हिंदी साहित्य का इतिहास लगभग एक हजार साल की कविता और गद्य की कहानी है, और पढ़ाई में इसे आम तौर पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ढाँचे से समझा जाता है। शुक्ल ने 1929 में छपे अपने ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में इसे चार कालों में बाँटा: आदिकाल यानी वीरगाथाकाल, पूर्व मध्यकाल यानी भक्तिकाल, उत्तर मध्यकाल यानी रीतिकाल, और आधुनिक काल यानी गद्यकाल। नाम और तारीखों पर बाद में खूब बहस हुई, फिर भी किताबें, सिलेबस और प्रश्नपत्र आज भी इसी नक्शे पर चलते हैं।
सबसे ज्यादा गलती तारीखों में होती है। शुक्ल की सीमाएँ विक्रम संवत में हैं, ईस्वी में नहीं, इसलिए आदिकाल का संवत 1050 असल में लगभग 993 ई. है, सन 1050 नहीं। दूसरी गलतफहमी नामों की है। वीरगाथाकाल का मतलब यह नहीं कि उस दौर में सिर्फ वीर रस लिखा गया, और छायावाद या प्रगतिवाद शुक्ल के काल-नाम नहीं हैं; ये आधुनिक काल के भीतर बाद में चले युग-नाम हैं।
हिंदी साहित्य का इतिहास एक नजर में
पूरा नक्शा पहले देख लीजिए। तारीखें शुक्ल की हैं और विक्रम संवत में हैं; ईस्वी पाने के लिए मोटे तौर पर 57 घटाइए।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| मानक ग्रंथ | आचार्य रामचंद्र शुक्ल, ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ (1929) |
| बाँटने का आधार | जनता की ‘चित्तवृत्ति’ और किसी दौर में खास ढंग की रचनाओं की अधिकता |
| आदिकाल (वीरगाथाकाल) | संवत 1050 से 1375, लगभग 993 से 1318 ई. |
| पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) | संवत 1375 से 1700, लगभग 1318 से 1643 ई. |
| उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) | संवत 1700 से 1900, लगभग 1643 से 1843 ई. |
| आधुनिक काल (गद्यकाल) | संवत 1900 से 1984, यानी शुक्ल के अपने समय तक |
| पहला इतिहास-ग्रंथ | गार्सां द तासी का फ्रेंच ग्रंथ (1839), कवियों का अकारादि क्रम, कोई काल-विभाजन नहीं |
| आधुनिक काल के युग | भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता |
शुक्ल का काल-विभाजन किस आधार पर टिका है
सीधा जवाब: शुक्ल ने दो आधार एक साथ लिए, समय का क्रम और उस समय में सबसे ज्यादा मिलने वाली रचना-प्रवृत्ति। उनका वाक्य है कि हर देश का साहित्य ‘वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ होता है। जनता की सोच बदलती है, तो साहित्य का रूप भी बदलता है, और इतिहासकार का काम इसी बदलाव को परिस्थितियों के साथ जोड़कर दिखाना है।
इसी वजह से हर काल के दो नाम हैं। समय के क्रम से नाम हैं आदिकाल, पूर्व मध्यकाल, उत्तर मध्यकाल और आधुनिक काल। प्रवृत्ति से नाम हैं वीरगाथाकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और गद्यकाल। ध्यान दीजिए, आदिकाल नाम भी शुक्ल का ही दिया हुआ है; बाद के इतिहासकारों ने इसे अपनाया और वीरगाथाकाल वाले नाम पर आपत्ति की।
शुक्ल ने खुद साफ लिखा कि किसी काल का नाम उसकी खास प्रवृत्ति से रखा गया है, पर उस दौर में बाकी तरह की रचनाएँ भी होती रहीं। भक्तिकाल और रीतिकाल में भी राजाओं की प्रशंसा वाले वीर काव्य मिलते हैं। इसलिए उन्होंने हर काल के अंत में ‘फुटकल’ रचनाओं का अलग हिस्सा रखा। आलोचक नामवर सिंह ने इसी पर उँगली उठाई कि हर युग में फुटकल खाता खोलना पड़ा, क्योंकि एक ही परिस्थिति में कई तरह की प्रवृत्तियाँ एक साथ कैसे चलीं, यह शुक्ल का ढाँचा पूरी तरह नहीं समझा पाता।
| काल | शुक्ल का प्रवृत्ति-नाम | विक्रम संवत | मुख्य काव्य-भाषा |
|---|---|---|---|
| आदिकाल | वीरगाथाकाल | 1050 से 1375 | अपभ्रंश (अवहट्ठ), डिंगल, मैथिली, शुरुआती खड़ी बोली |
| पूर्व मध्यकाल | भक्तिकाल | 1375 से 1700 | अवधी, ब्रजभाषा, सधुक्कड़ी |
| उत्तर मध्यकाल | रीतिकाल | 1700 से 1900 | ब्रजभाषा |
| आधुनिक काल | गद्यकाल | 1900 से 1984 | खड़ी बोली |
शुक्ल से पहले और बाद के इतिहासकार
हिंदी साहित्य का पहला इतिहास फ्रांसीसी विद्वान गार्सां द तासी ने 1839 में फ्रेंच में लिखा, पर उसमें कवि अकारादि क्रम में थे, समय के क्रम में नहीं। शुक्ल ने अपने से पहले के ग्रंथों को इतिहास नहीं, ‘कवि-वृत्त-संग्रह’ कहा, क्योंकि उनमें विचार की कोई शृंखला नहीं थी। नीचे की तालिका में बड़े नाम और उनके काल-विभाजन की खास बात है।
| इतिहासकार | ग्रंथ | वर्ष | खास बात |
|---|---|---|---|
| गार्सां द तासी | इस्त्वार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी (फ्रेंच) | 1839 | अकारादि क्रम, काल-विभाजन नहीं |
| शिवसिंह सेंगर | शिवसिंह सरोज | 1883 | शताब्दियों के हिसाब से बँटवारा, सामग्री के लिए अहम |
| जॉर्ज ग्रियर्सन | द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान | 1889 | ग्यारह खंड, पहला खंड चारण काल (सन 700 से 1300) |
| मिश्रबंधु | मिश्रबंधु विनोद | शुक्ल से पहले | भाषा के विकास पर आधारित नौ हिस्से, कवियों का समय तय करने पर मेहनत |
| रामचंद्र शुक्ल | हिंदी साहित्य का इतिहास | 1929 | चार काल, प्रवृत्ति से नामकरण |
| रामकुमार वर्मा | हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास | 1938 | संधिकाल और चारणकाल; स्वयंभू को पहला कवि माना |
| हजारीप्रसाद द्विवेदी | हिंदी साहित्य की भूमिका; हिंदी साहित्य का आदिकाल | 1940; 1952 | ‘वीरगाथाकाल’ नाम से असहमति, भक्ति को भारतीय चिंतन की निरंतरता में देखा |
| गणपतिचंद्र गुप्त | हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास | 1965 | शुरुआत सन 1184 के ‘भरतेश्वर बाहुबली रास’ से, 1857 बड़ी विभाजक रेखा |
| रामस्वरूप चतुर्वेदी | हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास | 1986 | संवेदना के बदलाव पर जोर, ढाँचा शुक्ल वाला ही |
सबसे बड़ी बहस आदिकाल के नाम पर है। शुक्ल ने रासो ग्रंथों को देखकर इसे वीरगाथाकाल कहा। रामकुमार वर्मा ने इसे चारणकाल कहा और उससे पहले संधिकाल जोड़ा। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल नाम और उसकी सीमा तो मानी, पर कहा कि किसी काल का नाम ग्रंथों की गिनती से नहीं, उस दौर की मुख्य प्रेरणा से तय होना चाहिए। इसी तर्क से उन्होंने राहुल सांकृत्यायन के सुझाए नाम ‘सिद्ध-सामंत काल’ को उस दौर के ज्यादा करीब माना।
भक्ति के उदय पर भी दोनों आचार्य अलग थे। शुक्ल ने भक्ति के उभार को इस्लाम के आगमन की प्रतिक्रिया के रूप में देखा। द्विवेदी का जवाब था कि इस्लाम न भी आया होता, तो भी हिंदी साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा हुआ। रीतिकाल के नाम पर विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने ‘शृंगारकाल’ का पक्ष लिया। बाद के आलोचक रामविलास शर्मा ने माना कि इतनी कोशिशों के बाद भी शुक्ल का बनाया ढाँचा बहुत कुछ अपने मूल रूप में कायम है। डॉ. नगेंद्र के संपादन में बना ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ आधुनिक काल के लिए खूब पढ़ा जाता है, यह बात हिंदी साहित्य वैकल्पिक विषय की गाइड की किताबों वाली सूची भी कहती है।
आदिकाल (वीरगाथाकाल): संवत 1050 से 1375
शुक्ल के अनुसार आदिकाल राजा भोज के समय (संवत 1050) से शुरू होकर हम्मीरदेव के कुछ बाद तक चलता है। उनके मुताबिक शुरुआती डेढ़ सौ साल में किसी एक प्रवृत्ति का पता नहीं चलता; धर्म, नीति, शृंगार और वीर, हर तरह के दोहे मिलते हैं। मुसलमानों की चढ़ाइयाँ शुरू होने के बाद राजाश्रित कवि और चारण अपने आश्रयदाताओं की वीरता के प्रबंध लिखने लगे, जिन्हें रासो कहा गया। इसी परंपरा को देखकर शुक्ल ने इस काल को वीरगाथाकाल कहा।
पर आदिकाल सिर्फ रासो का काल नहीं है। इसमें चार-पाँच धाराएँ साथ चलती हैं:
- सिद्ध साहित्य: चौरासी सिद्धों की रचनाएँ, अपभ्रंश और लोकभाषा के मेल में। सरहपा पहले सिद्ध कवि माने जाते हैं।
- नाथ साहित्य: मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य गोरखनाथ ने हठयोग का उपदेश दिया। कबीर जैसे संतों की तीखी भाषा की लौ यहीं से आती दिखती है।
- जैन साहित्य: स्वयंभू का ‘पउमचरिउ’ अपभ्रंश की रामकथा है।
- रासो काव्य: पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, परमाल रासो, खुमाण रासो।
- लोकभाषा की रचनाएँ: अमीर खुसरो की पहेलियाँ और मुकरियाँ, विद्यापति की पदावली।
भाषा के लिहाज से यह दौर दो पटरियों पर चलता है। एक तरफ कवि पुरानी, किताबी अपभ्रंश लिख रहे थे, दूसरी तरफ खुसरो दिल्ली में बोलचाल की भाषा में पहेलियाँ कह रहे थे। विद्यापति ने यह फर्क खुद दर्ज किया: ‘देसिल बअना सब जन मिट्ठा’, यानी देसी बोली सबको मीठी लगती है।
| कवि | रचना | खास बात |
|---|---|---|
| सरहपा | दोहाकोश | सिद्धों में पहले कवि, आडंबर का खंडन |
| गोरखनाथ | नाथ पंथ के उपदेश | हठयोग, संत काव्य की जमीन तैयार की |
| स्वयंभू | पउमचरिउ | अपभ्रंश रामकथा; रामकुमार वर्मा ने इन्हें हिंदी का पहला कवि माना |
| अब्दुर्रहमान (अद्दहमाण) | संदेश रासक | अपभ्रंश परंपरा की रचना, रचनाकार मुस्लिम कवि |
| नरपति नाल्ह | बीसलदेव रासो | शुक्ल ने रचना-तिथि संवत 1212 मानी; बारहमासा वर्णन पहली बार |
| चंदबरदाई | पृथ्वीराज रासो | शुक्ल के अनुसार हिंदी का पहला महाकाव्य; प्रामाणिकता पर बहस |
| जगनिक | परमाल रासो | आल्हा-ऊदल की वीरगाथा, आल्हखंड के रूप में लोक में जीवित |
| दलपति विजय | खुमाण रासो | मौजूदा प्रतियों में बाद के राणाओं तक का वर्णन |
| अमीर खुसरो | पहेलियाँ, मुकरियाँ | बोलचाल की खड़ी बोली का शुरुआती नमूना |
| विद्यापति | कीर्तिलता, कीर्तिपताका; पदावली | पहली दो अवहट्ठ में, पदावली मैथिली में; ‘मैथिल कोकिल’ |
रासो ग्रंथों को इतिहास की किताब मानकर मत पढ़िए। इनकी उपलब्ध प्रतियों में बाद के जोड़ भरे पड़े हैं; पृथ्वीराज रासो की तारीखों और घटनाओं पर सौ साल से ज्यादा पुरानी बहस का पूरा ब्योरा पृथ्वीराज रासो वाले नोट में है। विद्यापति के बारे में भी शुक्ल की एक बात याद रखिए: उन्होंने राधा-कृष्ण के पद शृंगार काव्य की दृष्टि से लिखे, इसलिए शुक्ल उन्हें कृष्णभक्तों की परंपरा में नहीं रखते।
भक्तिकाल: निर्गुण और सगुण की चार शाखाएँ
भक्तिकाल शुक्ल का पूर्व मध्यकाल है, संवत 1375 से 1700 तक। इस काल की कविता दो धाराओं में बँटती है, निर्गुण और सगुण, और हर धारा की दो शाखाएँ हैं। निर्गुण में ज्ञानाश्रयी (संत काव्य) और प्रेमाश्रयी (सूफी काव्य), सगुण में रामभक्ति और कृष्णभक्ति। ये चारों लगभग साथ-साथ चलीं, अलग-अलग दौर में नहीं।
| धारा | शाखा | प्रमुख कवि | प्रमुख रचनाएँ |
|---|---|---|---|
| निर्गुण | ज्ञानाश्रयी (संत काव्य) | कबीर, रैदास, गुरु नानक, दादू दयाल | बीजक (साखी, सबद, रमैनी); संतों के पद और साखियाँ |
| निर्गुण | प्रेमाश्रयी (सूफी काव्य) | मुल्ला दाऊद, कुतुबन, मंझन, मलिक मुहम्मद जायसी | चंदायन, मृगावती, मधुमालती, पद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम |
| सगुण | रामभक्ति | तुलसीदास, अग्रदास, नाभादास | रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली; भक्तमाल |
| सगुण | कृष्णभक्ति | सूरदास और अष्टछाप, मीराबाई, रसखान | सूरसागर, सूरसारावली; मीरा के पद |
संत कवियों में कबीर सबसे आगे हैं। उनकी मुख्य रचना बीजक है, जिसके तीन हिस्से हैं: साखी, सबद और रमैनी। किताबी ज्ञान पर उनका तंज आज भी याद किया जाता है: ‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय॥’ उनके जीवन, भाषा और विचार पर कबीर दास वाला नोट देखिए।
सूफी कवियों ने लोककथाओं को अवधी में प्रेम-कहानी बनाकर ईश्वर-प्रेम की बात कही। इन काव्यों के नाम अक्सर नायिका पर होते हैं: मृगावती, मधुमालती, पद्मावत। शुक्ल ने कुतुबन की मृगावती का समय 909 हिजरी यानी संवत 1558 बताया है। इस शाखा का सबसे प्रौढ़ काव्य जायसी का पद्मावत है। कवि ने कथा का आरंभ 927 हिजरी (लगभग 1520 ई.) बताया है, पर ग्रंथ की शुरुआत में शेरशाह की प्रशंसा है, जिसका शासन 947 हिजरी यानी 1540 ई. में शुरू हुआ। शुक्ल का अनुमान है कि कुछ पद्य 1520 के आसपास बने और ग्रंथ शेरशाह के समय में पूरा हुआ।
रामभक्ति शाखा का केंद्र तुलसीदास हैं। शुक्ल के अनुसार उन्होंने संवत 1631 में अयोध्या में रामचरितमानस शुरू की और दो साल सात महीने में पूरी की। मानस में खुद तुलसी लिखते हैं: ‘संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥’ इसी शाखा के नाभादास का ‘भक्तमाल’ भक्तों की जानकारी का बड़ा स्रोत है; शुक्ल के अनुसार यह संवत 1642 के बाद बना। तुलसी पर ज्यादा के लिए तुलसीदास और रामचरितमानस वाला नोट पढ़िए।
कृष्णभक्ति में वल्लभ संप्रदाय सबसे असरदार रहा। वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने आठ कवियों को चुनकर अष्टछाप बनाई:
- सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास
- छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, चतुर्भुजदास, नंददास
इनमें सूरदास सबसे बड़े हैं; सूरसागर में कृष्ण के जन्म से मथुरा जाने तक की कथा फुटकल पदों में गाई गई है, और उसका ‘भ्रमरगीत’ प्रसंग सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है। मीराबाई और रसखान अष्टछाप में नहीं हैं, पर कृष्णभक्ति के बड़े कवि हैं। पूरे भक्ति आंदोलन की जड़ें दक्षिण के आलवार संतों तक जाती हैं, जिसकी कहानी भारत में भक्ति आंदोलन वाले नोट में है।
रीतिकाल: लक्षण-ग्रंथ, दरबार और शृंगार
रीतिकाल शुक्ल का उत्तर मध्यकाल है, संवत 1700 से 1900 तक। यहाँ ‘रीति’ का मतलब है काव्यशास्त्र। इस दौर के कवि दरबारों में रहते थे और संस्कृत काव्यशास्त्र के आधार पर रस, अलंकार, छंद और नायिका-भेद के लक्षण-ग्रंथ लिखते थे; हर लक्षण के साथ अपना बनाया उदाहरण देते थे। भाषा लगभग पूरी तरह ब्रजभाषा रही।
एक बारीक बात परीक्षा में अक्सर फँसाती है। केशवदास ने कविप्रिया और रसिकप्रिया जैसे ग्रंथ तुलसी के आसपास के समय में ही लिख दिए थे, फिर भी शुक्ल ने रीतिकाल का आरंभ उनसे नहीं माना। उनका तर्क था कि केशव के बाद तुरंत परंपरा नहीं चली; कविप्रिया के करीब 50 साल बाद चिंतामणि त्रिपाठी से रीतिग्रंथों की अखंड परंपरा शुरू हुई, इसलिए रीतिकाल उन्हीं से गिना जाए। फिर भी केशव की चर्चा इतिहास में रीतिकाल के भीतर ही होती है।
रीतिकाल के कवियों को आज आम तौर पर तीन हिस्सों में बाँटा जाता है। यह बँटवारा विश्वनाथप्रसाद मिश्र के नाम से जाना जाता है:
| वर्ग | मतलब | प्रमुख कवि | रचनाएँ |
|---|---|---|---|
| रीतिबद्ध | जिन्होंने लक्षण-ग्रंथ लिखे | केशवदास, चिंतामणि, मतिराम, भूषण, भिखारीदास, पद्माकर | कविप्रिया, रसिकप्रिया; रसराज, ललितललाम; शिवराज भूषण, शिवा बावनी; काव्यनिर्णय; पद्माभरण, जगद्विनोद |
| रीतिसिद्ध | लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखे, पर रचना रीति के ज्ञान पर टिकी | बिहारी | बिहारी सतसई |
| रीतिमुक्त | रीति के बंधन से बाहर, अपनी अनुभूति की कविता | घनानंद, ठाकुर | घनानंद के कवित्त-सवैये, जिनमें ‘सुजान’ बार-बार आती है |
रीतिकाल पढ़ते समय यह भी याद रखिए कि इस काल का मुख्य स्वर शृंगार है, पर भूषण जैसे कवि ने शिवाजी और छत्रसाल पर वीर रस लिखा। यही वह बात है जिसके लिए शुक्ल ने हर काल में फुटकल रचनाओं की जगह रखी थी। रीतिकाल के लक्षण-ग्रंथ जिन चीजों को परिभाषित करते हैं, उन्हें समझने के लिए रस के भेद, अलंकार के भेद और छंद के नियम वाले नोट साथ रखिए।
आधुनिक काल: गद्य का उदय और कविता के युग
शुक्ल ने आधुनिक काल को गद्यकाल कहा, क्योंकि इस दौर की सबसे नई चीज खड़ी बोली का गद्य था। उन्होंने इसके भीतर उत्थान गिने: प्रथम उत्थान यानी भारतेंदु काल, द्वितीय उत्थान यानी द्विवेदी काल, और तृतीय उत्थान, जिसे उन्होंने कोई अलग नाम नहीं दिया। संवत 1975 यानी सन 1918 से शुरू होने वाले इसी तीसरे उत्थान को आज छायावाद कहा जाता है। उसके बाद के युग-नाम बाद के इतिहासकारों ने दिए।
| युग | आम तौर पर दिया जाने वाला समय | प्रमुख रचनाकार | रचनाएँ और पहचान |
|---|---|---|---|
| भारतेंदु युग | 1850 से 1900 | भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ | अंधेर नगरी; कविवचन सुधा (1868), हरिश्चंद्र मैगजीन (1873); ब्राह्मण; हिंदी प्रदीप; आनंद कादंबिनी |
| द्विवेदी युग | 1900 से 1920 | महावीरप्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी | सरस्वती का संपादन (1903 से); भारत-भारती (1912), साकेत, यशोधरा; प्रियप्रवास |
| छायावाद | 1918 से 1936 (कुछ इतिहास 1920 से) | जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा | कामायनी, आँसू; पल्लव, गुंजन; परिमल, अनामिका; नीहार, यामा |
| प्रगतिवाद | 1936 से | नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल; इस दौर के पंत और निराला | प्रगतिशील लेखक संघ (लखनऊ, 1936); ग्राम्या; कुकुरमुत्ता |
| प्रयोगवाद | 1943 से | अज्ञेय और तार सप्तक के कवि | तार सप्तक (1943), अज्ञेय के संपादन में |
| नई कविता | 1950 के आसपास से | मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय और उनकी पीढ़ी | प्रयोगवाद और प्रगतिशील धारा, दोनों इसमें घुल गईं |
भारतेंदु की मृत्यु 1885 में हो गई, फिर भी भारतेंदु युग 1900 तक माना जाता है, क्योंकि उनके मंडल के लेखक लिखते रहे और उस युग की दृष्टि बनी रही। इसी तरह महावीरप्रसाद द्विवेदी 1903 में ‘सरस्वती’ के संपादक बने, पर द्विवेदी युग 1900 से गिना जाता है। इस युग ने खड़ी बोली को कविता की भाषा के रूप में जमाया; हरिऔध का प्रियप्रवास खड़ी बोली का पहला महाकाव्य माना जाता है, और मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती की पंक्तियाँ हिंदी पट्टी में लोगों को कंठस्थ थीं।
छायावाद में खड़ी बोली कविता अपने कलात्मक शिखर पर पहुँची। इसके चार स्तंभ, उसकी विशेषताएँ, उस पर लगे आरोप और प्रगतिवाद की ओर उसका मोड़ अपने आप में एक पूरा अध्याय है। 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन हुआ, जहाँ से प्रगतिवाद गिना जाता है, और 1943 में अज्ञेय के संपादन में तार सप्तक छपा, जिससे प्रयोगवाद की शुरुआत मानी जाती है। आजादी के बाद यही धाराएँ नई कविता में मिल गईं।
हिंदी गद्य साहित्य का इतिहास: खड़ी बोली का गद्य कैसे जमा
शुक्ल के अनुसार संवत 1900 से पहले देश का परंपरागत साहित्य लगभग पूरा पद्य में था और उसकी भाषा ब्रजभाषा थी। खड़ी बोली में व्यवस्थित गद्य लिखने की शुरुआत उन्नीसवीं सदी की शुरुआत के आसपास हुई। शुक्ल चार लेखकों को खड़ी बोली गद्य को एक साथ आगे बढ़ाने वाला मानते हैं: मुंशी सदासुखलाल, इंशा अल्ला खाँ, लल्लूलाल और सदल मिश्र।
इनमें लल्लूलाल और सदल मिश्र कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज के आश्रय में लिख रहे थे, जिसकी स्थापना 1800 में हुई थी। लल्लूलाल ने ‘प्रेमसागर’ और सदल मिश्र ने ‘नासिकेतोपाख्यान’ लिखा। इंशा अल्ला खाँ की ‘रानी केतकी की कहानी’ (उदयभानचरित) की भाषा शुक्ल को चारों में सबसे चटकीली और मुहावरेदार लगी। शुक्ल यह भी कहते हैं कि 1857 के बाद ही हिंदी गद्य की परंपरा अच्छी तरह चली।
| विधा | शुरुआती या बड़े पड़ाव |
|---|---|
| खड़ी बोली गद्य | सदासुखलाल, इंशा अल्ला खाँ, लल्लूलाल (प्रेमसागर), सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान) |
| पत्र-पत्रिकाएँ | कविवचन सुधा (1868), हरिश्चंद्र मैगजीन (1873), सरस्वती (1900 से) |
| नाटक | भारतेंदु का अंधेर नगरी, उनका सबसे चर्चित नाटक |
| उपन्यास | परीक्षागुरु (1882), जिसे अक्सर पहला उपन्यास कहा जाता है; प्रेमचंद का सेवासदन (1918) से गोदान (1936) |
| कहानी | पहली कहानी पर बहस: इंदुमती, ग्यारह वर्ष का समय, दुलाईवाली; फिर प्रेमचंद युग |
| निबंध और आलोचना | भारतेंदु युग में शुरुआत; फिर रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी |
गद्य का इतिहास लिखते समय ज्यादातर इतिहासकारों ने कविता की युग-रेखा को ही आधार बनाया और हर विधा का विकास अलग से दिखाया। कथा-साहित्य के लिए इसलिए प्रेमचंद पूर्व युग, प्रेमचंद युग और प्रेमचंदोत्तर युग जैसा अलग बँटवारा चलता है।
परीक्षा में हिंदी साहित्य का इतिहास कैसे पूछा जाता है
राज्य स्तर की परीक्षाओं के सामान्य हिंदी में यह अध्याय ज्यादातर तथ्य के रूप में आता है: रचना और रचनाकार का मिलान, किस काल की सीमा क्या है, किस इतिहासकार ने किस काल को क्या नाम दिया, और अष्टछाप या रीतिबद्ध-रीतिसिद्ध-रीतिमुक्त जैसे वर्गीकरण। सिविल सेवा में हिंदी साहित्य वैकल्पिक विषय के पहले प्रश्नपत्र में यही इतिहास विश्लेषण के रूप में आता है, यानी नाम रटना काफी नहीं, बहस समझनी होगी। अनिवार्य हिंदी का प्रश्नपत्र साहित्य नहीं, भाषा परखता है; उसके लिए अनिवार्य हिंदी व्याकरण का नक्शा अलग से देखिए।
रिवीजन के लिए ये तथ्य पक्के कर लीजिए:
- शुक्ल का ग्रंथ 1929 का है; चार काल, सीमाएँ विक्रम संवत में।
- आदिकाल 1050 से 1375, भक्तिकाल 1375 से 1700, रीतिकाल 1700 से 1900, आधुनिक काल 1900 से।
- पहला इतिहास गार्सां द तासी का (1839), फ्रेंच में।
- रीतिकाल का आरंभ शुक्ल ने चिंतामणि त्रिपाठी से माना, केशवदास से नहीं।
- अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ ने की; सबसे बड़े कवि सूरदास।
- खड़ी बोली का पहला महाकाव्य प्रियप्रवास (हरिऔध)।
- प्रगतिशील लेखक संघ 1936 (लखनऊ), तार सप्तक 1943 (अज्ञेय)।
जिन जोड़ों में सबसे ज्यादा नंबर कटते हैं, उन्हें ऐसे अलग रखिए। आदिकाल और वीरगाथाकाल एक ही काल के दो नाम हैं, और दोनों शुक्ल के दिए हैं; सिद्ध-सामंत काल राहुल सांकृत्यायन का नाम है और चारणकाल रामकुमार वर्मा का। प्रियप्रवास हरिऔध का है, साकेत मैथिलीशरण गुप्त का। ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कबीर हैं, प्रेमाश्रयी के जायसी। और विद्यापति आदिकाल में आते हैं, भक्तिकाल में नहीं।
यह अध्याय दिखने में तारीखों और नामों का ढेर लगता है, पर असल में यह एक ही सवाल का जवाब है: किस दौर में लोग किस तरह सोच रहे थे और कविता ने उसे कैसे पकड़ा। चार काल और उनकी एक-एक मुख्य प्रवृत्ति पहले बैठा लीजिए, फिर हर काल में तीन-चार कवि और उनकी एक-एक रचना जोड़िए; तालिकाएँ अपने आप याद रहने लगेंगी।
अभ्यास प्रश्न
पहले आठ प्रश्न तथ्य पर हैं, बाकी समझ पर। उत्तर इस खंड के अंत में हैं।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ किस वर्ष प्रकाशित हुआ?
- शुक्ल के अनुसार भक्तिकाल की सीमा क्या है, और वह किस संवत-पद्धति में है?
- हिंदी साहित्य का पहला इतिहास किसने और किस भाषा में लिखा?
- ‘सिद्ध-सामंत काल’ नाम किसने सुझाया?
- बीजक के तीन भाग कौन-से हैं?
- मृगावती, मधुमालती और पद्मावत के रचनाकार कौन हैं?
- अष्टछाप की स्थापना किसने की? उसके कोई चार कवि लिखिए।
- बिहारी को रीतिकाल के किस वर्ग में रखा जाता है, और क्यों?
- शुक्ल ने रीतिकाल का आरंभ केशवदास से क्यों नहीं माना?
- शुक्ल ने आधुनिक काल को गद्यकाल क्यों कहा?
- खड़ी बोली गद्य के चार आरंभिक लेखकों के नाम लिखिए।
- वीरगाथाकाल नाम पर हजारीप्रसाद द्विवेदी की आपत्ति क्या थी?
- प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की शुरुआत किन दो घटनाओं से मानी जाती है?
उत्तर
- 1929 में।
- संवत 1375 से 1700; यह विक्रम संवत है, ईस्वी में लगभग 1318 से 1643।
- फ्रांसीसी विद्वान गार्सां द तासी ने, फ्रेंच में (1839)।
- राहुल सांकृत्यायन ने; हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे उस दौर के ज्यादा करीब माना।
- साखी, सबद और रमैनी।
- मृगावती: कुतुबन, मधुमालती: मंझन, पद्मावत: मलिक मुहम्मद जायसी।
- विट्ठलनाथ ने; सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, नंददास (बाकी: कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, चतुर्भुजदास)।
- रीतिसिद्ध; उन्होंने लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखा, पर बिहारी सतसई के दोहे काव्यशास्त्र की पूरी जानकारी पर टिके हैं।
- क्योंकि केशव के बाद रीतिग्रंथों की परंपरा तुरंत नहीं चली; कविप्रिया के करीब 50 साल बाद चिंतामणि त्रिपाठी से अखंड परंपरा शुरू हुई।
- क्योंकि इस काल की सबसे नई और मुख्य प्रवृत्ति खड़ी बोली के गद्य का विकास थी।
- मुंशी सदासुखलाल, इंशा अल्ला खाँ, लल्लूलाल और सदल मिश्र।
- उनका कहना था कि काल का नाम ग्रंथों की गिनती से नहीं, उस दौर की मुख्य प्रेरणा से तय होना चाहिए; रासो ग्रंथ उस दौर की पूरी प्रवृत्ति नहीं दिखाते।
- प्रगतिवाद: 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन; प्रयोगवाद: 1943 में अज्ञेय के संपादन में तार सप्तक का प्रकाशन।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हिंदी साहित्य का इतिहास किसने लिखा?
सबसे मानक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा, जो 1929 में छपा। इससे पहले गार्सां द तासी, शिवसिंह सेंगर, ग्रियर्सन और मिश्रबंधु के ग्रंथ आ चुके थे, पर शुक्ल ने पहली बार प्रवृत्ति के आधार पर सुसंगत काल-विभाजन किया। बाद में हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामकुमार वर्मा और डॉ. नगेंद्र जैसे विद्वानों ने भी इतिहास लिखे।
हिंदी साहित्य के इतिहास को कितने कालों में बाँटा गया है?
शुक्ल ने इसे चार कालों में बाँटा: आदिकाल (वीरगाथाकाल), पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल), उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) और आधुनिक काल (गद्यकाल)। उनकी सीमाएँ विक्रम संवत में हैं: 1050, 1375, 1700 और 1900। ज्यादातर किताबें आज भी इसी बँटवारे पर चलती हैं।
आदिकाल को वीरगाथाकाल क्यों कहा जाता है?
शुक्ल ने इस काल में राजाश्रित कवियों के लिखे रासो ग्रंथों की अधिकता देखी, जिनमें आश्रयदाता राजाओं की वीरता का वर्णन है, इसलिए इसे वीरगाथाकाल कहा। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस नाम पर आपत्ति की, क्योंकि उस दौर में सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य भी उतना ही अहम था। रामकुमार वर्मा ने इसे चारणकाल कहा।
भक्तिकाल की कितनी शाखाएँ हैं?
भक्तिकाल की दो धाराएँ और चार शाखाएँ हैं। निर्गुण धारा में ज्ञानाश्रयी शाखा (कबीर) और प्रेमाश्रयी या सूफी शाखा (जायसी), सगुण धारा में रामभक्ति शाखा (तुलसीदास) और कृष्णभक्ति शाखा (सूरदास)। ये चारों लगभग एक ही समय में साथ-साथ चलीं।
रीतिकाल को रीतिकाल क्यों कहते हैं?
हिंदी में ‘रीति’ शब्द काव्यशास्त्र के लिए इस्तेमाल हुआ। इस दौर के कवियों ने रस, अलंकार, छंद और नायिका-भेद पर लक्षण-ग्रंथ लिखे और उनके उदाहरण में कविता रची, इसलिए शुक्ल ने इसे रीतिकाल कहा। विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने इसके शृंगारी स्वर को देखते हुए ‘शृंगारकाल’ नाम का पक्ष लिया।
हिंदी गद्य साहित्य की शुरुआत कब हुई?
खड़ी बोली में व्यवस्थित गद्य उन्नीसवीं सदी की शुरुआत के आसपास मुंशी सदासुखलाल, इंशा अल्ला खाँ, लल्लूलाल और सदल मिश्र के लेखन से जमा। लल्लूलाल और सदल मिश्र 1800 में बने फोर्ट विलियम कॉलेज से जुड़े थे। शुक्ल के अनुसार गद्य की परंपरा 1857 के बाद और भारतेंदु के समय में ठीक से चल निकली।
शुक्ल की तारीखों को ईस्वी में कैसे बदलें?
शुक्ल की सारी सीमाएँ विक्रम संवत में हैं, जो ईस्वी से लगभग 57 साल आगे चलता है। इसलिए संवत में से 57 घटाइए: संवत 1050 लगभग 993 ई., संवत 1375 लगभग 1318 ई. और संवत 1700 लगभग 1643 ई. है। कई जगह इन्हें गलती से ईस्वी लिख दिया जाता है, जिससे पूरा काल करीब छह दशक खिसक जाता है।
हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ने के लिए कौन-सी किताब सबसे अच्छी है?
शुरुआत आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से कीजिए, क्योंकि बाद का लगभग हर इतिहास उसी से सहमति या असहमति में लिखा गया है। उसके बाद हजारीप्रसाद द्विवेदी की ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ उलटा पक्ष देती है। आधुनिक काल के लिए डॉ. नगेंद्र के संपादन वाला इतिहास काम आता है।
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