Opens in a new tab
Join Anantam IAS Channel on Telegram

भारत में AI शासन: नवाचार को रोके बिना सत्ता को जवाबदेह बनाना

इंडियाएआई मिशन, 45,000 से अधिक GPU, कृत्रिम सामग्री के नए नियम, एल्गोरिदमिक जवाबदेही और यूरोपीय जोखिम-ढांचे को आसान हिंदी में समझिए।

भारत में AI शासन: नवाचार की रफ्तार और नागरिक सुरक्षा, दोनों को साथ रखने वाला दृश्य।

वित्त मंत्री जैसी हूबहू आवाज़ आपको निवेश करने के लिए कहती है। किसी क्रिकेटर का वीडियो ऐसे ऐप का प्रचार करता है जिसे उसने कभी इस्तेमाल ही नहीं किया। कल्याण योजना के आंकड़ों से चुपचाप एक नाम हट जाता है और गांव की महिला को इसका पता तब चलता है जब राशन मिलना बंद हो जाता है। यह विज्ञान-कथा नहीं है। कानून बनने से पहले भारत में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। इसलिए सवाल यह नहीं है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) को नियमों में बांधना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि उस तकनीक को कैसे संभाला जाए जो कानून से तेज़ चलकर सत्ता के रिश्ते बदल रही है।

UPSC अभ्यर्थी को इसी खींचतान को समझना है। AI राष्ट्रीय विकास की बड़ी उम्मीद का इंजन है, जिस पर हजारों करोड़ रुपये और तकनीकी आत्मनिर्भरता की महत्वाकांक्षा टिकी है। यही AI किसी की आवाज़ की नकल कर सकता है, लाभ रोक सकता है और सड़क की निगरानी कर सकता है, जबकि नुकसान की जवाबदेही साफ नहीं होती। बहुत कड़े नियम नए उद्यमों (startups) को बढ़ने से पहले दबा सकते हैं। बहुत ढीले नियम नागरिक को ऐसी व्यवस्था के सामने अकेला छोड़ सकते हैं जो उसके प्रति जवाबदेह नहीं है। अच्छे उत्तर को नवाचार और नागरिक सुरक्षा, दोनों को साथ पकड़ना होगा।

मुद्दे को ठीक तरह से समझें

पहले चार जरूरी शब्द साफ कर लें। इस विषय की बहुत-सी उलझन कठिन शब्दों के ढीले इस्तेमाल से पैदा होती है।

आधारभूत मॉडल (foundation model) बहुत बड़े आंकड़ा-संग्रह पर प्रशिक्षित AI व्यवस्था है, जिसे बिना शुरू से दोबारा प्रशिक्षित किए लेखन, चित्र बनाने और प्रश्नों के उत्तर जैसे कई कामों के लिए ढाला जा सकता है। चैटजीपीटी जैसी प्रणालियां इन्हीं मॉडल पर टिकी हैं। डीपफेक (deepfake) ऐसा कृत्रिम ऑडियो, चित्र या वीडियो है जिसे असली दिखाने के लिए एल्गोरिदम से बनाया या बदला गया हो। एल्गोरिदमिक पक्षपात (algorithmic bias) तब होता है जब स्वचालित व्यवस्था टेढ़े आंकड़ों से सीखकर या गलत आबादी पर लागू होकर लगातार अनुचित नतीजे देती है। जोखिम-आधारित विनियमन (risk-based regulation) का मतलब पूरी तकनीक को खुला छोड़ना या रोकना नहीं, बल्कि किसी प्रयोग से होने वाले नुकसान के हिसाब से नियम तय करना है। पूरी बहस इन्हीं चार बातों पर घूमती है।

भारत एक साथ दो दिशाओं में बढ़ रहा है। पहली दिशा विकास की है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मार्च 2024 में पांच वर्षों के लिए ₹10,371.92 करोड़ के परिव्यय वाले इंडियाएआई मिशन (IndiaAI Mission) को मंजूरी दी। इसका लक्ष्य नियमों के बोझ से पहले गणना क्षमता, आंकड़ा-संग्रह, कौशल और स्वदेशी मॉडल तैयार करना है। जून 2026 तक साझा गणना ढांचे में 45,000 से अधिक GPU उपलब्ध कराए जा चुके थे। यह भारत का गति बढ़ाने वाला कदम है।

दूसरी दिशा सुरक्षा की है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने 10 फरवरी 2026 को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026 [IT (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Amendment Rules, 2026] अधिसूचित किए, जो 20 फरवरी 2026 से लागू हुए। ये AI से बनी सामग्री पर भारत के पहले बाध्यकारी नियम हैं। इनमें “कृत्रिम रूप से बनाई गई सूचना (synthetically generated information)” की परिभाषा दी गई है। मंचों को साफ दिखाई देने वाला लेबल और भीतर जुड़ा स्रोत-पहचान विवरण (provenance data) देना होगा। अदालत या सरकार के आदेश पर सामग्री हटाने की समय-सीमा करीब 3 घंटे और अंतरंग चित्र या पहचान की नकल वाले डीपफेक के लिए 2 घंटे तक हो सकती है। ये सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) के तहत बने अधीनस्थ नियम हैं, अलग AI कानून नहीं।

अंक दिलाने वाला ढांचा यह है: भारत एक ही सड़क पर गति भी बढ़ा रहा है और ब्रेक भी लगा रहा है, लेकिन समर्पित AI कानून की सड़क अभी बनी नहीं है। द हिंदू (The Hindu) में 4 मई 2026 को छपे विचार लेख “बेकाबू सत्ता का बनता तूफान: AI (AI and a gathering storm of unchecked power)” का तर्क है कि AI केवल औजार नहीं रहा; वह सत्ता की संरचना (structure of power) बन रहा है। कुछ कंपनियों और निगरानी व्यवस्थाओं में ताकत सिमट रही है, जबकि लोकतांत्रिक निगरानी कमजोर है। नीति के नीचे छिपी मूल चिंता यही है।

आंकड़े क्या बताते हैं

आंकड़े दो तस्वीरें साथ दिखाते हैं: एक ओर महत्वाकांक्षा, दूसरी ओर जोखिम। स्टैनफोर्ड HAI AI सूचकांक, 2025 (Stanford HAI AI Index 2025) के मुताबिक लगभग 50,460 AI लेखकों और आविष्कारकों के साथ भारत AI प्रतिभा में दुनिया में दूसरे स्थान पर है, केवल अमेरिका से पीछे। इंडियाएआई मिशन का ₹10,371.92 करोड़ इसी प्रतिभा के लिए बुनियादी आधार है। आरंभिक लक्ष्य 10,000 से अधिक GPU था; जून 2026 तक क्षमता 45,000 से अधिक GPU पहुंच गई। अगस्त 2026 तक रियायती गणना सुविधा से 237 परियोजनाओं को 93.18 लाख GPU-घंटे मिले और स्वदेशी आधारभूत मॉडल बनाने के लिए 20 प्रस्ताव चुने गए।

यही स्टैनफोर्ड सूचकांक कमी भी दिखाता है। विश्व-स्तरीय प्रतिभा बनाने के बावजूद भारत ने 2016 से 2025 के बीच AI से जुड़ा केवल एक कानून पारित किया। इसी कानूनी खालीपन को गति और ब्रेक का रूपक पकड़ता है। सूचकांक यह भी बताता है कि 2024 से 2025 के बीच AI के इस्तेमाल को लेकर भारतीय जनता की चिंता करीब 14 प्रतिशत अंक बढ़ी, जो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज बढ़ोतरी थी। यह चिंता किनारे की आवाज़ नहीं है।

नुकसान भी केवल अनुमान नहीं हैं। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले दो महीनों में अनुमानतः 5 करोड़ से अधिक AI आवाज़-नकल कॉल किए गए। चुनाव आयोग ने दलों को सूचना मिलने के 3 घंटे के भीतर गलत कृत्रिम सामग्री हटाने को कहा। 2023 और 2024 में कारोबार और खेल जगत की हस्तियों वाले धोखाधड़ी के डीपफेक तेजी से बढ़े। उद्योग की रिपोर्टों में नुकसान हजारों करोड़ बताया गया है, लेकिन उत्तर में इन्हें उद्योग के अनुमान के रूप में ही लिखें, सरकारी आंकड़ा न बनाएं।

कुछ नुकसान चुपचाप होते हैं। दस्तावेज़ बताते हैं कि आधार से जुड़ी कल्याण योजनाओं में जैवमितीय पहचान (biometric authentication) विफल होने का असर दलितों, महिलाओं और ग्रामीण उपयोगकर्ताओं पर ज्यादा पड़ता है। पीछे चल रही व्यवस्थाएं बिना सूचना या अपील के नाम हटा सकती हैं। स्वचालित फैसले से गलत तरीके से लाभ रुकने पर जिम्मेदार कौन है, मॉडल बनाने वाला, उसे लगाने वाला या मंच, किसी कानून में साफ नहीं है। यही जवाबदेही की खाई है।

इंडियाएआई मिशन के सात स्तंभ, ₹10,371.92 करोड़ का परिव्यय और जून 2026 तक 45,000 से अधिक GPU क्षमता।
इंडियाएआई मिशन गणना क्षमता, मॉडल, आंकड़े, कौशल, वित्त और सुरक्षित AI को एक ढांचे में जोड़ता है।
भारत के हल्के नुकसान-केंद्रित AI शासन और यूरोपीय संघ के चार जोखिम स्तर वाले कानून की तुलना।
भारत को यूरोपीय संघ का जोखिम-आधारित तर्क अपने हालात के हिसाब से अपनाना चाहिए।

हल्के नियमों के पक्ष में तर्क

नवाचार के पक्ष में हल्के नियमों का तर्क सचमुच मजबूत है। इसे कमजोर दिखाने वाला उत्तर अधूरा लगेगा, इसलिए पहले इसे पूरी ताकत से समझें।

पहला, भारत को तेजी से अंतर घटाना है। प्रतिभा तो है, लेकिन अपने आधारभूत मॉडल बहुत कम हैं। इंडियाएआई मिशन का क्रम साफ है: भारी नियम आने से पहले GPU, आंकड़ा-संग्रह और स्वदेशी मॉडल बनाइए। अभी यूरोपीय संघ (European Union) जैसे भारी दायित्व डालने से नए उद्यम बड़े होने से पहले टूट सकते हैं। जिस उद्योग का देश में पर्याप्त आकार अभी बना नहीं, उसे पहले ही कड़े नियमों में बांधना उलटा पड़ सकता है। इसलिए पहले क्षमता, फिर शासन का तर्क वाजिब है।

दूसरा, तकनीक कानून से तेज बदलती है। प्राथमिक कानून में आज की परिभाषाएं जड़ कर दी गईं तो कल वे पुरानी पड़ सकती हैं। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भारत की नीति को सोच-समझकर नपा हुआ बताया है: नुकसान को रोकते हुए “नवाचार को फलने-फूलने की जगह” देना। गोपनीयता और दूरसंचार में भी भारत ने चरणबद्ध रास्ता अपनाया। जल्दी बदले जा सकने वाले सिद्धांत कई बार ऐसे कठोर कानून से बेहतर होते हैं जिसे बदलना कठिन हो।

तीसरा, मौजूदा कानून पहले से कई नुकसान पर लागू होते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, डिजिटल व्यक्तिगत आंकड़ा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act, 2023), भारतीय न्याय संहिता तथा उपभोक्ता और व्यक्तित्व अधिकार कानून धोखाधड़ी, मानहानि और बिना सहमति वाली तस्वीर जैसे मामलों को समेटते हैं। नवंबर 2025 के इंडियाएआई शासन दिशानिर्देश (IndiaAI Governance Guidelines) भी नए सर्वसमावेशी AI कानून के बजाय इसी कानूनी ढांचे पर टिके हैं। नया व्यापक कानून लागू नियमों के ऊपर दोहराव वाला बोझ बन सकता है।

चौथा, भारत में नवाचार अपने-आप में सार्वजनिक लाभ दे सकता है। किसान, मरीज और विद्यार्थी डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (digital public infrastructure), यानी आधार और UPI जैसी साझा डिजिटल व्यवस्था, के जरिए AI का लाभ ले रहे हैं। कार्नेगी इंडिया का तर्क है कि नियम डर के बजाय “सार्वजनिक लाभ” से शुरू होने चाहिए। डर से बने नियम उन लोगों का फायदा छीन सकते हैं जिन्हें ये साधन मदद देने लगे हैं। नीति आयोग (NITI Aayog) के 2021 के जिम्मेदार AI दृष्टिकोण (Responsible AI) दस्तावेज़ ने सुरक्षा, समावेश, समानता, गोपनीयता, पारदर्शिता, जवाबदेही और सकारात्मक मानवीय मूल्यों की रक्षा के सात सिद्धांत दिए थे। सरकारी तर्क “नियम नहीं” का नहीं, बल्कि “तेजी से बदले जा सकने वाले सिद्धांत” का है।

पांचवां, ब्रसेल्स प्रभाव (Brussels effect) की नकल का खतरा है। यूरोपीय AI कानून की पालन-लागत को नए खिलाड़ियों के रास्ते की रुकावट माना जाता है। विकासशील अर्थव्यवस्था ने इसे जस का तस अपनाया तो महंगी कागजी कार्रवाई उठा सकने वाली कुछ विदेशी कंपनियां और मजबूत होंगी। हल्का ढांचा केवल तेजी नहीं, अपने बाजार को दूसरों के हवाले होने से बचाने का तर्क भी है।

हल्के नियमों के खिलाफ तर्क

अब देखें कि हल्के नियम किन बातों को छोड़ देते हैं। “हल्का हस्तक्षेप” आसानी से “कोई हस्तक्षेप नहीं” बन सकता है, जबकि नुकसान वास्तविक लोगों तक पहुंच चुका है। इस कसौटी पर कमियां गंभीर हैं।

पहला नुकसान चुनाव और सूचना की विश्वसनीयता पर है। एक चुनाव चक्र में 5 करोड़ से अधिक आवाज़-नकल कॉल केवल आशंका नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दर्ज हमला है। यही डीपफेक नागरिकों के पैसे भी ठगते हैं। कंपनियों की स्वैच्छिक नैतिकता इसे रोक नहीं सकी। चुनाव आयोग का 3 घंटे में हटाने का आदेश घटना के बाद की भागदौड़ था, पहले से तैयार व्यवस्था नहीं। इसलिए “मौजूदा कानून काफी है” का दावा जमीन पर कमजोर पड़ता है।

दूसरा, एल्गोरिदमिक पक्षपात भविष्य नहीं, आज लोगों को बाहर कर रहा है। जैवमितीय पहचान विफल होने पर दिहाड़ी मजदूर का लाभ रुक जाए तो नुकसान ठोस है और सबसे कमजोर व्यक्ति पर पड़ता है। पुलिस ने स्पष्ट कानूनी निगरानी के बिना चेहरे की पहचान (facial recognition) का इस्तेमाल किया है। इन फैसलों के खिलाफ अपील के लिए नामित प्राधिकरण नहीं है। सामान्य बातचीत वाले AI पर ढील हो सकती है, लेकिन कौन खाना पाएगा यह तय करने वाले एल्गोरिदम पर वही ढील नहीं हो सकती।

तीसरा, जवाबदेही साफ नहीं है। AI के फैसले से नुकसान हो तो मॉडल बनाने वाला, लगाने वाला, मंच या नियामक, कौन जिम्मेदार होगा? किसी भारतीय कानून में सीधा उत्तर नहीं है। स्वैच्छिक नैतिक नियम अदालत में नागरिक को इस्तेमाल करने लायक उपचार नहीं देते। उपचार के बिना अधिकार केवल सजावट है।

सबसे गहरी चिंता सत्ता की है। AI कुछ बड़ी कंपनियों और निगरानी ढांचों में ताकत जमा कर रहा है, जबकि लोकतांत्रिक निगरानी पीछे है। द हिंदू का विचार लेख इसे केवल उपभोक्ता सुरक्षा नहीं, बल्कि संप्रभुता और नागरिक स्वतंत्रता का मुद्दा मानता है। उसमें AI से सहायता वाली सैन्य निशानेबाजी से जुड़ी मृत्यु संख्या जैसे नाटकीय उदाहरण लेखक के तर्क हैं; उन्हें स्थापित तथ्य की तरह नहीं, लेखक के हवाले से ही लिखें। जब दांव सत्ता का हो, तब “बाजार खुद नियम बनाए” तटस्थ विकल्प नहीं रहता।

अंत में वैधता और भरोसे का खतरा है। भारत में AI को लेकर चिंता बहुत तेजी से बढ़ रही है। ऐसे समय राज्य गायब दिखे तो वास्तविक नुकसान के साथ जनता का भरोसा भी घटेगा। केंद्र ने हल्के नियमों की बात जारी रखते हुए कड़े ढांचे पर विचार भी किया है। भाषणों में नीति जितनी स्थिर दिखती है, व्यवहार में शायद उतनी नहीं।

AI के बहुत कम जोखिम वाले साधनों से व्यापक निगरानी तक बढ़ते नुकसान और हर स्तर पर जरूरी जवाबदेही।
नुकसान जितना गंभीर हो, नियम और जवाबदेही उतने कड़े होने चाहिए।

गहरी संरचनात्मक समझ

मूल टकराव “नवाचार बनाम विनियमन” नहीं है। यह ढांचा दोनों को दुश्मन मान लेता है। सही सवाल यह है कि भारत किस तरह के नियम चुने: पूरी तकनीक पर नियम या उसके नुकसान पर नियम।

घबराया राज्य पहले “AI” की परिभाषा बनाकर पूरी तकनीक को घेरना चाहता है। यूरोपीय संघ का अलग AI कानून इसी रास्ते पर है और इसलिए ब्रसेल्स प्रभाव की आलोचना झेलता है। बेहतर तरीका नतीजे को देखना है: किसे नुकसान हुआ, किस क्षेत्र में और कितना गंभीर। सुझाव देने वाला इंजन (recommendation engine) और पुलिस का एल्गोरिदम दोनों AI हैं, लेकिन दोनों को एक जैसा मानना ही असली गलती है।

यूरोपीय तुलना को नकल नहीं, आईने की तरह इस्तेमाल करें। यूरोपीय AI अधिनियम (EU AI Act), विनियम (Regulation) 2024/1689, दुनिया का पहला व्यापक AI कानून है। यह प्रयोगों को चार जोखिम स्तरों में बांटता है: अस्वीकार्य प्रयोग प्रतिबंधित, ऊंचे जोखिम पर कड़े दायित्व, सीमित जोखिम वाले डीपफेक पर खुलासा, और बहुत कम जोखिम वाले प्रयोगों को आजादी। नुकसान के हिसाब से नियम तय करने का तर्क सही है। लेकिन भारत की पालन क्षमता और उद्योग की परिपक्वता यूरोप जैसी नहीं है। इसलिए तर्क अपनाइए, बोझ अपने हालात के हिसाब से रखिए।

इसमें संघवाद की परत भी है। पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य और कल्याण वितरण काफी हद तक राज्यों के विषय हैं, जबकि AI शासन MeitY और केंद्रीय नियमों से चल रहा है। केंद्रीय साधन राज्य की लाभार्थी सूची या पुलिस कैमरा व्यवस्था में जाए तो टकराव केवल राजनीतिक नहीं, संरचनात्मक है। टिकाऊ ढांचे में क्षेत्रीय और राज्य नियामकों को शामिल करना होगा; सब कुछ एक मंत्रालय में केंद्रित नहीं किया जा सकता।

भावी प्रशासक के लिए एक और बात जरूरी है। कल्याण, पुलिस और कर में सरकार खुद AI की सबसे बड़ी प्रयोगकर्ता संस्थाओं में है। इसलिए “AI को कौन नियंत्रित करेगा” का उत्तर ऐसा नहीं हो सकता जो सरकारी प्रणालियों को छोड़ दे। निजी डीपफेक पर सख्ती और कल्याण एल्गोरिदम पर कोई जांच नहीं, जवाबदेही नहीं है; यह केवल तय करना है कि किन नागरिकों की रक्षा होगी।

भारत की कहानी पश्चिमी बहस की नकल भर नहीं है। फरवरी 2026 में भारत मंडपम पर AI प्रभाव शिखर सम्मेलन (AI Impact Summit) आयोजित करके और करीब 89 देशों व संगठनों से समर्थित AI प्रभाव पर नई दिल्ली घोषणा (New Delhi Declaration on AI Impact) के जरिए भारत ने वैश्विक दक्षिण (Global South) के लिए नियम बनाने वाले देश की भूमिका मांगी। यह महत्वाकांक्षा तभी टिकेगी जब घरेलू व्यवस्था भी संगत हो। नागरिक को जवाबदेही रहित एल्गोरिदम के खिलाफ उपचार न देकर दुनिया को समावेशी और मानव-केंद्रित AI का पाठ नहीं पढ़ाया जा सकता। बाहरी महत्वाकांक्षा और अंदरूनी शासन को एक कहानी कहनी होगी।

क्या किया जाना चाहिए

भारत को खोखला “संतुलन” नहीं, लागू किया जा सकने वाला ढांचा चाहिए। अमूर्त तकनीक के बजाय नुकसान को नियंत्रित करें और नियमों की कठोरता अपनी क्षमता के मुताबिक रखें। इसके लिए सात कदम हैं।

  1. नुकसान और जोखिम के स्तर पर नियम बनाएं। यूरोपीय तर्क लें, उसका पूरा बोझ नहीं। स्वास्थ्य, वित्त, पुलिस और चुनाव के ऊंचे जोखिम वाले प्रयोगों पर बाध्यकारी दायित्व हों; सामान्य AI पर हल्के नियम रहें। कड़े नियम सिद्ध नुकसान वाले हिस्से पर लगें, ताकि ज्यादातर नवाचार खुला रहे।
  2. कृत्रिम मीडिया के नियमों को कानून की ताकत दें। सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम, 2026 के लेबल, स्रोत-पहचान विवरण और तेज हटाने की व्यवस्था को प्राथमिक कानून तथा अनुपातिक दंड का सहारा मिले। व्यंग्य, पत्रकारिता और शिक्षा की साफ सुरक्षा भी हो, ताकि इलाज अभिव्यक्ति की आजादी को नुकसान न पहुंचाए।
  3. सरकारी AI की एल्गोरिदमिक जवाबदेही तय करें। कल्याण, पुलिस और ऋण में सरकारी AI के लिए पक्षपात जांच और एल्गोरिदमिक असर आकलन (algorithmic impact assessment) जरूरी हो। नागरिक को कारण जानने और अपील का अधिकार मिले तथा स्वचालित फैसले के लिए एक नामित प्राधिकरण जवाबदेह हो। यह DPDP अधिनियम की भावना को आंकड़ों से फैसलों तक बढ़ाएगा।
  4. क्षेत्रीय नियामक और एक समन्वय संस्था साथ रखें। RBI, SEBI, IRDAI, स्वास्थ्य नियामक और चुनाव आयोग अपने क्षेत्रों के जोखिम संभालें। MeitY और अंतर-मंत्रालयी AI समूह कमियां बंद करें और विभागों का टकराव रोकें। यही कार्नेगी इंडिया का पूरी सरकार वाला ढांचा (whole-of-government design) है।
  5. गणना क्षमता और प्रतिभा की संप्रभुता बचाएं। इंडियाएआई मिशन के GPU, आंकड़ा-संग्रह, कौशल और भारतीय भाषाओं के आधारभूत मॉडल पर काम जारी रहे, ताकि नियम बाजार विदेशी कंपनियों को न सौंप दें। जून 2026 की 45,000 से अधिक GPU क्षमता, 237 रियायती परियोजनाएं और 20 स्वदेशी मॉडल प्रस्ताव इसी दिशा की बुनियाद हैं।
  6. राष्ट्रीय AI सुरक्षा संस्थान बनाएं। जनहित संस्था मॉडल मूल्यांकन, हमलावर परीक्षण (red-teaming), मानक और घटना रिपोर्टिंग संभाले। इससे मिशन के “सुरक्षित और भरोसेमंद AI (Safe and Trusted AI)” स्तंभ और नई दिल्ली शिखर सम्मेलन की प्रतिबद्धताओं को स्थायी संस्था मिलेगी।
  7. अधिकार और उचित प्रक्रिया को आधार बनाएं। पूरे ढांचे को DPDP अधिनियम के अमल और अनुच्छेद 14, 19 तथा 21, यानी समानता, अभिव्यक्ति की आजादी और गोपनीयता, से जोड़ें। ये अधिकार बाद में जोड़ी गई बात नहीं, न्यूनतम जमीन हों।

ये सभी कदम औजार को नहीं, नुकसान को नियंत्रित करते हैं। नागरिक सुरक्षा और नवाचार में फर्क यहीं बनता है। 2026 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी का MANAV सूत्र, नैतिक, जवाबदेह, संप्रभु, सुलभ और वैध AI, भी मनुष्य को केंद्र में रखने की बात करता है। इसे समान नाम वाली पुरानी जीनोमिक परियोजना न समझें।

मुख्य परीक्षा के उत्तर के लिए

यह विषय GS3 का मजबूत आधार है और GS2 से साफ जुड़ता है। विज्ञान और तकनीक से शासन, अधिकार तथा संघवाद तक एक ही तर्क में पहुंचना ऐसा अंतर-पत्रीय मेल है जो उत्तर को बेहतर बनाता है।

GS पत्र से जुड़ाव: GS3 में विज्ञान-तकनीक के विकास और प्रयोग, स्वदेशीकरण, संचार नेटवर्क से आंतरिक सुरक्षा तथा AI अर्थव्यवस्था। GS2 में सरकारी नीति और नियामक ढांचा, वैधानिक तथा नियामक संस्थाएं, शासन में पारदर्शिता व जवाबदेही और मौलिक अधिकार।

संभावित प्रश्न:

  • “भारत को नवाचार का गला दबाए बिना कृत्रिम बुद्धिमत्ता से होने वाले नुकसान नियंत्रित करने चाहिए।” इंडियाएआई मिशन और सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम, 2026 के संदर्भ में आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
  • AI पर हल्का हस्तक्षेप कहीं बिना हस्तक्षेप का रास्ता न बन जाए। भारत में एल्गोरिदमिक जवाबदेही और सूचना की विश्वसनीयता के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
  • भारत के सिद्धांत-प्रथम AI शासन की तुलना यूरोपीय संघ के जोखिम-आधारित AI कानून से कीजिए और भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल ढांचा सुझाइए।

उद्धृत करने लायक आंकड़े:

  • मार्च 2024 में मंजूर इंडियाएआई मिशन का पांच वर्षों का परिव्यय ₹10,371.92 करोड़। जून 2026 तक साझा ढांचे में 45,000 से अधिक GPU।
  • सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम, 2026: 10 फरवरी को अधिसूचित, 20 फरवरी 2026 से लागू। कृत्रिम सामग्री के लेबल और स्रोत-पहचान का पहला बाध्यकारी ढांचा; कुछ मामलों में हटाने की समय-सीमा 2 से 3 घंटे।
  • AI प्रतिभा में दुनिया में दूसरा स्थान, करीब 50,460 लेखक और आविष्कारक, लेकिन 2016 से 2025 के बीच केवल एक AI से जुड़ा कानून।
  • 2024 से 2025 के बीच AI को लेकर सार्वजनिक चिंता में करीब 14 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी, बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज।
  • 2024 लोकसभा चुनाव से पहले 5 करोड़ से अधिक AI आवाज़-नकल कॉल; चुनाव आयोग का 3 घंटे में हटाने का निर्देश।
  • यूरोपीय AI अधिनियम, विनियम 2024/1689: चार जोखिम स्तर, दुनिया का पहला व्यापक AI कानून, अगस्त 2024 से लागू।

उत्तर में इस्तेमाल के मुख्य शब्द: आधारभूत मॉडल, कृत्रिम रूप से बनाई सूचना, स्रोत-पहचान और जलचिह्न (watermarking), एल्गोरिदमिक पक्षपात, एल्गोरिदमिक जवाबदेही, जोखिम-आधारित विनियमन, हल्का हस्तक्षेप और सह-विनियमन (co-regulation), गणना संप्रभुता (compute sovereignty), सत्ता के रूप में AI और सूचना की विश्वसनीयता।

पाठ्यक्रम से संबंध: सूचना प्रौद्योगिकी और AI की समझ; संचार नेटवर्क के जरिए आंतरिक सुरक्षा; सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप; नियामक संस्थाएं; पारदर्शिता और जवाबदेही; मौलिक अधिकार; भारत और वैश्विक समूह।

संतुलित निष्कर्ष: लक्ष्य नवाचार और सुरक्षा में किसी एक को चुनना नहीं है। AI के नुकसान को इतनी सटीकता से नियंत्रित करना है कि तकनीक को बनाने की आजादी मिले और नागरिक जवाबदेही रहित सत्ता से आजाद रहे। नुकसान को नियंत्रित कीजिए, कल्पना को नहीं।

उत्तर कैसे बनाएं

परिभाषा के बजाय टकराव से शुरुआत करें। AI विकास का इंजन भी है और सत्ता की संरचना भी, यह एक पंक्ति में नीति समस्या और मूल्य-संघर्ष दोनों दिखाता है। दूसरी पंक्ति में डीपफेक या आधारभूत मॉडल की छोटी परिभाषा दें, जहां वह तर्क को सहारा दे।

आंकड़े जल्दी दें, लेकिन सीमित रखें। पहले मुख्य अनुच्छेद में तीन आंकड़े काफी हैं: ₹10,371.92 करोड़, AI प्रतिभा में दूसरा स्थान और 5 करोड़ आवाज़-नकल कॉल। हर आंकड़े के बाद उसका मतलब लिखें। UPSC में तथ्य से निष्कर्ष तक जाना अंक दिलाता है।

जिस पक्ष से आप सहमत नहीं, उसका मजबूत तर्क भी दें। कड़े बचाव उपायों के समर्थक हैं तो पहले तेजी से अंतर घटाने और तकनीक की रफ्तार वाला तर्क स्वीकारें। हल्के नियम चाहते हैं तो दर्ज नुकसान मानें। इसी से उत्तर संतुलित दिखता है, अस्पष्ट नहीं।

सुधारों को बिखेरें नहीं। जोखिम-स्तर वाले नियम, कृत्रिम मीडिया को कानूनी आधार, सरकारी AI की जवाबदेही, समन्वय के साथ क्षेत्रीय नियामक, गणना संप्रभुता, AI सुरक्षा संस्थान और अधिकारों की जमीन, इन समूहों में आगे का रास्ता लिखें। इससे उत्तर समाचार-सार नहीं, शासन विश्लेषण लगेगा।

आम गलतियां

  • इसे “AI अच्छा है या बुरा” तक सीमित न करें। परीक्षक तकनीक पर फैसला नहीं, यह जानना चाहता है कि क्या नियंत्रित हो, कितनी कठोरता हो और अमल कौन कराए।
  • सूचना प्रौद्योगिकी नियम को अलग AI कानून न कहें। भारत में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत अधीनस्थ नियम हैं, समर्पित AI कानून नहीं। ऐसा लिखना तथ्यात्मक गलती है।
  • यूरोपीय कानून की पूरी नकल न सुझाएं। उससे तर्क लें, फिर बताएं कि भारत अपनी क्षमता के हिसाब से कठोरता क्यों तय करेगा।
  • अनुमान को तथ्य न बनाएं। डीपफेक धोखाधड़ी की नुकसान राशि और विचार लेख में दी सैन्य मृत्यु संख्या अनुमान या तर्क हैं; स्रोत के हवाले से लिखें।
  • नागरिक को न भूलें। जैवमितीय विफलता से सूची से हटे लाभार्थी और नकल की आवाज़ से गुमराह मतदाता का उदाहरण दें। जोखिम झेलने वाले व्यक्ति को नाम देने वाला शासन उत्तर ज्यादा असरदार होता है।

उत्तर का छोटा ढांचा

  1. भूमिका: एक पंक्ति में गति और ब्रेक का टकराव; अगली में डीपफेक या आधारभूत मॉडल की परिभाषा।
  2. साक्ष्य: दो या तीन स्रोत-सहित आंकड़े और हर आंकड़े का अर्थ, एक ओर महत्वाकांक्षा और दूसरी ओर नुकसान।
  3. तर्क: हल्के नियमों के पक्ष में तेजी से अंतर घटाना, तकनीक की रफ्तार, मौजूदा कानून; बचाव उपायों के पक्ष में चुनाव, पक्षपात, जवाबदेही और सत्ता। दोनों पक्ष निष्पक्ष रखें।
  4. संरचनात्मक निदान: असली चुनाव नुकसान को नियंत्रित करने और तकनीक को नियंत्रित करने के बीच है। कठोरता क्षमता के हिसाब से हो और संघीय जोड़ न भूलें।
  5. आगे का रास्ता: पांच से सात जुड़े सुधार और हर सुधार का स्पष्ट जिम्मेदार, MeitY, क्षेत्रीय नियामक, AI सुरक्षा संस्थान या अदालत।
  6. निष्कर्ष: प्रश्न के शब्दों के मुताबिक संतुलित निष्कर्ष ढालें।

रेखाचित्र या प्रवाह-चित्र का विचार

15 अंक के उत्तर में सजावटी मन-मानचित्र के बजाय बढ़ती नुकसान-सीढ़ी बनाएं: बहुत कम जोखिम वाले साधन, हल्के नियम → कृत्रिम मीडिया, लेबल और स्रोत-पहचान → चुनावी डीपफेक व ठगी, तेज हटाना और दंड → कल्याण, ऋण व पुलिस एल्गोरिदम, पक्षपात जांच, असर आकलन और अपील → अग्रणी मॉडल व बड़े पैमाने की निगरानी, सबसे कड़ी देखरेख और सुरक्षा संस्थान का मूल्यांकन। परीक्षक पांच सेकंड में नियमों की बढ़ती कठोरता समझ लेगा।

10 अंक के उत्तर में चित्र छोड़कर दो-स्तंभी तालिका बनाएं: “भारत, हल्का हस्तक्षेप” और “यूरोपीय संघ, जोखिम-आधारित”। साधन, सोच, ढांचा, डीपफेक नियम और अलग कानून की तुलना करें। कम समय में यह ज्यादा उपयोगी है।

नैतिकता और शासन का कोण

GS3 उत्तर में भी एक नैतिक पंक्ति जोड़ें। गहरा सवाल कार्यकुशलता का नहीं, यह है कि निर्जीव व्यवस्था नुकसान करे तो जवाब कौन देगा। जैवमितीय विफलता से लाभ खोने वाला दिहाड़ी मजदूर और नकल की आवाज़ से ठगा मतदाता लिखिए। इससे शासन लोगों की सेवा दिखता है, केवल प्रशासनिक अभ्यास नहीं।

सहानुभूति को प्रशासनिक ढांचे में बदलें। केवल “कमजोरों की रक्षा” न लिखें। सरकारी AI के लिए पक्षपात जांच, कारण और अपील का अधिकार, नामित जवाबदेह प्राधिकरण और बहुत व्यापक हटाने के आदेशों से व्यंग्य व पत्रकारिता की सुरक्षा जैसे ठोस उपाय दें। यही नैतिक भाषा से प्रशासनिक परिपक्वता तक का कदम है।

अलग-अलग विषयों में काम आने वाला वाक्य: “प्रयोग का लक्ष्य सही हो सकता है, लेकिन उसकी वैधता जवाबदेही, अनुपात और नागरिक की पहुंच में मौजूद उपचार पर निर्भर है।” यह राज्य के लक्ष्य को मानता है, पर उसे खुली छूट नहीं देता।

आंकड़े यांत्रिक लगे बिना कैसे लिखें

आप जितने आंकड़े जानते हैं, उन सबका इस्तेमाल न करें। समझाए गए तीन आंकड़े बिखरे दस आंकड़ों से बेहतर हैं। पैमाने के लिए ₹10,371.92 करोड़, विरोधाभास के लिए प्रतिभा में दूसरा स्थान लेकिन केवल एक AI कानून, और नुकसान के लिए 5 करोड़ आवाज़-नकल कॉल काफी हैं। एक महत्वाकांक्षा, एक विरोधाभास और एक नुकसान।

आंकड़े को अकेला न छोड़ें। उसके बाद “इसका मतलब” या “नीति पर इसका असर” लिखें। यही छोटा कदम तथ्य-सूची को विश्लेषण में बदलता है। मुख्य परीक्षा में तथ्य कच्चा माल हैं और निर्णय तैयार उत्तर।

अंत में देखें कि थका हुआ परीक्षक उत्तर एक बार में समझ सकता है या नहीं। छोटी भूमिका, शुरुआत में आंकड़े, साफ दो पक्ष और समूहों में आगे का रास्ता रखें। स्पष्टता गहराई से कम नहीं; वही गहराई को दिखाई देती है। जो पंक्ति केवल प्रभाव जमाती है, उसे हटाकर तथ्य, कारण, नतीजा या सुधार लिखें।

सामान्य प्रश्न

क्या भारत में अलग AI कानून है?

नहीं। 2026 तक भारत AI को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, DPDP अधिनियम, 2023, उपभोक्ता और क्षेत्रीय कानूनों, सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम, 2026 जैसे अधीनस्थ नियमों तथा गैर-बाध्यकारी इंडियाएआई शासन दिशानिर्देश से संभालता है। भारत ने यूरोपीय शैली के अलग AI अधिनियम से जानबूझकर दूरी रखी है और अपनी नीति को हल्का तथा नवाचार समर्थक बताया है।

सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम, 2026 में वास्तव में क्या जरूरी है?

10 फरवरी को अधिसूचित और 20 फरवरी 2026 से लागू नियम “कृत्रिम रूप से बनाई गई सूचना” को परिभाषित करते हैं। मंचों को ऐसी सामग्री पर प्रमुख लेबल और विशिष्ट पहचान वाला स्रोत-पहचान विवरण जोड़ना होगा। बड़े सामाजिक मीडिया मध्यवर्तियों को उपयोगकर्ता से कृत्रिम सामग्री की घोषणा लेनी होगी। अदालत या सरकार के आदेश पर करीब 3 घंटे और अंतरंग चित्र या पहचान-नकल डीपफेक पर 2 घंटे तक में कार्रवाई करनी पड़ सकती है।

भारत की नीति यूरोपीय AI कानून से कैसे अलग है?

यूरोपीय AI अधिनियम, विनियम 2024/1689, बाध्यकारी अलग कानून है जो प्रयोगों को अस्वीकार्य, ऊंचे, सीमित और बहुत कम, चार जोखिम स्तरों में बांटता है। भारत ने मौजूदा कानूनों और क्षेत्रीय नियामकों पर आधारित सिद्धांत-प्रथम, हल्का रास्ता चुना है; एक AI कानून नहीं है। यूरोप तकनीक को व्यापक रूप से नियंत्रित करता है, भारत खास नुकसान पर नियम लगाने की कोशिश करता है।

भारत में AI पर कड़े नियमों का सबसे मजबूत तर्क क्या है?

नुकसान भविष्य की आशंका नहीं, आज की वास्तविकता है: 2024 चुनाव से पहले 5 करोड़ से अधिक आवाज़-नकल कॉल, गरीबों को बाहर करने वाली जैवमितीय विफलताएं और नुकसानदेह स्वचालित फैसले के जिम्मेदार की कानूनी अस्पष्टता। AI को लेकर चिंता बहुत तेजी से बढ़ रही है। राज्य अनुपस्थित दिखा तो लोगों को नुकसान और शासन को भरोसे, दोनों का घाटा होगा।

Share this

PDF

Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

Recognized as one of India’s best content marketers, Gaurav Tiwari is an SEO strategist, WordPress developer, and founder of Gatilab. He builds websites that load in under a second, creates content that ranks on Google’s first page, and develops WordPress plugins and tools used on thousands of live sites.

Specialises in · Writing, web development, design — UPSC prep tooling Experience · 16+ years Visit website ↗

UPSC की तैयारी हिंदी माध्यम में — एक निशुल्क डेमो क्लास

न कोई सेल्स कॉल, न कोई ब्रोशर। सोमवार सुबह की असली GS क्लास देखिए — हमारे अनुभवी शिक्षकों के साथ।