Opens in a new tab
Join Anantam IAS Channel on Telegram

अपठित गद्यांश और बोध प्रश्न: हल करने की तकनीक, उदाहरण और अभ्यास

अपठित गद्यांश और बोध प्रश्न हल करने की चरणवार विधि: पढ़ने का तरीका, प्रश्नों के छह प्रकार, अपने शब्दों में उत्तर के नियम, हल किए उदाहरण और अभ्यास, उत्तर-संकेत सहित।

पठित अंश पर बोध प्रश्न: तकनीक — featured image

बोध प्रश्न अनिवार्य हिंदी का वह खंड है जो रटने से नहीं, समझने से हल होता है। UPSC मुख्य परीक्षा के अनिवार्य हिंदी प्रश्नपत्र में जो गद्यांश दिया जाता है, वह अपठित गद्यांश होता है, यानी ऐसा अंश जो किसी तय किताब से नहीं लिया जाता और जिसे आपने पहले नहीं पढ़ा होता। उसी के आधार पर चार-पाँच प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनके उत्तर अभ्यर्थी को अपनी भाषा में, गद्यांश की सीमा में रहते हुए देने होते हैं। ‘बोध’ शब्द का अर्थ ही है समझ; इसलिए यह खंड असल में आपकी पढ़ने की क्षमता, भाव पकड़ने और कम शब्दों में सटीक उत्तर देने की योग्यता को एक साथ परखता है।

परीक्षा-दृष्टि से यह खंड दोहरे लाभ का है। एक ओर इसमें अंक अपेक्षाकृत निश्चित होते हैं — उत्तर गद्यांश में ही उपस्थित रहता है, बस उसे पहचानकर अपनी भाषा में ढालना होता है; दूसरी ओर यही अभ्यास निबंध, संक्षेपण और पत्र-लेखन की नींव भी मजबूत करता है, क्योंकि तीनों में मूल कौशल एक ही है — पढ़े हुए को समझकर सुगठित भाषा में प्रस्तुत करना। यही कारण है कि बोध प्रश्न का नियमित अभ्यास पूरे प्रश्नपत्र में सबसे अधिक प्रतिफल देता है।

बोध प्रश्न क्या है — पठित और अपठित का अंतर

बोध प्रश्न वे प्रश्न हैं जो किसी गद्यांश (कभी-कभी पद्यांश) को पढ़कर उसकी समझ के आधार पर पूछे जाते हैं। अंग्रेज़ी में इसे Reading Comprehension कहते हैं। प्रश्न मुख्यतः दो प्रकार के गद्यांशों पर आधारित होते हैं —

  • पठित अंश — वह गद्यांश जो पाठ्यक्रम की निर्धारित पुस्तक से लिया गया हो, अर्थात् जिसे अभ्यर्थी ने पहले पढ़ रखा है। यहाँ संदर्भ और प्रसंग का ज्ञान सहायक होता है।
  • अपठित अंश — वह गद्यांश जो पाठ्यक्रम के बाहर का, पूर्णतः नया हो। यहाँ अभ्यर्थी का संपूर्ण आधार वही गद्यांश है जो सामने रखा गया है; बाहरी जानकारी का उपयोग प्रायः वर्जित रहता है।

दोनों में मूल तकनीक एक ही रहती है, अंतर केवल इतना है कि अपठित अंश में पूरी समझ उसी गद्यांश से बनानी पड़ती है। एक नियम सदैव याद रखें — उत्तर का स्रोत गद्यांश ही है, आपकी सामान्य जानकारी नहीं। यदि कोई बात गद्यांश में नहीं कही गई, तो उसे उत्तर में जोड़ना त्रुटि है, भले ही वह वस्तुतः सही हो।

बोध प्रश्नों के प्रकार

बोध प्रश्न देखने में भिन्न लगते हैं, पर वस्तुतः कुछ निश्चित श्रेणियों में ही आते हैं। प्रत्येक श्रेणी की पहचान और उत्तर-विधि अलग होती है। नीचे की तालिका इन प्रकारों को एक दृष्टि में प्रस्तुत करती है।

प्रकारप्रश्न क्या माँगता हैउत्तर की विधिप्रश्न का नमूना संकेत
तथ्यात्मकगद्यांश में सीधे दिया तथ्यसीधे ढूँढकर अपनी भाषा में‘लेखक के अनुसार … क्या है?’, ‘कितने कारण बताए गए हैं?’
अर्थ-स्पष्टीकरण / व्याख्यात्मककिसी पंक्ति या वाक्यांश का भावभाव खोलकर समझाना‘… इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।’
शीर्षकगद्यांश का उपयुक्त नामकेंद्रीय भाव को संक्षिप्त शीर्षक में‘गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।’
शब्दार्थ / पर्याय / विलोमकिसी शब्द का अर्थ, समानार्थी या विपरीतार्थीसंदर्भ के अनुसार सटीक शब्द‘… शब्द का अर्थ/पर्याय/विलोम लिखिए।’
सर्वनाम का संदर्भ‘यह’, ‘वह’, ‘उसका’ किसके लिए आयासंज्ञा पहचानकर बताना‘… यहाँ “उसका” किसके लिए प्रयुक्त है?’
अनुमान-आधारितजो सीधे नहीं कहा, उसका तर्कसंगत निष्कर्षगद्यांश के संकेतों से निष्कर्ष‘गद्यांश से लेखक के किस दृष्टिकोण का पता चलता है?’

इनमें तथ्यात्मक प्रश्न सबसे सरल हैं और इनमें अंक नहीं छोड़ने चाहिए। व्याख्यात्मक और अनुमान-आधारित प्रश्न समझ की गहराई परखते हैं और यहीं अभ्यर्थी सबसे अधिक अंतर बना सकता है। शीर्षक सदैव अंत में बनाएँ, क्योंकि पूरा गद्यांश समझने के बाद ही केंद्रीय भाव स्पष्ट होता है।

गद्यांश पढ़ने और प्रश्न हल करने की तकनीक

बोध प्रश्न हल करने की एक व्यवस्थित विधि है, जिसका पालन करने पर न समय व्यर्थ होता है, न उत्तर भटकते हैं। चरण इस प्रकार हैं —

  1. पहला पाठन — समग्र दृष्टि। गद्यांश को एक बार तेज़ी से पढ़ें और केवल यह समझें कि विषय क्या है तथा लेखक किस ओर बढ़ रहा है। इस पाठन में विस्तार में न उलझें; उद्देश्य केवल ‘मूल भाव’ पकड़ना है।
  2. प्रश्न पढ़ें। अब सभी प्रश्न ध्यान से पढ़ें। इससे आपका मस्तिष्क जान जाता है कि किस सूचना की खोज करनी है, और दूसरे पाठन में आँखें स्वतः उत्तर-स्थलों पर टिकती हैं।
  3. दूसरा पाठन — धीमे और सचेत। अब गद्यांश को धीरे, ध्यान से पढ़ें और प्रत्येक प्रश्न से जुड़ी पंक्तियाँ हलके-से रेखांकित करें या मन में चिह्नित करें।
  4. उत्तर-स्थल पहचानें। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर गद्यांश के किस भाग में है, यह तय करें। तथ्यात्मक प्रश्नों का उत्तर प्रायः एक ही वाक्य में, व्याख्यात्मक का दो-तीन वाक्यों में बिखरा हो सकता है।
  5. अपनी भाषा में लिखें। गद्यांश की पंक्तियाँ ज्यों-की-त्यों उठाना अनुचित है। भाव वही रखें, पर शब्द अपने हों। शब्दार्थ/पर्याय जैसे प्रश्नों में ही उद्धरण आवश्यक होता है।
  6. संक्षेप और सटीकता। प्रश्न जितना माँगे, उतना ही उत्तर दें। न अनावश्यक विस्तार, न आधा-अधूरा उत्तर।
  7. शीर्षक सबसे अंत में। अब, जब पूरा भाव स्पष्ट है, सबसे उपयुक्त और संक्षिप्त शीर्षक चुनें।

उत्तर लिखने के नियम

  • अपने शब्दों में — भाव गद्यांश का, भाषा आपकी। सीधी नकल से मौलिक समझ प्रकट नहीं होती।
  • गद्यांश तक सीमित — बाहरी जानकारी, अपनी राय या उदाहरण न जोड़ें, जब तक प्रश्न स्पष्ट रूप से न माँगे।
  • उपयुक्त लंबाई — तथ्यात्मक प्रश्न का उत्तर एक-दो वाक्य; व्याख्यात्मक का तीन-चार वाक्य; शब्दार्थ/पर्याय का केवल एक शब्द या वाक्यांश।
  • पूर्ण वाक्य में — एक शब्द से बचें (शब्दार्थ को छोड़कर)। उत्तर पूरा वाक्य बनाकर लिखें, जैसे — ‘लेखक के अनुसार …।’
  • प्रश्न के सभी भाग — यदि प्रश्न दो बातें पूछता है (अर्थ क्या है और क्यों कहा), तो दोनों का उत्तर दें।
  • भाषा शुद्ध और सुगठित — वर्तनी, लिंग, वचन और विराम-चिह्न की शुद्धता पर ध्यान दें; यही भाषा-पक्ष के अंक दिलाती है।

समय-प्रबंधन

लगभग 250-300 शब्द के गद्यांश और उस पर पाँच प्रश्नों के लिए कुल 18-20 मिनट पर्याप्त हैं — मोटे तौर पर पहले पाठन में 2 मिनट, प्रश्न पढ़ने में 1 मिनट, दूसरे पाठन में 3 मिनट और उत्तर-लेखन में शेष समय। एक प्रश्न पर अटक जाने पर उसे छोड़कर आगे बढ़ें और अंत में लौटें; एक प्रश्न के कारण पूरे खंड के अंक संकट में न डालें।

हल किया हुआ उदाहरण

नीचे एक नमूना गद्यांश और उस पर पाँच बोध प्रश्न, उनके आदर्श उत्तरों सहित दिए गए हैं। ध्यान दें कि उत्तर किस प्रकार गद्यांश की सीमा में रहते हुए भी अपनी भाषा में लिखे गए हैं।

गद्यांश —

> “स्वास्थ्य ही सच्चा धन है — यह कथन जितना पुराना है, उतना ही सत्य। किंतु आधुनिक जीवन-शैली ने मनुष्य को उसके इसी सबसे बड़े धन से वंचित कर दिया है। आज का व्यक्ति धन-अर्जन की होड़ में अपने शरीर की उपेक्षा कर रहा है। अनियमित दिनचर्या, असंतुलित आहार, व्यायाम का अभाव तथा मानसिक तनाव — ये चार कारण आधुनिक जीवन-शैली के विकारों की जड़ हैं। > > प्राचीन ऋषियों ने कहा था — ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’, अर्थात् शरीर ही धर्म का प्रथम साधन है। यदि शरीर स्वस्थ न हो, तो कोई भी लक्ष्य — चाहे वह आर्थिक हो, बौद्धिक हो अथवा आध्यात्मिक — प्राप्त नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्यवश आज के अनेक युवा देर रात तक स्क्रीन पर समय बिताते हैं, प्रातःकाल देर से उठते हैं, असंतुलित भोजन करते हैं और व्यायाम को अनावश्यक मानते हैं। > > स्वास्थ्य की रक्षा के लिए कोई कठिन उपाय आवश्यक नहीं। नियमित दिनचर्या, संतुलित आहार, प्रतिदिन तीस मिनट का व्यायाम, पर्याप्त नींद तथा मानसिक शांति के लिए ध्यान — ये पाँच सूत्र ही पर्याप्त हैं। यदि हम आज स्वास्थ्य की उपेक्षा करेंगे, तो कल चिकित्सालय के बिस्तर पर यह आभास होगा कि संचित धन भी खोया हुआ स्वास्थ्य वापस नहीं खरीद सकता।”

प्रश्न 1 — गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए। (शीर्षक)

उत्तर: ‘स्वास्थ्य ही सच्चा धन’। (टिप्पणी — शीर्षक छोटा, केंद्रीय भाव को समेटने वाला और गद्यांश से सीधे जुड़ा होना चाहिए।)

प्रश्न 2 — आधुनिक जीवन-शैली के विकारों के चार प्रमुख कारण क्या हैं? (तथ्यात्मक)

उत्तर: लेखक के अनुसार आधुनिक जीवन-शैली के विकारों की चार मुख्य जड़ें हैं — (i) अनियमित दिनचर्या, (ii) असंतुलित आहार, (iii) व्यायाम का अभाव, तथा (iv) मानसिक तनाव।

प्रश्न 3 — ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ का क्या अर्थ है तथा लेखक ने इसे क्यों उद्धृत किया है? (व्याख्यात्मक — दो भाग)

उत्तर: इस संस्कृत सूक्ति का अर्थ है — ‘शरीर ही धर्म का प्रथम साधन है।’ लेखक ने यह उद्धरण इस बात पर बल देने के लिए दिया है कि स्वस्थ शरीर के बिना कोई भी लक्ष्य — चाहे वह आर्थिक हो, बौद्धिक हो अथवा आध्यात्मिक — प्राप्त नहीं किया जा सकता। अतः शरीर-स्वास्थ्य की उपेक्षा किसी भी स्थिति में उचित नहीं है।

प्रश्न 4 — ‘संचित धन भी खोया हुआ स्वास्थ्य वापस नहीं खरीद सकता’ — इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए। (अर्थ-स्पष्टीकरण)

उत्तर: इस कथन द्वारा लेखक यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि जीवन भर अर्जित धन भी एक बार स्वास्थ्य गँवा देने पर उसे लौटा नहीं सकता। चिकित्सालय के बिस्तर पर मनुष्य को यह कटु सत्य अनुभव होता है कि जिस धन के पीछे उसने अपना स्वास्थ्य दाँव पर लगाया, वही धन अंतिम घड़ी में काम नहीं आता। अतः समय रहते स्वास्थ्य की रक्षा ही श्रेयस्कर है।

प्रश्न 5 — गद्यांश से लेखक के किस दृष्टिकोण का पता चलता है? (अनुमान-आधारित)

उत्तर: गद्यांश से यह स्पष्ट होता है कि लेखक स्वास्थ्य को धन से भी अधिक मूल्यवान मानते हैं और आधुनिक भौतिकवादी जीवन-शैली के प्रति चिंतित हैं। उनका दृष्टिकोण निवारक है — वे चाहते हैं कि मनुष्य रोग आने की प्रतीक्षा करने के बजाय नियमित दिनचर्या और संयम द्वारा पहले से ही स्वास्थ्य की रक्षा करे।

अपठित गद्यांश: क्या है, कैसे हल करें और एक उदाहरण

अपठित गद्यांश वह गद्य-अंश है जो आपके पाठ्यक्रम या किसी तय किताब से नहीं लिया जाता। ‘अपठित’ का मतलब ही है ‘जो पढ़ा न गया हो’। परीक्षा में इसे इसलिए रखा जाता है ताकि रटी हुई जानकारी काम न आए और सिर्फ़ आपकी समझ परखी जाए। UPSC के अनिवार्य हिंदी प्रश्नपत्र का बोध वाला गद्यांश इसी तरह का होता है, इसलिए ऊपर बताई गई पूरी तकनीक असल में अपठित गद्यांश हल करने की ही तकनीक है।

अपठित गद्यांश, पठित गद्यांश और अपठित पद्यांश में अंतर

तीनों पर बोध प्रश्न पूछे जाते हैं, पर तैयारी का तरीका थोड़ा अलग है। नीचे की तालिका में फ़र्क़ एक नज़र में देखिए।

आधारअपठित गद्यांशपठित गद्यांशअपठित पद्यांश
स्रोतपाठ्यक्रम से बाहर का कोई भी गद्य, जैसे लेख, संपादकीय या निबंध का अंशतय पाठ्य-पुस्तक का गद्यपाठ्यक्रम से बाहर की किसी कविता का अंश
पहले पढ़ा है?नहींहाँनहीं
उत्तर का आधारसिर्फ़ दिया गया गद्यांशगद्यांश, साथ में पाठ का संदर्भ और प्रसंगसिर्फ़ दिया गया पद्यांश
आम प्रश्नशीर्षक, तथ्य, आशय, शब्दार्थ, निष्कर्षसंदर्भ, प्रसंग, व्याख्या, पाठ और लेखक का नामभाव, शब्दार्थ, अलंकार, काव्य-सौंदर्य, शीर्षक
मुख्य चुनौतीनए विषय को जल्दी समझनायाद के भरोसे गद्यांश को ध्यान से न पढ़नाकविता के प्रतीक और भाव खोलना

अपठित गद्यांश हल करने की चरणवार विधि

  1. पहला पाठ: पूरा गद्यांश बिना रुके एक बार पढ़ें और मन में एक पंक्ति में तय करें कि यह किस बारे में है।
  2. प्रश्न पहले पढ़ें: अब सारे प्रश्न पढ़ लें, ताकि दूसरी बार पढ़ते समय पता हो कि क्या ढूँढना है।
  3. दूसरा पाठ: हर प्रश्न से जुड़ी पंक्ति पर निशान लगाएँ। कोई शब्द नया हो तो उसका अर्थ आसपास के वाक्यों से निकालें।
  4. अपने शब्दों में उत्तर: गद्यांश के वाक्य ज्यों-के-त्यों न उतारें, पर गद्यांश से बाहर की कोई बात भी न जोड़ें।
  5. शीर्षक सबसे आख़िर में: मुख्य विचार से बना छोटा शीर्षक चुनें, जो पूरे गद्यांश पर लागू हो, किसी एक हिस्से पर नहीं।
  6. आख़िरी जाँच: एक मिनट निकालकर वर्तनी, लिंग और विराम-चिह्न देख लें।

अपठित पद्यांश में भी यही चरण काम करते हैं। फ़र्क़ बस इतना है कि दूसरे पाठ में शब्दों के सीधे अर्थ से ज़्यादा ध्यान कविता के भाव और प्रतीकों पर देना होता है।

अपठित गद्यांश का हल किया हुआ उदाहरण

गद्यांश:

“हमारे गाँवों में कभी हर बस्ती के पास एक तालाब होता था। बरसात का पानी उसमें जमा होता, जानवर वहीं पानी पीते और आसपास के कुओं का जल-स्तर साल भर बना रहता। तालाब किसी एक का नहीं, पूरे गाँव का होता था, इसलिए उसकी सफ़ाई भी सब मिलकर करते थे। फिर हर घर में हैंडपंप और बोरवेल आ गए। लोगों को लगा कि अब तालाब की ज़रूरत नहीं रही। धीरे-धीरे तालाबों में मिट्टी भर दी गई और उन पर मकान और सड़कें बन गईं। आज वही गाँव गर्मी आते ही टैंकर का इंतज़ार करते हैं, क्योंकि ज़मीन के नीचे का पानी लगातार नीचे जा रहा है। सच यह है कि बोरवेल पानी पैदा नहीं करता, सिर्फ़ निकालता है। पानी को ज़मीन में लौटाने का काम तालाब करते थे। जब तक हम उन्हें फिर से साझी ज़िम्मेदारी नहीं मानेंगे, तब तक नई मशीनें भी हमारी प्यास नहीं बुझा पाएँगी।”

प्रश्न 1: गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए। (शीर्षक)

उत्तर: ‘तालाब: गाँव की साझी पूँजी’। (टिप्पणी: शीर्षक पूरे गद्यांश के मुख्य विचार को पकड़ता है, सिर्फ़ बोरवेल वाले हिस्से को नहीं।)

प्रश्न 2: पहले गाँव के तालाब किन कामों में आते थे? (तथ्यात्मक)

उत्तर: गद्यांश के अनुसार तालाब (i) बरसात का पानी जमा करते थे, (ii) जानवरों के पीने के पानी का साधन थे, और (iii) आसपास के कुओं का जल-स्तर साल भर बनाए रखते थे।

प्रश्न 3: ‘बोरवेल पानी पैदा नहीं करता, सिर्फ़ निकालता है’, इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए। (अर्थ-स्पष्टीकरण)

उत्तर: बोरवेल ज़मीन के नीचे पहले से जमा पानी को बाहर खींचता है, नया पानी नहीं बनाता। उस भंडार को भरने का काम तालाब करते थे, जो बरसात का पानी रोककर ज़मीन में उतारते थे। तालाब ख़त्म होने से भंडार भरना रुक गया, पर निकालना चलता रहा, इसलिए जल-स्तर लगातार गिर रहा है।

प्रश्न 4: लेखक के अनुसार पानी की इस समस्या का हल क्या है? (अनुमान-आधारित)

उत्तर: लेखक का मानना है कि हल नई मशीनों में नहीं है। तालाबों को फिर से पूरे गाँव की साझी ज़िम्मेदारी बनाना होगा, ताकि बरसात का पानी रुककर ज़मीन में लौट सके। यानी समाधान तकनीक से ज़्यादा सामूहिक भागीदारी में है।

सामान्य त्रुटियाँ और परीक्षा-दृष्टि

अभ्यर्थी प्रायः कुछ निश्चित गलतियाँ बार-बार दोहराते हैं। इन्हें पहचानकर टालना ही इस खंड में पूरे अंक लाने की कुंजी है।

सामान्य त्रुटिपरिणामसुधार
गद्यांश की पंक्तियाँ ज्यों-की-त्यों उतार देनामौलिक समझ प्रकट नहीं होती; अंक कटते हैंभाव वही, भाषा अपनी
प्रश्न का केवल एक भाग हल करनाअधूरा उत्तरप्रश्न के सभी भाग गिनकर उत्तर दें
उत्तर को अनावश्यक लंबा करनासमय की हानि, सटीकता घटती हैप्रश्न जितना माँगे, उतना ही
अनुमान-प्रश्न में कल्पना जोड़नागद्यांश से बाहर जाने पर अंक नहींनिष्कर्ष गद्यांश के संकेतों पर ही आधारित हो
शीर्षक आरंभ में ही बना लेनाभाव अधूरा रहने से शीर्षक अनुपयुक्तशीर्षक सबसे अंत में चुनें
बाहरी जानकारी/अपनी राय जोड़नाप्रश्न की सीमा का उल्लंघनउत्तर का स्रोत केवल गद्यांश
भाषा-पक्ष की उपेक्षा (वर्तनी, लिंग, विराम)भाषा के अंक कटते हैंउत्तर लिखने के बाद एक बार जाँचें

परीक्षा में इस खंड का अभ्यास सरल है — प्रतिदिन एक समाचार-पत्र का संपादकीय या किसी स्तरीय पत्रिका का गद्यांश पढ़ें, उस पर स्वयं पाँच बोध प्रश्न बनाएँ और निर्धारित समय में उनके उत्तर लिखें। यही नियमित अभ्यास पठन-गति, भाव-ग्रहण और सुगठित भाषा — तीनों को एक साथ साधता है।

अभ्यास प्रश्न

नीचे एक नया गद्यांश और उस पर पाँच बोध प्रश्न दिए गए हैं। पहले स्वयं उत्तर लिखिए, फिर अंत में दिए उत्तर-संकेत से मिलान कीजिए।

गद्यांश —

> “पुस्तकें मनुष्य की सबसे विश्वसनीय मित्र हैं। मित्र रूठ सकते हैं, साथ छोड़ सकते हैं, किंतु पुस्तक न कभी रूठती है, न साथ छोड़ती है। वह मौन रहकर भी हमें वह सब दे देती है जो किसी मुखर मित्र से भी प्राप्त नहीं होता — ज्ञान, संगति और एकांत का सहारा। जिसके पास अच्छी पुस्तकें हैं, वह कभी अकेला नहीं रहता। > > किंतु पुस्तकों का सच्चा लाभ तभी है जब हम उन्हें केवल संग्रह की वस्तु न मानकर पढ़ने और मनन करने की वस्तु मानें। अलमारी में सजी अपठित पुस्तकें घर की शोभा तो बढ़ाती हैं, पर मन को समृद्ध नहीं करतीं। पढ़ी हुई एक पुस्तक अनपढ़ी सौ पुस्तकों से अधिक मूल्यवान है। इसलिए कहा गया है कि पुस्तक का मोल पन्नों की संख्या से नहीं, उससे मिले विचार से आँका जाता है।”

प्रश्न —

  1. गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
  2. लेखक ने पुस्तक को मित्रों से श्रेष्ठ क्यों कहा है?
  3. ‘पढ़ी हुई एक पुस्तक अनपढ़ी सौ पुस्तकों से अधिक मूल्यवान है’ — इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
  4. ‘मुखर’ शब्द का विलोम गद्यांश में से छाँटकर लिखिए।
  5. गद्यांश के आधार पर लेखक पुस्तकों के प्रति किस दृष्टिकोण को सही मानते हैं?

उत्तर-संकेत —

  1. शीर्षक — ‘पुस्तकें : सच्ची मित्र’ अथवा ‘पुस्तकों का सच्चा मोल’।
  2. तथ्यात्मक — पुस्तक न कभी रूठती है, न साथ छोड़ती है; मौन रहकर भी वह ज्ञान, संगति और एकांत का सहारा देती है — इसलिए लेखक ने इसे मित्रों से श्रेष्ठ कहा है।
  3. अर्थ-स्पष्टीकरण — इसका आशय यह है कि पुस्तकों का मूल्य उनकी संख्या या संग्रह में नहीं, उन्हें पढ़ने और मनन करने में है; एक पढ़ी और समझी गई पुस्तक मन को जितना समृद्ध करती है, अलमारी में सजी सौ अपठित पुस्तकें उतना नहीं करतीं।
  4. विलोम — ‘मुखर’ का विलोम ‘मौन’।
  5. अनुमान-आधारित — लेखक उस दृष्टिकोण को सही मानते हैं जिसमें पुस्तक को संग्रह या सजावट की वस्तु न मानकर पढ़ने, समझने और मनन करने की वस्तु माना जाए; उनके अनुसार पुस्तक का मूल्य उससे प्राप्त विचार में है, पन्नों की संख्या में नहीं।

Tell Google you want more of this.

Add Anantam IAS as a preferred source

One tap, and this site shows up more often in your own Top Stories, AI Overviews and AI Mode. Remove it any time.

Share this

PDF

Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

Recognized as one of India’s best content marketers, Gaurav Tiwari is an SEO strategist, WordPress developer, and founder of Gatilab. He builds websites that load in under a second, creates content that ranks on Google’s first page, and develops WordPress plugins and tools used on thousands of live sites.

Specialises in · Writing, web development, design — UPSC prep tooling Experience · 16+ years Visit website ↗

Preparing for UPSC CSE 2026? Sit in a free demo class.

No sales call. No brochure. Watch a real Monday-morning GS session taught by ex-Rau's IAS faculty.