नोट्स बनाने की बात छेड़ दीजिए, किसी भी अभ्यर्थी-समूह में दो खेमे बन जाएँगे। एक खेमा सब कुछ हाथ से लिखता है और कहता है कि लिखने से चीज़ें दिमाग़ में बैठ जाती हैं। दूसरा खेमा सब कुछ ऐप में रखता है, जहाँ हर चीज़ खोजी जा सकती है, और गिनाता है कि पहला खेमा नक़ल उतारने में कितने घंटे गँवा देता है।
दोनों सही हैं। बहस इसलिए ख़त्म नहीं होती क्योंकि सवाल ही ग़लत पूछा जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि हाथ से लिखने से फ़ायदा होता है या नहीं। होता है। सवाल यह है कि हाथ से लिखने में जो समय लगता है, वह किस सामग्री पर लगाना बनता है। और इसका जवाब उससे कहीं छोटा है, जितना ज़्यादातर लोगों की कॉपियाँ बताती हैं।
हाथ से लिखना असल में करता क्या है
फ़ायदा असली है, और वह एक मजबूरी से आता है। आप उतनी तेज़ लिख नहीं सकते जितनी तेज़ पढ़ या टाइप कर सकते हैं। इसलिए आपको छाँटना पड़ता है। क्या ज़रूरी है, क्या छोड़ देना है, और बात को अपने शब्दों में कैसे कहना है। यही छाँटना सीखना है। कॉपी तो बस उसका बचा हुआ हिस्सा है।
टाइप करने में यह मजबूरी नहीं रहती। रफ़्तार इतनी होती है कि आप बिना कुछ तय किए उतारते चले जाते हैं। इसीलिए टाइप किए नोट्स अक्सर किताब की दूसरी कॉपी बन जाते हैं। पूरे, साफ़-सुथरे और रिवीज़न के लिए लगभग बेकार, क्योंकि उनमें कुछ भी सोचा-समझा नहीं गया।
तो हाथ से लिखने का फ़ायदा लिखाई में नहीं है। वह उस छँटाई में है जो धीमी रफ़्तार आप पर थोपती है। जो भी तरीक़ा वही छँटाई करवा दे, वही फ़ायदा देगा।
वह लागत जिसका हिसाब कोई नहीं लगाता
यह गणित अभ्यर्थी छोड़ जाते हैं।
पॉलिटी की एक मानक किताब क़रीब 700 पन्नों की होती है। असली रफ़्तार से उस पर हाथ से नोट्स बनाना, यानी पढ़ना, तय करना, छाँटना, फिर लिखना, इसमें 60 से 120 घंटे लगते हैं। यही काम पॉलिटी, अर्थव्यवस्था, भूगोल, इतिहास, पर्यावरण, समाज और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए कीजिए। साल का बड़ा हिस्सा काग़ज़ तैयार करने में निकल जाएगा।
यह अपने आप में ग़लत नहीं है। ग़लत तब है जब सामग्री को इसकी ज़रूरत ही नहीं थी। और ज़्यादातर सामग्री को नहीं होती।
नियम: वही हाथ से लिखिए जिसे आपको दोबारा खड़ा करना है
जो कुछ भी आप पढ़ते हैं, उसे दो हिस्सों में बाँट लीजिए।
वह सामग्री जिसे आपको दोबारा खड़ा करना है। मुख्य परीक्षा के उत्तर में बनाए जाने वाले तर्क, कारण-और-नतीजे की कड़ियाँ, तुलनाएँ, ढाँचे, और हर वह चीज़ जिसका ढाँचा आपको समय के दबाव में गढ़ना पड़ेगा। यहाँ हाथ से लिखना अपनी क़ीमत वसूल कर लेता है, क्योंकि छाँटना ही वह हुनर है जिसकी आप प्रैक्टिस कर रहे हैं।
वह सामग्री जिसे आपको सिर्फ़ पहचानना है। संधियाँ और उनके साल, प्रजातियाँ और उनका दर्जा, अनुच्छेद और उनमें क्या लिखा है, योजनाएँ और उनके मंत्रालय, घाटे की परिभाषाएँ, RBI की सुविधाएँ। यह याद रखने का मामला है। इसे हाथ से लिखना धीमा है और एक अच्छी बनी तालिका या फ़्लैशकार्ड के मुक़ाबले कुछ ख़ास नहीं देता।
लगभग हर कोई यह बात उलटी कर देता है। अभ्यर्थी तथ्यों की सूचियाँ हाथ से लिखते हैं, क्योंकि वही “नोट्स” जैसी लगती हैं, और तर्क वाली सामग्री यूँ ही पढ़ जाते हैं, क्योंकि वह समझ में आती हुई लगती है। नतीजा एक ख़ूबसूरत कॉपी है, जिसमें वे चीज़ें भरी हैं जिन्हें एक तालिका बेहतर सँभाल लेती, और तर्क गढ़ने का कोई अभ्यास नहीं है।
हमारा PYQ विश्लेषण इस बँटवारे को साफ़ कर देता है। प्रीलिम्स लगभग पूरी तरह पहचान का पेपर है। संधियों, संस्थाओं, प्रजातियों और प्रावधानों पर 1,403 सवाल। मुख्य परीक्षा दोबारा खड़ा करने का पेपर है। हाथ से लिखना मुख्य परीक्षा का औज़ार है, जिसे ज़्यादातर लोग प्रीलिम्स की सामग्री पर चला देते हैं।
हाथ से लिखे नोट्स कब साफ़ तौर पर फ़ायदे का सौदा हैं
- मुख्य परीक्षा के उत्तर-ढाँचे। वे चार-पाँच ढाँचे जो आप एक पूरे विषय में बार-बार इस्तेमाल करेंगे। उन्हें बार-बार हाथ से लिखना ही उन्हें अपने-आप आने लायक़ बनाता है।
- हर वह चीज़ जो आप पहले ग़लत कर चुके हैं। जो ग़लती आप हाथ से लिखकर सुधारते हैं, वह सुधरी ही रहती है।
- नैतिकता के केस स्टडी के ढाँचे। GS-4 का 47% हिस्सा केस स्टडी है, और यह ढाँचा बिना सोचे आ जाना चाहिए।
- आरेख और नक़्शे। किसी प्रक्रिया या इलाक़े को हाथ से बनाना उसे सीखने का सबसे तेज़ तरीक़ा भी है और उत्तर-पुस्तिका की सीधी प्रैक्टिस भी।
- आख़िरी महीने का निचोड़। हर विषय का एक पन्ना, याद से लिखा हुआ, फिर जाँचा हुआ। पूरी तैयारी में हाथ से लिखने का यह सबसे क़ीमती अभ्यास है।
कब यह जाल बन जाता है
- किसी भी चीज़ की पहली पढ़ाई। तब आपको पता ही नहीं होता कि क्या ज़रूरी है, इसलिए आप नक़ल उतारेंगे। पहले पढ़िए, नोट्स बाद में। हमेशा।
- तथ्यों की जमी-जमाई सूचियाँ। तालिका गद्य से बेहतर है, और टाइप की हुई तालिका हाथ की तालिका से बेहतर है, क्योंकि आप उसमें बदलाव करते रहेंगे।
- करेंट अफ़ेयर्स। मात्रा बहुत ज़्यादा है और उम्र बहुत कम। देखिए करेंट अफ़ेयर्स के नोट्स कैसे बनाएँ।
- हर वह चीज़ जिसे आपको ढूँढ़ना पड़ेगा। हाथ की लिखाई में खोज नहीं चलती, और आठवें महीने तक आपको याद नहीं रहेगा कि कौन-सी बात किस कॉपी में है।
- किसी मानक किताब की नक़ल। अगर आपके नोट्स किताब के अध्यायों के क्रम में चलते हैं, तो आपने नोट्स नहीं बनाए, नक़ल उतारी है।
एक चलने लायक़ मिला-जुला तरीक़ा
ज़्यादातर कामयाब तैयारियाँ घूम-फिरकर इसी पर आती हैं।
टाइप या तालिका में: तथ्यों की सूचियाँ, तुलनाएँ, संधियाँ, योजनाएँ, आँकड़े, हर वह चीज़ जिसमें आप बार-बार बदलाव करेंगे, और हर वह चीज़ जिसे आपको ढूँढ़ना पड़ेगा।
हाथ से: उत्तर-ढाँचे, नैतिकता के ढाँचे, आरेख और नक़्शे, ग़लतियों का रिकॉर्ड, और आख़िर में हर विषय के एक पन्ने वाला निचोड़।
दोनों में से कुछ नहीं: पहली पढ़ाई। पढ़िए, समझिए, और उसके बाद ही तय कीजिए कि इसका नोट बनना भी चाहिए या नहीं। जो आप पढ़ते हैं उसका बड़ा हिस्सा किसी नोट का मोहताज नहीं होता। उसे बस बाद में एक बार और पढ़ा जाना होता है।
जो नोट आप बनाने जा रहे हैं, उसकी कसौटी आसान है: क्या मैं इसे सच में दोबारा खोलूँगा? अगर ईमानदार जवाब ना है, तो आप नोट्स नहीं बना रहे, पढ़ाई का नाटक कर रहे हैं। पूरा तरीक़ा UPSC नोट-मेकिंग रणनीति में है।
किसी और के हाथ से लिखे नोट्स ख़रीदने पर
टॉपर्स की स्कैन की हुई कॉपियों का बड़ा बाज़ार है, और उसकी कशिश साफ़ है। छँटाई तो पहले ही हो चुकी है।
दिक़्क़त ठीक यही है। छँटाई ही सीखना था, और वह किसी और के दिमाग़ में हुआ। आपके हाथ जो आता है वह बचा-खुचा है। अधूरे इशारे, छोटे किए हुए शब्द, और ऐसी तरतीब जो उस व्यक्ति की पहले से मालूम बातों और उसकी अपनी मुश्किलों के हिसाब से बनी थी। जिन हिस्सों को उसने सबसे ज़्यादा दबाकर लिखा, वही हिस्से उसे सबसे अच्छे समझ आते थे। और अक्सर वही हिस्से होते हैं जो आपको सबसे कम समझ आते हैं।
इनका एक जायज़ मगर बहुत छोटा इस्तेमाल है। ढाँचे की जाँच के तौर पर, यह देखने के लिए कि एक अनुभवी अभ्यर्थी ने विषय को कैसे जमाया था, इससे पहले कि आप उसे ख़ुद जमाएँ। पढ़ने की सामग्री के तौर पर ये सबसे कम काम की चीज़ों में हैं। इस पर विस्तार से टॉपर्स के हाथ से लिखे नोट्स में लिखा है।
सामान्य प्रश्न
क्या UPSC के लिए हाथ से लिखे नोट्स ज़रूरी हैं? नहीं। बहुत से चयनित उम्मीदवार लगभग पूरा काम डिजिटल तरीक़े से करते हैं। ज़रूरी चीज़ छँटाई है, यानी यह तय करना कि क्या मायने रखता है और उसे अपने शब्दों में दोबारा कहना। हाथ से लिखना उसे करवाने का एक तरीक़ा है, इकलौता नहीं।
क्या UPSC के लिए हाथ के नोट्स डिजिटल नोट्स से बेहतर हैं? जिस सामग्री को आपको परीक्षा में दोबारा खड़ा करना है, यानी तर्क, ढाँचे और आरेख, उसके लिए हाथ से लिखना आम तौर पर बेहतर है। जिसे सिर्फ़ पहचानना है, और जिसमें बदलाव या खोज करनी है, उसके लिए डिजिटल बेहतर है। दोनों इस्तेमाल कीजिए, अलग-अलग सामग्री पर।
UPSC के लिए हाथ से नोट्स बनाने में कितना समय लगता है? अगर आप एक मानक किताब पर पूरे नोट्स बनाएँ तो हर बड़े विषय पर सच में 60 से 120 घंटे। यही गणित इस बात का सबसे मज़बूत तर्क है कि नोट्स चुन-चुनकर बनाइए, पूरे नहीं।
क्या मुझे टॉपर्स के हाथ से लिखे नोट्स ख़रीदने चाहिए? ढाँचे की मिसाल के तौर पर वे काम आ सकते हैं। पढ़ने की सामग्री के तौर पर वे बेकार हैं, क्योंकि जिस छँटाई ने उन्हें क़ीमती बनाया वह किसी और के दिमाग़ में हुई और उनके इशारे उसी की पहले से मालूम बातों के हिसाब से बने हैं।
UPSC के लिए नोट्स कब बनाने शुरू करूँ? किसी टॉपिक को एक बार पढ़ लेने के बाद, पढ़ते वक़्त नहीं। पढ़ने से पहले आप बता ही नहीं सकते कि किस बात का नोट बनना चाहिए, इसलिए पहली पढ़ाई के नोट्स लगभग हमेशा नक़ल बन जाते हैं।
क्या हाथ के नोट्स प्रीलिम्स से ज़्यादा मुख्य परीक्षा में काम आते हैं? हाँ। मुख्य परीक्षा दोबारा खड़ा करने पर नंबर देती है, और हाथ से लिखना यही सिखाता है। प्रीलिम्स पहचान पर नंबर देती है, जिसके लिए तालिकाएँ और फ़्लैशकार्ड ज़्यादा कारगर हैं।