UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना: फ़ायदे और अमल

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना क्या है, कौन-से 12 पैमाने जाँचे जाते हैं, GPS ग्रिड से नमूने कैसे लिए जाते हैं और सलाह मानने पर किसान को कितना फ़ायदा होता है।

Soil Health Card Scheme: Benefits & Implementation — featured card for Anantam IAS UPSC guide.

मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card, SHC) योजना केंद्र सरकार का वह कार्यक्रम है जिसमें पूरे देश की खेती की ज़मीन की मिट्टी जाँची जाती है और हर किसान को एक कार्ड दिया जाता है। इस कार्ड पर लिखा होता है कि उसके अपने खेत में किस पोषक तत्व और किस खाद की कितनी मात्रा डालनी चाहिए। यह योजना 19 फ़रवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के सूरतगढ़ से शुरू की थी। इसका निशाना भारतीय खेती की एक पुरानी बीमारी है — बिना जाँचे आँख मूँदकर खाद डालना

UPSC के लिहाज़ से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना GS-3 (कृषि, खाद्य सुरक्षा, टिकाऊ खेती), GS-2 (सरकारी योजनाएँ, ग्रामीण विकास) से जुड़ती है और पर्यावरण की टिकाऊ हालत (मिट्टी का क्षरण, उर्वरक सब्सिडी को तर्कसंगत बनाना) को भी छूती है। इसके पीछे की वैज्ञानिक सोच साफ़ है और किसान के स्तर पर इसका फ़ायदा नापा जा सकता है।

पृष्ठभूमि: भारत की मिट्टी और खाद की समस्या

ज़रूरत से ज़्यादा खाद डालने का संकट

भारत के किसान यूरिया (नाइट्रोजन) ज़रूरत से ज़्यादा डालते हैं, जबकि फ़ॉस्फ़ोरस, पोटैशियम और सूक्ष्म पोषक तत्व कम डालते हैं। खाद का यह असंतुलित इस्तेमाल इन वजहों से होता है:

  • यूरिया की सब्सिडी: यूरिया पर भारी सब्सिडी है — मिट्टी में नाइट्रोजन कितना है, इसकी परवाह किए बिना किसान इसे डालते रहते हैं
  • मिट्टी जाँचने की आदत ही नहीं: ज़्यादातर किसानों ने कभी अपनी मिट्टी जँचवाई ही नहीं; वे आदत से या पड़ोसी को देखकर खाद डालते रहे
  • सूक्ष्म पोषक तत्वों की अनदेखी: ज़िंक, बोरॉन, सल्फ़र और आयरन की कमी पैदावार बहुत गिरा देती है, लेकिन बिना जाँच के यह कमी दिखती ही नहीं
  • घटता हुआ फ़ायदा: जिस मिट्टी में नाइट्रोजन पहले ही भरा हो, उसमें और यूरिया डालने से पैदावार लगभग नहीं बढ़ती, पैसा भी जाता है और प्रदूषण भी होता है

बिना जाँचे खाद डालने के नतीजे:

  • ज़्यादा यूरिया वाले राज्यों (पंजाब, हरियाणा) में मिट्टी का तेज़ाबी होना
  • भूजल में नाइट्रेट का घुलना
  • मिट्टी में जैविक कार्बन का घटते जाना
  • सरकार का हर साल उर्वरक सब्सिडी पर ₹1.5–2 लाख करोड़ ख़र्च करना, जिसका बड़ा हिस्सा बेकार जाता है

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना सीधे इसी पर चोट करती है — किसान को ठीक-ठीक बताकर कि उसकी मिट्टी को किस पोषक तत्व की कितनी ज़रूरत है।

योजना के मक़सद

SHC योजना के तीन साफ़ मक़सद हैं:

  1. मिट्टी में पोषक तत्वों की हालत जानना: हर मिट्टी के नमूने को 12 पैमानों पर जाँचना
  2. अपने खेत के हिसाब से सलाह: उसी मिट्टी और उसी फ़सल के लिए पोषक तत्व और खाद की मात्रा बताना
  3. पोषक तत्वों का बेहतर इस्तेमाल: किसान सही खाद सही मात्रा में डाले — पैदावार बढ़े और फ़ालतू खाद डलना बंद हो

लंबी दौड़ का मक़सद यह है कि बर्बादी रोककर भारत का उर्वरक सब्सिडी का बिल घटे। साथ ही खेती की पैदावार और मिट्टी की सेहत, दोनों सुधरें।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड होता क्या है?

मृदा स्वास्थ्य कार्ड हर किसान को दी जाने वाली छपी हुई या डिजिटल रिपोर्ट है। इसमें यह सब होता है:

हिस्साक्या-क्या रहता है
किसान का ब्योरानाम, गाँव, खसरा नंबर, रकबा
मिट्टी की जाँच के नतीजे12 पैमानों पर आए मान
दर्जाहर पैमाना कम/मध्यम/ज़्यादा में से क्या है
फ़सल के हिसाब से सलाहकिस फ़सल के लिए कौन-सी खाद या पोषक तत्व कितना डालें
मिट्टी की सेहत का सूचकांकमिट्टी की कुल हालत

जाँचे जाने वाले 12 पैमाने

पैमानाश्रेणी
pHमिट्टी की प्रतिक्रिया (तेज़ाबी/क्षारीय)
विद्युत चालकता (EC)खारापन
जैविक कार्बन (OC)मिट्टी में जैविक पदार्थ
नाइट्रोजन (N)मुख्य पोषक तत्व
फ़ॉस्फ़ोरस (P)मुख्य पोषक तत्व
पोटैशियम (K)मुख्य पोषक तत्व
सल्फ़र (S)गौण पोषक तत्व
ज़िंक (Zn)सूक्ष्म पोषक तत्व
बोरॉन (B)सूक्ष्म पोषक तत्व
आयरन (Fe)सूक्ष्म पोषक तत्व
मैंगनीज़ (Mn)सूक्ष्म पोषक तत्व
कॉपर (Cu)सूक्ष्म पोषक तत्व

12 पैमानों की यह पूरी सूची उन सभी पोषक तत्वों को छूती है जो पैदावार तय करते हैं — सिर्फ़ NPK (नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस, पोटैशियम) नहीं, जिनके बारे में ज़्यादातर किसान जानते हैं।

दो-दो साल के चक्र वाला ढाँचा

योजना दो साल के चक्रों में चलती है — हर चक्र में भारत के हर खेत की मिट्टी एक बार जाँची जाती है:

चक्रसमयलक्ष्य
चक्र I2015-16 से 2016-1714 करोड़ मिट्टी के नमूने (हर खेती वाली जोत को कवर करते हुए)
चक्र II2017-18 से 2018-19बदलाव देखने के लिए दोबारा जाँच
चक्र III और आगे2019 से आगेबदले हुए तरीक़ों के साथ जारी

हर चक्र में सिंचित इलाक़ों में हर 2.5 हेक्टेयर पर एक नमूना और बारानी या पहाड़ी इलाक़ों में हर 10 हेक्टेयर पर एक नमूना लेने का लक्ष्य रहता है। दो साल बाद दोबारा जाँच से तुलना हो पाती है — मिट्टी की सेहत सुधरी या नहीं? सलाह मानने के बाद पोषक तत्वों का स्तर बदला या नहीं?

अब तक की प्रगति

चक्रलिए गए नमूनेबाँटे गए कार्ड
चक्र I2.53 करोड़11.69 करोड़
चक्र II2.35 करोड़11.08 करोड़
कुल (2024 तक)5+ करोड़ नमूने23+ करोड़ कार्ड

ये आँकड़े छोटे नहीं हैं — इतने बड़े पैमाने पर मिट्टी जाँचने की कोशिश किसी और देश ने नहीं की।

GPS से नमूने लेना: तरीक़ा क्या है

SHC योजना को पहले की मिट्टी जाँच की कोशिशों से अलग करने वाली एक बड़ी बात है — GPS वाले ग्रिड से नमूने लेना

ग्रिड की व्यवस्था

भारत की खेती की ज़मीन को ग्रिड में बाँटा गया है:

  • सिंचित ज़मीन: 2.5 हेक्टेयर के ग्रिड
  • बारानी/सूखी ज़मीन: 10 हेक्टेयर के ग्रिड
  • पहाड़ी या मुश्किल इलाक़ा: 25 हेक्टेयर के ग्रिड

हर ग्रिड का अपना GPS निर्देशांक होता है — नमूना उसी तय जगह से लिया जाता है, उसका अक्षांश-देशांतर दर्ज होता है, और मिट्टी की सेहत वाले पोर्टल (soilhealth.dac.gov.in) पर वह नमूना ठीक उसी जगह से जोड़कर देखा जा सकता है।

नमूने लेने की प्रक्रिया

  1. राज्य सरकार नमूने लेने वाली टीमें तय करती है — आम तौर पर कृषि प्रसार कर्मी, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के कर्मचारी या निजी एजेंसी के लोग
  2. टीमें GPS वाले फ़ोन से तय ग्रिड की जगह तक पहुँचती हैं
  3. ऊपर की 0–20 सेंटीमीटर गहराई से मिट्टी का नमूना लिया जाता है
  4. हर नमूने पर GPS निर्देशांक, किसान का नाम और खसरा नंबर लिखा जाता है
  5. नमूने मिट्टी जाँच प्रयोगशालाओं (STL) को भेजे जाते हैं — देश भर में 1,200 से ज़्यादा स्थायी और चलती-फिरती प्रयोगशालाएँ हैं
  6. नतीजे SHC पोर्टल पर चढ़ाए जाते हैं
  7. नतीजों से कार्ड अपने आप बन जाता है, एक तय फ़ॉर्मूले के हिसाब से
  8. कार्ड किसान तक पहुँचाया जाता है — ग्राम पंचायत, कृषि अधिकारी, या स्मार्टफ़ोन वाले किसानों के लिए SMS/पोर्टल के ज़रिए

मिट्टी जाँच का ढाँचा

स्थायी और चलती-फिरती प्रयोगशालाएँ

प्रकारसंख्या (क़रीब)
स्थायी मिट्टी जाँच प्रयोगशालाएँ1,200+ (सरकारी + निजी)
चलती-फिरती मिट्टी जाँच वैन100+
मिनी STL (ग्राम पंचायत स्तर पर)बढ़ाई जा रही हैं

चलती-फिरती मिट्टी जाँच वैन का कार्यक्रम जाँच को सीधे गाँव तक ले गया — वैन में ज़रूरी उपकरण रहते हैं, दिन भर में 400–600 नमूने जाँचे जाते हैं और नतीजे 24 घंटे के भीतर मिल जाते हैं। इससे नमूना लेने से कार्ड मिलने तक का समय बहुत घट गया।

सरकार ने हब एंड स्पोक STL के लिए भी पैसा दिया है — यानी बड़ी क्षमता वाली मशीनों से लैस बड़ी क्षेत्रीय प्रयोगशालाएँ (हब), जो कई प्रखंडों के छोटे संग्रह केंद्रों (स्पोक) से आए नमूने जाँचती हैं।

सलाह और फ़सल के हिसाब से मशविरा

मृदा स्वास्थ्य कार्ड सिर्फ़ जाँच के आँकड़े नहीं देता — यह किसान की अपनी फ़सल और अपनी मिट्टी के हिसाब से करने लायक़ सलाह देता है।

सलाह कैसे बनती है

सलाह बनाने वाला फ़ॉर्मूला इन चीज़ों का इस्तेमाल करता है:

  • सभी 12 पैमानों के जाँच नतीजे
  • राज्य या क्षेत्र के हिसाब से मिट्टी-फ़सल के आँकड़े (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद — ICAR — के डेटाबेस से)
  • किसान ने उस मौसम के लिए कौन-सी फ़सल बताई है

नतीजा: हर फ़सल के लिए हर खाद (यूरिया, DAP, MOP, ज़िंक सल्फ़ेट वग़ैरह) की मात्रा किलो प्रति एकड़ या हेक्टेयर में बताई जाती है।

सलाह का एक नमूना

पंजाब में गेहूँ उगाने वाले जिस किसान की मिट्टी में नाइट्रोजन ज़्यादा, ज़िंक कम और फ़ॉस्फ़ोरस मध्यम है, उसके कार्ड पर यह सलाह हो सकती है:

  • यूरिया 20% कम डालें
  • बुवाई से पहले ज़िंक सल्फ़ेट 10 किलो प्रति एकड़ डालें
  • DAP तय मात्रा में डालें

कार्ड न होता तो वही किसान पूरी यूरिया डालता (पैसा बर्बाद) और ज़िंक की अनदेखी करता (10-15% पैदावार का नुक़सान)।

किसान को क्या मिला: सबूत क्या कहते हैं

पैदावार में बढ़त

ICAR और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों के अध्ययनों में यह मिला है:

  • SHC की सलाह मानने वाले किसानों की पैदावार पहले के मुक़ाबले औसतन 8–10% बढ़ती है
  • जिन मिट्टियों में कमी है, वहाँ अकेले सूक्ष्म पोषक तत्व (ख़ासकर ज़िंक) डालने से धान और गेहूँ की पैदावार 15–20% तक बढ़ सकती है
  • कुछ फ़सलों (कपास, दलहन) में SHC की सलाह मानने से पैदावार 20% से भी ज़्यादा बढ़ी

लागत में बचत

SHC की सलाह के हिसाब से संतुलित खाद डालने पर खाद का कुल ख़र्च आम तौर पर 10–15% घट जाता है — क्योंकि किसान ज़रूरत से ज़्यादा नाइट्रोजन डालना बंद कर देता है और सिर्फ़ वही डालता है जिसकी सचमुच कमी है।

उर्वरक सब्सिडी में बचत

सरकार का अनुमान है कि SHC को बड़े पैमाने पर अपनाने से भारत का सालाना उर्वरक सब्सिडी बिल समय के साथ ₹8,000–10,000 करोड़ तक घट सकता है, क्योंकि किसान फ़ालतू यूरिया डालना कम करेंगे। लेकिन यह इस पर टिका है कि सलाह सचमुच मानी जाए, और यही सबसे बड़ी दिक़्क़त है।

दूसरी योजनाओं से जुड़ाव

मृदा स्वास्थ्य कार्ड अकेले नहीं चलता:

योजनाजुड़ाव
प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना (PMFBY)फ़सल के नुक़सान का आकलन करने में मिट्टी के आँकड़े काम आते हैं
परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY)जैविक खेती की तरफ़ बढ़ने में SHC रास्ता दिखाता है
PM-KISANकार्ड सही किसान तक पहुँचाने के लिए किसानों का डेटाबेस साझा होता है
सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSA)SHC इस मिशन का एक अहम हिस्सा है
e-NAMमिट्टी की सेहत का असर उपज की गुणवत्ता पर पड़ता है — जोड़ने का प्रस्ताव है

यह योजना भारत के उर्वरक सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने के एजेंडे से भी जुड़ी है। सरकार उर्वरक के लिए DBT की तरफ़ बढ़ना चाहती है — यानी सब्सिडी खाद कंपनियों को नहीं, सीधे किसान को देना। इसके लिए यह जानना ज़रूरी है कि किस किसान के पास कितनी ज़मीन है और उसकी मिट्टी की हालत क्या है। दूसरी जानकारी SHC से ही आती है।

अमल में आने वाली दिक़्क़तें

सलाह कम ही मानी जाती है

सबसे बड़ी दिक़्क़त यही है: किसानों को SHC कार्ड मिल तो जाता है, पर वे सलाह पर अमल नहीं करतेनीति आयोग के 2020 के एक मूल्यांकन में मिला कि जिन राज्यों का सर्वे हुआ, वहाँ SHC पाने वालों में सिर्फ़ 25–35% ने सलाह पर अमल किया। वजहें ये हैं:

  • जिन सूक्ष्म पोषक खादों की सलाह दी जाती है, वे स्थानीय बाज़ार में मिलती ही नहीं
  • आदत — किसान उसी पर भरोसा करता है जो वह हमेशा से करता आया है
  • पैसे की तंगी — नई तरह की खाद ख़रीदने के लिए पहले नक़द चाहिए

प्रयोगशालाओं की क्षमता

बढ़ोतरी के बावजूद कई राज्यों में STL की क्षमता अब भी अड़चन बनी हुई है। बिना जँचे नमूनों का ढेर लगने का मतलब है कि कार्ड बुवाई का मौसम बीत जाने के बाद पहुँचता है — यानी उस साल की फ़सल के फ़ैसले में उसका कोई काम नहीं।

आँकड़ों की गुणवत्ता

स्वतंत्र ऑडिट में GPS निर्देशांक ग़लत दर्ज होने, नमूनों पर ग़लत पर्ची लगने और सलाह ग़लत बनने की शिकायतें सामने आई हैं। मिट्टी वाले पोर्टल के आँकड़ों की जाँच होनी चाहिए।

मुश्किल इलाक़ों में पहुँच

पहाड़ी राज्यों (हिमाचल, उत्तराखंड, पूर्वोत्तर के राज्य), जंगल के किनारे के इलाक़ों और दूर-दराज़ के आदिवासी क्षेत्रों में नमूने कम लिए जाते हैं। चलती-फिरती प्रयोगशालाओं से हालत सुधरी है, पर यह खाई पूरी तरह भरी नहीं है।

इससे जुड़ा: मनरेगा — महात्मा गांधी रोज़गार गारंटी अधिनियम इससे जुड़ा: पोषण अभियान — राष्ट्रीय पोषण मिशन

UPSC के लिए ज़रूरी तथ्य एक जगह

बातब्योरा
शुरुआत19 फ़रवरी 2015, सूरतगढ़, राजस्थान
किसने शुरू कीप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
मंत्रालयकृषि एवं किसान कल्याण
पूरा नाममृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (SHC)
जाँचे जाने वाले पैमाने12 (pH, EC, OC, N, P, K, S, Zn, B, Fe, Mn, Cu)
ग्रिड का आकार (सिंचित)2.5 हेक्टेयर के ग्रिड पर 1 नमूना
ग्रिड का आकार (बारानी)10 हेक्टेयर के ग्रिड पर 1 नमूना
जाँच का चक्रहर 2 साल पर
चक्र I में बाँटे गए कार्ड11.69 करोड़
चक्र II में बाँटे गए कार्ड11.08 करोड़
कुल कार्ड (2024 तक)23+ करोड़
स्थायी STL1,200+
पोर्टलsoilhealth.dac.gov.in
पैदावार में बढ़त (औसत)सलाह मानने पर 8-10%
सब्सिडी में संभावित बचत₹8,000-10,000 करोड़ सालाना

सामान्य प्रश्न

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना क्या है और यह कब शुरू हुई?

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना 19 फ़रवरी 2015 को प्रधानमंत्री मोदी ने राजस्थान के सूरतगढ़ से शुरू की थी। इसमें हर किसान को एक कार्ड मिलता है, जिस पर उसकी मिट्टी में पोषक तत्वों की हालत 12 पैमानों पर लिखी होती है — pH, जैविक कार्बन, NPK और सूक्ष्म पोषक तत्व। साथ में फ़सल के हिसाब से खाद और पोषक तत्वों की सलाह भी रहती है। मक़सद है संतुलित खाद डलवाना और खेती की पैदावार बढ़ाना।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड में कौन-से 12 पैमाने जाँचे जाते हैं?

12 पैमाने ये हैं: pH (तेज़ाबी/क्षारीय), विद्युत चालकता (खारापन), जैविक कार्बन, नाइट्रोजन (N), फ़ॉस्फ़ोरस (P), पोटैशियम (K), सल्फ़र (S), और चार सूक्ष्म पोषक तत्व — ज़िंक (Zn), बोरॉन (B), आयरन (Fe), मैंगनीज़ (Mn) और कॉपर (Cu)। यह पूरी सूची मिट्टी की उन सभी ख़ूबियों को छूती है जो पैदावार और लंबे समय में मिट्टी की उपजाऊ ताक़त पर सीधा असर डालती हैं।

SHC में GPS वाले ग्रिड से नमूने लेने की व्यवस्था क्या है?

मिट्टी के नमूने GPS वाले उपकरणों से तय ग्रिड बिंदुओं पर लिए जाते हैं — सिंचित इलाक़ों में हर 2.5 हेक्टेयर पर एक और बारानी इलाक़ों में हर 10 हेक्टेयर पर एक। हर नमूने पर GPS निर्देशांक दर्ज होते हैं, जिससे उसे राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य पोर्टल (soilhealth.dac.gov.in) पर उसी जगह से जोड़कर देखा जा सकता है। इस तरीक़े से हर जगह के हिसाब से सटीक सलाह बनती है और चक्र दर चक्र मिट्टी की सेहत में आया बदलाव भी दिखता है।

अब तक कितने मृदा स्वास्थ्य कार्ड बाँटे जा चुके हैं?

दो चक्रों में 23 करोड़ से ज़्यादा मृदा स्वास्थ्य कार्ड बाँटे जा चुके हैं — चक्र I (2015-17) में 11.69 करोड़ और चक्र II (2017-19) में 11.08 करोड़, और इसके बाद के दौर जारी हैं। हर चक्र भारत की पूरी खेती वाली ज़मीन को कवर करता है, और दो साल के अंतर से यह तुलना हो पाती है कि दो जाँचों के बीच मिट्टी की सेहत में क्या बदला।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सलाह मानने से क्या फ़ायदा होता है?

SHC की सलाह मानने वाले किसानों की पैदावार औसतन 8-10% बढ़ती है, और जिन मिट्टियों में कमी है वहाँ सूक्ष्म पोषक तत्व (ख़ासकर ज़िंक) डालने से पैदावार 15-20% तक बढ़ जाती है। लागत आम तौर पर 10-15% घटती है, क्योंकि फ़ालतू यूरिया डलना बंद होता है और खाद सही जगह पड़ती है। दिक़्क़त अमल की है — सर्वे वाले राज्यों में सिर्फ़ 25-35% किसान ही सलाह पर चलते हैं, एक बड़ी वजह यह कि सलाह वाली सूक्ष्म पोषक खाद हमेशा आसपास मिलती नहीं।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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