UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

नादिर शाह: करनाल की लड़ाई, दिल्ली की लूट और मयूर सिंहासन

नादिर शाह पर पूरा नोट: ईरान में उसका उदय, करनाल की लड़ाई, दिल्ली का कत्लेआम, मयूर सिंहासन और कोहिनूर, और इस आक्रमण की मुगलों को क्या कीमत चुकानी पड़ी।

An 18th-century Mughal miniature of Nadir Shah seated on a gold throne with a sword across his lap and a halo behind him

नादिर शाह ईरान का वह शासक था जिसने 1738-39 में मुगल भारत पर आक्रमण किया। फरवरी 1739 में करनाल की लड़ाई में उसने बादशाह मुहम्मद शाह की सेना को तहस-नहस कर दिया और 57 दिन तक दिल्ली पर कब्जा रखा। वह खुरासान के अफशार कबीले का तुर्कमान था और 1736 में खुद को शाह घोषित करके ताज पहन चुका था। लौटते समय वह मयूर सिंहासन, कोहिनूर और सिंधु नदी के पश्चिम का हर मुगल प्रांत अपने साथ ले गया। पीछे जो मुगल दरबार बचा, वह अपना पुराना अधिकार फिर कभी वापस नहीं पा सका।

ज्यादातर पाठक उसके बारे में दो गलत धारणाएँ लेकर आते हैं। पहली यह कि वह अहमद शाह अब्दाली की तरह कोई अफगान लुटेरा था। ऐसा नहीं है। वह ईरानी तुर्कमान था, और अब्दाली तो उसी की सेना में काम करता था। दूसरी धारणा यह कि करनाल ने मुगल शासन खत्म कर दिया। यह भी सही नहीं है। नादिर ने ताज वापस मुहम्मद शाह के सिर पर रख दिया, और मुगल बादशाह 1857 तक दिल्ली में राज करते रहे। करनाल ने असल में साम्राज्य की साख खत्म की। यह नोट दो और बातें साफ करता है: किताबों में इस लड़ाई की दो तारीखें क्यों छपती हैं, और दिल्ली के कत्लेआम में मरने वालों के आँकड़े असल में किन स्रोतों पर टिके हैं।

नादिर शाह: एक नजर में

नादिर शाह ने 1736 से 1747 तक ईरान पर राज किया और थोड़े समय तक चले अफशारी वंश की नींव रखी। ब्रिटानिका के मुताबिक उसका साम्राज्य सिंधु से काकेशस तक फैला था।

तथ्यविवरण
जन्म1688, खुरासान में मशहद के उत्तर में दर्रा गज जिले में; ब्रिटानिका 22 अक्टूबर बताती है, एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका नवंबर
कबीलाअफशार तुर्कमानों का किरकलू कुनबा
नामनद्र कुली बेग; शाह तहमास्प द्वितीय के समय तहमास्प कुली खान (‘तहमास्प का सेवक’); 1736 से नादिर शाह, जिसे हिंदी में नादिरशाह भी लिखा जाता है
राज्याभिषेक8 मार्च 1736, मुगान के मैदान में हुई एक सभा के बाद
भारत अभियानकंधार (1738), काबुल (जून 1738), लाहौर, करनाल (फरवरी 1739), दिल्ली (मार्च से मई 1739)
प्रतिद्वंद्वीमुगल बादशाह मुहम्मद शाह (शासनकाल 1719 से 1748), जिसे पहले हराया गया और फिर गद्दी पर लौटाया गया
लूटशाही जवाहरात, जिनमें कोहिनूर और शाहजहाँ का मयूर सिंहासन शामिल थे; कुल लूट आम तौर पर 70 करोड़ रुपये आँकी जाती है
छीना गया इलाकासिंधु के पश्चिम के मुगल प्रांत, कश्मीर से सिंध तक, ठट्ठा समेत
मृत्युजून 1747, खुरासान के फतहाबाद में अपने ही अफसरों के हाथों मारा गया

नादिर कुली ईरान की गद्दी तक कैसे पहुँचा

नादिर करीब दस साल में चरवाहों के एक परिवार से गद्दी तक पहुँच गया, और उसकी सीढ़ी बना एक ढहता हुआ राजवंश। सफवी 1501 से ईरान का शिया शाही घराना थे। 1722 में वे अपनी राजधानी इस्फहान गिलजई अफगान हमलावरों के हाथों गँवा बैठे, और इसके बाद देश भर में नए-नए सेनापति सिर उठाने लगे। नादिर का उदय चार कदमों में हुआ:

  • तहमास्प द्वितीय की सेवा। सफवी शहजादे तहमास्प को कजविन में शाह घोषित किया गया था। 1720 के दशक के मध्य में उसने नादिर को अपना मुख्य सेनापति बनाया, और नादिर ने तहमास्प कुली खान की उपाधि ले ली।
  • अफगानों की विदाई, 1729। मई 1729 में उसने हेरात के पास अब्दाली अफगानों को हराया, और 29 सितंबर 1729 को मेहमानदोस्त में गिलजइयों को। ईरानिका इसी को ईरान में अफगान शासन का असली अंत मानती है।
  • संरक्षक, 1732। जब तहमास्प ने उस्मानियों (ऑटोमन) को जमीन सौंपने वाले समझौते पर दस्तखत कर दिए, तो नादिर ने अगस्त 1732 में उसे गद्दी से हटा दिया। उसने तहमास्प के आठ महीने के बेटे को अब्बास तृतीय के नाम से गद्दी पर बिठाया और खुद उसका संरक्षक (रीजेंट) बन गया।
  • शाह, 1736। उसने ईरान के कबीलों और शहरों के मुखियाओं को मुगान के मैदान में इकट्ठा किया, उनसे खुद को चुनवाया और 8 मार्च 1736 को उसका राज्याभिषेक हुआ।

उसने उस शिया-सुन्नी झगड़े को खत्म करने की भी कोशिश की, जिसने ईरान को उसके पड़ोसियों से भिड़ा रखा था। उसका प्रस्ताव था कि इस्ना अशरी (बारह इमामों को मानने वाले) शिया मत को जाफरी मजहब माना जाए। यानी सुन्नी इस्लाम के भीतर कानून (फिकह) का पाँचवाँ मत, जिसका नाम छठे इमाम जाफर अल-सादिक पर रखा गया। उस्मानियों ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। इससे पता चलता है कि वह खुद को कैसे देखता था: एक तुर्कमान विजेता, जो उस्मानी और मुगल दरबारों से रिश्तेदारी जैसा नाता जोड़ना चाहता था, न कि किसी शिया राजवंश का वारिस।

1738 में उसने करीब एक साल की घेराबंदी के बाद गिलजइयों के आखिरी गढ़ कंधार को तबाह कर दिया। इस जीत ने उसकी सेना को सीधे मुगल सरहद पर ला खड़ा किया।

नादिर शाह ने भारत पर आक्रमण क्यों किया?

बहाना थे अफगान भगोड़े। असली वजह थी एक दौलतमंद साम्राज्य, जो अब अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा था। ईरानिका दर्ज करती है कि नादिर ने मुगलों पर आरोप लगाया कि वे उन अफगानों को पनाह दे रहे हैं जो भागकर उनकी सरहद के पार चले गए थे। उनका पीछा करते-करते यह अभियान आक्रमण में बदल गया। मुगल दरबार ने उसकी चिट्ठियों का जवाब भी नहीं दिया था।

इस बहाने के पीछे तीन दशक की गिरावट छिपी थी। नक्शे पर मुगल साम्राज्य अब भी पूरा दिखता था, लेकिन 1707 में औरंगजेब की मौत के बाद उसका केंद्र भीतर से खोखला हो चुका था:

  • बँटा हुआ दरबार। मध्य एशियाई मूल के अमीरों का तूरानी गुट निजाम-उल-मुल्क और उसके चचेरे भाई वजीर कमरुद्दीन खान की अगुवाई में था। यह गुट खान-ए-दौरान के हिंदुस्तानी गुट से लड़ता रहता था। खान-ए-दौरान मीर बख्शी था, यानी सेना का मुख्य वेतन-अधिकारी।
  • अपनी राह चलते प्रांत। निजाम-उल-मुल्क 1724 में हैदराबाद को स्वतंत्र बना चुका था। सआदत खान बुरहान-उल-मुल्क 1722 में अवध का सूबेदार बना था, और तभी से उसे अपना अलग राज्य बनाने में लगा था।
  • मराठे। बाजीराव के नेतृत्व में उन्होंने मालवा और गुजरात ले लिए थे और दो बार निजाम को हरा चुके थे।
  • भूखी सरहद। जदुनाथ सरकार बताते हैं कि लाहौर के सूबेदार जकरिया खान को पैसा और फौज देने से मना कर दिया गया, क्योंकि वह विरोधी गुट का आदमी था।

काबुल से करनाल तक पहुँचने में करीब आठ महीने लगे। सरकार की पुरानी शैली (Old Style) वाली गणना के हिसाब से काबुल के किले ने 19 जून 1738 को हथियार डाल दिए, और वहाँ का शाही खजाना और हाथी नादिर के हाथ लगे। 1738 के आखिर में उसने खैबर दर्रा पार किया, अटक में सिंधु नदी पर पुल बाँधा और लाहौर ले लिया। मुहम्मद शाह कहीं जाकर 29 जनवरी 1739 को दिल्ली से निकला। उसने करनाल में डेरा डाला, जो पुरानी दिल्ली-लाहौर सड़क पर पानीपत से 20 मील उत्तर में है।

करनाल की लड़ाई में क्या हुआ?

24 फरवरी 1739 को करनाल में नादिर की सेना ने एक ही दोपहर में मुगल फौज को तोड़ दिया। वह इसलिए जीता क्योंकि मुगल सेनापति तीन अलग-अलग सेनाओं की तरह लड़े, और उनमें से भी सिर्फ दो ने सच में लड़ाई लड़ी।

दोनों तरफ की संख्या में उतना फर्क नहीं था जितना नतीजे से लगता है। सरकार के अनुसार मुगलों की लड़ने वाली ताकत 75,000 से ज्यादा नहीं थी, और वह भी साथ चलने वाले लोगों से ठसाठस भरे एक डेरे के भीतर। सामने फारसी सेना थी, जिसे इतिहास-लेखक रुस्तम अली ने 55,000 घुड़सवारों की आँका। असली फर्क कमान और मारक ताकत (फायरपावर) में था। लड़ाई चार चालों में आगे बढ़ी:

  • देर से पहुँचना। सआदत खान एक महीने की थका देने वाली तेज कूच के बाद अपनी अवध की टुकड़ी के साथ करीब आधी रात को डेरे में पहुँचा।
  • चारा। अगले दिन फारसी झड़प-दस्तों ने उसके सामान पर धावा बोला, और वह कोई योजना बनने का इंतजार किए बिना सामान छुड़ाने निकल पड़ा।
  • जाल। खान-ए-दौरान उसकी मदद के लिए पीछे-पीछे गया, और दोनों नादिर के बंदूकचियों से जा भिड़े। नादिर ने अपने 3,000 सबसे अच्छे सैनिक घात में छिपा रखे थे।
  • खाली बाजू। सरकार दर्ज करते हैं कि निजाम, जो मुगल पक्ष का सबसे काबिल जनरल था, पूरे दिन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। शायद उसे उम्मीद थी कि विरोधी मारे गए तो उनके पद उसे मिल जाएँगे।

तीन घंटे से भी कम में सब खत्म हो गया। सआदत खान पकड़ा गया और खान-ए-दौरान को जानलेवा घावों के साथ वापस लाया गया; ब्रिटानिका के अनुसार अगले दिन उसकी मौत हो गई। मुगल पक्ष के मरने वालों के अनुमान 8,000 से 30,000 तक जाते हैं। निचला आँकड़ा रुस्तम अली की गिनती है, जैसी सरकार ने उसे दोबारा जोड़कर निकाला। ऊपरी आँकड़ा नादिर के दरबारी इतिहासकार का है, जिसे सरकार बढ़ा-चढ़ाकर बताया हुआ मानते हैं।

50 लाख से दिल्ली तक

करनाल एक हार थी, लेकिन अभी तबाही नहीं बनी थी। निजाम फारसी डेरे में गया और 50 लाख रुपये के युद्ध-हर्जाने पर बात पक्की कर आया। यह रकम करनाल से काबुल के रास्ते में चार किस्तों में चुकानी थी, और उसके बाद नादिर घर लौट जाता। नादिर ने पूछा कि उसकी चिट्ठियों को नजरअंदाज क्यों किया गया। निजाम ने जवाब दिया कि फर्रुखसियर की मौत के बाद से सरकार “अमीरों के आपसी झगड़ों की वजह से पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है”।

फिर दरबार की राजनीति ने यह सौदा बिगाड़ दिया। खान-ए-दौरान की मौत के बाद निजाम ने खाली हुआ बख्शी का पद खुद ले लिया, जबकि सआदत खान लंबे समय से इसी पद पर नजर गड़ाए था। सरकार का ब्योरा इतिहास-लेखक हरचरनदास पर आधारित है। इसके मुताबिक बंदी सआदत खान ने नादिर से कहा कि 50 लाख तो घाटे का सौदा है, जबकि दिल्ली से नकदी और जवाहरात में 20 करोड़ निकल सकते हैं। इसके बाद नादिर बादशाह को अपने डेरे में साथ लिए राजधानी की ओर मुड़ गया।

नादिर शाह ने दिल्ली में कत्लेआम का आदेश क्यों दिया?

उसकी मौत की एक झूठी अफवाह से दंगा भड़का, जिसमें उसके सैनिक मारे गए। नादिर ने इसका जवाब पूरे-पूरे मोहल्लों को सजा देकर दिया।

नादिर 20 मार्च 1739 को दिल्ली में दाखिल हुआ और लाल किले के दीवान-ए-खास के पास शाहजहाँ के अपने महल के कमरों में ठहरा। सरकार के ब्योरे के अनुसार उसी रात सआदत खान ने जहर खा लिया, क्योंकि वादा किया हुआ पैसा न जुटा पाने पर उसे फटकार पड़ी थी। अगले दिन ईद-उज-जुहा थी, और जामा मस्जिद के मिंबर से नादिर का नाम बादशाह के तौर पर पढ़ा गया। दोपहर को बाजारों में एक किस्सा फैल गया कि महल की एक कलमाक महिला पहरेदार ने बादशाह के हुक्म पर उसे गोली मार दी है। भीड़ ने गलियों में दो-दो, तीन-तीन की टोलियों में घूम रहे फारसी सैनिकों पर हमला कर दिया, और लड़ाई पूरी रात चलती रही।

22 मार्च 1739 को सूरज निकलते ही नादिर कवच पहनकर रोशन-उद-दौला की सुनहरी मस्जिद पहुँचा, जो चाँदनी चौक के बीचों-बीच है। उसने पता किया कि हमले किन मोहल्लों से हुए थे, और संकेत के तौर पर अपनी तलवार खींच ली। उसके सैनिकों ने चाँदनी चौक, दरीबा बाजार और जामा मस्जिद के आसपास की गलियों में लूटपाट की और आग लगाई। हिंदू और मुसलमान एक साथ जलाए गए। सरकार के हिसाब से कत्लेआम सुबह करीब 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक चला; लॉरेंस लॉकहार्ट छह घंटे बताते हैं। यह तब रुका जब मुहम्मद शाह ने निजाम और वजीर को शहर की जान की भीख माँगने भेजा।

दिल्ली के कत्लेआम में कितने लोग मारे गए?

मरने वालों की किसी ने भरोसेमंद गिनती नहीं की। आँकड़े बहुत अलग-अलग दर्जे के स्रोतों से आते हैं, जैसा सरकार की सूची दिखाती है:

  • 8,000, कोतवाल की बाद में की गई गिनती, जैसी वह अब्दुल करीम के संस्मरणों की उस पांडुलिपि में दर्ज है जो सरकार के पास थी।
  • 20,000, यही गिनती, उस प्रति में जिसे एच. एम. इलियट की ग्रंथमाला के अनुवादक ने इस्तेमाल किया।
  • 30,000, जो नादिर के अपने राज-सचिव मिर्जा महदी ने दिया है।
  • 50,000, और कहीं-कहीं 3 से 4 लाख, दूर से सुनी-सुनाई बातों पर लिखे गए मराठा समाचार-पत्रों में।
  • 1 लाख, हरचरनदास के यहाँ; यात्री जोनस हैनवे इसमें 10,000 और जोड़ देता है।

सरकार ने 20,000 को सबसे संभावित आँकड़ा माना, क्योंकि कत्लेआम छोटे इलाके में हुआ और कुछ ही घंटे चला। याद रखने लायक यही संख्या है, और साथ में सरकार का नाम भी। यह याद मरने वालों से कहीं ज्यादा समय तक जिंदा रही: शायर मीर और सौदा ने दिल्ली की बर्बादी का मातम मनाया, और लॉकहार्ट ने दर्ज किया कि दिल्ली के बाजार में नादिरशाही का मतलब ही कत्लेआम हो गया था।

नादिर शाह भारत से क्या-क्या ले गया?

नादिर मुगलों के शाही जवाहरात, खजाना और अमीरों की दौलत ले गया, और फिर सिंधु के पश्चिम के प्रांत भी। कुल रकम भले पक्के तौर पर न बताई जा सके, लेकिन अलग-अलग चीजें भरोसे के साथ गिनाई जा सकती हैं:

  • मयूर सिंहासन। यह तख्त-ए-ताऊस शाहजहाँ के लिए बना था, और सरकार के अनुसार इस पर 2 करोड़ रुपये खर्च हुए थे।
  • कोहिनूर, जो बाकी शाही जवाहरात के साथ सौंपा गया।
  • खजाने। हैनवे ने सरकारी खजानों में 3 करोड़ दर्ज किए, और भीतरी तहखानों में इससे कहीं ज्यादा, जो कई बादशाहों के दौर से बंद पड़े थे।
  • नागरिकों से वसूली। कत्लेआम में बच गए खाते-पीते लोगों को अपनी आधी संपत्ति देने का हुक्म हुआ, जो कुल मिलाकर 2 करोड़ तय की गई।
  • जानवर और कारीगर। करीब 300 हाथी, 10,000 घोड़े और 10,000 ऊँट ले जाए गए। साथ में कई सौ राजमिस्त्री, बढ़ई, लोहार और पत्थर तराशने वाले भी, ताकि ईरान में एक दिल्ली बसाई जा सके; इनमें से बहुत-से कारीगर लाहौर पहुँचने से पहले ही खिसक गए।

आम तौर पर बताई जाने वाली कुल रकम 70 करोड़ रुपये है। यह आँकड़ा स्कॉटिश लेखक जेम्स फ्रेजर से आता है, जिसे सरकार बढ़ा-चढ़ाकर लिखने वाला मानते थे। लॉकहार्ट और इस दौर पर IGNOU की पाठ्य-इकाई कम से कम इतनी रकम मानते हैं। अंदाजा लगाने के लिए देखिए: करनाल में तय पूरा हर्जाना 50 लाख था, यानी इसके सौवें हिस्से से भी कम।

12 मई 1739 को नादिर ने एक बड़ा दरबार लगाया और अपने हाथों से हिंदुस्तान का ताज मुहम्मद शाह के सिर पर रखा। इसके बाद बादशाह ने सिंधु के पश्चिम के प्रांत, कश्मीर से सिंध तक, ठट्ठा और उसके बंदरगाहों समेत, उसे भेंट कर दिए। नादिर 16 मई 1739 को दिल्ली से रवाना हुआ। ईरान लौटकर इस लूट के बल पर उसने तीन साल तक सारे कर माफ कर दिए।

नादिर शाह के आक्रमण ने भारतीय इतिहास को कैसे बदला

इस आक्रमण ने मुगल राज्य को खत्म नहीं किया। उसने पुणे से काबुल तक हर ताकत को दिखा दिया कि इस राज्य के लिए अब कोई लड़ने वाला नहीं है। सतीश चंद्र इसे साफ शब्दों में कहते हैं: 1739 में नादिर ने बादशाह को कैद किया और दिल्ली पर कब्जा किया, तो साम्राज्य की कमजोरी पूरी दुनिया के सामने आ गई। नादिर शाह का आक्रमण पाँच दिशाओं में असर छोड़ गया:

  • खाली खजाना। शाही जवाहरात और पुराने तहखाने जा चुके थे, और ब्रिटानिका के शब्दों में मुगल प्रतिष्ठा को भारी चोट पहुँची।
  • खुला उत्तर-पश्चिम। सरकार ध्यान दिलाते हैं कि काबुल, पेशावर और खैबर के विदेशी हाथों में जाने से पंजाब दिल्ली पर नए अभियानों का शुरुआती ठिकाना बन गया।
  • अहमद शाह अब्दाली। अब्दाली नादिर के सेनापतियों में से एक के रूप में उभरा। 1747 के बाद उसने अफगानिस्तान में दुर्रानी राज्य की नींव रखी और 1748 से 1767 के बीच कई बार उत्तर भारत पर हमला किया। 1761 में उसने पानीपत की तीसरी लड़ाई जीती।
  • मराठे। बाजीराव ने लिखा कि बादशाह की मदद करने से मराठा राज्य का यश बढ़ेगा, लेकिन कोई मराठा सेना करनाल तक नहीं पहुँची। दिल्ली पर कब्जे के दौरान उसने दक्कन को बचाने के लिए चंबल पर मोर्चा थामने की योजना बनाई। दो दशक बाद पानीपत में अब्दाली का सामना मुगलों ने नहीं, मराठों ने किया।
  • उत्तराधिकारी राज्य। हैदराबाद और अवध ने अपनी स्वायत्तता बनाए रखी, लेकिन दिल्ली से रिश्ते भी नहीं तोड़े। इसीलिए इतिहासकार मुजफ्फर आलम इस बदलाव को पतन नहीं, रूपांतरण कहते हैं।

नादिर को खुद इससे खास कुछ हासिल नहीं हुआ। 1741 में उस पर जानलेवा हमला हुआ, और उसकी साजिश के शक में उसने अपने सबसे बड़े बेटे को अंधा करवा दिया; भारी कर फिर लौट आए और एक के बाद एक विद्रोह होते रहे। जून 1747 में अफशार और काजार अफसरों की एक टोली ने फतहाबाद में उसकी हत्या कर दी, और जल्द ही उसका साम्राज्य बिखर गया।

नादिर शाह के बारे में इतिहासकारों के विवाद

चार बातों पर स्रोत आज भी एकमत नहीं हैं:

  • हर घटना की दो तारीखें। सरकार और IGNOU की पाठ्य-इकाई करनाल की तारीख 13 फरवरी 1739 छापते हैं; ब्रिटानिका 24 फरवरी। दोनों सही हैं। सरकार ने पुरानी शैली (जूलियन) का कैलेंडर इस्तेमाल किया, जो नई शैली (New Style, ग्रेगोरियन) के कैलेंडर से 11 दिन पीछे चलता है। लॉकहार्ट नई शैली इस्तेमाल करते हैं। इसी फर्क से सरकार का 11 मार्च वाला कत्लेआम 22 मार्च बन जाता है।
  • पैमाना। मरने वालों की संख्या 8,000 से कई लाख तक जाती है। लूट का आँकड़ा मिर्जा महदी के 15 करोड़ से शुरू होता है, जो सिर्फ तोहफों का है और जिसमें तख्त भी शामिल है, और 70 करोड़ और उससे आगे तक जाता है।
  • गद्दारी या गुटबाजी? इतिहासकार शाकिर खान का दावा था कि जकरिया खान ने निजाम और सआदत खान के इशारे पर नादिर को लाहौर में घुसने दिया; सरकार इसे गुटबाजी की कड़वाहट कहकर खारिज करते हैं। करनाल में निजाम का हाथ पर हाथ धरे बैठना तो दर्ज है, लेकिन उसकी मंशा सिर्फ अंदाजा है।
  • यह कितना निर्णायक था? ब्रिटानिका कहती है कि करनाल ने असल में मुगल साम्राज्य का अंत कर दिया। IGNOU की पाठ्य-इकाई इससे असहमत है: अब्दाली के हमलों ने दिल्ली को और बुरी हालत में छोड़ा, और 1772 तक शहर फिर सँभल गया था। सतीश चंद्र पतन की जड़ जागीरदारी व्यवस्था के संकट में देखते हैं। यानी मनसबदारी व्यवस्था के तहत बहुत कम राजस्व-जागीरों के पीछे बहुत ज्यादा अमीरों की दौड़।

संतुलित उत्तर करनाल को पतन का कारण नहीं मानता, बल्कि वह पल मानता है जब पतन साफ दिखने लगा।

नादिर शाह और उसकी लूट: आज की स्थिति

तख्त अब नहीं रहा, हीरा लंदन में है और लड़ाई का मैदान हरियाणा का एक जिला शहर है। हर चीज के साथ क्या हुआ, देखिए:

  • मयूर सिंहासन। ब्रिटानिका दर्ज करती है कि नादिर ने इससे मेल खाता एक दीवान भी बनवाया और दोनों को ईरान ले गया। वहाँ कुर्दों से लड़ाई में दोनों खो गए, और लगता है कुर्दों ने उन्हें तोड़ डाला। बाद में तेहरान में दिखाए गए तख्त नकल हैं।
  • कोहिनूर। नादिर की मौत के बाद यह अहमद शाह के पास गया, फिर उसके वंशज शाह शुजा के पास, जिसे इसे महाराजा रणजीत सिंह को सौंपने पर मजबूर होना पड़ा। 1849 में पंजाब को अपने राज में मिलाने पर अंग्रेजों ने इसे ले लिया, और तब से यह ब्रिटिश शाही जवाहरात का हिस्सा है। भारत इसकी वापसी की माँग करता रहा है, और 2023 में चार्ल्स तृतीय के राज्याभिषेक में इसे शामिल नहीं किया गया।
  • 2025 की बातचीत। 2 मई 2025 को ब्रिटेन की संस्कृति मंत्री लिसा नंदी और भारत के संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने नई दिल्ली में ब्रिटेन-भारत सांस्कृतिक सहयोग कार्यक्रम पर दस्तखत किए। उसी दौरे में कोहिनूर लौटाने के बारे में पूछे जाने पर नंदी ने सहयोग और ऐसी कलाकृतियों तक साझा पहुँच की बात की, वापसी की नहीं।
  • करनाल। जिला प्रशासन का इतिहास पेज शहर की अहमियत की शुरुआत 1739 में नादिर की जीत से मानता है।

परीक्षा के लिए नादिर शाह कैसे पढ़ें

नादिर शाह मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास के जोड़ पर खड़ा है। GS पेपर I का आधुनिक इतिहास मोटे तौर पर अठारहवीं सदी के मध्य से शुरू होता है, और यह कहानी आम तौर पर उसी के आक्रमण से शुरू की जाती है। प्रीलिम्स का इतिहास बाद के मुगलों को कवर करता है, और इतिहास वैकल्पिक विषय अठारहवीं सदी को सीधे पूछता है। Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 1,403 में से 184 प्रश्न इतिहास के हैं।

मुख्य परीक्षा व्यक्ति से ज्यादा उसके दौर की थीम को परखती है। 2026 में इतिहास वैकल्पिक के पेपर I ने पूछा: “क्या आप भारत में अठारहवीं सदी को ‘अंधकार युग’ का दौर मानेंगे, या आर्थिक विकास का काल? स्पष्ट कीजिए।” ‘अंधकार युग’ वाले पक्ष के लिए दिल्ली की लूट सबसे मजबूत सबूत है, और 1772 तक दिल्ली का फिर सँभल जाना उसका जवाब। 2019 में इतिहास वैकल्पिक के पेपर I ने पूछा: “18वीं सदी में मुगलों के पतन को जितना दरबारी षड्यंत्रों ने तेज किया, उतना ही प्रांतीय शक्तियों की अवज्ञा ने भी। टिप्पणी कीजिए।” करनाल, जो सआदत खान की जल्दबाजी और निजाम के हाथ पर हाथ धरे बैठने से हारी गई, इसका तैयार उदाहरण है।

जिन तथ्यों को पक्का कर लेना चाहिए:

  • 8 मार्च 1736 को राज्याभिषेक; जून 1747 में फतहाबाद में हत्या।
  • काबुल, जून 1738; करनाल, 24 फरवरी 1739; दिल्ली का कत्लेआम, 22 मार्च 1739; वापसी, 16 मई 1739।
  • करनाल में: सआदत खान पकड़ा गया, खान-ए-दौरान जानलेवा रूप से घायल हुआ, निजाम लड़ाई से दूर रहा।
  • 50 लाख का हर्जाना तय हुआ, करीब 70 करोड़ की लूट हुई, जिसमें मयूर सिंहासन और कोहिनूर शामिल थे।
  • सौंपे गए इलाके: सिंधु के पश्चिम के प्रांत, कश्मीर से सिंध तक, ठट्ठा समेत।
  • कत्लेआम में मौतें: सरकार के अनुमान से करीब 20,000, जबकि पूरी रेंज 8,000 से कई लाख तक।

तीन गड़बड़ियाँ सबसे ज्यादा अंक कटवाती हैं:

  • नादिर और अब्दाली। नादिर ईरानी तुर्कमान था, जिसने सिर्फ एक बार, 1738-39 में, आक्रमण किया। अब्दाली उसका अफगान सेनापति था, जिसने 1748 से बार-बार हमले किए और 1761 में पानीपत में जीत हासिल की।
  • करनाल और पानीपत। दोनों मैदान एक ही सड़क पर 20 मील के फासले पर हैं। लेकिन करनाल में नादिर मुगलों से लड़ा था, जबकि पानीपत की तीसरी लड़ाई अब्दाली और मराठों के बीच थी।
  • फरवरी की दो तारीखें। 13 फरवरी (पुरानी शैली) और 24 फरवरी (नई शैली) एक ही दिन हैं।

उसे दिल्ली पर कब्जा करने वाले बाकी आक्रमणकारियों के साथ रखकर देखिए, तो उसका खास नुकसान साफ दिखता है:

आक्रमणकारीकबदिल्ली ने क्या झेलापीछे क्या छोड़ गया
तैमूर1398लूट और कत्लेआमकोई इलाका हाथ से नहीं गया; उसकी मौत के साथ खतरा खत्म
नादिर शाह1738-3922 मार्च 1739 का कत्लेआम; शाही जवाहरात छिनेसिंधु के पश्चिम के प्रांत सौंपे गए
अहमद शाह अब्दाली1748 से 1767बार-बार के हमले, जिन्होंने दिल्ली को नादिर से भी बदतर हाल में छोड़ापंजाब हाथ से गया; पानीपत में मराठों की हार

नादिर शाह दोहराई के एक घंटे के लायक है, पूरे एक दिन के नहीं, लेकिन वह घंटा सही होना चाहिए। उसे उस कड़ी परीक्षा की तरह पढ़िए जिसमें बाद का मुगल राज्य फेल हो गया। दोनों कैलेंडरों को अलग रखिए, और मौत और खजाने के हर आँकड़े को उसके स्रोत के साथ याद कीजिए। तब अठारहवीं सदी पर आने वाले किसी भी प्रश्न को सबसे अच्छा शुरुआती उदाहरण मिल जाएगा।

सामान्य प्रश्न

नादिर शाह कौन था?

नादिर शाह खुरासान के अफशार कबीले का तुर्कमान था, जो आखिरी सफवी शासकों के दौर में ऊपर उठा और 1736 में खुद ईरान का शाह बन बैठा। 1738-39 में उसने मुगल भारत पर आक्रमण किया, करनाल में मुहम्मद शाह को हराया और दिल्ली को लूटा। जून 1747 में उसके अपने अफसरों ने उसकी हत्या कर दी।

नादिर शाह ने भारत पर आक्रमण कब किया?

भारत पर नादिर शाह का आक्रमण 1738 से 1739 तक चला। उसने जून 1738 में काबुल लिया, उसी साल के आखिर में अटक पर सिंधु पार की, फरवरी 1739 में करनाल में जीत हासिल की और 20 मार्च को दिल्ली में दाखिल हुआ। 16 मई 1739 को उसने शहर छोड़ दिया।

करनाल की लड़ाई में क्या हुआ?

करनाल की लड़ाई 24 फरवरी 1739 को पानीपत के उत्तर में लड़ी गई, जिसे कई किताबें करनाल का युद्ध भी कहती हैं। इसमें नादिर शाह और मुहम्मद शाह, यानी मुगल बादशाह, आमने-सामने थे। मुगल सेनापति अलग-अलग लड़े: सआदत खान पकड़ा गया, खान-ए-दौरान जानलेवा रूप से घायल हुआ और निजाम-उल-मुल्क लड़ाई से दूर रहा। फारसी सेना तीन घंटे से भी कम में जीत गई।

नादिर शाह ने दिल्ली में कत्लेआम का आदेश क्यों दिया?

21 मार्च 1739 को अफवाह फैली कि नादिर मारा गया है, और इससे दंगा भड़क उठा जिसमें फारसी सैनिकों पर हमले हुए। अगली सुबह उसने अपनी फौज को उन मोहल्लों को सजा देने का हुक्म दिया जहाँ से हमले हुए थे, और कत्लेआम करीब छह घंटे चला। जदुनाथ सरकार ने करीब 20,000 मौतों को सबसे संभावित आँकड़ा माना।

नादिर शाह भारत से क्या-क्या ले गया?

वह मुगलों के शाही जवाहरात ले गया, जिनमें शाहजहाँ का मयूर सिंहासन और कोहिनूर शामिल थे। साथ में खजाना भी गया और दिल्ली के नागरिकों से की गई वसूली भी। कुल लूट का आम अनुमान 70 करोड़ रुपये है। मुहम्मद शाह ने सिंधु के पश्चिम के प्रांत भी उसे सौंप दिए।

मयूर सिंहासन अब कहाँ है?

असली मयूर सिंहासन अब मौजूद नहीं है। ब्रिटानिका दर्ज करती है कि नादिर शाह की मौत के बाद यह ईरान में कुर्दों से लड़ाई के दौरान खो गया, और लगता है कुर्दों ने सोने और जवाहरात के लिए इसे तोड़ डाला। बाद में तेहरान में दिखाए गए तख्त नकल हैं।

क्या नादिर शाह अफगान था?

नहीं। नादिर शाह खुरासान के अफशार तुर्कमान कबीले का ईरानी शासक था। उसी दौर का अफगान आक्रमणकारी अहमद शाह अब्दाली था, जो नादिर के सेनापतियों में से एक रह चुका था और जिसने 1747 के बाद दुर्रानी राज्य की नींव रखी।

नादिर शाह के आक्रमण का मुगल साम्राज्य पर क्या असर पड़ा?

इसने मुगल खजाना खाली कर दिया, साम्राज्य से सिंधु के पश्चिम की जमीन छीन ली और दरबार की कमजोरी हर प्रतिद्वंद्वी के सामने खोल दी। उत्तर-पश्चिम अहमद शाह अब्दाली के लिए खुल गया, जबकि मराठे, हैदराबाद और अवध पहले से ज्यादा दबंग होते गए। राजवंश बचा रहा, लेकिन अपनी साख फिर कभी वापस नहीं पा सका।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. नादिर शाह के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. वह तुर्कमानों के अफशार कबीले से था। 2. उसने अफगानिस्तान के दुर्रानी राजवंश की स्थापना की। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a) दुर्रानी राजवंश की स्थापना अहमद शाह अब्दाली ने की थी, जो नादिर का पूर्व सेनापति था।

2. करनाल की लड़ाई के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह 1739 में नादिर शाह और मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के बीच लड़ी गई थी। 2. निजाम-उल-मुल्क को युद्ध के मैदान में बंदी बना लिया गया था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a) अवध का सआदत खान पकड़ा गया था; निजाम लड़ाई से दूर रहा।

3. निम्नलिखित घटनाओं को कालक्रम में व्यवस्थित कीजिए: 1. पानीपत की तीसरी लड़ाई 2. करनाल की लड़ाई 3. नादिर शाह का राज्याभिषेक 4. नादिर शाह की हत्या। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  • (a) 3-2-4-1
  • (b) 2-3-4-1
  • (c) 3-2-1-4
  • (d) 2-3-1-4

उत्तर: (a) राज्याभिषेक (1736), करनाल (1739), हत्या (1747) और पानीपत (1761)।

4. मार्च 1739 में दिल्ली का कत्लेआम किस वजह से भड़का?

  • (a) करनाल में तय हर्जाना चुकाने से मुहम्मद शाह का इनकार
  • (b) यह अफवाह कि नादिर शाह मारा गया है
  • (c) फारसी डेरे पर मराठों का हमला
  • (d) सआदत खान की मौत

उत्तर: (b) नादिर की मौत की झूठी अफवाह के बाद फारसी सैनिकों पर हमले हुए, और बदले में उसने कत्लेआम का हुक्म दिया।

5. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. नादिर शाह के आक्रमण के बाद मुगलों ने सिंधु के पश्चिम के अपने प्रांत उसे सौंप दिए। 2. अहमद शाह अब्दाली ने बाद में मयूर सिंहासन दिल्ली को लौटा दिया। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a) मयूर सिंहासन कभी वापस नहीं आया; नादिर की मौत के बाद यह ईरान में खो गया।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. स्पष्ट कीजिए कि अठारहवीं सदी के मध्य का भारत किस तरह बिखरी हुई राजव्यवस्था के साये से घिरा हुआ था। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2017, GS पेपर I।
  2. करनाल की लड़ाई मैदान में हारने से पहले मुगल दरबार में हारी जा चुकी थी। सआदत खान और निजाम-उल-मुल्क की भूमिकाओं के संदर्भ में परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  3. इस मत का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए कि 1738-39 के नादिर शाह के आक्रमण ने असल में मुगल साम्राज्य का अंत कर दिया। (15 अंक, 250 शब्द)
  4. 1739 में सिंधु के पश्चिम के प्रांतों के हाथ से निकल जाने ने अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों को किस तरह आकार दिया? (10 अंक, 150 शब्द)
  5. 1739 के दिल्ली कत्लेआम में मरने वालों के अनुमान 8,000 से कई लाख तक हैं। यह फैलाव किसी इतिहासकार को अठारहवीं सदी के भारत के स्रोतों के बारे में क्या बताता है? (10 अंक, 150 शब्द)

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Written by

Ashish Shrivastav Sir

Ashish Shrivastav teaches Art and Culture and History at Anantam IAS. He works through temple architecture, painting, dance and the UNESCO sites the way Prelims actually asks about them, and links ancient and medieval material to GS I Mains answers.

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