लोकसभा अध्यक्ष (Speaker of Lok Sabha) भारतीय लोकसभा का पीठासीन अधिकारी (presiding officer) है। संविधान के अनुच्छेद 93 के तहत लोकसभा अपने सदस्यों में से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का चुनाव करती है। वर्तमान अध्यक्ष ओम बिरला हैं — जो जून 2019 में पहली बार और जून 2024 में 18वीं लोकसभा के लिए दोबारा निर्वाचित हुए। अध्यक्ष का चुनाव साधारण बहुमत (simple majority) से होता है। उनकी प्रमुख शक्तियाँ — सदन की कार्यवाही का संचालन, धन विधेयक प्रमाणित करना (अनुच्छेद 110), दल-बदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के तहत सदस्यता पर निर्णय, मत बराबर होने पर निर्णायक मत (अनुच्छेद 100), और संयुक्त बैठक की अध्यक्षता (अनुच्छेद 108) — हैं। हटाने की प्रक्रिया अनुच्छेद 94 में है। पहले अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर (G. V. Mavalankar) थे जिन्होंने 1952 में पदभार ग्रहण किया।
परिचय (Introduction)

संसद, राष्ट्रपति और लोकसभा-राज्यसभा से मिलकर बनती है। लोकसभा (House of the People) जनता का प्रत्यक्ष-निर्वाचित सदन है — और इसके सुचारू संचालन के लिए एक निष्पक्ष पीठासीन अधिकारी की आवश्यकता होती है। यही भूमिका लोकसभा अध्यक्ष की है। ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कॉमन्स से उधार ली गई इस संस्था को संविधान-निर्माताओं ने भारतीय परिवेश के अनुसार ढाला।
लोकसभा अध्यक्ष “House of Commons की परंपरा के अनुसार” सदन का संरक्षक, गरिमा का प्रतीक और शक्तियों का एक केंद्र है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अध्यक्ष पद को “सदन की स्वतंत्रता का प्रतीक” कहा था। UPSC प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा (GS-2) में अध्यक्ष से जुड़े प्रश्न लगभग नियमित रूप से पूछे जाते हैं — विशेष रूप से शक्तियाँ, धन विधेयक, और दल-बदल विरोधी कानून के संदर्भ में।
मुख्य तथ्य एक नज़र में (Quick Facts at a Glance)
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 93 (अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव), अनुच्छेद 94 (पद-त्याग, हटाना), अनुच्छेद 95 (उपाध्यक्ष का दायित्व), अनुच्छेद 96 (हटाने के प्रस्ताव पर पीठ नहीं संभालेंगे), अनुच्छेद 97 (वेतन-भत्ते), अनुच्छेद 100 (निर्णायक मत), अनुच्छेद 108 (संयुक्त बैठक), अनुच्छेद 110 (धन विधेयक प्रमाणन)।
- वर्तमान अध्यक्ष: ओम बिरला (कोटा-बूँदी, राजस्थान); 17वीं लोकसभा से (जून 2019), 18वीं लोकसभा में पुनर्निर्वाचित (जून 2024)।
- प्रथम अध्यक्ष: गणेश वासुदेव मावलंकर (15 मई 1952 – 27 फ़रवरी 1956)।
- चुनाव: लोकसभा सदस्यों द्वारा साधारण बहुमत से।
- कार्यकाल: लोकसभा के पूरे कार्यकाल तक (5 वर्ष), या जब तक वह सदस्य रहें।
- शपथ: अध्यक्ष अलग से शपथ नहीं लेते — सदस्य के रूप में शपथ ही पर्याप्त।
- वेतन-भत्ते: भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से, संसद द्वारा निर्धारित (Salary, Allowances and Pension of Members of Parliament Act, 1954)।
- हटाना: अनुच्छेद 94 — 14-दिन की लिखित सूचना के बाद उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के “तब-वर्तमान बहुमत” (effective majority) से।
- केवल एक बार निर्णायक मत: सामान्य मतदान में भाग नहीं लेते; मत बराबर होने पर ही निर्णायक मत।
- दल-बदल विरोधी: 10वीं अनुसूची के तहत निर्णयकर्ता।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)
लोकसभा अध्यक्ष की संस्था ब्रिटिश संसदीय परंपरा से प्रेरित है, जहाँ “Speaker” का इतिहास 1377 (Sir Thomas Hungerford) से जुड़ा है। भारत में इसकी जड़ें भारत सरकार अधिनियम 1919 (Government of India Act 1919) में हैं, जिसके तहत 1921 में केंद्रीय विधान सभा (Central Legislative Assembly) में “President” का पद बनाया गया।
प्रारंभ में यह पद वायसराय द्वारा नामित होता था। विट्ठलभाई पटेल (Vithalbhai Patel) 1925 में पहले निर्वाचित भारतीय अध्यक्ष (President) बने। 1947 में संविधान सभा (Constituent Assembly) के संसदीय कार्यों के लिए G. V. Mavalankar को अध्यक्ष चुना गया। 26 जनवरी 1950 के बाद उन्हीं की अध्यक्षता में अंतरिम संसद चली, और 1952 में पहली निर्वाचित लोकसभा के पहले अध्यक्ष भी वही बने। मावलंकर ने ही “Speakers’ Conference” शुरू की और कई परंपराएँ स्थापित कीं — आज तक उन्हें “भारतीय संसदीय परंपरा का पिता” कहा जाता है।
निर्वाचन की प्रक्रिया (Election Process)

- समय: नई लोकसभा के गठन के तुरंत बाद, सदन की पहली बैठक में ही (व्यवहार में सदस्यों के शपथ-ग्रहण के बाद)।
- तिथि निर्धारण: राष्ट्रपति द्वारा।
- मतदान: लोकसभा के सभी मौजूदा सदस्यों द्वारा साधारण बहुमत से।
- पीठासीन अधिकारी: चुनाव की कार्यवाही प्रोटेम स्पीकर (Pro-tem Speaker) की अध्यक्षता में होती है, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति आमतौर पर सबसे वरिष्ठ सदस्य को करते हैं।
- परंपरा: सत्ताधारी दल अपना प्रत्याशी रखता है; प्रायः निर्विरोध निर्वाचन (16वीं लोकसभा में सुमित्रा महाजन निर्विरोध, 17वीं और 18वीं लोकसभा में ओम बिरला)।
18वीं लोकसभा (जून 2024): ओम बिरला बनाम K. Suresh के बीच ध्वनि-मत हुआ; ओम बिरला फिर से अध्यक्ष चुने गए — स्वतंत्र भारत में दूसरी बार किसी अध्यक्ष का लगातार दूसरा कार्यकाल (इससे पहले G. V. Mavalankar और बलराम जाखड़ ने भी पूरा दूसरा कार्यकाल पूरा किया था; जाखड़ 1980-1989)।
अध्यक्ष की शक्तियाँ और कार्य (Powers and Functions)
लोकसभा अध्यक्ष की शक्तियों को सात प्रमुख श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।
1. सदन-संचालन की शक्तियाँ
- सभी कार्यवाहियों की अध्यक्षता; प्रश्नकाल, शून्यकाल, बहसें।
- स्थगन, निंदा, स्थगन प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव की स्वीकार्यता पर निर्णय।
- सदस्यों को बोलने की अनुमति, सदन की व्यवस्था और गरिमा बनाए रखना।
- अव्यवस्था की स्थिति में सदस्य का निलंबन (Rule 374A); सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना।
2. वोट और निर्णायक मत (अनुच्छेद 100)
- अध्यक्ष सामान्य मतदान में भाग नहीं लेते।
- केवल मत बराबर होने पर निर्णायक मत (casting vote) का प्रयोग करते हैं।
3. धन विधेयक प्रमाणन (अनुच्छेद 110(3))
- कोई विधेयक “धन विधेयक” है या नहीं — इसका अंतिम और निर्णायक निर्णय अध्यक्ष करता है।
- अध्यक्ष का प्रमाणन (Speaker’s Certificate) न्यायालय में चुनौती-योग्य नहीं है।
- राज्यसभा को धन विधेयक पर केवल सिफ़ारिश का अधिकार है — इसी कारण यह शक्ति राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
4. दल-बदल विरोधी कानून — 10वीं अनुसूची
- 52वें संविधान संशोधन (1985) से 10वीं अनुसूची जोड़ी गई।
- दल-बदल के आधार पर सदस्य की अयोग्यता पर अध्यक्ष ही निर्णायक प्राधिकारी हैं।
- किहोतो होलोहन बनाम ज़चिल्हू (Kihoto Hollohan vs. Zachillhu, 1992): उच्चतम न्यायालय ने अध्यक्ष के निर्णय को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना।
- संबंधित विषय: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और राजनीतिक दल।
5. संयुक्त बैठक की अध्यक्षता (अनुच्छेद 108)
- दोनों सदनों के बीच विधेयक पर गतिरोध की स्थिति में राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुलाते हैं।
- संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करते हैं — यह पद की प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
- अब तक तीन संयुक्त बैठकें हुई हैं (1961, 1978, 2002)।
6. समितियों पर नियंत्रण
- सभी संसदीय समितियाँ अध्यक्ष के निर्देशन में काम करती हैं।
- अध्यक्ष कार्य मंत्रणा समिति (Business Advisory Committee), नियम समिति (Rules Committee) और साधारण प्रयोजन समिति (General Purposes Committee) के पदेन (ex-officio) अध्यक्ष होते हैं।
- अन्य समितियों के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति।
7. अन्य प्रशासनिक शक्तियाँ
- लोकसभा सचिवालय का प्रशासनिक प्रमुख।
- विदेशी संसदीय प्रतिनिधिमंडलों के साथ संबंध।
- संसद-संग्रहालय और सदस्यों के निवास तक की व्यवस्था।
उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) — अनुच्छेद 95
अध्यक्ष की अनुपस्थिति में या पद रिक्त होने पर उपाध्यक्ष सदन का संचालन करते हैं। उपाध्यक्ष का चुनाव भी सदन के सदस्य साधारण बहुमत से करते हैं — परंपरा यह है कि यह पद विपक्षी दल को दिया जाता है।
विशेष तथ्य — 17वीं लोकसभा (2019-2024) का उपाध्यक्ष कोई नियुक्त नहीं हुआ — यह स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास में पहला मामला था; 18वीं लोकसभा (2024-) में भी मार्च 2026 तक उपाध्यक्ष का पद रिक्त है।
हटाने की प्रक्रिया (Removal — Article 94)
संविधान के अनुच्छेद 94 के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष का पद तीन प्रकार से रिक्त हो सकता है:
- त्याग-पत्र: अध्यक्ष उपाध्यक्ष को त्याग-पत्र देकर पद त्याग सकते हैं।
- लोकसभा सदस्यता समाप्त होने पर: यदि वे लोकसभा के सदस्य नहीं रहें।
- हटाया जाना: लोकसभा के तत्कालीन सभी सदस्यों के “प्रभावी बहुमत” (effective majority — कुल सदस्यों में से रिक्तियाँ घटाकर शेष का बहुमत) के संकल्प द्वारा। प्रस्ताव से पूर्व 14-दिन की लिखित सूचना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 96 का विशेष प्रावधान: हटाने के प्रस्ताव पर बहस के दौरान अध्यक्ष पीठ की अध्यक्षता नहीं करेंगे (परंतु बहस में भाग ले सकते हैं और निर्णायक मत के अतिरिक्त मत दे सकते हैं)।
विशेष परंपरा: लोकसभा भंग होने पर भी अध्यक्ष तत्काल पद-मुक्त नहीं होते — वे नई लोकसभा की पहली बैठक तक पद पर बने रहते हैं ताकि सत्ता का “निरंतर हस्तांतरण (continuity)” बना रहे।
लोकसभा के अब तक के सभी अध्यक्षों की सूची
| क्रम | नाम | कार्यकाल | विशेष |
|---|---|---|---|
| 1 | गणेश वासुदेव मावलंकर | 15 मई 1952 – 27 फ़रवरी 1956 | प्रथम अध्यक्ष; पद पर निधन |
| 2 | एम. ए. अयंगर (M. A. Ayyangar) | 8 मार्च 1956 – 16 अप्रैल 1962 | प्रथम कार्यवाहक से नियमित बने |
| 3 | हुकम सिंह | 17 अप्रैल 1962 – 16 मार्च 1967 | — |
| 4 | नीलम संजीव रेड्डी | 17 मार्च 1967 – 19 जुलाई 1969 | त्याग-पत्र देकर राष्ट्रपति-प्रत्याशी; आगे चलकर 6वें राष्ट्रपति |
| 5 | जी. एस. ढिल्लों (G. S. Dhillon) | 8 अगस्त 1969 – 1 दिसंबर 1975 | — |
| 6 | बलि राम भगत | 5 जनवरी 1976 – 25 मार्च 1977 | — |
| 7 | नीलम संजीव रेड्डी (दूसरी बार) | 26 मार्च 1977 – 13 जुलाई 1977 | त्याग-पत्र देकर राष्ट्रपति बने |
| 8 | के. एस. हेगड़े (K. S. Hegde) | 21 जुलाई 1977 – 21 जनवरी 1980 | — |
| 9 | बलराम जाखड़ | 22 जनवरी 1980 – 18 दिसंबर 1989 | पूर्ण दो कार्यकाल; सबसे लंबा अविच्छिन्न कार्यकाल |
| 10 | रबि राय | 19 दिसंबर 1989 – 9 जुलाई 1991 | — |
| 11 | शिवराज पाटिल | 10 जुलाई 1991 – 22 मई 1996 | — |
| 12 | पी. ए. संगमा (P. A. Sangma) | 23 मई 1996 – 23 मार्च 1998 | प्रथम पूर्वोत्तर के अध्यक्ष |
| 13 | जी. एम. सी. बालयोगी (G. M. C. Balayogi) | 24 मार्च 1998 – 3 मार्च 2002 | प्रथम SC अध्यक्ष; पद पर निधन |
| 14 | मनोहर जोशी | 10 मई 2002 – 2 जून 2004 | — |
| 15 | सोमनाथ चटर्जी | 4 जून 2004 – 30 मई 2009 | — |
| 16 | मीरा कुमार | 4 जून 2009 – 4 जून 2014 | प्रथम महिला अध्यक्ष |
| 17 | सुमित्रा महाजन | 6 जून 2014 – 17 जून 2019 | द्वितीय महिला अध्यक्ष; निर्विरोध निर्वाचन |
| 18 | ओम बिरला | 19 जून 2019 – अब तक | जून 2024 में पुनर्निर्वाचित (18वीं लोकसभा) |
स्वतंत्रता और निष्पक्षता — अध्यक्ष की भूमिका
ब्रिटिश परंपरा में अध्यक्ष चुनाव के बाद अपने राजनीतिक दल से औपचारिक रूप से इस्तीफ़ा देते हैं (“Once a Speaker, always a Speaker”)। भारत में यह औपचारिक प्रथा नहीं है — अध्यक्ष दल-सदस्य बने रहते हैं, हालांकि निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है। नीलम संजीव रेड्डी और सोमनाथ चटर्जी (2008 में परमाणु समझौते-विश्वास मत के समय वामपंथी दलों की ‘whip’ मानने से इनकार) जैसे उदाहरण इस निष्पक्षता-धारा को दर्शाते हैं।
संबंधित गहराई के लिए लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका तथा भारत की संसद की संरचना देखें।
तुलनात्मक विश्लेषण (Comparative Analysis)
| बिंदु | लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) | राज्यसभा सभापति (Chairman) | राष्ट्रपति (US Speaker से समानांतर) |
|---|---|---|---|
| संवैधानिक अनुच्छेद | अनुच्छेद 93 | अनुच्छेद 64 (उपराष्ट्रपति पदेन) | — |
| चुनाव | लोकसभा सदस्यों द्वारा | उपराष्ट्रपति का चुनाव; पदेन सभापति | — |
| सदन का सदस्य? | हाँ | नहीं (पदेन) | — |
| धन विधेयक प्रमाणन | हाँ (अनुच्छेद 110) | नहीं | — |
| संयुक्त बैठक की अध्यक्षता | हाँ (अनुच्छेद 108) | नहीं | — |
| सामान्य मत | नहीं; केवल निर्णायक | नहीं; केवल निर्णायक | — |
चुनौतियाँ और आलोचना (Challenges and Criticism)
- राजनीतिक तटस्थता पर प्रश्न: अध्यक्ष का दल-सदस्य बने रहना भारतीय व्यवस्था की कमज़ोरी मानी जाती है।
- धन विधेयक का दुरुपयोग: कुछ विधेयकों (Aadhaar Act 2016, FCRA संशोधन) को धन विधेयक के रूप में प्रमाणित कर राज्यसभा-समीक्षा से बचाने के आरोप।
- दल-बदल पर देरी: 10वीं अनुसूची के तहत निर्णयों में अध्यक्ष की देरी (कुछ राज्यों में वर्षों तक लंबित) ने न्यायालयों को हस्तक्षेप करने पर मजबूर किया।
- उपाध्यक्ष पद की रिक्ति: 17वीं और 18वीं लोकसभा में उपाध्यक्ष पद वर्षों तक रिक्त — एक संवैधानिक चिंता।
- सदस्य निलंबन: हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में विपक्षी सांसदों के निलंबन से सदन-संचालन की निष्पक्षता पर बहस।
UPSC के लिए प्रासंगिकता (UPSC Relevance)
- Prelims: अनुच्छेद 93/94/95/100/108/110; प्रथम अध्यक्ष (G. V. Mavalankar); प्रथम महिला अध्यक्ष (मीरा कुमार); संयुक्त बैठक तीन बार (1961-दहेज, 1978-बैंकिंग, 2002-POTA)। प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति।
- Mains GS-2 (राजव्यवस्था): “लोकसभा अध्यक्ष की निष्पक्षता के लिए ब्रिटिश मॉडल की प्रासंगिकता”; “धन विधेयक प्रमाणन की शक्ति का दुरुपयोग”; “10वीं अनुसूची के तहत निर्णयों की समयबद्धता पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश”।
- Mains Essay: “लोकतंत्र और संसदीय गरिमा”।
संबंधित अध्ययन: संसदीय विशेषाधिकार, भारत में संसदीय प्रणाली।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Questions)
- लोकसभा अध्यक्ष की धन विधेयक प्रमाणन की शक्ति (अनुच्छेद 110(3)) के संदर्भ में हाल के विवादों की समीक्षा कीजिए। क्या इस शक्ति पर न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता है? (150 शब्द / 10 अंक)
- “अध्यक्ष सदन की स्वतंत्रता का प्रतीक है।” किहोतो होलोहन निर्णय और 10वीं अनुसूची के तहत निर्णयों के संदर्भ में अध्यक्ष की निष्पक्षता और जवाबदेही पर चर्चा कीजिए। ब्रिटिश मॉडल से तुलना करते हुए सुधार सुझाइए। (250 शब्द / 15 अंक)
निष्कर्ष (Conclusion)
लोकसभा अध्यक्ष भारतीय संसदीय लोकतंत्र की वह संस्था है जो सदन की गरिमा, बहसों की गुणवत्ता और संवैधानिक संतुलन का रक्षक है। मावलंकर से बिरला तक की यात्रा बताती है कि यह पद केवल प्रशासनिक नहीं — संसदीय परंपराओं का स्तंभ है। साथ ही, धन विधेयक प्रमाणन, दल-बदल निर्णय, उपाध्यक्ष पद की रिक्ति, और सदस्य निलंबन जैसे मुद्दे यह दर्शाते हैं कि अध्यक्ष-संस्था को सुधार और निरंतर आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता है। संविधान-निर्माताओं का सपना था कि अध्यक्ष का पद “दल से ऊपर” हो; इस सपने को साकार करने के लिए संस्थागत निष्पक्षता, समय-बद्ध निर्णय और संसदीय आचार-संहिता का पालन अनिवार्य है। UPSC अभ्यर्थी के लिए लोकसभा अध्यक्ष का अध्ययन भारतीय राजव्यवस्था के सबसे जीवंत प्रश्नों में से एक का अध्ययन है — जहाँ संवैधानिक प्रावधान, राजनीतिक व्यवहार और न्यायिक हस्तक्षेप तीनों एक साथ चलते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष कौन हैं?
वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला हैं। वे राजस्थान के कोटा-बूँदी क्षेत्र से सांसद हैं और जून 2019 में पहली बार तथा जून 2024 में 18वीं लोकसभा के लिए दोबारा अध्यक्ष चुने गए।
लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव कैसे होता है?
लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव लोकसभा के सदस्यों द्वारा साधारण बहुमत से होता है। चुनाव की अध्यक्षता प्रोटेम स्पीकर करते हैं और तिथि राष्ट्रपति निर्धारित करते हैं।
भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष कौन थे?
भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर (G. V. Mavalankar) थे, जिन्होंने 15 मई 1952 को पदभार ग्रहण किया। उन्हें “भारतीय संसदीय परंपरा का पिता” कहा जाता है।
भारत की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष कौन थीं?
भारत की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार थीं, जिन्होंने 15वीं लोकसभा (2009-2014) में यह पद संभाला। उनके बाद सुमित्रा महाजन (16वीं लोकसभा, 2014-2019) दूसरी महिला अध्यक्ष बनीं।
धन विधेयक का निर्णय कौन करता है?
अनुच्छेद 110(3) के अनुसार, यदि किसी विधेयक के बारे में प्रश्न उठता है कि यह “धन विधेयक” है या नहीं, तो लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम और निर्णायक होता है। उनका प्रमाणन न्यायालय में चुनौती-योग्य नहीं माना जाता।
क्या लोकसभा अध्यक्ष मतदान कर सकते हैं?
लोकसभा अध्यक्ष सामान्य मतदान में भाग नहीं लेते। अनुच्छेद 100 के अनुसार वे केवल मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत (casting vote) का प्रयोग करते हैं।
लोकसभा अध्यक्ष को कैसे हटाया जाता है?
अनुच्छेद 94 के तहत 14-दिन की लिखित सूचना के बाद लोकसभा के तत्कालीन सभी सदस्यों के “प्रभावी बहुमत” से पारित संकल्प द्वारा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है। अब तक किसी भी अध्यक्ष को इस प्रकार हटाया नहीं गया है।
प्रोटेम स्पीकर कौन होता है?
प्रोटेम स्पीकर (Pro-tem Speaker) नई लोकसभा के नियमित अध्यक्ष के चुनाव तक के लिए राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त अस्थायी अध्यक्ष होते हैं। परंपरा से सबसे वरिष्ठ सदस्य को यह दायित्व दिया जाता है। उनका मुख्य कार्य नए सदस्यों को शपथ दिलाना और नियमित अध्यक्ष का चुनाव संपन्न कराना है।
क्या अध्यक्ष लोकसभा भंग होते ही पद-मुक्त हो जाते हैं?
नहीं। एक विशेष परंपरा के अनुसार, लोकसभा भंग होने पर भी अध्यक्ष नई लोकसभा की पहली बैठक तक पद पर बने रहते हैं — ताकि निरंतरता बनी रहे और संसदीय कार्य बाधित न हो।
10वीं अनुसूची के तहत अध्यक्ष की क्या भूमिका है?
दल-बदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची, 52वें संशोधन 1985) के तहत किसी सदस्य की अयोग्यता का निर्णय लोकसभा अध्यक्ष करते हैं। 1992 के किहोतो होलोहन निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अध्यक्ष का यह निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है।