UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

रणथंभौर का किला: चौहानों का गढ़, खिलजी की घेराबंदी और UNESCO का वन दुर्ग

रणथंभौर का किला: चौहानों से जुड़ी शुरुआत, 1301 में हम्मीर देव की घेराबंदी, फिर मेवाड़, मुगल और जयपुर का शासन, और UNESCO की सूची में इसकी जगह।

Crenellated walls and bastions of Ranthambore Fort along a rocky cliff top above dry forest in Sawai Madhopur, Rajasthan

रणथंभौर का किला पूर्वी राजस्थान का एक पहाड़ी किला है, जिसे चारों ओर से जंगल घेरे हुए है। यह सवाई माधोपुर के पास रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के भीतर थंभोर पहाड़ी पर खड़ा है। चौहान राजा हम्मीर देव की गद्दी यहीं थी। 1301 में अलाउद्दीन खिलजी के हाथों उनकी हार का अंत जौहर में हुआ। इसके बाद किला कई बार हाथ बदलता रहा, और आखिर में जयपुर के कछवाहा शासकों के पास जाकर टिका। 2013 से रणथंभौर किला UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल राजस्थान के छह पहाड़ी किलों में से एक है। इन छह में यही अकेला किला है जिसे वन दुर्ग (forest fort) के रूप में चुना गया।

ज्यादातर सारांश किले की स्थापना की एक तारीख बता देते हैं, आमतौर पर 944 ईस्वी, और आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन स्रोत इसकी इजाजत नहीं देते। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) एक परंपरा दोहराता है, जो पहला किला 5वीं सदी में रखती है। राजस्थान का पर्यटन विभाग 10वीं सदी बताता है। UNESCO ने जिस मूल्यांकन पर भरोसा किया, उसे किलेबंदी का पहला पक्का जिक्र 12वीं सदी में ही मिलता है। और पर्यटन विभाग का वही पेज अलाउद्दीन की घेराबंदी को 1303 में रख देता है, जो असल में चित्तौड़ का साल है। इसलिए रणथंभौर किले का इतिहास उसी रूप में याद रखिए जो परंपरा और दर्ज इतिहास को अलग-अलग रखे, और घेराबंदी का साल सही बताए।

रणथंभौर का किला क्या है और कहाँ है

रणथंभौर वन श्रेणी का पहाड़ी किला है। यानी दीवारों से घिरा एक पठार, जिसकी रक्षा का बड़ा हिस्सा खड़ी चट्टानें ही कर देती थीं। यह सूखे जंगल के बीच बसा है, और वही जंगल आज बाघों का घर है। सबसे पहले ये तथ्य पक्के कर लीजिए।

तथ्यविवरण
स्थानथंभोर पहाड़ी, रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के भीतर, पूर्वी राजस्थान में सवाई माधोपुर के पास
प्रकारवन पहाड़ी किला; UNESCO की सूची वाले राजस्थान के छह पहाड़ी किलों में अकेला वन दुर्ग
सबसे पुरानी तिथियाँ5वीं सदी के पुरातात्विक अवशेष; किलेबंदी का पहला पक्का जिक्र 12वीं सदी में (ICOMOS)
किलेबंदी किसने कीचौहान (चाहमान), जिनकी रणथंभौर शाखा 1301 में हम्मीर देव के साथ खत्म हुई
मुख्य घेराबंदियाँ1301 में अलाउद्दीन खिलजी; 1569 में अकबर
बाद के कब्जेदार1301 के बाद दिल्ली सल्तनत; 14वीं और 15वीं सदी में मेवाड़ के सिसोदिया; 1569 से मुगल; 1753 में जयपुर के सवाई माधो सिंह को सौंपा गया
दीवारें और दरवाजे5.4 किलोमीटर लंबी घेरने वाली दीवार; उत्तर से टेढ़ी-मेढ़ी चढ़ाई पर चार दरवाजे (नौलखा, हाथी, गणेश और अंधेरी पोल)
संरक्षणराष्ट्रीय महत्व का स्मारक, 28 नवंबर 1951 को अधिसूचित; ASI जयपुर मंडल
UNESCOराजस्थान के पहाड़ी किले, 21 जून 2013 को नोम पेन्ह में 37वें सत्र में सूची में शामिल; मानदंड (ii) और (iii)

अंग्रेजी में यह नाम कई वर्तनियों (spellings) में मिलता है, और सबका मतलब एक ही किला है:

  • Ranthambore, जो UNESCO की सूची में लिखा रूप है;
  • Ranthambhore और Ranthambhor, जिन्हें राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और ASI इस्तेमाल करते हैं;
  • Rantambhor, जो फारसी इतिहास-ग्रंथों के पुराने अंग्रेजी अनुवादों में मिलता है।

रणथंभौर का किला किसने बनवाया?

कोई भी स्रोत आपको पूरे भरोसे के साथ किसी संस्थापक का नाम लेने नहीं देता। सबूत इससे छोटी बात का साथ देते हैं: 12वीं सदी तक यह किला चौहानों का गढ़ बन चुका था, और इससे पुरानी हर तारीख परंपरा की देन है।

यहाँ सबूत की तीन परतें एक के ऊपर एक रखी हैं। ज्यादातर उलझन इन्हें एक ही चीज समझ लेने से पैदा होती है।

  • परंपरा, जैसा ASI दर्ज करता है। ASI का जयपुर मंडल बताता है कि कहा जाता है, यह किला 5वीं सदी में किसी महाराजा जयंत ने बनवाया था। फिर यह यादवों के पास रहा, जब तक 12वीं सदी में पृथ्वीराज चौहान ने उन्हें यहाँ से निकाल नहीं दिया।
  • पर्यटन विभाग की तारीख। राजस्थान पर्यटन के मुताबिक चौहान शासकों ने यह किला 10वीं सदी में बनवाया, और वह साल 944 ईस्वी बताता है। पेज इन दोनों में से किसी बात के लिए कोई शिलालेख नहीं देता।
  • पुरातत्व। ICOMOS, यानी वह संस्था जिसने UNESCO के लिए इस किले का मूल्यांकन किया, रणथंभौर के सबसे पुराने अवशेषों को 5वीं सदी का मानती है। लेकिन किलेबंदी की संरचनाओं का पहला पक्का जिक्र उसे 12वीं सदी में ही मिलता है, जब यह पहाड़ी पहले से एक जाना-माना जैन तीर्थ थी।

तो उत्तर में इसे कैसे लिखें? “12वीं सदी तक रणथंभौर चौहानों का गढ़ था; परंपरा इसकी शुरुआत 5वीं या 10वीं सदी में रखती है।” यह वाक्य ऊपर के हर स्रोत की कसौटी पर खरा उतरता है। “चौहानों ने 944 ईस्वी में बनवाया” वाला वाक्य सिर्फ एक स्रोत पर टिकता है।

पृथ्वीराज चौहान से यह रिश्ता सिर्फ स्थानीय गर्व की बात नहीं है। यह जुड़ाव दिल्ली के अपने इतिहासकारों ने जोड़ा था। जियाउद्दीन बरनी हम्मीर देव को “राय पिथौरा” का पोता बताते हैं। फारसी इतिहासकार पृथ्वीराज को इसी नाम से पुकारते थे। अमीर खुसरो उन्हें पृथ्वीराज का वंशज कहते हैं। यानी रणथंभौर वह जगह थी जहाँ पृथ्वीराज की हार के बाद उनके घराने की एक शाखा टिकी रही।

ASI यह भी दर्ज करता है कि दिल्ली के सुल्तानों ने भी कुछ समय तक इस किले पर कब्जा रखा। लेकिन सबसे अहम शासक चौहान वंश के आखिर में आए। ASI हम्मीर देव को रणथंभौर का सबसे ताकतवर शासक और कला-साहित्य का संरक्षक कहता है। आज UNESCO जिस महल को खास तौर पर गिनाता है, वह भी उन्हीं के नाम पर है।

1301 में रणथंभौर के किले में क्या हुआ?

दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 1301 के वसंत और शुरुआती गर्मियों भर किले को घेरे रखा। जुलाई में उन्होंने किला जीत लिया, जब भूख और प्यास ने किले की सेना को तोड़ दिया था। हम्मीर देव लड़ते हुए मारे गए, और किले की स्त्रियों ने जौहर किया। जौहर यानी दुश्मन के हाथ पड़ने से बचने के लिए सामूहिक रूप से आग में जान दे देना। इसके बाद 1303 में चित्तौड़ की बारी आई। पूरे अभियान की कहानी खिलजी वंश वाले नोट में है।

दिल्ली ने रणथंभौर पर चढ़ाई क्यों की

चिंगारी थी शरण। गुजरात जीतकर लौटते समय दिल्ली की सेना के एक हिस्से ने बगावत कर दी। कुछ बागी भागकर रणथंभौर पहुँच गए। ये हाल ही में इस्लाम अपनाने वाले मंगोल थे, जिन्हें इतिहास-ग्रंथ “नव-मुसलमान” (New Muslims) कहते हैं। हम्मीर ने उन्हें शरण दी, और आगे चलकर वे किले के सबसे पक्के रक्षकों में गिने गए।

दूरी भी मायने रखती थी। बरनी रणथंभौर को सुल्तान का पहला निशाना बताते हैं, और लिखते हैं कि यह दिल्ली से अपेक्षाकृत पास था। जिस शासक की नजर राजस्थान पर हो, वह राजधानी के इतने पास सिर उठाए खड़े किले को यूँ ही नहीं छोड़ सकता था।

घेराबंदी कैसे लड़ी गई

दिल्ली की ओर से पहले सेनापति उलुग खान और नुसरत खान थे। बरनी के मुताबिक उन्होंने पास का कस्बा झाइन जीता और फिर किले को घेर लिया। नुसरत खान दीवारों के बहुत पास जाकर घेराबंदी का काम करवा रहे थे। तभी एक मगरिबी (maghrabi) से फेंका गया पत्थर उन्हें लगा और उनकी मौत हो गई। मगरिबी पत्थर फेंकने वाला घेराबंदी का यंत्र था।

इसके बाद अलाउद्दीन खुद आए। तिलपत में उनकी जान लेने की कोशिश हुई, और दूसरी जगहों पर बगावतें भड़कीं, जिनमें एक दिल्ली में भी थी। फिर भी वे वापस नहीं लौटे। उनकी सेना ने एक पाशेब (pasheb) बनाया, यानी किले के पश्चिमी हिस्से से सटाकर उठाया गया ढलान वाला रैंप। इसके लिए रस्सियों को बुनकर बोरे बनाए गए, उनमें मिट्टी भरी गई, और उन्हें खाई में एक के ऊपर एक जमा दिया गया। रक्षकों ने पश्चिम की तीन बुर्जों से आग और तीरों से जवाब दिया। खुसरो के ग्रंथ के मुताबिक सेना रजब के महीने से जिलकाद तक किले की तलहटी में डेरा डाले रही। इस्लामी चंद्र कैलेंडर में यह करीब चार महीने बनता है, और घेरा भरी गर्मियों तक खिंच गया।

अंत कैसे हुआ: भूख, आग और जौहर

रणथंभौर को दीवार में पड़ी दरार ने नहीं, रसद की कमी ने तोड़ा। खुसरो लिखते हैं कि किले के अंदर अकाल इतना भयानक हो गया कि लोग “चावल के एक दाने के लिए सोने के दो दाने दे देते”, फिर भी चावल नहीं मिलता। वे यह भी जोड़ते हैं कि जो किला अपना पानी आसमान से पाता था, वह सूख गया। बारिश पर टिका किला अपनी दीवारें खत्म होने से बहुत पहले पानी खत्म होने से हार सकता है।

फिर खुसरो बताते हैं कि एक रात हम्मीर ने एक बड़ी आग जलवाई और अपने घराने की स्त्रियों को उसमें भेज दिया। उसके बाद उन्होंने पाशेब के सिरे तक आखिरी धावा बोला और मारे गए। राजपूत परंपरा इसी घटना को रणथंभौर के जौहर के रूप में याद करती है। खुसरो को उसी रूप में पढ़िए जो वे थे: सुल्तान के दरबारी कवि, जो सजी-धजी भाषा में जीत का बखान लिख रहे थे, कोई तटस्थ गवाह नहीं। हाँ, उनकी तारीख एकदम सटीक है। किला 3 जिलकाद 700 हिजरी (AH, यानी इस्लामी हिजरी साल) को गिरा, जो जुलाई 1301 में पड़ता है।

एक दूसरा वृत्तांत इस घेराबंदी को अलग नजर से देखता है। हम्मीर महाकाव्य जैन कवि नयचंद्र सूरि का संस्कृत महाकाव्य है, जो 15वीं सदी की शुरुआत में ग्वालियर के तोमर दरबार में लिखा गया। इसमें हम्मीर एक दुखांत नायक हैं, और किले के गिरने का दोष उनके अफसरों के विश्वासघात पर डाला गया है। इसकी कीमत यह है कि यह कहानी रक्षकों की तरफ से सुनाता है। लेकिन इसे भी खुसरो जितनी ही सावधानी से पढ़ना होगा, क्योंकि यह भी एक खास बात साबित करने के लिए लिखा गया था।

जीतने वालों ने इमारतों को भी नहीं बख्शा। ICOMOS के मुताबिक किले की सबसे पुरानी संरचनाएँ 1301 की लूटपाट में नष्ट हो गईं। दिल्ली के स्रोत बताते हैं कि राजधानी लौटने से पहले अलाउद्दीन ने किला उलुग खान को सौंप दिया।

1301 के बाद रणथंभौर का किला किसके पास रहा?

दिल्ली इसे ज्यादा दिन अपने पास नहीं रख पाई। किला पहले मेवाड़ के सिसोदियों के पास गया। फिर 1569 में अकबर के समय मुगलों के पास, और आखिर में 1753 के एक अनुदान से जयपुर के कछवाहा शासकों के पास पहुँचा।

मेवाड़ और हाड़ा

ICOMOS दर्ज करता है कि 1301 के कुछ ही समय बाद मेवाड़ के सिसोदिया राजपूतों ने किला ले लिया। राणा हमीर सिंह के समय इसका विस्तार हुआ, जिन्होंने 1326 से 1364 तक राज किया, और बाद में राणा कुंभा के समय भी। इन दो हम्मीरों को आपस में मिला देना आसान है, इसलिए इन्हें अलग-अलग रखिए। हम्मीर देव वे चौहान थे जो 1301 में रणथंभौर में मारे गए। राणा हमीर सिंह एक पीढ़ी बाद मेवाड़ के सिसोदिया शासक थे।

1569 में किला एक हाड़ा राजपूत, राय सुरजन हाड़ा के पास था। अकबर को इन्हीं को यहाँ से हटाना था।

1569 में अकबर की घेराबंदी

1568 में मेवाड़ से चित्तौड़ छीनने के बाद अकबर ने रणथंभौर का रुख किया। उनके सेनापतियों ने ढके हुए रास्ते (covered ways) बनवाए, ताकि तोपें दीवारों के पास तक लाई जा सकें। 1569 में सुरजन ने किला सौंप दिया। विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम (V&A) में रखी अकबरनामा की पेंटिंग्स में अकबर इस हमले का निर्देशन करते दिखते हैं। कुछ कैप्शनों में, जिनमें V&A का एक रिकॉर्ड भी है, आपको 1568 मिलेगा। लेकिन ICOMOS का मूल्यांकन और मानक इतिहास-ग्रंथ 1569 बताते हैं, और उत्तर में यही साल लिखिए।

दोनों बड़ी घेराबंदियों को साथ रखकर देखिए, युद्ध का बदला हुआ तरीका साफ दिख जाता है। 1301 में दिल्ली को मिट्टी भरे बोरों का रैंप और महीनों की भूख चाहिए थी। 1569 में ज्यादातर काम तोपों ने किया, और V&A का कैप्शन बताता है कि पूरा अभियान करीब एक महीने में निपट गया। इसके बाद सुरजन मुगल सेवा में आ गए। अकबर के राजपूत अभियानों का यही ढर्रा था: बड़े किले जीतो, फिर उनके सरदारों को शाही व्यवस्था में शामिल कर लो।

जयपुर के कछवाहा

किले ने आखिरी बार हाथ घेराबंदी से नहीं, अनुदान से बदला। ICOMOS दर्ज करता है कि 1753 में मुगल दरबार ने यह किला जागीर के रूप में जयपुर के सवाई माधो सिंह को दे दिया। ब्रिटानिका जयपुर के महाराजा के रूप में उनका शासनकाल 1751 से 1768 तक बताता है। वही उन्हें सवाई माधोपुर का परकोटे वाला शहर जयपुर जैसे नक्शे पर बसाने का श्रेय भी देता है।

कुछ सारांश जयपुर के कब्जे को 17वीं सदी में रख देते हैं, लेकिन UNESCO ने जिस मूल्यांकन का इस्तेमाल किया, वह 1753 बताता है। कछवाहा वही घराना था जिसकी पहले की राजधानी आमेर थी। रणथंभौर के आसपास का जंगल उनका शिकारगाह बन गया। ICOMOS के शब्दों में यह किला जयपुर महाराजा के पुराने शिकारगाहों की पहरेदारी करता खड़ा है, और वही शिकारगाह आज राष्ट्रीय उद्यान हैं।

रणथंभौर की रक्षा-व्यवस्था कैसे काम करती है: जंगल से महल तक

रणथंभौर को समझने का सबसे साफ तरीका यह है कि आप उस तक वैसे ही पहुँचिए जैसे कोई हमलावर पहुँचता, यानी बाहर से अंदर की ओर। हर परत अगली परत तक पहुँचना और मुश्किल बना देती थी।

जंगल और खड़ी चट्टान

पहली रक्षा-पंक्ति खुद जंगल था। ICOMOS चारों तरफ फैले घने जंगल को राजपूत वन दुर्ग की एक अतिरिक्त सुरक्षा कहता है। वह यह भी बताता है कि इस जंगल ने किले को छिपाए रखा, और दूर से यह मुश्किल से ही दिखता है।

पेड़ों के पीछे पहाड़ी उठती थी। कई जगह इसकी चोटी सीधी खड़ी होकर घाटी में गिरती है, और वहाँ बनाने वालों ने बहुत कम जोड़ा। जहाँ चट्टान यह काम नहीं कर पाती थी, वहाँ उन्होंने गोल बुर्जों (bastions) वाली मजबूत प्राचीरें बनाईं। बुर्ज दीवार से बाहर निकली मीनारें होती हैं, ताकि रक्षक दीवार के सामने वाले हिस्से पर बगल से वार कर सकें। ICOMOS इन दीवारों में आग्नेयास्त्रों के लिए बने चौकोर मारक छेद भी दर्ज करता है। ये संकरे छेद होते थे, जिनसे बंदूकची खुद आड़ में रहकर गोली चला सकता था। इनसे लगता है कि दीवारों के ये हिस्से बंदूकें आने के बाद बने, या फिर उनके हिसाब से दोबारा ढाले गए।

दरवाजे और टेढ़ी-मेढ़ी चढ़ाई

मुख्य रास्ता उत्तर की ओर से चट्टान में काटी गई सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ता है। 5.4 किलोमीटर लंबी घेरने वाली दीवार के भीतर, ऊपर जाते हुए ICOMOS चार दरवाजे गिनाता है:

  • नौलखा पोल;
  • हाथी पोल, यानी हाथी दरवाजा;
  • गणेश पोल;
  • अंधेरी पोल, यानी अंधेरा दरवाजा।

पोल का मतलब सीधे-सीधे दरवाजा है। इन दरवाजों के बीच का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा चलता है। ASI प्रवेश-द्वार को सीढ़ीदार और Z के आकार का द्वार बताता है, जिसमें दो मजबूत, भारी किवाड़ लगे हैं। अब हमला करती एक सैन्य टुकड़ी की कल्पना कीजिए। सीधी सड़क पर वह रफ्तार पकड़ सकती थी, और दरवाजों पर दीवार तोड़ने वाला लट्ठा या हाथी भिड़ा सकती थी। Z के आकार की चढ़ाई पर उसे हर दरवाजे पर रुकना और मुड़ना पड़ता है। वह दीवारों के नीचे सिमटकर जमा हो जाती है, और उसका बगल वाला हिस्सा ऊपर बैठे तीरंदाजों के सामने खुला रहता है। आखिरी दरवाजा महल वाले इलाके में खुलता है।

बीच में हम्मीर का महल और कचहरी

अंदर पहुँचकर बनावट राजस्थान के आम ढर्रे से हट जाती है। बाकी पहाड़ी किलों में महल पश्चिमी हिस्से में होते हैं। लेकिन ICOMOS बताता है कि रणथंभौर में रिहायशी और सरकारी इमारतें घेरे के बीचोंबीच खड़ी हैं। मुख्य संरचनाएँ ये हैं:

  • हम्मीर महल, यानी हम्मीर का महल, जिसे ICOMOS 1281 से 1301 के बीच का मानता है;
  • रानी महल, यानी रानियों का महल, जिसकी तिथि 1283 से 1381 दी गई है;
  • 17वीं और 18वीं सदी में जोड़ी गई बाद की इमारतें, जैसे सुपारी महल और दूल्हा महल;
  • हम्मीर बड़ी कचहरी और छोटी कचहरी, यानी वे बड़ी और छोटी अदालतें जिन्हें ASI गिनाता है (कचहरी का मतलब अदालत या दफ्तर है);
  • बत्तीस खंभा छतरी, यानी 32 खंभों पर टिका मंडप, जिसे ICOMOS 18वीं सदी में जोड़ी गई इमारतों में रखता है।

छतरी खंभों पर उठा गुंबद वाला मंडप होती है, जो अक्सर किसी की याद में बनाई जाती थी। UNESCO का मूल्य-विवरण (statement of value) कहता है कि हम्मीर के महल के अवशेष किसी भारतीय महल की बची हुई सबसे पुरानी संरचनाओं में से हैं। उस बयान के पीछे वाले ICOMOS मूल्यांकन ने एक शर्त जोड़ी थी, जिसे याद रखना चाहिए: “अगर इन्हें प्रामाणिक माना जाए”। इससे आपको पता चलता है कि यह दावा माना गया है, साबित नहीं हुआ।

मंदिर, एक मस्जिद और जैन अतीत

इस पहाड़ी पर पूजा-पाठ यहाँ की ज्यादातर इमारतों से पुराना है। ICOMOS गणेश मंदिर की स्थापना 5वीं सदी जितनी पुरानी मानता है, और ASI किले के मंदिरों में इसे खास तौर पर गिनाता है। आज इसे त्रिनेत्र गणेश मंदिर के नाम से जाना जाता है। त्रिनेत्र का मतलब है तीन आँखों वाला। श्रद्धालु आज भी किले की सड़क से होकर यहाँ पहुँचते हैं।

ASI कुछ जैन मंदिर भी दर्ज करता है। यह ICOMOS की उस बात से मेल खाता है कि 12वीं सदी तक यह पहाड़ी एक जाना-माना जैन तीर्थ बन चुकी थी। ICOMOS 13वीं या 14वीं सदी की एक मस्जिद और एक मुस्लिम कब्रगाह के अवशेष भी बताता है। ये किले पर दिल्ली के कब्जे वाले सालों की निशानी हैं।

पानी, सबसे कमजोर कड़ी

कोई भी पहाड़ी किला उतना ही मजबूत होता है जितना घेराबंदी के आखिरी महीने में उसका पानी। खुसरो के शब्दों में रणथंभौर का पानी आसमान से आता था। और 1301 की घेराबंदी भरी गर्मी में खत्म हुई, जब बारिश से भरे भंडार सबसे नीचे होते हैं। राजस्थान पर्यटन किले की खास पहचानों में इसके जलाशयों को गिनाता है। UNESCO भी बताता है कि छहों पहाड़ी किलों में जल-संचयन की बड़ी-बड़ी संरचनाएँ हैं, जिनमें से कई आज भी काम में आती हैं।

दीवारों के नीचे ICOMOS तीन बड़ी झीलों के नाम लेता है। ये प्राचीर से दिखती हैं और अब किले के बफर जोन के भीतर हैं:

  • पदम तालाब;
  • मलिक तालाब;
  • राजबाग।

रणथंभौर का किला आज: UNESCO, ASI और टाइगर रिजर्व

रणथंभौर किला एक साथ तीन तरह का दर्जा रखता है, और हर दर्जे के साथ उसके अपने नियम आते हैं:

  • विश्व धरोहर स्थल, राजस्थान के छह पहाड़ी किलों में से एक होने के नाते;
  • ASI द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय महत्व का स्मारक;
  • रणथंभौर टाइगर रिजर्व के भीतर बसा एक धरोहर स्थल।

UNESCO की सूची में जगह

विश्व धरोहर समिति ने 21 जून 2013 को कंबोडिया के नोम पेन्ह में अपने 37वें सत्र में “राजस्थान के पहाड़ी किले” को सूची में शामिल किया। यह पहली कोशिश में नहीं हुआ। 2012 में सेंट पीटर्सबर्ग में हुए 36वें सत्र में समिति ने नामांकन वापस भेज दिया था। उसने भारत से कहा था कि वह और साफ ढंग से दिखाए कि चुने गए किले राजपूत सैन्य स्थापत्य और भू-भाग की पूरी रेंज को कैसे समेटते हैं।

छह हिस्से एक-दूसरे से अलग दिखने के लिए चुने गए थे, और UNESCO हर एक को इस आधार पर बताता है कि वह सूची में क्या जोड़ता है:

  • चित्तौड़गढ़, सिसोदियों की पुरानी राजधानी और तीन मशहूर घेराबंदियों का निशाना;
  • कुंभलगढ़, जो एक ही दौर में बना, और जिसका डिजाइन वास्तुकार मंडन का माना जाता है;
  • रणथंभौर, वन दुर्ग;
  • गागरोन, जिसे नदियाँ बचाती हैं और जो व्यापार मार्गों पर नियंत्रण रखने वाले एक दर्रे पर बसा है;
  • आमेर, 17वीं सदी की राजपूत-मुगल दरबारी शैली का प्रमुख उदाहरण;
  • जैसलमेर, एक मरुस्थलीय किला, जिसके भीतर आज भी एक शहर बसा है।

यह दर्जा दो मानदंडों पर टिका है। आसान शब्दों में, मानदंड (ii) का मतलब है विचारों का लेन-देन। राजपूत किलों की योजना ने सल्तनत और मुगल निर्माण जैसे पड़ोसी तौर-तरीकों से सीखा, और बाद में मराठा स्थापत्य जैसी शैलियों पर असर डाला। मानदंड (iii) का मतलब है किसी सांस्कृतिक परंपरा का असाधारण सबूत। यहाँ वह परंपरा है शासक राजपूत कुलों के दरबार, और धर्म, कलाओं और साहित्य को उनका संरक्षण।

खुद रणथंभौर के लिए UNESCO दो चीजें गिनाता है: जंगल वाला परिवेश और हम्मीर के महल के अवशेष। आधिकारिक प्रविष्टि UNESCO विश्व धरोहर केंद्र की साइट पर है। भारत में UNESCO विश्व धरोहर स्थल वाला नोट इसे भारत के बाकी सूचीबद्ध स्थलों के बीच रखकर दिखाता है।

ASI का संरक्षण और देखभाल

किले को 28 नवंबर 1951 को उसी साल के अधिनियम के तहत राष्ट्रीय महत्व का स्मारक अधिसूचित किया गया, और ASI का जयपुर मंडल इसकी देखभाल करता है। 102 हेक्टेयर के मूल स्थल के चारों ओर इसका बफर जोन 372 हेक्टेयर में फैला है। बफर जोन आसपास की वह पट्टी होती है जहाँ परिवेश को बचाने के लिए निर्माण पर नियंत्रण रहता है। यहाँ इसमें पूरी पहाड़ी और नीचे की झीलें शामिल हैं।

2013 का ICOMOS मूल्यांकन किले की हालत पर बिना लाग-लपेट के बोला। उसने पाया कि:

  • रणथंभौर संरक्षण की ऐसी हालत में नहीं था कि कुछ मुख्य संरचनाओं में दर्शकों को सुरक्षित ढंग से अंदर जाने दिया जा सके;
  • वहाँ की जर्जर और टूटी-फूटी इमारतों पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत थी, और किले के भीतर पेड़-पौधों पर नियंत्रण सुधरना था;
  • घेरे के दूर-दराज हिस्सों में बने छोटे मंदिर और मंडप और भी बुरी हालत में थे, और उनका सर्वे होना चाहिए;
  • किले के भीतर बसे घरों को कहीं और बसाने की कोई भी योजना संबंधित लोगों से पूरी सलाह-मशविरे के साथ बननी चाहिए।

जंगल में खड़े किले के लिए पौधों की जड़ें और गिरते पेड़ असली खतरा हैं। इसीलिए पेड़-पौधों वाली बात बार-बार लौटकर आती है।

टाइगर रिजर्व के भीतर

NTCA रणथंभौर टाइगर रिजर्व को अरावली और विंध्य पर्वतमालाओं के मिलन-बिंदु पर बताता है। उसके मुताबिक यह किला, जिसके नाम पर उद्यान का नाम पड़ा, पूरे रिजर्व के ऊपर सिर उठाए खड़ा है। NTCA रिजर्व का क्षेत्रफल 1,411.28 वर्ग किलोमीटर बताता है, जिसमें से 1,113.36 वर्ग किलोमीटर कोर, यानी मुख्य आवास क्षेत्र है। ICOMOS ने किले के बफर जोन को ठीक इसी वजह से काफी माना: चारों ओर फैला राष्ट्रीय उद्यान किसी भी धरोहर सीमा से कहीं बड़ा सुरक्षा घेरा देता है। कहानी का वन्यजीव वाला पहलू रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान वाले नोट में है।

यही साझा जमीन अब तय करती है कि किले तक कौन और कब पहुँच सकता है। 2025 की खबरें बताती हैं कि दो महीने के भीतर रिजर्व में बाघ के हमलों में तीन लोगों की जान गई। इनमें से दो मौतें किले के रास्ते पर या किले के अंदर हुईं:

  • 16 अप्रैल 2025 को त्रिनेत्र गणेश मंदिर जाने वाली सड़क पर सात साल के एक बच्चे की जान गई, और 24 अप्रैल तक श्रद्धालुओं का प्रवेश सीमित कर दिया गया।
  • 11 मई 2025 को जोगी महल इलाके में एक वन रेंजर मारे गए; मंदिर तक आम लोगों की पहुँच रोक दी गई, और उद्यान के 10 जोन में से दो में सफारी बंद कर दी गई।
  • जून 2025 में किले के भीतर एक जैन मंदिर के पुजारी की जान गई।

यहाँ तीर्थयात्री, वन कर्मचारी और बाघ एक ही सड़क साझा करते हैं। इसलिए किले का प्रबंधन अब जितना धरोहर का सवाल है, उतना ही वन्यजीवों का भी। नीति वाला पहलू मानव-वन्यजीव संघर्ष वाले इलाकों में सह-अस्तित्व के प्रबंधन पर करंट अफेयर्स नोट में है।

परीक्षा के लिए रणथंभौर का किला कैसे पढ़ें

रणथंभौर वहाँ बैठता है जहाँ सिलेबस के तीन हिस्से आपस में मिलते हैं:

  • कला और संस्कृति (GS पेपर I): राजपूत किला स्थापत्य, और UNESCO स्थल के रूप में राजस्थान के पहाड़ी किले।
  • मध्यकालीन इतिहास (GS पेपर I): राजस्थान में अलाउद्दीन खिलजी का विस्तार और अकबर की राजपूत नीति।
  • पर्यावरण (GS पेपर III): टाइगर रिजर्व के भीतर एक संरक्षित स्मारक।

इतिहास वाला धागा किले के नाम से कम, स्रोतों और नीति के जरिए ज्यादा पूछा जाता है। मुख्य परीक्षा 2020 के GS पेपर I में पूछा गया: “मध्यकालीन भारत के फारसी साहित्यिक स्रोत उस युग की भावना को प्रतिबिंबित करते हैं। टिप्पणी कीजिए।” 1301 पर खुसरो का वृत्तांत इस उत्तर के दोनों हिस्सों के लिए तैयार उदाहरण है: तारीखों और घेराबंदी के कामकाज पर एकदम सटीक, और लहजे में खुलकर एक पक्ष का।

इतिहास वैकल्पिक विषय 2017 के पेपर I में पूछा गया: “क्या आप मानते हैं कि अकबर की राजपूत नीति भारतीय शासक वर्ग को मुगल शाही व्यवस्था में शामिल करने का एक सोचा-समझा प्रयास थी?” 1569 में सुरजन हाड़ा का आत्मसमर्पण और फिर उनका मुगल सेवा में आना ठीक वैसा उदाहरण है जिसकी इस उत्तर को जरूरत है। प्रीलिम्स की बात करें तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 94 पर कला और संस्कृति का टैग है और 184 पर इतिहास का। इसलिए किले की इमारतें भी उतनी ही दोहराइए जितनी उसकी तारीखें।

इन बातों को तब तक दोहराइए जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएँ:

  • सवाई माधोपुर जिले में थंभोर पहाड़ी पर बना वन पहाड़ी किला; राजस्थान के छह पहाड़ी किलों में अकेला वन दुर्ग।
  • स्थापना: परंपरा 5वीं सदी (ASI) या 944 ईस्वी (राजस्थान पर्यटन) बताती है; किलेबंदी का पहला पक्का जिक्र 12वीं सदी में (ICOMOS)।
  • 1301: पाशेब रैंप के सहारे चली घेराबंदी के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने इसे हम्मीर देव चौहान से छीना; अमीर खुसरो ने खजाइन-उल-फुतूह में इसका वर्णन किया।
  • 14वीं और 15वीं सदी: मेवाड़ के सिसोदिया, राणा हमीर सिंह (1326 से 1364) और राणा कुंभा के समय।
  • 1569: चित्तौड़ के एक साल बाद अकबर ने इसे राय सुरजन हाड़ा से लिया।
  • 1753: जयपुर के सवाई माधो सिंह को सौंपा गया, जिन्होंने सवाई माधोपुर बसाया।
  • 2013: नोम पेन्ह में 37वें सत्र में मानदंड (ii) और (iii) के तहत सूची में शामिल; 1951 से ASI द्वारा संरक्षित।

चार उलझनें नंबर कटवाती हैं:

  • 1301 या 1303? रणथंभौर 1301 में गिरा और चित्तौड़ 1303 में। राजस्थान पर्यटन का पेज भी इन दोनों को आपस में मिला देता है।
  • दो हम्मीर। हम्मीर देव चौहान 1301 में रणथंभौर में मारे गए; मेवाड़ के राणा हमीर सिंह ने 14वीं सदी में इसे अपने कब्जे में रखा।
  • किला या उद्यान? किला ASI का स्मारक है और UNESCO सूची का एक हिस्सा; उद्यान वन कानून के तहत एक टाइगर रिजर्व है। एक दूसरे के भीतर है, लेकिन कानून की नजर में ये दो अलग चीजें हैं।
  • पहाड़ी किला या वन दुर्ग? UNESCO छहों को पहाड़ी किले कहता है। “वन दुर्ग” उस समूह के भीतर रणथंभौर के भू-भाग का प्रकार बताता है।

रणथंभौर को सूची में उसके पाँच साथियों के बगल में रखकर देखना भी काम आता है:

किलाजिलाUNESCO जिस परिवेश को रेखांकित करता हैसूची में यह क्या जोड़ता है
चित्तौड़गढ़चित्तौड़गढ़पहाड़ीसिसोदियों की पुरानी राजधानी; तीन मशहूर घेराबंदियाँ
कुंभलगढ़राजसमंदपहाड़ीएक ही दौर में बना; डिजाइन मंडन का माना जाता है
रणथंभौरसवाई माधोपुरजंगलहम्मीर के महल के अवशेष
गागरोनझालावाड़नदीव्यापार मार्गों पर नियंत्रण रखने वाला दर्रा
आमेरजयपुरपहाड़ी17वीं सदी की राजपूत-मुगल दरबारी शैली
जैसलमेरजैसलमेरमरुस्थलआबाद बस्ती और जैन मंदिर

रणथंभौर उस अभ्यर्थी का साथ देता है जो परंपरा और दर्ज इतिहास में फर्क कर सके। इसकी स्थापना की तारीख परंपरा है, और 1301 में इसका गिरना दर्ज इतिहास है। वहीं इसका वर्तमान संरक्षण और बाघ प्रबंधन के बीच रोज की खींचतान है। कौन-सी बात किस खाने की है, यह कहना सीख लीजिए। फिर यह एक किला आपको अलाउद्दीन की दिल्ली से लेकर एक चालू टाइगर रिजर्व के नीतिगत सवालों तक ले जाएगा।

सामान्य प्रश्न

रणथंभौर का किला किसने बनवाया?

किसी संस्थापक का नाम पक्के तौर पर नहीं लिया जा सकता। ASI की दर्ज परंपरा इसका श्रेय 5वीं सदी के किसी महाराजा जयंत को देती है, और राजस्थान पर्यटन 944 ईस्वी के साथ चौहानों को, लेकिन किलेबंदी का सबसे पुराना पक्का जिक्र 12वीं सदी का है। इसलिए सुरक्षित उत्तर यही है कि 12वीं सदी तक यह चौहानों का गढ़ बन चुका था।

1301 में रणथंभौर के किले में क्या हुआ?

किले के चौहान शासक हम्मीर देव ने दिल्ली की सेना से भागे मंगोल बागियों को शरण दी, और इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी ने किले को घेर लिया। महीनों की घेराबंदी, अकाल और पानी की कमी के बाद हम्मीर आखिरी धावे में मारे गए, और किले की स्त्रियों ने जौहर किया। जुलाई 1301 में किला गिर गया, और अमीर खुसरो ने अपने खजाइन-उल-फुतूह में इस घेराबंदी का वर्णन किया।

अकबर ने रणथंभौर का किला कब जीता?

अकबर ने चित्तौड़ जीतने के एक साल बाद, 1569 में रणथंभौर पर कब्जा किया। मुगल जब तोपें दीवारों के पास तक ले आए, तो किलेदार राय सुरजन हाड़ा ने आत्मसमर्पण कर दिया, और फिर वे मुगल सेवा में शामिल हो गए। कुछ कैप्शन 1568 बताते हैं, लेकिन UNESCO का मूल्यांकन और मानक इतिहास-ग्रंथ 1569 बताते हैं।

क्या रणथंभौर का किला UNESCO विश्व धरोहर स्थल है?

हाँ। इसे 21 जून 2013 को नोम पेन्ह में विश्व धरोहर समिति के 37वें सत्र में राजस्थान के छह पहाड़ी किलों में से एक के रूप में सूची में शामिल किया गया। UNESCO इसे दो वजहों से अलग से गिनाता है: समूह का अकेला वन दुर्ग होने के लिए, और हम्मीर के महल के अवशेषों के लिए।

क्या रणथंभौर का किला रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के अंदर है?

हाँ। किला उद्यान के भीतर थंभोर पहाड़ी पर खड़ा है, और यह उद्यान सवाई माधोपुर जिले के रणथंभौर टाइगर रिजर्व का हिस्सा है। यह जंगल कभी जयपुर के शासकों का शिकारगाह था, और रिजर्व का नाम इसी किले पर पड़ा है।

रणथंभौर के किले का संरक्षण कौन करता है?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अपने जयपुर मंडल के जरिए इसे राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में संरक्षित करता है, जिसकी अधिसूचना नवंबर 1951 में जारी हुई थी। किला एक टाइगर रिजर्व के भीतर है, इसलिए वन विभाग भी किले की सड़क पर आवाजाही रोक सकता है, जैसा उसने 2025 में कई बार किया।

रणथंभौर का त्रिनेत्र गणेश मंदिर क्या है?

यह रणथंभौर किले के भीतर बना गणेश मंदिर है, और ‘त्रिनेत्र’ का मतलब है तीन आँखों वाला। UNESCO के लिए हुआ मूल्यांकन किले के गणेश मंदिर की स्थापना 5वीं सदी जितनी पुरानी मानता है, और ASI किले के मंदिरों में इसे खास तौर पर गिनाता है।

राजस्थान के छह पहाड़ी किले कौन-से हैं?

राजस्थान के पहाड़ी किले ये छह हैं: चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, गागरोन, आमेर और जैसलमेर, जिन्हें UNESCO ने 2013 में एक साथ सूची में शामिल किया। हर किला एक अलग भू-भाग या दौर दिखाता है, गागरोन के नदी वाले परिवेश और रणथंभौर के जंगल से लेकर जैसलमेर के मरुस्थल तक।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. रणथंभौर के किले के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. UNESCO द्वारा सूचीबद्ध राजस्थान के छह पहाड़ी किलों में यह अकेला वन दुर्ग है।
2. यह राजस्थान स्मारक, पुरातत्व स्थल और पुरावशेष अधिनियम, 1961 के तहत राज्य स्मारक के रूप में संरक्षित है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a) रणथंभौर 1951 से ASI का राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है; गागरोन और आमेर राज्य द्वारा संरक्षित हिस्से हैं।

2. रणथंभौर के किले से जुड़ी निम्नलिखित घटनाओं को कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित कीजिए:
1. अकबर ने राय सुरजन हाड़ा से किला लिया।
2. अलाउद्दीन खिलजी ने हम्मीर देव से किला लिया।
3. किला जयपुर के सवाई माधो सिंह को सौंपा गया।
4. मेवाड़ के राणा हमीर सिंह ने किले पर अधिकार रखा और उसका विस्तार किया।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  • (a) 2-4-1-3
  • (b) 4-2-1-3
  • (c) 2-1-4-3
  • (d) 4-2-3-1

उत्तर: (a) क्रम है 1301, राणा हमीर सिंह का शासनकाल (1326 से 1364), 1569 और 1753।

3. रणथंभौर के हम्मीर देव पर लिखे गए संस्कृत महाकाव्य हम्मीर महाकाव्य की रचना किसने की थी?

  • (a) चंद बरदाई
  • (b) नयचंद्र सूरि
  • (c) अमीर खुसरो
  • (d) जयानक

उत्तर: (b) जैन कवि नयचंद्र सूरि ने इसे ग्वालियर के तोमर दरबार में लिखा; खुसरो फारसी में लिखते थे, और बाकी दोनों पृथ्वीराज चौहान से जुड़े हैं।

4. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मेवाड़ के राणा हमीर सिंह और रणथंभौर के हम्मीर देव चौहान एक ही शासक थे।
2. खिलजी विजय के बाद 14वीं सदी में मेवाड़ के सिसोदियों ने रणथंभौर पर अधिकार रखा।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b) हम्मीर देव चौहान 1301 में रणथंभौर में मारे गए, जबकि राणा हमीर सिंह ने 1326 से 1364 तक मेवाड़ पर राज किया।

5. 1301 में रणथंभौर की घेराबंदी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. घेराबंदी के दौरान दिल्ली के सेनापति नुसरत खान मारे गए।
2. दीवारों तक पहुँचने के लिए घेरने वालों ने पाशेब बनाया, जो मिट्टी भरे बोरों का रैंप था।
3. अमीर खुसरो ने अपने खजाइन-उल-फुतूह में इस घेराबंदी का वर्णन किया।
ऊपर दिए गए कथनों में से कितने सही हैं?

  • (a) केवल एक
  • (b) केवल दो
  • (c) सभी तीन
  • (d) कोई भी नहीं

उत्तर: (c) बरनी नुसरत खान की मौत और पाशेब दोनों दर्ज करते हैं, और खुसरो का खजाइन-उल-फुतूह घेराबंदी का वृत्तांत सुनाता है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. भारतीय कला विरासत का संरक्षण करना इस समय की नितांत आवश्यकता है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2018, GS पेपर I।
  2. रणथंभौर की घेराबंदी को फिर से गढ़ने के लिए एक इतिहासकार को अमीर खुसरो के खजाइन-उल-फुतूह और नयचंद्र सूरि के हम्मीर महाकाव्य का एक साथ इस्तेमाल कैसे करना चाहिए? (10 अंक, 150 शब्द)
  3. 1301 में रणथंभौर का पतन उसकी दीवारों की मजबूती से ज्यादा पानी और रसद पर टिका था। घेराबंदी के समकालीन वृत्तांतों के संदर्भ में इस मत का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  4. रणथंभौर, गागरोन और जैसलमेर के संदर्भ में समझाइए कि राजस्थान के पहाड़ी किले रक्षा के लिए भू-भाग का इस्तेमाल कैसे करते हैं। (15 अंक, 250 शब्द)
  5. संरक्षित क्षेत्रों के भीतर बने धरोहर स्थलों के सामने ऐसी समस्याएँ आती हैं जिन्हें न तो अकेला धरोहर कानून सुलझा सकता है, न अकेला वन्यजीव कानून। रणथंभौर किले और रणथंभौर टाइगर रिजर्व के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

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Written by

Ashish Shrivastav Sir

Ashish Shrivastav teaches Art and Culture and History at Anantam IAS. He works through temple architecture, painting, dance and the UNESCO sites the way Prelims actually asks about them, and links ancient and medieval material to GS I Mains answers.

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