारह मुख्य विशेषताएँ और उनके उदाहरण हैं।
| विशेषता | मतलब | उदाहरण |
|---|---|---|
| वैयक्तिकता | कवि की निजी अनुभूति ही विषय | प्रसाद का आँसू |
| प्रेम और सौंदर्य | नारी, मनुष्य और प्रकृति का सूक्ष्म सौंदर्य | कामायनी, राम की शक्तिपूजा में नारी के प्रति संवेदना |
| निराशा और वेदना | अवसाद और पीड़ा का गहरा स्वर | महादेवी के गीत, निराला की ‘मैं अकेला’ |
| प्रकृति का सजीव चित्रण | प्रकृति आलंबन बनी, सिर्फ उद्दीपन नहीं | पंत की कविता |
| रहस्य भावना | अज्ञात, असीम सत्ता से प्रेम | महादेवी वर्मा |
| राष्ट्रीयता | अतीत का गौरव और देश-वंदना | प्रसाद का ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ |
| मानवतावाद | उपेक्षित आम आदमी के लिए करुणा | निराला की भिक्षुक, विधवा, तोड़ती पत्थर |
| कल्पना की प्रधानता | स्थूल बयान की जगह चित्र और कल्पना | पंत और प्रसाद के प्रकृति-चित्र |
| प्रतीकात्मकता | भाव प्रतीकों से कहे गए | प्रसाद और महादेवी |
| कोमल, परिष्कृत भाषा | संस्कृत-निष्ठ, संगीतमय खड़ी बोली | चारों कवि |
| नए छंद | मुक्त छंद और गीत | निराला की जूही की कली |
| नए अलंकार | मानवीकरण, विशेषण-विपर्यय, ध्वन्यार्थ व्यंजना | प्रसाद की ‘बीती विभावरी जाग री’ |
प्रकृति का बर्ताव छायावाद में सबसे साफ बदलता है। रीतिकाल में प्रकृति ज्यादातर नायक-नायिका के मन को उकसाने वाला पर्दा थी, यानी उद्दीपन। छायावाद में प्रकृति खुद विषय बन गई, जीती-जागती, बोलती हुई। प्रसाद की भोर का चित्र देखिए, जहाँ उषा एक नागरी की तरह आसमान के पनघट में तारों का घड़ा डुबो रही है: ‘अम्बर पनघट में डुबो रही / तारा-घट ऊषा नागरी!’ (जयशंकर प्रसाद)। यहाँ उषा पर मानव-क्रिया का आरोप है, यानी मानवीकरण। यही अलंकार छायावाद का सबसे प्रिय अलंकार है; इसकी पहचान अलंकार के भेद और उदाहरण वाले नोट में देखिए।
वेदना वाली विशेषता को रस की भाषा में समझना आसान है। छायावाद में वियोग शृंगार और करुण का स्वर बार-बार आता है। रस के स्थायी भाव और उनकी पहचान के लिए रस वाला नोट काम आएगा।
छायावाद पर आरोप और आलोचना
छायावाद हिंदी का शायद सबसे ज्यादा सराहा और सबसे ज्यादा कोसा गया आंदोलन है। तारीफ करने वालों में नंददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेंद्र और शांतिप्रिय द्विवेदी थे; आलोचना करने वालों में शुक्ल, रामविलास शर्मा, डॉ. देवराज और मुक्तिबोध। दोनों पक्षों के मुख्य तर्क ये हैं:
- शुक्ल: छायावाद बाहरी चटक-मटक पर ज्यादा ध्यान देने वाली एक शैली भर है।
- श्यामसुंदरदास: इसकी कविता का साधारणीकरण नहीं हो पाता, यानी पाठक उससे अपने को जोड़ नहीं पाता।
- डॉ. नगेंद्र: इसमें कुंठा फैली हुई है; फिर भी वे मानते हैं कि इसकी समृद्धि की बराबरी हिंदी का केवल भक्तिकाव्य कर सकता है।
- डॉ. देवराज: ‘छायावाद का पतन’ निबंध में इसे रीतिकाल का पुनरागमन बताया।
- रामविलास शर्मा और मुक्तिबोध: जनजीवन से दूरी पर तीखी टिप्पणियाँ कीं।
सबसे टिकाऊ आरोप यही है कि छायावाद जनजीवन से कटता गया। ज्यादा कल्पना, ज्यादा भावुकता और भीतर की ओर मुड़ी कविता धीरे-धीरे कवि के अपने मन की चीज बन गई। चिर, मधु, आली जैसे शब्द इतने दोहराए गए कि कविता एकरस लगने लगी। खुद पंत ने बाद में लिखा कि छायावाद ज्यादा इसलिए नहीं चल सका, क्योंकि उसके पास भविष्य के लिए नए आदर्श और नए विचार नहीं थे, और वह काव्य न रहकर केवल ‘अलंकृत संगीत’ बन गया था।
पर संतुलित फैसला यह है कि इन कमियों के बावजूद खड़ी बोली को कविता की परिपक्व भाषा बनाने का काम छायावाद ने ही पूरा किया। द्विवेदी युग ने खड़ी बोली को कविता में जगह दिलाई; छायावाद ने उसमें कोमलता, संगीत और गहराई भरी। दिनकर का कथन इसका सार है कि यह आंदोलन ‘विचित्र जादूगर’ बनकर आया था, जिधर उसने एक मुट्ठी गुलाल फेंकी, उधर क्षितिज लाल हो गया। नगेंद्र ने इसकी तुलना भक्तिकाव्य से की थी; भक्ति कविता का वह दौर कैसे बना, यह भारत में भक्ति आंदोलन वाले नोट में है।
छायावाद से प्रगतिवाद तक: 1936 का मोड़
छायावाद का अंत किसी एक घटना से नहीं, 1936 के आसपास कई घटनाओं के साथ हुआ। इसी साल लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन प्रेमचंद की अध्यक्षता में हुआ। संघ की नींव लंदन में मुल्कराज आनंद और सज्जाद जहीर की कोशिश से पड़ी थी। प्रेमचंद ने अपने अध्यक्षीय भाषण में लेखकों से व्यक्तिवादी सौंदर्य-चेतना और कल्पना की दुनिया से निकलकर जीवन के यथार्थ को लिखने को कहा।
छायावाद के कवि खुद इस मोड़ पर मुड़ गए, और यह बात परीक्षा में खूब पूछी जाती है:
- पंत, जिन्हें छायावाद का घोषणापत्र लिखने वाला कहा जाता है, ने 1936 में ही ‘युगांत’ की घोषणा की; फिर ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्या’ में गाँव, किसान और समाज की बात आई।
- निराला ने 1937 की ‘तोड़ती पत्थर’ में यथार्थ देखा, और ‘कुकुरमुत्ता’ में व्यंग्य का नया तेवर दिखाया।
- प्रसाद का निधन 15 नवंबर 1937 को हुआ; कामायनी छायावाद का आखिरी बड़ा शिखर रही।
यानी प्रगतिवाद छायावाद के बाहर से आई धारा भर नहीं थी; छायावाद के दो बड़े कवि खुद उसके शुरुआती आवाज बने। आगे नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवियों ने इसे ज्यादा तीखा स्वर दिया। एक और बात याद रखिए: जिन सालों में कविता में छायावाद चल रहा था, उन्हीं सालों में कहानी और उपन्यास में प्रेमचंद का दौर था। उनका ‘सेवासदन’ 1918 में और ‘गोदान’ 1936 में आया, और कहानी के इतिहास में यह समय प्रेमचंद युग कहलाता है। इसलिए ‘कहानी की दृष्टि से छायावाद युग को क्या कहा जाता है’ जैसे प्रश्न का उत्तर प्रेमचंद युग है।
परीक्षा में छायावाद कैसे पूछा जाता है
राज्य स्तर की परीक्षाओं के सामान्य हिंदी में छायावाद अक्सर रचना-रचनाकार मिलान, परिभाषा किसकी है, किस कवि को क्या उपाधि मिली और छायावाद की विशेषताओं के रूप में आता है। सिविल सेवा में हिंदी साहित्य वैकल्पिक विषय लेने वालों के लिए यह पहले प्रश्नपत्र का बड़ा हिस्सा है, जहाँ आलोचकों के मत और कवियों की तुलना पर विश्लेषण माँगा जाता है; विषय चुनने से पहले हिंदी साहित्य वैकल्पिक की गाइड देख लीजिए। पूरे काल-विभाजन में छायावाद कहाँ बैठता है, यह हिंदी साहित्य के इतिहास वाले नोट से साफ होगा। अनिवार्य हिंदी का प्रश्नपत्र साहित्य नहीं पूछता; उसके लिए अनिवार्य हिंदी व्याकरण का नक्शा अलग से है।
रिवीजन के लिए ये तथ्य पक्के कर लीजिए:
- समय आम तौर पर 1918 से 1936; शुक्ल का तृतीय उत्थान संवत 1975 से।
- नाम का पहला प्रयोग मुकुटधर पांडेय, ‘हिंदी में छायावाद’, शारदा (1920)।
- चार स्तंभ: प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी वर्मा।
- कामायनी प्रसाद का महाकाव्य; मनु, श्रद्धा, इड़ा।
- निराला मुक्त छंद के प्रवर्तक; पहली कविता जूही की कली।
- ज्ञानपीठ: पंत को चिदंबरा पर (1968), महादेवी को यामा पर (1982)।
- ‘स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह’ नगेंद्र का कथन है; ‘स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म की प्रतिक्रिया’ शुक्ल का।
सबसे ज्यादा नंबर इन जोड़ों में कटते हैं। छायावाद और रहस्यवाद एक नहीं हैं; रहस्यवाद छायावाद का एक हिस्सा है, और शुक्ल के अनुसार पूरी तरह उसमें केवल महादेवी आती हैं। शुक्ल ने छायावाद को ‘प्रतिक्रिया’ कहा, नगेंद्र ने ‘विद्रोह’; शब्द बदलते ही कथन का लेखक बदल जाता है। और मुक्त छंद को छंदहीन कविता मत लिखिए। पड़ोसी धाराओं से तुलना एक तालिका में याद रखिए:
| धारा | समय | मुख्य स्वर | प्रमुख कवि |
|---|---|---|---|
| द्विवेदी युग | 1900 से 1920 | आदर्श, नैतिकता, कथा का सीधा बयान | मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध |
| छायावाद | 1918 से 1936 | निजी अनुभूति, सौंदर्य, वेदना, रहस्य | प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी |
| प्रगतिवाद | 1936 से | किसान-मजदूर, सामाजिक यथार्थ | नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल |
| प्रयोगवाद | 1943 से | नए प्रयोग, बौद्धिकता | अज्ञेय और तार सप्तक के कवि |
छायावाद को रटने की बजाय चार कवियों की चार आवाजें पहचानना सीखिए: प्रसाद का दर्शन, पंत की प्रकृति, निराला का विद्रोह, महादेवी की वेदना। हर कवि की एक पंक्ति और एक रचना जुबान पर रहे, तो विशेषताएँ, आलोचना और प्रगतिवाद की ओर मोड़, तीनों अपने आप समझ में बैठ जाते हैं।
अभ्यास प्रश्न
पहले आठ प्रश्न तथ्य पर हैं, बाकी समझ पर। उत्तर इस खंड के अंत में हैं।
- छायावाद का समय आम तौर पर क्या माना जाता है?
- हिंदी में ‘छायावाद’ शब्द का पहला प्रयोग किसने और कहाँ किया?
- छायावाद के चार स्तंभ कौन हैं?
- कामायनी किसकी रचना है, और उसके तीन मुख्य पात्र कौन हैं?
- ‘छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है’, यह कथन किसका है?
- मुक्त छंद का प्रवर्तक किसे माना जाता है, और उनकी कौन-सी कविता इस दिशा में पहली मानी जाती है?
- महादेवी वर्मा को किस रचना पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला?
- ‘वह तोड़ती पत्थर’ किस कवि की पंक्ति है?
- शुक्ल ने छायावाद शब्द के कौन-से दो अर्थ बताए?
- शुक्ल ने केवल महादेवी को रहस्यवादी क्यों माना?
- ‘अम्बर पनघट में डुबो रही, तारा-घट ऊषा नागरी’ में कौन-सा अलंकार है?
- छायावाद पर सबसे बड़ा आरोप क्या है?
- छायावाद से प्रगतिवाद की ओर मोड़ में पंत की भूमिका क्या रही?
उत्तर
- आम तौर पर 1918 से 1936; कुछ इतिहास 1920 से 1936 देते हैं।
- मुकुटधर पांडेय ने, ‘हिंदी में छायावाद’ निबंध में, जो 1920 में शारदा पत्रिका में छपा।
- जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा।
- जयशंकर प्रसाद की; मनु, श्रद्धा और इड़ा।
- डॉ. नगेंद्र का।
- निराला को; ‘जूही की कली’।
- ‘यामा’ पर, 1982 में।
- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की, कविता ‘तोड़ती पत्थर’ से।
- पहला, रहस्यवाद के अर्थ में (काव्य-वस्तु से जुड़ा); दूसरा, काव्यशैली या प्रतीक पद्धति के अर्थ में।
- क्योंकि बाकी कवि शैली के कारण छायावादी कहलाए, जबकि महादेवी की कविता का केंद्र ही अज्ञात प्रियतम के प्रति वेदना है।
- मानवीकरण, क्योंकि उषा पर नागरी की तरह घड़ा डुबोने की मानवीय क्रिया का आरोप है।
- जनजीवन से दूरी: ज्यादा कल्पना, भावुकता और अंतर्मुखता के कारण कविता आम लोगों की जिंदगी से कट गई।
- पंत ने 1936 में ‘युगांत’ की घोषणा की और ‘युगवाणी’ तथा ‘ग्राम्या’ में सामाजिक यथार्थ की ओर मुड़े।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
छायावाद क्या है?
छायावाद आधुनिक हिंदी कविता का लगभग 1918 से 1936 तक का दौर है, जिसमें कवियों ने बाहरी बयान की जगह अपनी निजी अनुभूति, सौंदर्य और वेदना को प्रतीकों और चित्रों में कहा। शुक्ल के शब्दों में यह प्रस्तुत के स्थान पर उसकी छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन है। प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी इसके चार स्तंभ हैं।
छायावाद की परिभाषा क्या है?
सबसे ज्यादा उद्धृत परिभाषाएँ दो हैं: शुक्ल के अनुसार छायावाद स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म की प्रतिक्रिया है, और डॉ. नगेंद्र के अनुसार स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह। प्रसाद ने इसे वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति कहा। महादेवी ने इसे प्रकृति में चेतना का आरोप और असीम के प्रति आत्म-विसर्जन बताया।
छायावाद की मुख्य विशेषता क्या है?
छायावाद की मुख्य विशेषता आत्माभिव्यक्ति है, यानी कवि की निजी अनुभूति ही कविता का विषय बनती है। इसके साथ प्रेम और सौंदर्य, प्रकृति का सजीव चित्रण, वेदना, रहस्य भावना, प्रतीकात्मकता, कोमल भाषा, मुक्त छंद और मानवीकरण जैसे नए अलंकार इसकी पहचान हैं।
छायावाद के चार स्तंभ कौन हैं?
जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा छायावाद के चार स्तंभ हैं। प्रसाद की पहचान कामायनी से, पंत की प्रकृति-चित्रण से, निराला की मुक्त छंद और विद्रोह से, और महादेवी की वेदना और रहस्य भावना से है।
छायावाद का प्रवर्तक किसे माना जाता है?
इस पर एक राय नहीं है। शुक्ल ने मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पांडेय को श्रेय दिया, जबकि इलाचंद्र जोशी और कई बाद के आलोचक जयशंकर प्रसाद को प्रवर्तक मानते हैं, क्योंकि उनकी झरना वाली कविताएँ 1909 से छपने लगी थीं। कुछ ने माखनलाल चतुर्वेदी और पंत का नाम भी लिया।
कहानी की दृष्टि से छायावाद युग को क्या कहा जाता है?
कहानी और उपन्यास के इतिहास में छायावाद वाले वर्षों को प्रेमचंद युग कहा जाता है। प्रेमचंद का सेवासदन 1918 में और गोदान 1936 में आया, यानी उनका सबसे बड़ा दौर लगभग छायावाद के साथ-साथ चला। कविता में जो समय छायावाद है, कथा-साहित्य में वही प्रेमचंद युग है।
छायावाद और रहस्यवाद में क्या अंतर है?
रहस्यवाद में कवि अनंत और अज्ञात सत्ता से प्रेम की बात करता है, जबकि छायावाद एक बड़ी काव्य-धारा है जिसमें प्रकृति, प्रेम, राष्ट्र और समाज सब आते हैं। रहस्यवाद छायावाद का एक हिस्सा है, पूरा छायावाद नहीं। शुक्ल के अनुसार पूरी तरह रहस्यवाद में केवल महादेवी वर्मा रहीं।
छायावाद का अंत कब और कैसे हुआ?
छायावाद का अंत आम तौर पर 1936 के आसपास माना जाता है। उसी साल लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन हुआ, पंत ने युगांत की घोषणा की, और 1937 में प्रसाद का निधन हुआ। इसके बाद पंत और निराला की कविता खुद सामाजिक यथार्थ की ओर मुड़ गई और प्रगतिवाद का दौर शुरू हुआ।
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