किसान आत्महत्या का मतलब है खेती से जुड़े लोगों की आत्महत्या से मौत। इनकी गिनती हर साल राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) अपनी रिपोर्ट “भारत में दुर्घटनावश मौतें और आत्महत्याएँ” (Accidental Deaths and Suicides in India, ADSI) में करता है। इसका ताजा संस्करण 7 मई 2026 को आया, जिसमें 2024 के आँकड़े हैं। इसमें खेती के क्षेत्र में 10,546 आत्महत्याएँ दर्ज हुईं, जो देश की कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का 6.2% हैं। यानी हर घंटे एक से ज्यादा मौत। इसीलिए यह विषय ठीक वहाँ खड़ा है, जहाँ खेती की नीति और जन मानसिक स्वास्थ्य आपस में मिलते हैं।
ज्यादातर लोगों के मन में एक जमीन वाले किसान की तस्वीर होती है, जिसे बैंक के कर्ज ने तोड़ दिया। और वे NCRB के आँकड़े को पूरी गिनती मान लेते हैं। ये दोनों तस्वीरें सुधारनी होंगी। खेतिहर मजदूर, जिनके पास अपनी जमीन नहीं होती और जो मजदूरी पर काम करते हैं, 2021 से 2024 तक हर साल इन मौतों में आधे से ज्यादा रहे हैं। और यह गिनती इस पर टिकी है कि राज्यों की पुलिस क्या दर्ज करती है। इसी वजह से कई राज्य शून्य बताते हैं। यह नोट बताता है कि यह संख्या असल में क्या मापती है, सबूत इसके पीछे किन कारणों की ओर इशारा करते हैं और सरकारी नीति कहाँ तक पहुँच पाई है।
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भारत में किसान आत्महत्या क्या है?
सरकारी भाषा में किसान आत्महत्या वह आत्महत्या से मौत है, जिसमें पुलिस ने उस व्यक्ति का पेशा खेती दर्ज किया हो। NCRB गृह मंत्रालय के तहत काम करता है। वह ये रिकॉर्ड राज्यों से इकट्ठा करता है और ADSI रिपोर्ट में छापता है। यह रिपोर्ट आम तौर पर उस कैलेंडर वर्ष के खत्म होने के एक साल से भी काफी बाद आती है, जिसके आँकड़े उसमें होते हैं। संसद में इस विषय पर दिए गए जवाब भी यही ADSI आँकड़े देते हैं। तो आधिकारिक शृंखला एक ही है, और सारी बहस उसी पर होती है।
| तथ्य | ब्योरा |
|---|---|
| आधिकारिक स्रोत | NCRB की ADSI रिपोर्ट (भारत में दुर्घटनावश मौतें और आत्महत्याएँ), जो राज्यों के पुलिस रिकॉर्ड से बनती है |
| ताजा आँकड़े | कैलेंडर वर्ष 2024, रिपोर्ट 7 मई 2026 को जारी |
| कृषि क्षेत्र में आत्महत्याएँ, 2024 | 10,546: 4,633 किसान या खेतिहर और 5,913 खेतिहर मजदूर |
| कुल आत्महत्याओं में हिस्सा, 2024 | 1,70,746 का 6.2% |
| सबसे ज्यादा वाला राज्य, 2024 | महाराष्ट्र, 3,824 (लगभग 36%), उसके बाद कर्नाटक 2,971 |
| 2014 से इस्तेमाल होने वाली श्रेणियाँ | किसान या खेतिहर (अपनी या पट्टे की जमीन) और खेतिहर मजदूर |
| शून्य बताने वाले राज्य और केंद्रशासित प्रदेश, 2023 | 14, जिनमें पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा और झारखंड शामिल हैं |
| राष्ट्रीय हेल्पलाइन | टेली-मानस, 14416 या 1-800-891-4416, 10 अक्टूबर 2022 से चालू |
NCRB किसान आत्महत्या की गिनती कैसे करता है?
NCRB वही गिनता है जो राज्यों की पुलिस हर मौत के बारे में दर्ज करती है, और इसे व्यक्ति के दर्ज पेशे के हिसाब से छाँटा जाता है। 2014 से NCRB खेती के क्षेत्र को दो समूहों में बाँटता है। उससे पहले रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र की कुल आत्महत्याओं की बस एक पंक्ति होती थी। दो समूह ये हैं:
- किसान या खेतिहर: वे लोग जिनका पेशा अपनी जमीन पर या पट्टे पर ली गई जमीन पर खेती करना है। मालिक-खेतिहर अपने नाम की जमीन जोतता है। बटाईदार या काश्तकार किसी और की जमीन किराये पर या फसल के हिस्से के बदले जोतता है।
- खेतिहर मजदूर: वे लोग जिनकी कमाई मुख्य रूप से दूसरों के खेतों पर मजदूरी से होती है और जिनके पास अपनी कोई खेती की जमीन नहीं है।
यह बँटवारा काम का था, क्योंकि दो बिल्कुल अलग तरह की मुसीबतें एक ही संख्या में छिपी बैठी थीं। खेतिहर की परेशानी आम तौर पर फसल और कर्ज से जुड़ी होती है। मजदूर की परेशानी मजदूरी, काम के दिनों और सेहत से जुड़ी होती है। लेकिन इस बँटवारे ने पुरानी शृंखला को भी तोड़ दिया। 2014 में किसानों का आँकड़ा 5,650 था, जो पहली नजर में बड़ी गिरावट जैसा लगा। फिर उसी साल अलग से गिने गए 6,710 मजदूरों को वापस जोड़ा गया, तो कृषि क्षेत्र का कुल आँकड़ा 12,360 निकला। इसलिए 2014 के पहले और बाद के सालों की तुलना करनी हो, तो कृषि क्षेत्र के कुल आँकड़े की तुलना कीजिए, सिर्फ किसानों वाली पंक्ति की नहीं।
आँकड़ों पर विवाद क्यों है
NCRB का आँकड़ा अकेली राष्ट्रीय शृंखला है, और कोई गंभीर व्यक्ति इसे फेंक देने की बात नहीं करता। झगड़ा इस पर है कि यह क्या छोड़ देता है। तीन दिक्कतें बार-बार सामने आती हैं:
- शून्य बताने वाले राज्य। 2023 के आँकड़ों में 14 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने कृषि क्षेत्र में एक भी आत्महत्या दर्ज नहीं की। इनमें पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा और झारखंड शामिल थे। पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा 2022 में और 2018 में भी शून्य बताने वाले राज्य थे। द वायर ने एक RTI जवाब की खबर दी, जिसमें पश्चिम बंगाल के अकेले एक जिले, पश्चिम मेदिनीपुर, में किसानों और खेतिहर मजदूरों की 122 आत्महत्याएँ गिनी गई थीं। और यह उस साल की बात है, जब राज्य ने एक भी आत्महत्या नहीं बताई थी।
- किसान किसे दर्ज किया जाता है। अर्थशास्त्री श्रीजित मिश्रा बताते हैं कि NCRB की खेती वाली श्रेणी में मालिक और बटाईदार खेतिहर तो आते हैं, लेकिन मजदूर नहीं आते। वे यह भी कहते हैं कि भारत में आत्महत्याएँ आम तौर पर कम दर्ज होती हैं। इस कमी को पटेल और उनके साथियों के एक राष्ट्रीय मृत्यु-दर अध्ययन ने 2012 में मापा था। वर्गीकरण इस पर टिका है कि पुलिस व्यक्ति का काम कैसे लिखती है। इसलिए जिसकी खेती को औपचारिक मान्यता नहीं मिली, वह किसी दूसरे खाने में जा सकता है।
- खेती करने वाली महिलाएँ। 2023 में आत्महत्या से जिनकी मौत हुई, उनमें 4,690 किसानों में से 137 और 6,096 मजदूरों में से 663 महिलाएँ थीं। दिसंबर 2022 में राज्यसभा में एक सवाल पूछा गया कि क्या कृषि क्षेत्र की महिलाएँ इस गिनती से छूट रही हैं। गृह मंत्रालय ने जवाब दिया कि ADSI में पुरुष और महिलाएँ दोनों शामिल हैं, और गड़बड़ियाँ सुधार के लिए राज्यों को वापस भेजी जाती हैं।
इन तीनों बातों से एक सुरक्षित समझ निकलती है। NCRB का आँकड़ा आधिकारिक गिनती है और एक न्यूनतम सीमा है। यह खेती करने वाले हर परिवार के नुकसान की पूरी जनगणना नहीं है।
NCRB के आँकड़े क्या दिखाते हैं?
पिछले दस सालों की तस्वीर एक ऊँचे स्तर पर ठहराव की है। कृषि क्षेत्र में आत्महत्याएँ 2015 में 12,602 थीं। 2018 तक ये घटकर 10,349 पर आईं, और 2021 से 2024 के बीच 10,546 से 11,290 के दायरे में रहीं। बड़ा बदलाव कुल संख्या के भीतर हुआ है: अब मजदूरों की संख्या किसानों से ज्यादा है।
| वर्ष | किसान या खेतिहर | खेतिहर मजदूर | कृषि क्षेत्र का कुल |
|---|---|---|---|
| 2014 | 5,650 | 6,710 | 12,360 |
| 2015 | 8,007 | 4,595 | 12,602 |
| 2021 | 5,318 | 5,563 | 10,881 |
| 2022 | 5,207 | 6,083 | 11,290 |
| 2023 | 4,690 | 6,096 | 10,786 |
| 2024 | 4,633 | 5,913 | 10,546 |
इस तालिका को तीन बार पढ़िए। पहली बात, किसानों की आत्महत्याएँ 2021 से हर साल घटी हैं, 5,318 से 4,633 पर, यानी लगभग 13% की गिरावट। दूसरी बात, मजदूरों की आत्महत्याएँ 2021 के 5,563 से बढ़कर 2023 में 6,096 हो गईं, और 2024 में भी कुल का 56% थीं। तीसरी बात, देश की कुल आत्महत्याओं में खेती के क्षेत्र का हिस्सा 2021 और 2022 के 6.6% से फिसलकर 2024 में 6.2% पर आ गया।
भूगोल के हिसाब से ये मौतें कुछ ही जगहों पर सिमटी हुई हैं। 2024 में राष्ट्रीय आँकड़े का ज्यादातर हिस्सा छह राज्यों से आया:
- महाराष्ट्र, 3,824, यानी कुल का लगभग 36%, और महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या के मामले 2022, 2023 और 2024, तीनों साल सबसे ज्यादा रहे;
- कर्नाटक, 2,971, जो 2023 के 2,423 से लगभग 23% ज्यादा है;
- मध्य प्रदेश, 835;
- आंध्र प्रदेश, 780, जो 2023 से लगभग 16% कम है;
- तमिलनाडु, 503;
- छत्तीसगढ़, 486।
इतना तीखा जमावड़ा यह बताता है कि कहाँ देखना है, यह नहीं बताता कि क्यों। अगला खंड देखता है कि कारणों पर हुआ शोध असल में क्या पाता है।
भारत में किसान आत्महत्या के कारण क्या हैं?
किसान आत्महत्या को कोई एक कारण नहीं समझा सकता। सबूत बताते हैं कि आर्थिक झटके उन परिवारों पर गिरते हैं, जिनके पास सहारे के लिए बहुत कम होता है। इन झटकों को आपस में जोड़ने वाला धागा कर्ज है। और मजदूरों के मामले में बीमारी और पारिवारिक तनाव ज्यादा भारी पड़ते हैं। नीचे के चारों दबावों का अपना-अपना स्रोत है।
कर्ज: संस्थागत और साहूकारी
खेती के कर्ज की सबसे अच्छी राष्ट्रीय तस्वीर राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) का कृषि परिवारों का स्थिति आकलन सर्वेक्षण देता है। यह NSS का 77वाँ दौर था, जिसमें कृषि वर्ष 2018-19 को लिया गया। इसके मुताबिक आधे से कुछ ज्यादा कृषि परिवार कर्ज में थे, और औसत बकाया कर्ज ₹74,121 था। इस कर्ज का लगभग 69.6% संस्थागत स्रोतों से आया था, यानी बैंकों, सहकारी समितियों और सरकारी एजेंसियों से। 20.5% पेशेवर साहूकारों से आया था। इसी सर्वेक्षण ने एक कृषि परिवार की औसत मासिक आय ₹10,218 बताई।
अब इन दोनों संख्याओं को साथ रखकर देखिए। औसत कर्ज, औसत परिवार की सात महीने से भी ज्यादा की आय के बराबर था। और कर्ज का जो पाँचवाँ हिस्सा साहूकारों का है, वही हिस्सा बैंक कर्ज की माफी छू भी नहीं सकती। साइट का भारत में कृषि ऋण वाला नोट बताता है कि औपचारिक कर्ज की कड़ी कैसे बनी है और कहाँ जाकर कमजोर पड़ती है।
फसल का नुकसान और दामों का झटका
खेतिहर बुआई से पहले कर्ज लेता है और कटाई के बाद चुकाता है। इसलिए मानसून फेल हो जाए या मंडी में दाम गिर जाएँ, तो एक आम कर्ज ऐसा कर्ज बन जाता है जिसे चुकाया ही न जा सके। डाउन टू अर्थ ने NCRB के आँकड़ों का विश्लेषण किया, तो पाया कि जिन सालों में बारिश कम हुई, उनमें किसान आत्महत्या लगातार ज्यादा रही। एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग (स्वामीनाथन आयोग) ने अक्टूबर 2006 की अपनी अंतिम रिपोर्ट किसानों के संकट के कारणों और आत्महत्याओं में बढ़ोतरी पर केंद्रित की। उसके जवाब का बड़ा हिस्सा दाम और जोखिम के बारे में था। इसमें उसकी यह सिफारिश भी थी कि समर्थन मूल्य उत्पादन की भारित औसत लागत से कम से कम 50% ज्यादा हो। भारत में सूखा वाला नोट बताता है कि बारिश न होने पर सूखा कैसे घोषित होता है और उससे कैसे निपटा जाता है।
छोटी जोत और सूखी जमीन
जोत का आकार मायने रखता है, क्योंकि छोटा खेत कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता। सीमांत जोत 1 हेक्टेयर से कम होती है और छोटी जोत 1 से 2 हेक्टेयर की। 2015 की ADSI में आत्महत्या से जिन किसानों की मौत हुई, उनमें 45.2% छोटे किसान थे और 27.4% सीमांत किसान। यानी लगभग हर चार में से तीन के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन थी। सिंचाई इस खाई को और चौड़ा करती है। नंद किशोर कन्नूरी और सुश्रुत जाधव का 2021 का एक नृवंशविज्ञान अध्ययन (ethnographic study) “एंथ्रोपोलॉजी एंड मेडिसिन” पत्रिका में छपा था। उसने पाया कि दलित और दूसरी पिछड़ी जातियों के कपास किसानों की सिंचाई तक पहुँच कमजोर थी, और सिंचाई पर अक्सर दबंग जातियों के जमींदारों का नियंत्रण होता था।
बीमारी, पारिवारिक तनाव और जाति
मजदूरों के मामले में दर्ज कारण खेत से हटकर दिखते हैं। 2015 के आँकड़ों में खेतिहर मजदूरों की आत्महत्याओं में से लगभग 60% पारिवारिक समस्याओं और बीमारी के कारण दर्ज हुईं। कन्नूरी और जाधव का अध्ययन इसमें सामाजिक परत जोड़ता है। महँगे हाइब्रिड बीज और खाद-दवाओं के लिए कर्ज लिया गया, और यह कर्ज परिवार और जाति के रिश्तों के जाल के भीतर चुकाना था। इससे अपमान और निराशा पैदा हुई, जिसे पुलिस रजिस्टर की कोई एक पंक्ति पकड़ नहीं पाती।
यहाँ एक वाजिब सवाल उठता है। अगर दर्ज कारणों में पारिवारिक समस्याएँ और बीमारी सबसे ऊपर हैं, तो क्या यह खेती की नहीं, समाज की समस्या है? पूरी तरह नहीं। दर्ज कारण मौत के बाद लिखी गई एक पंक्ति भर है। फसल खराब होने के बाद कर्ज पर हुआ झगड़ा, या बिना इलाज छूट गई बीमारी, पारिवारिक समस्या या बीमारी के रूप में दर्ज हो जाती है, भले ही इसकी शुरुआत खेती की अर्थव्यवस्था से हुई हो। इसीलिए शोधकर्ता फाइल में दर्ज अकेले कारण को नहीं, बल्कि परिवार पर पड़ रहे सारे दबावों के पैटर्न को पढ़ते हैं।
किसान आत्महत्या पर नीति ने क्या जवाब दिया है?
नीति ने तीन मोर्चों पर काम किया है, और हर मोर्चा समस्या के एक हिस्से तक ही पहुँचता है:
- कर्ज और कर्ज से राहत, आसान शर्तों वाले बैंक कर्ज और राज्यों की कर्ज माफी के जरिए;
- आय की सुरक्षा, फसल बीमा, नकद हस्तांतरण और समर्थन मूल्य के जरिए;
- मानसिक स्वास्थ्य देखभाल, 2022 से राष्ट्रीय स्तर पर।
तालिका दिखाती है कि हर कदम कहाँ जाकर रुक जाता है।
| वर्ष | कदम | क्या करता है | कहाँ रुकता है |
|---|---|---|---|
| 1998 | किसान क्रेडिट कार्ड | फसल की जरूरतों के लिए घूमता हुआ बैंक कर्ज, NABARD के मॉडल पर | जमीन के रिकॉर्ड और बैंक खाता चाहिए |
| 2004-2006 | राष्ट्रीय किसान आयोग | पाँच रिपोर्टें; MSP उत्पादन की भारित औसत लागत से कम से कम 50% ज्यादा | सिर्फ सलाह; केंद्र ने 2010 में 50% वाला फॉर्मूला नहीं माना |
| 2016 | PMFBY | फसल बीमा, जिसमें किसान का प्रीमियम 2% (खरीफ), 1.5% (रबी) और 5% (वाणिज्यिक और बागवानी फसलें) पर सीमित है | खरीफ 2020 से सभी किसानों के लिए अपनी मर्जी की बात |
| 2018-19 | PM-KISAN | साल में ₹6,000, तीन किस्तों में | सिर्फ उन परिवारों के लिए जिनके नाम पर जमीन है |
| 2022 | टेली-मानस | मुफ्त मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन, 24 घंटे, हफ्ते के 7 दिन | फोन करने वाले को इसके होने का पता होना चाहिए |
| 2022 | राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति | 2020 के मुकाबले 2030 तक आत्महत्या से मृत्यु-दर 10% घटाने का लक्ष्य | एक राष्ट्रीय ढाँचा; अमल राज्यों के जिम्मे |
| 2026 | महाराष्ट्र की फसल कर्ज माफी | ₹2 लाख तक के पात्र अल्पकालिक फसल कर्ज का बकाया खत्म करती है | सिर्फ संस्थागत फसल कर्ज |
सबसे पहले कर्ज आया। अगस्त 1998 के किसान क्रेडिट कार्ड ने खेतिहरों को हर मौसम में नया कर्ज लेने के बजाय बैंक में एक घूमती सीमा (revolving limit) दी। यह उस किसान के लिए अच्छा काम करता है, जिसकी जमीन का मालिकाना साफ है और बैंक की शाखा पास में है। फिर बीमा आया: PMFBY ने 2016 में पुरानी योजनाओं की जगह ली और किसानों के लिए प्रीमियम कम रखा। खरीफ 2020 से फसल कर्ज वाले किसान भी खुद तय कर सकते थे कि इसमें शामिल होना है या नहीं। आय सहायता सबसे नई परत है। PM-KISAN सम्मान निधि साल में ₹6,000 सीधे बैंक खातों में डालती है। और दामों को न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था का सहारा है, जिसमें कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) सिफारिश करता है और केंद्रीय मंत्रिमंडल दाम तय करता है।
राज्यों की कर्ज माफी सबसे ज्यादा दिखने वाला जवाब है, और सबसे ज्यादा बहस वाला भी। माफी उस कर्ज को खत्म करती है जो पहले से चढ़ा हुआ है। इससे डिफॉल्ट में फँसे परिवार को तुरंत राहत मिलती है। लेकिन यह सिर्फ बैंकों और सहकारी समितियों के कर्ज को ढकती है। साहूकार का हिस्सा बना रहता है, और अगला खराब मौसम नया कर्ज ले आता है।
असली सबक पूरी तालिका के पैटर्न में है। इनमें से ज्यादातर योजनाएँ जमीन के रिकॉर्ड पर बनी हैं, और हर योजना पैसा देने से पहले किसान के नाम पर जमीन माँगती है। खेतिहर मजदूर, जो अब इन मौतों में बड़ा समूह हैं, और बिना लिखे पट्टे पर खेती करने वाले बटाईदार, इनमें से ज्यादातर योजनाओं से बाहर रह जाते हैं। स्वास्थ्य वाले कदम इसका अपवाद हैं, क्योंकि टेली-मानस और जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम हर उस व्यक्ति की सेवा करते हैं जो उन तक पहुँचता है। भारत में मानसिक स्वास्थ्य वाला नोट इलाज की उस कमी को समझाता है, जिसे ये भरने की कोशिश कर रहे हैं।
समझदारी न तो इन योजनाओं को खारिज करने में है, न यह उम्मीद करने में कि कोई एक योजना अकेले यह संख्या घटा देगी। ₹6,000 का हस्तांतरण ₹74,121 का कर्ज नहीं चुका सकता, और हेल्पलाइन बारिश नहीं ला सकती। लेकिन ये साथ मिलकर चलें, और बिना जमीन के खेती करने वालों तक भी पहुँचाई जाएँ, तो ये एक ही जंजीर की अलग-अलग कड़ियों पर काम करती हैं।
भारत में किसान आत्महत्या: आज की स्थिति
7 मई 2026 को जारी ताजा ADSI एक छोटी गिरावट दिखाती है: कृषि क्षेत्र में आत्महत्याएँ 2023 के 10,786 से घटकर 2024 में 10,546 पर आईं। किसानों की मौतें 1.2% कम हुईं और मजदूरों की 3%। फिर भी दर हर घंटे एक से ज्यादा है। कर्नाटक में एक साल में लगभग 23% की बढ़ोतरी राष्ट्रीय रुझान के उलट है, और इस पर ध्यान देना जरूरी है।
2026 के तीन घटनाक्रम इस विषय से जुड़ते हैं:
- महाराष्ट्र की फसल कर्ज माफी। राज्य मंत्रिमंडल ने 2 जून 2026 को नई कर्ज माफी मंजूर की। इसमें पात्र अल्पकालिक फसल कर्ज के बकाये पर ₹2 लाख की सीमा है। अनुमान है कि यह लगभग 56 लाख किसान परिवारों तक पहुँचेगी और इस पर लगभग ₹36,585 करोड़ खर्च होंगे। लाभार्थियों का सत्यापन 22 जुलाई 2026 से शुरू हुआ। रोलआउट पर करंट अफेयर्स नोट में पात्रता के नियम दिए गए हैं।
- PM-KISAN की अवधि बढ़ी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने योजना को पाँच वित्त वर्षों, यानी 2026-27 से 2030-31 तक, जारी रखने को मंजूरी दी। इसका परिव्यय ₹3.15 लाख करोड़ है।
- बड़े पैमाने पर टेली-मानस। 23 जुलाई 2024 तक 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने 53 टेली-मानस सेल बना लिए थे, जिन्होंने 11.76 लाख से ज्यादा कॉल संभाली थीं। टेली-मानस की आधिकारिक साइट पर हर राज्य में इस सेवा की जानकारी है।
खुला सवाल खुद आँकड़ों का है। जब तक कई राज्य शून्य बताते रहेंगे, राष्ट्रीय कुल ठीक उन्हीं जगहों पर समस्या को कम करके दिखाएगा, जहाँ स्वतंत्र सबूत कुछ और कहते हैं। NCRB के ADSI पेज पर हर संस्करण मौजूद है।
परीक्षा के लिए किसान आत्महत्या कैसे पढ़ें
किसान आत्महत्या मुख्य रूप से GS पेपर III का विषय है, जहाँ खेती और कृषि ऋण पढ़ाए जाते हैं। लेकिन इसका मजबूत खिंचाव GS पेपर I (सामाजिक मुद्दे) और GS पेपर II (कल्याण योजनाएँ और स्वास्थ्य) की ओर भी है। यह विषय गिनती के रूप में कम, और कृषि संकट के आखिरी नतीजे के रूप में ज्यादा पूछा जाता है।
मुख्य परीक्षा 2017 के निबंध पेपर में विषय था “भारत में अधिकांश किसानों के लिए खेती जीविका का साधन बने रहने की क्षमता खो चुकी है।” उसी साल GS पेपर III में पूछा गया “सब्सिडी फसल पैटर्न, फसल विविधता और किसानों की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है? छोटे और सीमांत किसानों के लिए फसल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य और खाद्य प्रसंस्करण का क्या महत्व है?” प्रीलिम्स में योजनाएँ पूछी जाती हैं: Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 सवालों में से 256 भारतीय अर्थव्यवस्था के हैं।
दोहराने लायक तथ्य:
- NCRB (गृह मंत्रालय के तहत) ADSI छापता है; 2024 के आँकड़े 7 मई 2026 को आए।
- 2024: कृषि क्षेत्र में 10,546 आत्महत्याएँ, 4,633 किसान और 5,913 मजदूर, कुल आत्महत्याओं का 6.2%।
- 2014 से NCRB किसानों या खेतिहरों (अपनी या पट्टे की जमीन) को खेतिहर मजदूरों से अलग रखता है।
- 2024 में कृषि क्षेत्र में सबसे ज्यादा आत्महत्याएँ महाराष्ट्र में (3,824) हुईं, उसके बाद कर्नाटक में (2,971)।
- NSS का 77वाँ दौर: हर कृषि परिवार पर औसत बकाया कर्ज ₹74,121; इसका लगभग 70% संस्थागत स्रोतों से।
- PMFBY (2016): किसान का प्रीमियम खरीफ में 2%, रबी में 1.5%, वाणिज्यिक और बागवानी फसलों में 5% पर सीमित।
- टेली-मानस, 10 अक्टूबर 2022 को शुरू: 14416 या 1-800-891-4416।
चार उलझनें लगभग सबको फँसाती हैं, और हर एक का आसान हल है:
- किसान बनाम मजदूर। सुर्खियों में “किसान आत्महत्या” का मतलब आम तौर पर पूरा कृषि क्षेत्र होता है। NCRB की “किसान या खेतिहर” वाली पंक्ति उसका सिर्फ एक हिस्सा है।
- रिपोर्ट का साल बनाम आँकड़ों का साल। 2026 में जारी रिपोर्ट में 2024 के आँकड़े हैं। हमेशा आँकड़ों का साल बताइए।
- दर्ज कारण बनाम असली कारण। रजिस्टर एक ही कारण दर्ज करता है। बीमारी या पारिवारिक समस्या के रूप में दर्ज कारण के पीछे अक्सर कर्ज और फसल का नुकसान होता है।
- NCRB बनाम NSO। आत्महत्या की गिनती NCRB के पुलिस रिकॉर्ड से आती है। कर्ज और आय के आँकड़े NSO के परिवार सर्वेक्षणों से आते हैं।
इससे जुड़ी अवधारणाओं को साथ रखकर देखें, तो उन्हें अलग पहचानना आसान हो जाता है। भारतीय कृषि का परिचय इन्हें आपस में जोड़ने की सही जगह है।
| अवधारणा | क्या मापती है | मुख्य स्रोत |
|---|---|---|
| किसान आत्महत्या | खेतिहरों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या से मौतें | NCRB, ADSI (सालाना) |
| कृषि कर्जग्रस्तता | कर्ज में डूबे कृषि परिवारों का हिस्सा, और उनके कर्ज का आकार और स्रोत | NSO, स्थिति आकलन सर्वेक्षण (NSS का 77वाँ दौर) |
| कृषि संकट | खेती में कम आय, ऊँचे जोखिम और कर्ज की व्यापक हालत | कोई एक सूचकांक नहीं; ऊपर के दोनों स्रोतों और फसल व दामों के आँकड़ों से समझा जाता है |
इस विषय पर एक मजबूत उत्तर कभी गिनती पर नहीं रुकता। वह सवाल खोलने के लिए NCRB का आँकड़ा लेता है, उसे समझाने के लिए NSO के आँकड़े, और सरकार के जवाब को परखने के लिए योजनाओं की बनावट। जो अभ्यर्थी बता सकता है कि जमीन के रिकॉर्ड पर टिकी योजना इन मौतों के बड़े हिस्से को क्यों छोड़ देती है, वह इस विषय को उस अभ्यर्थी से बेहतर समझता है जो राज्यों की रैंकिंग रट सकता है।
सामान्य प्रश्न
2024 में भारत में कितने किसानों की आत्महत्या से मौत हुई?
7 मई 2026 को जारी NCRB की 2024 की ADSI रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र में 10,546 आत्महत्याएँ दर्ज हुईं। इनमें 4,633 किसान या खेतिहर थे और 5,913 खेतिहर मजदूर। कुल मिलाकर ये उस साल भारत में दर्ज 1,70,746 आत्महत्याओं का 6.2% थीं।
किस राज्य में किसान आत्महत्या सबसे ज्यादा है?
2024 में सबसे ज्यादा संख्या महाराष्ट्र में दर्ज हुई: कृषि क्षेत्र में 3,824 आत्महत्याएँ, जो राष्ट्रीय कुल का लगभग 36% है। कर्नाटक 2,971 के साथ दूसरे नंबर पर रहा। महाराष्ट्र 2022 और 2023 में भी सूची में सबसे ऊपर था।
NCRB के आँकड़ों में किसान किसे माना जाता है?
2014 से NCRB खेती के क्षेत्र में दो समूह दर्ज करता है। किसान या खेतिहर अपनी जमीन पर या पट्टे पर ली गई जमीन पर खेती करते हैं, जबकि खेतिहर मजदूर मुख्य रूप से दूसरों के खेतों पर मजदूरी करते हैं। किसान आत्महत्या का सुर्खियों वाला आँकड़ा आम तौर पर इन दोनों को जोड़कर बनता है।
भारत में किसान आत्महत्या के मुख्य कारण क्या हैं?
सबूत किसी एक कारण की नहीं, कई दबावों के मेल की ओर इशारा करते हैं। कर्ज, बारिश न होने के बाद फसल का नुकसान, कम दाम और बहुत छोटी जोत का बोझ सबसे ज्यादा किसानों पर पड़ता है। खेतिहर मजदूरों में पारिवारिक समस्याएँ और बीमारी ज्यादा दर्ज होती हैं। ये दबाव आम तौर पर एक ही परिवार के भीतर साथ-साथ काम करते हैं।
कुछ राज्य किसान आत्महत्या शून्य क्यों बताते हैं?
NCRB वही इकट्ठा करता है जो राज्यों की पुलिस दर्ज करती है। इसलिए किसी राज्य का आँकड़ा इस पर टिका है कि उसकी पुलिस हर मौत को पेशे के हिसाब से कैसे दर्ज करती है। 2023 के आँकड़ों में पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा समेत 14 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने शून्य बताया। पश्चिम बंगाल के एक जिले से मिले RTI जवाब जैसे स्वतंत्र सबूतों ने ऐसी शून्य रिपोर्टों को झुठलाया है।
किसान आत्महत्या कम करने के लिए सरकार ने क्या किया है?
मुख्य कदम हैं: सस्ते कर्ज के लिए किसान क्रेडिट कार्ड, PMFBY फसल बीमा योजना, PM-KISAN आय सहायता, न्यूनतम समर्थन मूल्य और राज्यों की कर्ज माफी। स्वास्थ्य की तरफ, टेली-मानस हेल्पलाइन और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति 2022 में शुरू हुईं। खेती की ज्यादातर योजनाएँ जमीन के रिकॉर्ड पर टिकी हैं, इसलिए बिना जमीन वाले मजदूरों को सबसे कम फायदा मिलता है।
टेली-मानस हेल्पलाइन का नंबर क्या है?
टेली-मानस स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की राष्ट्रीय टेली मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन है, जो 10 अक्टूबर 2022 को शुरू हुई। इस पर दिन-रात, बिना कोई शुल्क दिए, 14416 या 1-800-891-4416 पर बात की जा सकती है। कॉल का जवाब प्रशिक्षित काउंसलर देते हैं, जो जरूरत पड़ने पर फोन करने वाले को विशेषज्ञों के पास भेज सकते हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. कृषि क्षेत्र में आत्महत्याओं पर NCRB के आँकड़ों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 2014 से NCRB किसानों या खेतिहरों और खेतिहर मजदूरों के आँकड़े अलग-अलग छापता है। 2. 2024 में किसानों या खेतिहरों की आत्महत्याएँ खेतिहर मजदूरों की आत्महत्याओं से ज्यादा थीं। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) बँटवारा 2014 में शुरू हुआ; 2024 में मजदूरों (5,913) की संख्या किसानों (4,633) से ज्यादा थी।
2. “भारत में दुर्घटनावश मौतें और आत्महत्याएँ” रिपोर्ट किस मंत्रालय के तहत आने वाली संस्था छापती है?
- (a) कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय
- (b) गृह मंत्रालय
- (c) स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
- (d) सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय
उत्तर: (b) ADSI छापने वाला NCRB गृह मंत्रालय के तहत काम करता है।
3. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. प्रीमियम में किसान का हिस्सा खरीफ फसलों के लिए 2% और रबी फसलों के लिए 1.5% पर सीमित है। 2. खरीफ 2020 से फसल कर्ज वाले किसानों के लिए भी नामांकन स्वैच्छिक है। 3. यह योजना 2019 में शुरू हुई थी। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) PMFBY 2016 में शुरू हुई थी, इसलिए कथन 3 गलत है।
4. राष्ट्रीय टेली मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, टेली-मानस, कब शुरू हुआ?
- (a) 2 अक्टूबर 2021
- (b) 10 अक्टूबर 2022
- (c) 21 नवंबर 2022
- (d) 1 अप्रैल 2023
उत्तर: (b) यह विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस, 10 अक्टूबर 2022 को शुरू हुआ; 21 नवंबर 2022 राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति की तारीख है।
5. कृषि परिवारों के स्थिति आकलन सर्वेक्षण (NSS का 77वाँ दौर) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. हर कृषि परिवार पर औसत बकाया कर्ज लगभग ₹74,000 था। 2. बकाया कर्ज का ज्यादातर हिस्सा पेशेवर साहूकारों का था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) औसत ₹74,121 था, और लगभग 69.6% कर्ज संस्थागत स्रोतों से आया था, जबकि साहूकारों से 20.5%।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- कृषि क्षेत्र में होने वाली आत्महत्याओं में अब आधे से ज्यादा खेतिहर मजदूरों की हैं। इसके कारणों का परीक्षण कीजिए, और मूल्यांकन कीजिए कि क्या मौजूदा कृषि-कल्याण योजनाएँ उन तक पहुँचती हैं। (15 अंक, 250 शब्द)
- किसान आत्महत्या पर NCRB के आँकड़ों की विश्वसनीयता का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए और इन्हें सुधारने के उपाय सुझाइए। (10 अंक, 150 शब्द)
- कर्ज को अक्सर किसान आत्महत्याओं का साझा धागा कहा जाता है। ग्रामीण कर्ज के स्रोतों और अनौपचारिक उधारी की भूमिका के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- क्या कृषि कर्ज माफी कृषि संकट का असरदार जवाब है? इसकी बनावट और दायरे के संदर्भ में तर्क दीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- किसान आत्महत्या जितना कृषि का मुद्दा है, उतना ही जन मानसिक स्वास्थ्य का भी। टेली-मानस और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति के आलोक में चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)