भारत में श्वेत क्रांति उस डेयरी बदलाव का नाम है जिसने देश को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना दिया। इसकी रीढ़ था ऑपरेशन फ्लड, जिसे राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने 1970 में शुरू किया और जो गुजरात के आणंद में पहले से आज़माए जा चुके सहकारी मॉडल पर खड़ा था। हरित क्रांति सरकार की चलाई हुई बीज और खाद वाली मुहिम थी। भारत में श्वेत क्रांति इससे अलग थी: यह किसानों की सहकारी समितियों का एक संघ था, जिसने दूध की ख़रीद, प्रोसेसिंग और बिक्री निजी व्यापारियों के हाथ से निकालकर ख़ुद उत्पादकों के हाथ में दे दी।
आँकड़े ही पूरी कहानी कह देते हैं। आज़ादी के वक़्त भारत साल में क़रीब 1.7 करोड़ टन दूध पैदा करता था। 2022-23 तक यह उत्पादन 23 करोड़ टन पार कर गया, यानी दुनिया के कुल उत्पादन का एक-चौथाई से भी ज़्यादा। प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 1970 में रोज़ 124 ग्राम थी, आज 460 ग्राम से ऊपर है। भारतीय कृषि की बाक़ी किसी क्रांति ने उत्पादन और गाँव की मिल्कियत का ढाँचा, दोनों को इतने साफ़ तरीक़े से नहीं बदला।
वर्गीज़ कुरियन: पूरे ढाँचे के शिल्पकार
भारत में श्वेत क्रांति को एक इंजीनियर से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। वर्गीज़ कुरियन केरल में जन्मे धातुकर्म इंजीनियर थे, पढ़ाई मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी से की थी, और 1949 में उनकी तैनाती गुजरात के आणंद में खेड़ा ज़िला सहकारी दूध उत्पादक संघ यानी अमूल में हुई। इसके बाद वे आधी सदी तक वहीं रहे।
कुरियन की पकड़ यह थी कि भारत में दूध पैदा करने की दिक़्क़त नहीं थी, संगठन की दिक़्क़त थी। गाँवों में दूध भरपूर था, लेकिन बचा हुआ दूध व्यापारी और बिचौलिए उठा ले जाते थे। वही दाम तय करते, दूध में मिलावट करते और मुनाफ़ा अपनी जेब में रखते। अगर प्रोसेसिंग प्लांट और बिक्री का ब्रैंड ख़ुद किसानों का हो, तो पूरी कड़ी उन्हीं के लिए काम करेगी।
1965 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री आणंद आए, एक रात गाँव में रुके, और सहकारी मॉडल से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कुरियन से कहा कि इसे पूरे देश में दोहराने के लिए एक राष्ट्रीय संस्था खड़ी करें। उसी साल राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) बना, मुख्यालय आणंद में रखा गया और कुरियन उसके अध्यक्ष बने। आणंद पैटर्न अब पूरे देश में जाने वाला था।
आणंद पैटर्न की सहकारी समिति
भारत में श्वेत क्रांति का पूरा ढाँचा असल में तीन स्तर वाली सहकारी व्यवस्था है।
गाँव का स्तर
हर गाँव में एक प्राथमिक दूध उत्पादक सहकारी समिति। दुधारू पशु रखने वाला कोई भी किसान इसका सदस्य बन सकता है। दूध दिन में दो बार इकट्ठा होता है, उसमें फैट और SNF (सॉलिड्स-नॉट-फैट) की जाँच होती है, और गुणवत्ता के हिसाब से तय दर पर वहीं मौक़े पर पैसा मिल जाता है।
ज़िले का स्तर
ज़िला सहकारी दूध उत्पादक संघों के पास चिलिंग प्लांट और प्रोसेसिंग डेयरियाँ होती हैं। ये गाँव की समितियों से दूध जोड़ते हैं, उसे पाश्चुराइज़ करते हैं, मक्खन, घी, पनीर और दूध पाउडर बनाते हैं, और बचा हुआ दूध फेडरेशन तक भेजते हैं।
राज्य का स्तर
राज्य की सहकारी डेयरी फेडरेशन अपने बड़े ब्रैंडों के नाम से बिक्री सँभालती हैं। गुजरात में अमूल, कर्नाटक में नंदिनी, तमिलनाडु में आविन, और दिल्ली-NCR में NDDB के ज़रिए मदर डेयरी। देश भर में माल पहुँचाना, विज्ञापन और दाम तय करना, यह सब फेडरेशन का काम है।
तीन स्तर वाले इस मॉडल का मतलब यह है कि जो मुनाफ़ा वरना निजी व्यापारियों के पास जाता, वह लौटकर उत्पादकों तक आता है। अमूल का दूध ख़रीदने पर ग्राहक जो एक रुपया देता है, उसमें से क़रीब 75 से 80 पैसे किसान तक पहुँचते हैं। यही एक आँकड़ा भारत में श्वेत क्रांति का असली इंजन है।
ऑपरेशन फ्लड: तीन चरण
NDDB ने पूरे देश में इस मॉडल को फैलाने का काम एक तय समय वाले कार्यक्रम में बाँधा, जिसका नाम था ऑपरेशन फ्लड। यह 1970 से 1996 तक चला। शुरुआती पैसा यूरोपीय आर्थिक समुदाय के बचे हुए स्किम मिल्क पाउडर और बटर ऑयल से आया, जिसे भारतीय शहरों में बेचा गया और उससे मिली रकम डेयरी के बुनियादी ढाँचे में लगाई गई। बाद में विश्व बैंक के क़र्ज़ भी जुड़े।
पहला चरण (1970-1980)
पहले चरण में देश के 18 सबसे अच्छे मिल्कशेड चार बड़े महानगरों के बाज़ार से जोड़े गए: बंबई, कलकत्ता, दिल्ली और मद्रास। मक़सद सीधा था। शहरों में दूध की सप्लाई ग़ैर-औपचारिक व्यापारियों से हटाकर सहकारी समितियों की कड़ी में लाना। 1980 तक चारों महानगरों में दूध सहकारी समितियों से आने लगा था, और गुजरात, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक में राज्य फेडरेशनों की नींव पड़ चुकी थी।
दूसरा चरण (1981-1985)
दूसरे चरण में सहकारी नेटवर्क देश भर के 136 मिल्कशेड और 290 शहरी बाज़ारों तक फैल गया। इसमें फीडर-बैलेंसिंग डेयरियाँ, मदर डेयरियाँ और एक राष्ट्रीय मिल्क ग्रिड बनी, जो ज़्यादा दूध वाले इलाक़ों से कमी वाले इलाक़ों तक दूध पाउडर पहुँचा सकती थी। दूसरे चरण के ख़त्म होते-होते भारत ने दूध पाउडर मँगाना बंद कर दिया था।
तीसरा चरण (1985-1996)
आख़िरी चरण में संस्थाओं का ढाँचा पक्का किया गया, सहकारी समितियों का कामकाज मज़बूत हुआ, नस्ल सुधार और पशु स्वास्थ्य की सेवाएँ जोड़ी गईं, और उत्पादकता बढ़ाने वाला ढाँचा खड़ा किया गया। 1996 तक भारत में श्वेत क्रांति 1,70,000 डेयरी सहकारी समितियों का ऐसा संघ बना चुकी थी जो 285 ज़िलों में 1.1 करोड़ किसान-सदस्यों तक पहुँचता था।
अमूल: वह ब्रैंड जिसने पूरी व्यवस्था को थामा
अमूल यानी आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड, वही सहकारी फेडरेशन है जिसकी कामयाबी से बाक़ी पूरा नेटवर्क खड़ा हुआ। इसकी शुरुआत 1946 में पोलसन डेयरी की मनमानी के ख़िलाफ़ उत्पादकों के विरोध के तौर पर हुई थी। त्रिभुवनदास पटेल की अध्यक्षता और कुरियन के महाप्रबंधक रहते यह भारत का सबसे बड़ा खाद्य ब्रैंड बन गया।
अमूल ने दिखा दिया कि एक सहकारी संस्था भी ऐसे ब्रैंडेड उपभोक्ता उत्पाद बना सकती है जो गुणवत्ता में मुक़ाबले के लायक़ हों। मक्खन, पनीर, आइसक्रीम, चॉकलेट, शिशु आहार, सब कुछ। और वह इन्हें भारत के सबसे लंबे चले विज्ञापन अभियानों में से एक के दम पर बेच भी सकती है। यूस्टेस फर्नांडिस और ASP की बनाई, और बाद में डाकुन्हा एसोसिएट्स की सँभाली अमूल गर्ल 1966 से अख़बारों में मौजूदा घटनाओं पर टिप्पणी करती आ रही है।
UPSC के लिहाज़ से काम की बात यह है कि अमूल ने सहकारी कारोबार को व्यावसायिक रूप से भरोसेमंद बना दिया। देश भर की राज्य फेडरेशनों ने ख़ुद को इसी के साँचे में ढाला।
भारत में श्वेत क्रांति की उपलब्धियाँ
UPSC के GS-III उत्तरों में भारत में श्वेत क्रांति का ज़िक्र बार-बार आता है, भारतीय ग्रामीण विकास में संस्थाओं के स्तर पर हुए सबसे कामयाब हस्तक्षेप के तौर पर।
- दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक — भारत ने 1998 में अमेरिका को पीछे छोड़ा और तब से पहले नंबर पर है। 2022-23 में क़रीब 23 करोड़ टन, जबकि दूसरे नंबर के उत्पादक का आँकड़ा क़रीब 10 करोड़ टन है।
- आत्मनिर्भरता — दूध पाउडर का आयात 1980 के दशक की शुरुआत में ही बंद हो गया। आज भारत पश्चिम एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया को डेयरी उत्पाद बेचने वाला शुद्ध निर्यातक है।
- गाँव की आमदनी — 9 करोड़ से ज़्यादा परिवारों की नक़द आमदनी का बड़ा हिस्सा डेयरी से आता है। सहकारी सदस्यता में महिलाओं की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से ऊपर है और बढ़ रही है।
- पोषण — 1970 के बाद से प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता तीन गुना हो चुकी है। भारतीय खानपान में पशु प्रोटीन का सबसे बड़ा अकेला स्रोत दूध ही है।
- दूसरी जगह दोहराने लायक़ ढाँचा — यही सहकारी मॉडल तिलहन (धारा), नमक, फल, सब्ज़ी और खाद के लिए भी ढाला गया। भारत में पशुपालन और डेयरी का पूरा तंत्र इसी ढाँचे पर टिका है।
आज की चुनौतियाँ
भारत में श्वेत क्रांति अब एक अलग दौर में है। शुरुआती दिक़्क़तें, यानी उत्पादन, प्रोसेसिंग और बिक्री, ज़्यादातर सुलझ चुकी हैं। नई दिक़्क़तें दूसरी हैं।
उत्पादकता का फ़र्क़
भारत में प्रति पशु औसत दूध उपज दुनिया में सबसे कम में गिनी जाती है। संकर नस्ल के मवेशी से रोज़ क़रीब 5 किलो, जबकि विकसित डेयरी देशों में यही आँकड़ा 25 से 30 किलो है। अगली बढ़त पोषण, नस्ल सुधार और पशु स्वास्थ्य से आएगी। राष्ट्रीय गोकुल मिशन और राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम इसी दिशा में सरकार के हाल के क़दम हैं।
चारा और दाना
हरे चारे की उपलब्धता माँग से 35 से 40 प्रतिशत कम है। दाना महँगा है और उसका बड़ा हिस्सा अब बाहर से आने लगा है। प्रति पशु उपज को असल में यही चीज़ रोके हुए है।
जलवायु का दबाव
गर्मी का तनाव, सूखा और बेभरोसा मानसून सिंधु-गंगा के मैदान और मध्य भारत में उत्पादकता घटा रहे हैं। संकर नस्ल के पशु, यानी होल्सटीन-फ्रीज़ियन और जर्सी क्रॉस जो भारत में श्वेत क्रांति के दौरान लाए गए, देसी नस्लों के मुक़ाबले गर्मी ज़्यादा जल्दी झेल नहीं पाते। इसलिए नस्ल नीति अब देसी और देसी-संकर लाइनों की तरफ़ मोड़ी जा रही है।
बाज़ार का खुलना
निजी डेयरी कंपनियाँ जैसे हैटसन, हेरिटेज, तिरुमला और डोडला, और नेस्ले तथा डैनोन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अब दूध की ख़रीद और दुकान की शेल्फ़, दोनों के लिए सहकारी समितियों से कड़ा मुक़ाबला कर रही हैं। संगठित दूध ख़रीद में सहकारी हिस्सा घटकर क़रीब 50 प्रतिशत रह गया है।
FTA का दबाव
ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत बार-बार डेयरी के मुद्दे पर अटक जाती है। भारतीय सहकारी संस्थाओं का कहना है कि बिना ड्यूटी आने वाला दूध पाउडर और पनीर उत्पादकों का वह हिस्सा तबाह कर देगा जो भारत में श्वेत क्रांति ने खड़ा किया है। क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी और ऐसी ही दूसरी बातचीत में भारत अब तक डेयरी को बचाता आया है।
A2 दूध और वैल्यू एडिशन
A2 दूध, ऑर्गैनिक डेयरी और फ़र्मेंटेड (fermented) उत्पादों की प्रीमियम पोज़िशनिंग से शहरी बाज़ारों में मुनाफ़ा तेज़ी से बढ़ रहा है। इस प्रीमियम को पकड़ने में सहकारी संस्थाएँ निजी कंपनियों से पीछे रही हैं।
भारत में श्वेत क्रांति: नीति का सबक
भारत में श्वेत क्रांति हरित क्रांति जैसी तकनीक वाली मुहिम नहीं थी। यह संगठन का सुधार था, जिसने संस्थाओं के स्तर की एक नाकामी ठीक की: व्यापारी का वह मुनाफ़ा, जो उत्पादक की हिम्मत तोड़ रहा था। सबक दोहराया जा सकता है। जहाँ बाज़ार छोटे उत्पादकों के लिए काम नहीं करता, वहाँ मुनाफ़ा पकड़ने के लिए उत्पादकों की अपनी संस्था खड़ी कीजिए।
इसीलिए 2002 का प्रोड्यूसर कंपनी एक्ट और आज का किसान उत्पादक संगठन वाला ज़ोर, दोनों की जड़ें आणंद तक जाती हैं। दाल, तिलहन, बाग़वानी और मत्स्य पालन में छोटे किसान की आमदनी का सवाल हल करने का औज़ार वही आणंद पैटर्न है, हर फ़सल के हिसाब से ढाला हुआ। नीली क्रांति और भारत में मत्स्य पालन की कहानी काफ़ी हद तक यही कोशिश है कि मछली के लिए वही किया जाए जो ऑपरेशन फ्लड ने दूध के लिए किया।
एम.एस. स्वामीनाथन और भारत में हरित क्रांति की बड़ी कहानी अनाज में हुए इसी तरह के बदलाव को समझाती है। तीनों क्रांतियाँ मिलकर आज़ाद भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हुए ज़्यादातर बदलाव की वजह बनती हैं। साथ में खाद्य सुरक्षा और कृषि ऋण भी देखिए, जो इसे सँभालने वाला नीतिगत ढाँचा हैं।
सामान्य प्रश्न
भारत में श्वेत क्रांति क्या है?
भारत में श्वेत क्रांति 1970 से 1996 के बीच हुआ वह डेयरी बदलाव है जिसने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना दिया। यह ऑपरेशन फ्लड के ज़रिए हुआ, जिसे राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने सहकारी आणंद पैटर्न पर चलाया था।
भारत में श्वेत क्रांति के जनक कौन हैं?
वर्गीज़ कुरियन भारत में श्वेत क्रांति के जनक हैं। NDDB के संस्थापक अध्यक्ष और अमूल के शिल्पकार के तौर पर उन्होंने ऑपरेशन फ्लड और तीन स्तर वाला सहकारी ढाँचा बनाया, जिस पर भारतीय डेयरी आज भी टिकी है।
सहकारी समिति का आणंद पैटर्न क्या है?
आणंद पैटर्न तीन स्तर वाली उत्पादक सहकारी व्यवस्था है: गाँव की प्राथमिक समिति, ज़िला संघ और राज्य फेडरेशन। इसमें प्रोसेसिंग प्लांट और बिक्री का ब्रैंड ख़ुद किसानों का होता है। ग्राहक के दिए हर रुपये में से क़रीब 75 से 80 पैसे उत्पादक तक लौटते हैं।
ऑपरेशन फ्लड के तीन चरण कौन से हैं?
पहले चरण (1970-1980) में 18 मिल्कशेड चार महानगरों से जुड़े। दूसरे चरण (1981-1985) में यह 136 मिल्कशेड और 290 शहरी बाज़ारों तक फैला और राष्ट्रीय मिल्क ग्रिड बनी। तीसरे चरण (1985-1996) में संस्थाओं का ढाँचा पक्का हुआ और नस्ल सुधार तथा पशु स्वास्थ्य सेवाएँ जोड़ी गईं।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक कब बना?
भारत ने 1998 में अमेरिका को पीछे छोड़ा और तब से दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना हुआ है। 2022-23 में सालाना उत्पादन 23 करोड़ टन पार कर गया, जो दुनिया के कुल उत्पादन का क़रीब एक-चौथाई है।
NDDB की भूमिका क्या रही?
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड 1965 में वर्गीज़ कुरियन की अध्यक्षता में बना और उसका मुख्यालय आणंद में रखा गया। इसी ने ऑपरेशन फ्लड बनाया और चलाया। इसने यूरोपीय आर्थिक समुदाय और विश्व बैंक से पैसा जुटाया, डेयरी का बुनियादी ढाँचा खड़ा किया और राज्यों में सहकारी फेडरेशनों की नींव रखी।
श्वेत क्रांति के सामने आज कौन सी चुनौतियाँ हैं?
आज की बड़ी चुनौतियाँ हैं: प्रति पशु कम उत्पादकता, चारे की कमी, संकर नस्ल के पशुओं पर जलवायु का दबाव, निजी डेयरी कंपनियों से मुक़ाबला, आयात खोलने के लिए मुक्त व्यापार समझौतों का दबाव, और प्रीमियम A2 तथा ऑर्गैनिक हिस्से में सहकारी संस्थाओं का देर से उतरना।
भारत में हरित क्रांति और श्वेत क्रांति में क्या फ़र्क़ है?
भारत में हरित क्रांति तकनीक वाली मुहिम थी, जिसका केंद्र गेहूँ और चावल के लिए HYV बीज, सिंचाई और खाद था, और जिसे सरकार चला रही थी। भारत में श्वेत क्रांति संस्थाओं का सुधार थी, जो डेयरी में उत्पादक सहकारी समितियों पर खड़ी थी और जिसे NDDB ने आणंद पैटर्न पर चलाया। पहली ने बदला कि किसान क्या उगाता है; दूसरी ने बदला कि कमाई किसके हाथ में जाती है।