17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में वह हुआ जो मोदी सरकार के ग्यारह साल में पहले कभी नहीं हुआ था। सरकार का लाया हुआ एक संविधान संशोधन गिर गया। संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाता, सीटों का बँटवारा 2011 की जनगणना के आधार पर करता और महिला आरक्षण को आखिरकार लागू करता। पक्ष में 298 वोट पड़े, लेकिन यह अनुच्छेद 368 के तहत ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत से कम था। इसलिए विधेयक गिर गया, इससे जुड़ा परिसीमन विधेयक निष्फल हो गया और उस पर आगे विचार नहीं हुआ। देश पचास साल से जिस सवाल को टाल रहा था, वह फिर सामने खड़ा हो गया।
यह इस साल पढ़ने वाली सबसे साफ़ संवैधानिक दुविधाओं में से एक है। एक पक्ष कहता है कि हर भारतीय के वोट का मूल्य बराबर होना चाहिए, इसलिए सीटें आबादी के हिसाब से मिलनी चाहिए। दूसरा पक्ष कहता है कि जिन राज्यों ने आबादी की बढ़त काबू में रखी, उन्हें इसकी राजनीतिक सज़ा नहीं मिलनी चाहिए। इसलिए मौजूदा संतुलन बचा रहना चाहिए। दोनों पक्षों की बात में दम है। इसी वजह से यह असली दुविधा है, ऐसी बहस नहीं जिसमें एक पक्ष साफ़ तौर पर सही और दूसरा ग़लत हो।
मुद्दा क्या है?
पहले शब्द को समझिए, क्योंकि इस विषय की आधी उलझन इसके ढीले इस्तेमाल से पैदा होती है। परिसीमन (delimitation) में ताज़ा जनगणना के आधार पर तय किया जाता है कि हर राज्य को लोकसभा और अपनी विधानसभा में कितनी सीटें मिलेंगी। फिर उन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ खींची जाती हैं। आबादी बदलती है, हिसाब दोबारा होता है और सीटों का बँटवारा बदलता है। मूल व्यवस्था यही है।
लेकिन पचास साल से यह हिसाब दोबारा नहीं हुआ। संविधान की मूल व्यवस्था तीन अनुच्छेदों में साफ़ है। अनुच्छेद 81 कहता है कि लोकसभा की सीटें राज्यों को उनकी आबादी के अनुपात में मिलें, ताकि जहाँ तक संभव हो हर जगह सीट और आबादी का अनुपात लगभग एक जैसा रहे। अनुच्छेद 82 के मुताबिक हर जनगणना के बाद संसद परिसीमन अधिनियम बनाती है और सीटों का दोबारा बँटवारा होता है। अनुच्छेद 170 यही नियम राज्य विधानसभाओं पर लागू करता है। यानी जनगणना के बाद नया बँटवारा अपने-आप होना था।
फिर सीटों पर रोक (seat freeze) ने यह क्रम तोड़ दिया। 1976 के 42वें संशोधन ने हर राज्य की लोकसभा सीटों को 1971 की जनगणना पर जमा दिया और अगला बँटवारा 2001 तक टाल दिया। वजह दफ़्तरी नहीं, न्याय की चिंता थी। केंद्र परिवार नियोजन पर ज़ोर दे रहा था, दक्षिणी राज्य तेज़ी से नतीजे ला रहे थे और जन्म दर घटाने वाले राज्य की आबादी का हिस्सा तथा सीटें कम हो सकती थीं। किसी राज्य से यह कहना ठीक नहीं था कि राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करने की कीमत उसकी राजनीतिक ताक़त होगी। रोक ने कुछ समय खरीद लिया।
2001 के 84वें संशोधन ने रोक आगे बढ़ा दी। सीटों का अगला बँटवारा “2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना” तक टाल दिया गया। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ 2001 की जनगणना के आधार पर बदलीं, लेकिन हर राज्य की सीटों की संख्या 1971 के आँकड़ों पर ही अटकी रही। आज भी यही स्थिति है। लोकसभा की मौजूदा 543 निर्वाचित सीटें राज्यों में 1971 की आबादी के हिसाब से बँटी हैं, जबकि निर्वाचन क्षेत्रों के लोगों की गिनती 2001 के स्तर पर है। इसलिए यह कोई पुरानी रोक नहीं जो चुपचाप ख़त्म हो रही हो। यह आज का संवैधानिक सवाल है जिसे 131वाँ संशोधन सुलझाने निकला और नाकाम रहा।
समय यहाँ बहुत अहम है। “2026 के बाद पहली जनगणना” कानूनी शुरुआत का बिंदु है और वह अब सामने है। इसलिए यह केवल चर्चा का विषय नहीं रहा। यह समय-सीमा बन चुका है।
आँकड़े क्या बताते हैं?
आँकड़े बताते हैं कि एक पक्ष खुद को ठगा हुआ क्यों मानता है। 1971 के जमे हुए बँटवारे में तेज़ी से बढ़ा राज्य कम प्रतिनिधित्व पाता है और धीमे बढ़ा राज्य ज़्यादा। लुईज़ टिलिन (Louise Tillin), मिलन वैष्णव (Milan Vaishnav) और एंडी रोबैना (Andy Robaina) के मई 2026 के कार्नेगी एंडोमेंट (Carnegie Endowment) विश्लेषण के मुताबिक राज्यों के बीच लोकसभा का लगभग 8% प्रतिनिधित्व ग़लत जगह बँटा है। यानी 543 में से करीब 44 सीटें उस जगह नहीं हैं जहाँ आज की आबादी के अनुपात में होनी चाहिए।
अंतर के दोनों सिरों को देखिए। 1971 के बाद बिहार की आबादी करीब 215% बढ़ी, जबकि केरल की करीब 70%। औसतन एक भारतीय सांसद करीब 25 लाख नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन यह औसत बड़ा अंतर छिपाता है: उत्तर प्रदेश में एक सांसद पर करीब 30 लाख लोग हैं, जबकि केरल में करीब 17.5 लाख। इसलिए सदन में केरल के एक वोट का वज़न उत्तर प्रदेश के एक वोट से ज़्यादा है। जनसंख्या के अनुपात से कम प्रतिनिधित्व (malapportionment) की यही गड़बड़ी परिसीमन समर्थक पक्ष ठीक करना चाहता है।
अब अनुमानों को समझिए। इन्हें सावधानी से लिखना होगा, क्योंकि ये विद्वानों के अनुमान हैं, परिसीमन आयोग का फैसला नहीं। अगर सदन 543 पर ही रहे और सीटें 2011 की जनगणना के हिसाब से बाँटी जाएँ, तो 131वें संशोधन विधेयक के तर्क पर PRS की व्याख्या में उत्तर प्रदेश 80 से 89 और बिहार 40 से 46 पर पहुँचते हैं, जबकि तमिलनाडु 39 से 32 और केरल 20 से 15 पर आते हैं। राज्यवार एक बहुचर्चित स्थिर-543 अनुमान में यह करीब उत्तर प्रदेश +11 और बिहार +10, जबकि तमिलनाडु −8 और केरल −8 बैठता है। 2011 के सख़्त पुनर्बँटवारे में दक्षिणी राज्यों को कुल 27 सीटें कम मिलेंगी। सदन में दक्षिण का हिस्सा करीब 24% से घटकर 20% से नीचे चला जाएगा।
परीक्षा में ये आँकड़े लिखते समय परिदृश्य ज़रूर बताइए। सदन को 543 पर रखने से दक्षिण की सीटें वास्तव में घटती हैं। सदन बड़ा करने पर किसी राज्य की सीटों की संख्या सीधे कम नहीं होती, लेकिन दक्षिण का सापेक्ष हिस्सा फिर भी घटता है। इसलिए साफ़ लिखें कि आप किस परिदृश्य की बात कर रहे हैं।


परिसीमन के पक्ष में तर्क
आबादी के आधार पर परिसीमन संविधान की मूल व्यवस्था है। इसका तर्क इतना मज़बूत है कि विरोधी पक्ष पर जाने से पहले इसे पूरी ताक़त से रखना चाहिए।
एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य। अनुच्छेद 81 इसी सिद्धांत पर बना है: सीटें आबादी के साथ चलें ताकि हर नागरिक के वोट का वज़न बराबर हो। 1971 की रोक स्थायी नहीं थी। वह साफ़ तौर पर सीमित समय का अपवाद था और अब तय समय पर खत्म होने जा रहा है। अनुपातिक सीटें बहाल करना उत्तर भारत की कोई उग्र माँग नहीं है। यह पचास साल के विराम के बाद संविधान के अपने नियम का फिर लागू होना है।
गड़बड़ी असली और नापने योग्य है। यह किसी की बनाई शिकायत नहीं। जब उत्तर प्रदेश में एक सांसद पर 30 लाख और केरल में 17.5 लाख मतदाता हों, तो राष्ट्रीय कानून बनाने वाले सदन में कम प्रतिनिधित्व पाने वाले नागरिक का वोट सचमुच कम मूल्य रखता है। पाँच दशक तक यह फ़र्क़ बढ़ने देना और उसे न्याय कहना, न्याय का अर्थ बदल देना है।
इंतज़ार जितना लंबा होगा, फ़र्क़ उतना बढ़ेगा। 1971 का अनुपात हमेशा के लिए जमा रखने का मतलब है कि तेज़ी से बढ़ते राज्य में जन्म लेने वाला हर नया नागरिक व्यवस्था के कारण कम वज़न पाएगा। समय इस गड़बड़ी को ठीक नहीं करता, बल्कि बढ़ाता है। इसलिए रोक आगे बढ़ाना तटस्थ फैसला नहीं। यह उसी असमानता को और बड़ा करने का चुनाव है जिसे रोक के जरिए सँभालना था।
महिला आरक्षण भी इसी में अटका है। 2023 का संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम, लोकसभा और विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करता है। लेकिन अनुच्छेद 334A इसे 2026 के बाद पहली जनगणना पर आधारित परिसीमन के बाद ही लागू करता है। परिसीमन रुका तो महिला आरक्षण भी रुका रहेगा। लोकसभा ने 2023 में संशोधन 454 के मुकाबले 2 वोट से पास किया था, फिर भी वह लागू नहीं हो सकता। परिसीमन अनिश्चित समय तक टालने का अर्थ महिला आरक्षण भी अनिश्चित समय तक टालना है। यह मामूली दुष्प्रभाव नहीं, गतिरोध तोड़ने की बड़ी वजह है।
परिसीमन के ख़िलाफ़ तर्क
बराबरी का तर्क एक बात भूल जाता है। लोग आबादी की आपस में बदल सकने वाली इकाइयाँ नहीं हैं। वे उन राज्यों के नागरिक हैं जिन्होंने नीतिगत फैसले लिए, और आज के आँकड़ों का अंतर कुछ हद तक उन्हीं फैसलों का नतीजा है।
दक्षिणी पक्ष की पूरी चिंता एक वाक्य में है: सफलता की सज़ा। केरल और तमिलनाडु की कुल प्रजनन दर (TFR) 1.8, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की 1.7 है। ये सभी 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे हैं। दूसरी ओर बिहार 3.0 पर है और प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर रहने वाला अकेला बड़ा राज्य है। कुल प्रजनन दर का मतलब मौजूदा दरों पर एक महिला के जीवन में पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या है। 2.1 से नीचे आबादी खुद को पूरी तरह दोबारा नहीं बना पाती। दक्षिण ने यह लक्ष्य हासिल किया। 1976 की रोक ने भरोसा दिया था कि इसके कारण सीटें नहीं जाएँगी। केवल आबादी के आधार पर रोक हटाने से सीटें उन राज्यों से जाएँगी जिन्होंने संख्या काबू की और उसे मिलेंगी जिसने नहीं की। दक्षिण के लिए यह संविधान का दिया प्रोत्साहन उलट देना है।
गहरी चिंता संघीय संतुलन की है। सीटों का बड़ा बदलाव केवल कुर्सियाँ इधर-उधर नहीं करेगा। इससे उत्तरी राज्य दक्षिण की सहमति के बिना साधारण कानून और किसी ख़राब दिन संविधान संशोधन तक पास करने की स्थिति में आ सकते हैं। दक्षिणी नेताओं ने इसे अपनी सौदेबाज़ी की ताक़त पर लटकती डैमोक्लीज़ की तलवार कहा है। संघ में छोटे हिस्से की रोकने की क्षमता उस समझौते का भाग है जो संघ को जोड़े रखता है।
पैसा जोड़ें तो शिकायत और बढ़ती है। दक्षिणी और पश्चिमी राज्य पहले से कहते हैं कि राष्ट्रीय कर-कोष में उनका योगदान मिलने वाली रकम से ज़्यादा है, जबकि बँटवारे में आबादी को बढ़ता वज़न मिलता है। एक ही आबादी वाले तर्क के कारण सीट और कर का हिस्सा दोनों कम होने का डर है। इसके नीचे भाषा और संस्कृति की चिंता भी है। संसद में दक्षिण का वज़न घटने से हिंदी थोपे जाने और त्रि-भाषा सूत्र को लेकर पुरानी चिंता बढ़ती है। इस तरह सीटों की तकनीकी गिनती पहचान का सवाल बन जाती है।
कार्नेगी की टीम संतुलन को तटस्थ ढंग से रखती है। एक व्यक्ति, एक वोट बहाल करने से वे दक्षिणी राज्य संतुष्ट नहीं होंगे जो संघ में अपने योगदान के बदले अपनी अनुपात से अधिक राजनीतिक ताक़त बचाना चाहते हैं। दोनों हिस्से एक साथ सच हैं। एक वाक्य में यही पूरी दुविधा है।

गहराई में असली टकराव
सीटों की गिनती से पीछे हटकर देखें तो असली दरार दिखती है। यह किसी एक संख्या की लड़ाई नहीं। यह इस बात की दो जायज़ धारणाओं का टकराव है कि वोट किसका प्रतिनिधित्व करता है। संविधान दोनों को एक साथ जगह देता है।
पहली धारणा कहती है कि प्रतिनिधित्व लोगों के साथ चले। वोट व्यक्ति का है, बराबर लोगों को बराबर वज़न मिलना चाहिए और सदन को आबादी दिखानी चाहिए। यह बहुमत और एक व्यक्ति-एक वोट का तर्क है, जिसका आधार अनुच्छेद 81 है। दूसरी धारणा कहती है कि प्रतिनिधित्व समुदायों और राज्यों का भी होता है। संघ केवल व्यक्तियों का ढेर नहीं, राज्यों का संघ है। किसी राज्य का हित है कि बड़े राज्य उसे हमेशा के लिए वोट से दबा न दें। यह संघीय तर्क है। इसी कारण राज्यसभा बनी और 1976 की रोक इतने समय तक स्वीकार हुई। भारत ने इन दोनों में से एक को नहीं चुना। उसने लोकसभा को पहले और संघीय ढाँचे को दूसरे तर्क पर बनाया। रोक ने लंबे समय तक यह छिपाए रखा कि दोनों अलग दिशाओं में खींचते हैं।
131वें संशोधन की हार वही क्षण है जब देश को यह टकराव देखना पड़ा। सरकार का प्रस्ताव सावधान बीच का रास्ता था। उसने अधिकतम संख्या 550 से बढ़ाकर करीब 850 करने और सभी राज्यों की सीटें लगभग 50% बढ़ाने का प्रस्ताव दिया। इससे उत्तर प्रदेश 80 से 120 और तमिलनाडु 39 से 59 पर जाता। हर राज्य को कुल सीटें ज़्यादा मिलतीं, लेकिन दक्षिण का हिस्सा घटता। अनुपातिक परिसीमन का इससे नरम रूप मुश्किल है, फिर भी इसे दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। सबक यह नहीं कि हिसाब ख़राब था। कोई केवल संख्याओं वाला हल सहमति नहीं बना सकता, क्योंकि आपत्ति गणित पर नहीं बल्कि उससे होने वाले सापेक्ष ताक़त के बदलाव पर है।
भावी प्रशासक के लिए इससे भी गहरा सवाल है। कार्रवाई का सबसे मज़बूत तर्क यह है कि जमा हुआ प्रतिनिधित्व समय के साथ अलोकतांत्रिक होता जाता है। सावधानी का सबसे मज़बूत तर्क यह है कि संघ में क्षेत्रों की अपनी ताक़त घटने पर उनकी सहमति चाहिए। कोई पक्ष बेतुका नहीं। कार्नेगी के लेखकों का निष्कर्ष है कि भविष्य के किसी भी पुनर्बँटवारे के लिए एक सरकार के साधारण बहुमत से कहीं व्यापक और टिकाऊ राजनीतिक सहमति चाहिए। इसलिए 17 अप्रैल का वोट केवल विधेयक की हार नहीं था। व्यवस्था ने बताया कि सहमति अभी मौजूद नहीं है और चतुर सीट-सूत्र उसे बनाने की जगह नहीं ले सकता।
इससे समस्या का अर्थ बदल जाता है। परिसीमन का कठिन हिस्सा कभी स्प्रेडशीट नहीं था। कठिन हिस्सा हमेशा भरोसा था।
क्या किया जाना चाहिए?
बचाव योग्य रास्ता न तो रोक बढ़ाकर उम्मीद करने का है, न कच्ची आबादी पर सीटें बाँटकर दक्षिण को चुनौती देने का। दोनों जिम्मेदारी से बचना है। नीचे क्रमबद्ध रास्ता है। हर कदम केवल संख्या बदलने के बजाय सहमति बनाने पर केंद्रित है।
- सदन इतना बढ़ाएँ कि किसी राज्य की कुल सीट न घटे। किसी कामचलाऊ समझौते की पहली शर्त यही है। मिलन वैष्णव और जेमी हिंटसन (Jamie Hintson) ने 2019 में हिसाब लगाया था कि करीब 848 सदस्यों की लोकसभा बिना किसी राज्य की सीट घटाए अनुपात बहाल कर सकती है। हारे हुए विधेयक की 850 की सीमा का लक्ष्य भी लगभग यही था। तेज़ी से बढ़ा राज्य अधिक पाए, धीमे बढ़ा राज्य अपनी संख्या रखे। तब झगड़ा “किसकी सीटें घटेंगी” से “किसे कम बढ़ोतरी मिलेगी” पर आ जाता है, जिसे हल करना आसान है। इसे महिला आरक्षण की समयरेखा से ईमानदारी से जोड़ें, क्योंकि फैसला हुए बिना 33% आरक्षण शुरू नहीं हो सकता।
- सख़्त प्रति-व्यक्ति बराबरी के बजाय घटते अनुपात वाला प्रतिनिधित्व (degressive proportionality) अपनाएँ। यूरोपीय संसद की व्यवस्था से सीखें। अधिक आबादी वाले राज्य को अधिक सीटें मिलें, लेकिन हर अगली बढ़ोतरी पर लाभ घटता जाए, ताकि छोटे राज्य जानबूझकर कुछ अधिक प्रतिनिधित्व पाएँ। आसान शब्दों में, बड़े राज्य को उसकी हर अतिरिक्त दस लाख आबादी पर एक-के-बदले-एक सीट न मिले। कार्नेगी के लेखक यही विकल्प और न्यूनतम-सीट के बाद अनुपातिक बँटवारे (floor-plus-proportionality) का मॉडल सुझाते हैं। इसमें हर राज्य को पहले आधार संख्या मिलती है, फिर बची सीटें आबादी से बँटती हैं। इससे अनुच्छेद 81 का सम्मान होता है और संघ कुचला नहीं जाता।
- राज्यसभा के जरिए संतुलन बनाएँ। निचला सदन आबादी की ओर बढ़ता है तो ऊपरी सदन को असली संघीय सदन की तरह मज़बूत करें। संरचनात्मक संतुलन के लिए इसे अमेरिकी सीनेट में राज्यों के बराबर प्रतिनिधित्व के कुछ करीब लाया जा सकता है। लोगों को दिखाने वाली लोकसभा और राज्यों को बचाने वाली राज्यसभा मिलकर प्रतिनिधित्व की दोनों धारणाओं का सम्मान करेंगी। इसे भारत में संघवाद के साथ पढ़ें। यह सबसे साफ़ संवैधानिक संतुलन है।
- वित्त आयोग से पैसे वाली शिकायत की भरपाई करें। सीट और कर-हिस्से की चिंता एक ही आबादी वाले स्रोत से आती है, इसलिए दोनों को साथ देखें। कर-बँटवारे के मानकों में “आबादी के बेहतर प्रबंधन” (demographic performance) को वज़न दें, ताकि आबादी काबू करने वाला राज्य एक ही दशक में सीट और केंद्रीय रकम दोनों न खोए। पैसे का डर घटेगा तो सीटों वाली बहस की गर्मी भी कम होगी।
- परिसीमन आयोग को साफ़ तौर पर सभी पक्षों वाला बनाएँ। केवल तकनीकी विशेषज्ञों के बजाय क्षेत्रीय दलों और नागरिक समाज को प्रक्रिया में शामिल करें, ताकि इसे केंद्र की बनाई काट-छाँट न कहा जा सके। अप्रैल की हार ने साबित किया कि असली रुकावट गणित नहीं, वैधता है। इसलिए पहले दिन से प्रक्रिया में वैधता जोड़ें।
- क्रम बनाकर धैर्य रखें। “2026 के बाद पहली जनगणना” को बातचीत की शुरुआत मानें, दौड़ की बंदूक नहीं। कार्नेगी का निष्कर्ष भी है कि टिकाऊ समझौते के लिए व्यापक सहमति चाहिए। ईमानदार रास्ता मानता है कि यह कई साल की राजनीतिक परियोजना है। जल्दबाज़ी में बहुमत से धकेलना, जैसा अभी नाकाम हुआ, काम को आगे नहीं बल्कि पीछे ले जाएगा।
मुख्य परीक्षा के उत्तर के लिए
यह GS2 का पक्का विषय है। संविधान, संघवाद, संसद की संरचना, वित्तीय बँटवारा और महिला प्रतिनिधित्व यहाँ एक साथ आते हैं। इसलिए अच्छी तरह बनाया एक उत्तर कई तरह के सवालों में काम आ सकता है।
GS प्रश्नपत्र में जगह: GS2: भारतीय संविधान की विशेषताएँ, अहम प्रावधान और संशोधन; संघ और राज्यों के काम तथा जिम्मेदारियाँ; संघीय ढाँचे की चुनौतियाँ; संसद की संरचना और कामकाज; शक्तियों और वित्त का बँटवारा।
संभावित सवाल:
- “आबादी पर आधारित परिसीमन और संघीय संतुलन, दोनों संवैधानिक मूल्य हैं जो एक-दूसरे के विरुद्ध खिंच सकते हैं।” संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 की हार के संदर्भ में जाँच कीजिए।
- 1971 की सीट रोक एक अस्थायी उपाय था जो संरचनात्मक विशेषता बन गया। इसे हटाने के पक्ष और विपक्ष का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
- अनुच्छेद 334A के तहत परिसीमन और महिला आरक्षण का जुड़ाव प्रतिनिधित्व की बहस को कैसे मुश्किल बनाता है? चर्चा कीजिए।
लिखने योग्य आँकड़े:
- लोकसभा की 543 निर्वाचित सीटें अब भी 1971 की जनगणना पर बँटी हैं। 42वें संशोधन (1976) ने इन्हें रोका और 84वें (2001) ने रोक “2026 के बाद पहली जनगणना” तक बढ़ाई।
- लोकसभा का करीब 8% प्रतिनिधित्व, यानी 543 में लगभग 44 सीटें, इस समय राज्यों के बीच ग़लत जगह बँटी हैं।
- उत्तर प्रदेश में एक सांसद करीब 30 लाख, जबकि केरल में करीब 17.5 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।
- 543 सीट कायम रखकर 2011 की जनगणना पर पुनर्बँटवारे के एक अनुमान में: उत्तर प्रदेश +11, बिहार +10, तमिलनाडु −8 और केरल −8; दक्षिणी राज्यों को कुल 27 सीटें कम।
- सदन में दक्षिण का हिस्सा करीब 24% से घटकर 20% से नीचे आ जाएगा।
- कुल प्रजनन दर (TFR) का अंतर: बिहार 3.0, केरल और तमिलनाडु 1.8, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक 1.7; राष्ट्रीय TFR 2.0, जो 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है।
- संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 को 17 अप्रैल 2026 को पक्ष में 298 वोट मिले। यह अनुच्छेद 368 के दो-तिहाई स्तर से कम था और इस सरकार के तहत गिरने वाला पहला ऐसा संशोधन बना।
- अनुच्छेद 334A के कारण 33% महिला आरक्षण (106वाँ संशोधन, 2023) 2026 के बाद की जनगणना पर परिसीमन होने तक लागू नहीं हो सकता।
मुख्य शब्द: एक व्यक्ति-एक वोट-एक मूल्य, जनसंख्या के अनुपात से कम प्रतिनिधित्व, सीट रोक, अनुच्छेद 81, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, अनुच्छेद 334A, अनुच्छेद 368, घटते अनुपात वाला प्रतिनिधित्व, न्यूनतम-सीट के बाद अनुपातिक बँटवारा, संघीय न्याय, आबादी के बेहतर प्रबंधन।
पाठ्यक्रम से जुड़ाव: संविधान की मुख्य विशेषताएँ और संशोधन; संसद और राज्य विधानमंडल; संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध; वित्त और वित्त आयोग के जरिए बँटवारा; महिलाओं का प्रतिनिधित्व।
संतुलित निष्कर्ष: जमा हुआ सदन तेज़ी से बढ़ते राज्य के नागरिक के वोट को चुपचाप कमज़ोर करता है, लेकिन दक्षिण की सहमति के बिना थोपा पुनर्बँटवारा संघ के एक पूरे क्षेत्र की आवाज़ कमज़ोर करता है। संविधान के सामने बराबर वोट और संघीय समझौते, दोनों को एक साथ बचाने की जिम्मेदारी है। इसलिए हल किसी एक विजयी बहुमत में नहीं, बल्कि सदन बढ़ाने, घटते अनुपात वाले सूत्र और मज़बूत राज्यसभा में है।
उत्तर कैसे बनाएँ?
परिभाषा से नहीं, मूल्यों के टकराव से शुरू करें। पहली पंक्ति में दिखना चाहिए कि बराबर वोट और संघीय न्याय, दोनों अच्छी चीज़ें हैं लेकिन सचमुच तनाव में हैं। दूसरी पंक्ति में परिसीमन और 1971 की सीट रोक परिभाषित करें। शब्दकोश जैसा आरंभ बताता है कि आपने याद किया है; तनाव वाला आरंभ बताता है कि आपने समझा है।
आँकड़े जल्दी लाएँ, लेकिन अनुशासन से। एक मज़बूत अनुच्छेद में 8% ग़लत बँटवारा, 30 लाख बनाम 17.5 लाख प्रति सांसद और सीटों का एक अनुमान रख सकते हैं। फिर बताएँ कि वे क्या साबित करते हैं। संख्या आधार है, उससे निकला मतलब अंक दिलाता है।
जिस पक्ष का अंत में समर्थन नहीं करेंगे, उसका सबसे मज़बूत रूप भी रखें। परिसीमन का समर्थन करते हैं तो पहले TFR के अंतर से समझाएँ कि दक्षिण का “सफलता की सज़ा” वाला डर जायज़ क्यों है। सावधानी का समर्थन करते हैं तो पहले मानें कि जमी हुई व्यवस्था असली नागरिकों के वोट का वज़न घटाती है। इससे उत्तर संतुलित लगेगा, बचता हुआ नहीं।
आगे का रास्ता समूहों में रखें। सदन बढ़ाना, घटते अनुपात या न्यूनतम-सीट वाला सूत्र, राज्यसभा में संतुलन और वित्त आयोग से भरपाई, इन चार समूहों में सुधार रखें और हर एक के साथ जिम्मेदार संस्था जोड़ें। अनुच्छेद 81, अनुच्छेद 334A और घटते अनुपात वाला प्रतिनिधित्व जैसे विषय के अपने शब्द इस्तेमाल करें। तब उत्तर संवैधानिक विश्लेषण लगेगा, समाचार का सार नहीं।
आम गलतियों से बचें
- किसी एक पक्ष को नायक न बनाएँ। एकतरफ़ा उत्तर यहाँ अंक खोता है। बराबर वोट और संघीय दावे, दोनों को जायज़ मानने में ही अच्छे अंक हैं।
- “उत्तर प्रदेश +21” को अकेले उत्तर प्रदेश का आँकड़ा न लिखें। समाचारों में यह संख्या उत्तर प्रदेश और बिहार को जोड़कर है। राज्यवार लिखना हो तो “उत्तर प्रदेश +11, बिहार +10” लिखें।
- अनुमान को फैसला न बताएँ। परिसीमन आयोग ने राज्यवार संख्या जारी नहीं की है। हर सीट संख्या विद्वानों या समाचार का अनुमान है, इसलिए स्रोत या परिदृश्य बताएँ।
- महिला आरक्षण न भूलें। कई अभ्यर्थी चूक जाते हैं कि अनुच्छेद 334A ने 33% आरक्षण को परिसीमन से बाँध रखा है। यह कड़ी लिखने से उत्तर का दायरा दिखता है।
- नारे पर खत्म न करें। निष्कर्ष बराबर वोट और संघीय समझौते के दोहरे संवैधानिक सिद्धांत पर हो, केवल आकर्षक पंक्ति पर नहीं।
उत्तर का छोटा ढाँचा
- परिचय: बराबर वोट बनाम संघीय न्याय के तनाव से शुरू करें; अगली पंक्ति में परिसीमन और 1971 की रोक समझाएँ।
- सबूत: स्रोत के साथ दो या तीन आँकड़े दें: 8% ग़लत बँटवारा, प्रति सांसद आबादी का अंतर और एक सीट अनुमान। हर आँकड़े का असर भी बताएँ।
- तर्क: पहले आबादी पर परिसीमन का पक्ष, यानी अनुच्छेद 81 की मूल व्यवस्था, असली गड़बड़ी और अटका महिला आरक्षण। फिर संघीय संतुलन बचाने का पक्ष, यानी सफलता की सज़ा, क्षेत्रीय रोक की ताक़त और वित्तीय शिकायत।
- संरचनात्मक पहचान: लोगों और राज्यों के प्रतिनिधित्व की दो धारणाएँ एक ही संविधान में हैं। असली सीमा गणित नहीं, सहमति है।
- आगे का रास्ता: किसी राज्य की सीट घटाए बिना सदन बढ़ाना, घटते अनुपात या न्यूनतम-सीट वाला सूत्र, राज्यसभा में संतुलन, वित्त आयोग से भरपाई और सबको साथ लेने वाला परिसीमन आयोग।
- निष्कर्ष: संतुलित निष्कर्ष को सवाल के सही शब्दों के मुताबिक ढालें।
आरेख या प्रवाह-चित्र का विचार
15 अंक के सवाल में यह कारण-श्रृंखला बनाएँ: 1971 जनगणना पर रोक (42वाँ, 84वाँ संशोधन) → आबादी की अलग बढ़त (बिहार +215%, केरल +70%) → जनसंख्या के अनुपात से कम प्रतिनिधित्व (करीब 44 सीटें, उत्तर प्रदेश में 30 लाख बनाम केरल में 17.5 लाख प्रति सांसद) → प्रस्तावित पुनर्बँटवारा → उत्तर को लाभ, दक्षिण का हिस्सा कम → संघीय विरोध → 131वाँ संशोधन पराजित। परीक्षक एक नज़र में पूरा तर्क पढ़ लेगा।
10 अंक के सवाल में श्रृंखला छोड़कर दो कॉलम की तालिका बनाएँ: “बराबर वोट (अनुच्छेद 81)” के सामने “संघीय न्याय (1971 की रोक का तर्क)”, दोनों में दो-दो पंक्तियाँ। इसे जाँचना तेज़ है और संतुलन तुरंत दिखता है।
नैतिकता और शासन का पहलू
GS2 के उत्तर में भी एक पंक्ति लिखें कि कीमत कौन चुकाता है। यहाँ एक नहीं, दो चेहरे हैं: उत्तर प्रदेश या बिहार के कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्र का मतदाता, जिसके वोट का वज़न कम है; और दक्षिण का नागरिक, जिसे अपने क्षेत्र की सौदेबाज़ी की ताक़त वोट से खत्म होने का डर है। परिपक्व उत्तर किसी एक को पीड़ित चुनने के बजाय दोनों को नाम देता है।
फिर संवेदना को व्यवस्था में बदलें। केवल “हितों में संतुलन” न लिखें। तरीका बताएँ: सदन बढ़ाएँ ताकि नुकसान सापेक्ष हो, वास्तविक नहीं; कर-बँटवारे के मानकों से वित्तीय चोट की भरपाई करें; क्षेत्रीय दलों को परिसीमन आयोग में जगह दें ताकि प्रक्रिया थोपी हुई नहीं, सबकी अपनी लगे। यही नैतिक भाषा को प्रशासनिक समझ में बदलता है।
काम आने वाली पंक्ति है: “उद्देश्य संवैधानिक रूप से सही है, लेकिन उसकी वैधता सहमति, सही क्रम और संघीय भरोसे पर निर्भर है।” यह मानती है कि परिसीमन आखिर होना है, लेकिन केंद्र को उसे जबरन लागू करने की खुली छूट नहीं देती।
आँकड़े यांत्रिक लगे बिना कैसे लिखें?
जितने आँकड़े जानते हैं, उनसे कम इस्तेमाल करें। एक पैमाना लें, जैसे 8% सीटें ग़लत बँटी हैं; एक अंतर लें, जैसे उत्तर प्रदेश में 30 लाख बनाम केरल में 17.5 लाख प्रति सांसद; और एक नतीजा लें, जैसे दक्षिण को कुल 27 सीटें कम। हर एक का अर्थ समझाएँ। एक पैमाना, एक अंतर और एक परिणाम आम तौर पर काफ़ी हैं।
आँकड़ा अकेला न छोड़ें। उसके बाद लिखें “इसका मतलब है” या “इसका असर होगा”। अकेली संख्या तथ्य-पत्र है; संख्या के साथ निकला अर्थ विश्लेषण है। सीट अनुमान के पीछे का परिदृश्य हमेशा बताएँ, क्योंकि वही पुनर्बँटवारा 543 सीटों पर कठोर और 850 पर नरम दिखता है।
अंत में जाँचें कि थका हुआ परीक्षक इसे एक बार में समझ पाएगा या नहीं। छोटा परिचय, आँकड़े जल्दी, दोनों पक्ष साफ़ और आगे का रास्ता समूह में। UPSC में स्पष्टता ही गहराई को दिखाती है। प्रभावशाली लगने लेकिन कुछ साबित न करने वाली पंक्ति हटाएँ और उसकी जगह तथ्य, कारण या सुधार रखें।
सामान्य प्रश्न
एक पंक्ति में परिसीमन क्या है?
अनुच्छेद 81, 82 और 170 के तहत ताज़ा जनगणना के आधार पर लोकसभा तथा विधानसभा सीटों को राज्यों में दोबारा बाँटना और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ फिर खींचना परिसीमन है। आबादी बदलती है तो सीटों का बँटवारा भी बदलता है।
लोकसभा की सीटें अब भी 1971 की जनगणना पर क्यों रुकी हैं?
1976 के 42वें संशोधन ने हर राज्य की सीटें 1971 की जनगणना पर इसलिए रोक दीं कि परिवार नियोजन में सफल राज्य सीटें न खोएँ। 2001 के 84वें संशोधन ने रोक “2026 के बाद पहली जनगणना” तक बढ़ा दी। इसलिए राज्यों के बीच सीटों की संख्या 1971 के आँकड़ों पर है, भले निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ 2001 के आँकड़ों पर बदली गईं।
अप्रैल 2026 में 131वाँ संशोधन विधेयक क्यों गिरा?
पक्ष में 298 वोट पड़े, जो संविधान संशोधन के लिए अनुच्छेद 368 के तहत ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत से कम थे। मोदी सरकार का कोई संविधान संशोधन पहली बार गिरा। विधेयक लोकसभा की सीमा करीब 850 करता, बँटवारा 2011 की जनगणना पर लाता और महिला आरक्षण लागू करता। लेकिन उत्तर की ओर सापेक्ष ताक़त जाने पर राजनीतिक सहमति नहीं बनी।
महिला आरक्षण परिसीमन से कैसे जुड़ा है?
2023 का 106वाँ संशोधन लोकसभा और विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करता है, लेकिन अनुच्छेद 334A इसे 2026 के बाद पहली जनगणना पर आधारित परिसीमन के बाद ही लागू करता है। इसलिए परिसीमन पर रोक रहने तक 33% महिला आरक्षण शुरू नहीं हो सकता।