UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

लखनऊ समझौता: सीटों का बँटवारा, पृथक निर्वाचन मंडल और स्वशासन की माँग

लखनऊ समझौता क्या था: दिसंबर 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने लखनऊ में क्या तय किया, प्रांतवार सीटें कितनी रहीं और इतिहासकार इसे सराहते और कोसते क्यों हैं।

Circa-1910 studio portrait of barrister Muhammad Ali Jinnah in a dark three-piece suit and high white collar

लखनऊ समझौता (लखनऊ पैक्ट) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच हुआ वह समझौता है, जो दिसंबर 1916 में लखनऊ में दोनों के सालाना अधिवेशनों में बना। इसके तहत दोनों संगठनों ने संवैधानिक सुधार की एक साझा योजना अंग्रेजों के सामने रखी। साथ ही कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल (separate electorates) मान लिया। कांग्रेस ने इसे 29 दिसंबर को पास किया और लीग ने 31 दिसंबर को। यह समझौता दो वजहों से अहम है। पहली बार दोनों संगठनों ने मिलकर स्वशासन की माँग रखी। और इस एकता की एक कीमत थी: मुसलमानों के लिए तय सीटें, जिन्हें सिर्फ मुस्लिम मतदाता भरते थे। इसी कीमत ने भारत के चुनावों को तब तक आकार दिया, जब तक 1947 में संविधान सभा ने यह व्यवस्था खत्म नहीं कर दी।

इस समझौते की दो बातें अक्सर थोड़ी गलत बताई जाती हैं। इसे अक्सर तिलक-जिन्ना समझौता कहा जाता है, इसलिए बहुत से पाठक मान लेते हैं कि लखनऊ में कांग्रेस की अध्यक्षता तिलक ने की थी। असल में अध्यक्ष अंबिका चरण मजूमदार थे, और जिन्ना ने लीग के अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। दूसरी बात, पृथक निर्वाचन मंडल इस समझौते ने नहीं बनाए। अंग्रेज इन्हें 1909 में ही दे चुके थे, वह भी कांग्रेस के विरोध के बावजूद। 1916 में बदला यह कि कांग्रेस ने इन्हें मान लिया, और हर प्रांत के लिए सीटों का हिस्सा लिखकर तय कर दिया। यह नोट दोनों बातें साफ करता है, और सीटों का हिस्सा ठीक वैसे ही देता है, जैसे योजना में छपा था।

लखनऊ समझौता क्या था

लखनऊ समझौता असल में सुधारों की एक साझा योजना थी, जिसे उस समय कांग्रेस-लीग योजना कहा गया। दोनों दलों ने अपने-अपने अधिवेशन में प्रस्ताव पास करके इसे अपनाया, और फिर इसे भारत की साझा माँग के रूप में सामने रखा।

तथ्यविवरण
क्यासंवैधानिक सुधार की एक साझा योजना और साथ में हिंदू-मुस्लिम सीटों का समझौता, जिसे कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने अपनाया
कब और कहाँलखनऊ, दिसंबर 1916; कांग्रेस ने 29 दिसंबर को और लीग ने 31 दिसंबर को अपनाया
अध्यक्षताअंबिका चरण मजूमदार (कांग्रेस का 31वाँ अधिवेशन); मोहम्मद अली जिन्ना (लीग का नौवाँ अधिवेशन)
इससे जुड़े नामकांग्रेस की ओर से बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट, लीग की ओर से जिन्ना
मूल सौदाकांग्रेस ने मुसलमानों के लिए प्रांतवार तय हिस्सों के साथ पृथक निर्वाचन मंडल माना; लीग स्वशासन की माँग में साथ आई
केंद्र में हिस्साइंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के निर्वाचित भारतीय सदस्यों में एक-तिहाई मुसलमान हों
सांप्रदायिक सुरक्षा उपायकिसी समुदाय से जुड़ा विधेयक या प्रस्ताव तब छोड़ दिया जाए, जब परिषद में उस समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य उसका विरोध करें
आगे क्या हुआअगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा; मताधिकार समिति ने 1919 के सुधारों के लिए समझौते के मुस्लिम सीट हिस्सों को आधार बनाया
किसने किनारे किया1928 की नेहरू रिपोर्ट ने

1916 में कांग्रेस और लीग साथ क्यों आए

दोनों साथ इसलिए आए, क्योंकि दोनों अपनी पुरानी जगह से आगे बढ़ चुके थे। लीग सरकार के प्रति वफादारी छोड़कर स्वशासन की माँग की ओर आ गई थी। उधर कांग्रेस चाहती थी कि अंग्रेज युद्ध के बाद के सुधार लिखें, उससे पहले भारत एक होकर खड़ा दिखे। लीग की स्थापना 1906 में मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए हुई थी। फिर 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने मुसलमानों को पृथक निर्वाचन मंडल दिए, जिनका कांग्रेस तभी से विरोध करती आ रही थी।

1911 के बाद लीग का रुख कैसे बदला

यह बदलाव क्यों आया, इसकी वजहें खुद अंग्रेजों ने 1918 की मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में गिनाई हैं। ये वे घटनाएँ थीं, जिन्होंने सरकार पर मुसलमानों का भरोसा हिला दिया:

  • 1911 में इटली और तुर्की के बीच हुए युद्ध में ब्रिटेन का तटस्थ रहना;
  • 1911 में बंगाल विभाजन का रद्द होना, जिसने रिपोर्ट के शब्दों में एक मूल रूप से मुस्लिम प्रांत को खत्म कर दिया;
  • 1912 का बाल्कन युद्ध, और एक बड़े मुस्लिम विश्वविद्यालय की उम्मीदों को लगा झटका;
  • 1913 में कानपुर की एक मस्जिद का हिस्सा गिराए जाने पर हुए दंगे;
  • नवंबर 1914 में तुर्की का ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध में उतरना।

लीग के भीतर वकीलों और पत्रकारों का एक युवा गुट आगे आया, जिसे लखनऊ की “यंग पार्टी” कहा जाता था। IGNOU के मुताबिक वजीर हसन वह व्यक्ति थे, जिन्होंने लीग के लक्ष्यों को कांग्रेस के लक्ष्यों के करीब खींचा। 1913 में मुस्लिम लीग ने “भारत के अनुकूल ढंग के” स्वशासन को अपना लक्ष्य बना लिया। जिन्ना पहले से कांग्रेस में थे। उसी साल वे कांग्रेस छोड़े बिना लीग में भी शामिल हो गए।

युद्ध, होम रूल और लखनऊ तक का रास्ता

पहले विश्व युद्ध ने दोनों पक्षों के लिए दाँव ऊँचा कर दिया। ब्रिटेन को भारत के सैनिक और पैसा चाहिए था। भारतीय नेताओं को इसमें मौका दिखा कि बदले में स्वशासन की माँग पर जोर दिया जाए। 1914 में जेल से छूटे तिलक, और उसी साल कांग्रेस में आईं एनी बेसेंट, एक साथ दो काम कर रहे थे। पहला, गरमपंथियों की कांग्रेस में वापसी। दूसरा, होम रूल का अभियान। तिलक ने लखनऊ कांग्रेस में कहा था कि स्वराज, स्वशासन और होम रूल एक ही माँग के तीन नाम हैं। यानी इस शब्द के पीछे कुछ छिपा नहीं था। इसका मतलब था, साम्राज्य के भीतर रहते हुए भारतीयों का भारत पर शासन।

तिलक ने अप्रैल 1916 में बेलगाम में अपनी इंडियन होम रूल लीग शुरू की। एनी बेसेंट ने सितंबर 1916 में मद्रास में अपनी लीग बनाई। दोनों लीगें कंधे से कंधा मिलाकर काम करती रहीं। IGNOU के हिसाब से 1917 तक दोनों की कुल सदस्य संख्या 60,000 तक पहुँच गई थी।

लखनऊ तक पहुँचने के कदम इस क्रम में उठे:

  • 1915, बंबई: एस. पी. सिन्हा की अध्यक्षता में कांग्रेस और मजहर-उल-हक की अध्यक्षता में लीग, दोनों का अधिवेशन एक ही शहर में, एक ही समय पर हुआ। कांग्रेस यहाँ से यह जनादेश लेकर लौटी कि लीग के साथ मिलकर सुधार योजना का मसौदा बनाया जाए।
  • अक्टूबर 1916: इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के 19 निर्वाचित सदस्यों ने भारत सरकार को सुधारों का एक ज्ञापन भेजा। बाद में साझा योजना ने इसी ज्ञापन को विस्तार दिया।
  • नवंबर 1916, कलकत्ता: अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और लीग की सुधार समिति ने दो दिन की बातचीत के बाद योजना पर सहमति बनाई।
  • दिसंबर 1916, लखनऊ: अधिवेशनों से ठीक पहले हुए एक संयुक्त सम्मेलन में आखिरी विवाद सुलझे, और दोनों अधिवेशनों ने योजना अपना ली।

लखनऊ समझौते के प्रावधान क्या थे

लखनऊ समझौते के प्रावधान दो हिस्सों में बँटे थे। पहला हिस्सा एक संवैधानिक योजना थी, जिसे लागू करने की माँग दोनों दलों ने अंग्रेजों से की। दूसरा हिस्सा एक सांप्रदायिक समझौता था, जो दोनों दलों ने आपस में किया। इसमें कांग्रेस ने पृथक निर्वाचन मंडल और मुसलमानों के लिए तय सीट हिस्से मान लिए।

स्वशासन की माँग

29 दिसंबर का कांग्रेस प्रस्ताव सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने रखा था, जिन्होंने संयुक्त सम्मेलन की अध्यक्षता भी की थी। इस प्रस्ताव में तीन चीजें माँगी गईं:

  • एक शाही घोषणा, कि ब्रिटिश नीति भारत को “जल्द से जल्द” स्वशासन देने की है;
  • तुरंत एक ठोस कदम, यानी साझा योजना वाले सुधार लागू करना;
  • युद्ध के बाद साम्राज्य के नए ढाँचे में भारत को एक अधीन देश के दर्जे से उठाकर स्वशासित डोमिनियनों के बराबर का साझेदार बनाना।

यह योजना निर्वाचित भारतीयों को कानून बनाने और पैसे पर नियंत्रण देती थी, लेकिन कार्यपालिका को अभी उनके प्रति जवाबदेह नहीं बनाती थी:

  • हर प्रांतीय परिषद का, और 150 सदस्यों वाली इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल का भी, चार-पाँचवाँ हिस्सा चुना जाए, और मताधिकार जितना हो सके उतना व्यापक हो;
  • हर कार्यकारी परिषद में, चाहे प्रांतीय हो या केंद्रीय, कम से कम आधे सदस्य ऐसे भारतीय हों, जिन्हें परिषद के निर्वाचित सदस्य चुनें;
  • परिषद का प्रस्ताव सरकार पर बाध्यकारी हो, जब तक उस पर वीटो न लगे; और अगर एक साल बाद वह फिर पास हो जाए, तो वीटो के बावजूद बाध्यकारी हो;
  • भारत सचिव की इंडिया काउंसिल खत्म की जाए।

अंग्रेजों ने बाद में ठीक इसी कमी पर हमला किया, जो यह सूची छोड़ देती है। विधायिका कार्यपालिका को बाँध तो सकती थी, पर उसे हटा नहीं सकती थी।

पृथक निर्वाचन मंडल और सीटों का बँटवारा

पृथक निर्वाचन मंडल का मतलब है कि मुस्लिम सीटें सिर्फ मुस्लिम मतदाता भरें, और वह भी अपने अलग निर्वाचन क्षेत्रों में। इसे ऐसे समझिए। एक ही प्रांत में दो मतदाता सूचियाँ हैं। एक सूची मुस्लिम सीटों के लिए वोट डालती है, दूसरी बाकी सीटों के लिए। योजना ने हर प्रांतीय परिषद की निर्वाचित भारतीय सीटों में मुसलमानों का हिस्सा इन शब्दों में तय किया:

प्रांतमुस्लिम हिस्सा, जैसा योजना में लिखा है
पंजाबनिर्वाचित भारतीय सदस्यों का आधा
बंगाल40 प्रतिशत
बंबईएक-तिहाई
संयुक्त प्रांत30 प्रतिशत
बिहार (तब बिहार और उड़ीसा)25 प्रतिशत
मध्य प्रांत15 प्रतिशत
मद्रास15 प्रतिशत

केंद्र में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के निर्वाचित भारतीय सदस्यों में एक-तिहाई मुसलमान होने थे। इन्हें प्रांतों के पृथक मुस्लिम निर्वाचन मंडल चुनते, और मोटे तौर पर उसी अनुपात में, जो प्रांतों के लिए तय था।

बारीक शर्तों में एक शर्त अक्सर नजरअंदाज हो जाती है, और वह पूरी तस्वीर बदल देती है। योजना में लिखा था कि खास हितों वाली सीटों को छोड़कर कोई मुसलमान किसी और चुनाव में वोट नहीं डालेगा। 1909 की व्यवस्था में मुसलमान अपने निर्वाचन क्षेत्रों के साथ-साथ सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी वोट डाल सकते थे। मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने इस अधिकार को छोड़ने पर लीग की रजामंदी का स्वागत किया। यानी लखनऊ में लीग ने भी कुछ छोड़ा था: दोहरा वोट

तीन-चौथाई वाला नियम

तीसरी शर्त एक तरह का वीटो थी। किसी समुदाय से जुड़ा कोई विधेयक, उसकी कोई धारा या कोई गैर-सरकारी प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सकता था, अगर परिषद में उस समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य उसका विरोध करें। और मामला उस समुदाय से जुड़ा है या नहीं, यह भी उसी समुदाय के सदस्य तय करते। सीधे शब्दों में, अगर किसी परिषद में 12 मुस्लिम सदस्य हों और उनमें से 9 अपने समुदाय से जुड़े किसी कदम पर आपत्ति करें, तो वह कदम वहीं रुक जाता। हिंदू सदस्यों के लिए भी यह नियम ठीक इसी तरह काम करता था।

लखनऊ समझौते में भारांक कैसे काम करता था

भारांक (weightage) का मतलब है किसी समुदाय को उसकी आबादी के हिस्से से ज्यादा सीटें देना। समझौते ने हर उस प्रांत में मुसलमानों को भारांक दिया, जहाँ वे अल्पसंख्यक थे। बदले में बंगाल और पंजाब के मुसलमानों ने, जहाँ वे बहुमत में थे, अपनी आबादी के हिस्से से कम सीटें मान लीं। सौदा यही था।

भारत सरकार ने मताधिकार समिति की रिपोर्ट पर अपने 1919 के डिस्पैच में यह हिसाब लगाया था:

प्रांतआबादी में मुसलमानों का हिस्सा (%)समझौते के तहत सीटों में मुसलमानों का हिस्सा (%)आबादी के हिस्से के मुकाबले सीटों का हिस्सा (प्रतिशत में)
बंगाल52.64076
पंजाब54.85091
बंबई20.433.3163
संयुक्त प्रांत14.030214
बिहार और उड़ीसा10.525238
मद्रास6.515231
मध्य प्रांत4.315349

एक पंक्ति पढ़कर देखिए। संयुक्त प्रांत में मुसलमान आबादी के 14% थे। तो 100 निर्वाचित भारतीय सीटों वाली परिषद में आबादी के हिसाब से उन्हें 14 सीटें मिलतीं। समझौते ने उन्हें 30 दीं, यानी दोगुने से थोड़ा ज्यादा। आखिरी कॉलम का 214 यही है। अब बंगाल लीजिए। वहाँ मुसलमान आबादी के 52.6% थे। आबादी के हिसाब से इसका मतलब होता 100 में करीब 53 सीटें। समझौते ने 40 दीं, यानी लगभग तीन-चौथाई। डिस्पैच ने ठीक यही कहा। बंगाल के मुसलमानों को आबादी के हिसाब से बनने वाली सीटों का तीन-चौथाई मिला, और पंजाब के मुसलमानों को नौ-दसवाँ हिस्सा। बाकी जगह मुसलमानों को अच्छी शर्तें मिलीं, “कुछ को तो हद से ज्यादा अच्छी”।

यही आँकड़े क्यों, कोई और क्यों नहीं? मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने माना कि उसे इनका कोई आधार नहीं मालूम, “सिवाय मोलभाव के”। ईमानदार जवाब यही है। ये मोलभाव से निकले आँकड़े थे, किसी फॉर्मूले से नहीं। मजूमदार ने बाद में लिखा कि यह सवाल संयुक्त प्रांत से ज्यादा कहीं नहीं लड़ा गया। IGNOU भी बताता है कि वहाँ इस पर तीखे विरोध हुए, कि आबादी के 14% वाले समुदाय को 30% सीटें क्यों दी जा रही हैं।

लखनऊ समझौता किसने कराया: तिलक, जिन्ना और फिर से एक हुई कांग्रेस

समझौते से दो नाम जुड़े हैं। पहले, बाल गंगाधर तिलक, जो कांग्रेस के गरमपंथी धड़े को इस सौदे में लाए। दूसरे, मोहम्मद अली जिन्ना, जिन्होंने लीग की अध्यक्षता की और जो दोनों संगठनों के सदस्य थे। औपचारिक अध्यक्षता की बात करें, तो कांग्रेस के 31वें अधिवेशन के अध्यक्ष मजूमदार थे। यह अधिवेशन 26, 28, 29 और 30 दिसंबर को हुआ। लीग के नौवें अधिवेशन के अध्यक्ष जिन्ना थे।

लखनऊ एक मिलन भी था। 1907 में सूरत में कांग्रेस नरमपंथी और गरमपंथी, दो धड़ों में बँट गई थी। उसके बाद लखनऊ पहला अधिवेशन था, जिसमें दोनों धड़े साथ बैठे। मजूमदार ने प्रतिनिधियों से कहा कि जो एकजुट कांग्रेस सूरत में दफन हुई थी, उसने लखनऊ में फिर जन्म लिया है। उनके बाद के ब्योरे में रासबिहारी घोष और सुरेंद्रनाथ बनर्जी तिलक के बगल में बैठे दिखते हैं।

तिलक को इस आरोप का जवाब देना पड़ा कि हिंदुओं ने बहुत ज्यादा दे दिया है। स्वशासन वाले प्रस्ताव पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “हम कितना भी झुकते, वह ज्यादा नहीं होता”। उनका तर्क था कि एक अड़ियल नौकरशाही से लड़ने के लिए एक साझा मंच चाहिए। हिंदुओं, मुसलमानों और सरकार के बीच तिकोनी लड़ाई से काम नहीं चलेगा।

ब्रिटानिका के मुताबिक 1915 और 1916 में दोनों संगठनों के सालाना अधिवेशन साथ-साथ कराने का श्रेय जिन्ना को जाता है। ब्रिटानिका वह नाम भी दर्ज करती है, जो गोखले ने उन्हें दिया था: हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे अच्छे राजदूत।

गांधी भी वहाँ थे, लेकिन वे समझौते पर नहीं, गिरमिटिया मजदूरी पर बोले। NCERT दर्ज करती है कि इसी अधिवेशन में चंपारण के एक किसान ने नील के बागान मालिकों के बारे में उनसे बात की। यानी जिस हफ्ते ने हिंदू-मुस्लिम समझौता दिया, उसी ने गांधी को चंपारण की राह पर भी डाल दिया।

मुसलमानों के बीच भी इस समझौते के आलोचक थे। सरकार पर टिके जमींदार परिवारों ने, और अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट जैसे उर्दू अखबारों ने, इस गठबंधन पर हमला बोला।

अंग्रेजों ने कांग्रेस-लीग योजना का जवाब कैसे दिया

अंग्रेजों ने समझौते का सांप्रदायिक बँटवारा तो ले लिया, लेकिन उसका संवैधानिक ढाँचा ठुकरा दिया। अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा ने वादा किया कि प्रशासन की हर शाखा में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाई जाएगी, और स्वशासी संस्थाएँ धीरे-धीरे विकसित की जाएँगी। इसका लक्ष्य उत्तरदायी शासन बताया गया। फिर 1918 की मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने योजना को बारीकी से जाँचा और तीन फैसले दिए:

  • सीटों के बँटवारे पर: रिपोर्ट ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल तो मान लिए, लेकिन आँकड़ों पर मुहर तब तक रोक ली, जब तक यह न दिख जाए कि दूसरे समूहों पर उनका क्या असर होगा।
  • तीन-चौथाई वाले नियम पर: रिपोर्ट ने इस शर्त को “कहीं ज्यादा संदिग्ध किस्म का” सुरक्षा उपाय कहा। भारत सरकार ने बाद में दर्ज किया कि रिपोर्ट ने इसे पूरी तरह अव्यावहारिक मानकर किनारे कर दिया था।
  • ढाँचे पर: रिपोर्ट के मुताबिक योजना की शुरुआत ही एक गलत सोच से हुई थी। लंदन के प्रति जवाबदेह कार्यपालिका और मतदाताओं के प्रति जवाबदेह विधायिका के बीच गतिरोध होना तय था, और योजना में इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं था।

इस गतिरोध का रिपोर्ट का जवाब था प्रांतीय सरकार को दो हिस्सों में बाँटना। एक हिस्सा विधायिका के प्रति जवाबदेह होता, दूसरा नहीं। 1919 के मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों में यही द्वैध शासन (dyarchy) बना। तो द्वैध शासन कुछ हद तक लखनऊ योजना का जवाब था। वह कभी उस योजना का हिस्सा नहीं था।

सीटों का बँटवारा बच गया। लॉर्ड साउथबरो की अध्यक्षता वाली मताधिकार समिति ने पाया कि ज्यादातर भारतीय गवाह, और ज्यादातर प्रांतीय सरकारें, यह समझौता बनाए रखना चाहती थीं। इसलिए समिति ने मुस्लिम सीटों के लिए समझौते को ही आधार बनाया। उसने पंजाब में सिखों के लिए, और भारतीय ईसाइयों, यूरोपीयों और एंग्लो-इंडियनों के लिए भी पृथक निर्वाचन मंडल की सिफारिश की। यह कहानी 1919 के सुधारों में पृथक निर्वाचन मंडल वाला नोट आगे बढ़ाता है। जो सिद्धांत कांग्रेस ने 1916 में एक समुदाय के लिए माना था, 1919 तक उसकी सिफारिश पाँच समुदायों के लिए हो रही थी।

लखनऊ समझौते का महत्व: पक्ष और विपक्ष के तर्क

कक्षा में लखनऊ समझौते का महत्व अक्सर इस तरह बताया जाता है कि यह हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक एकता का शिखर था, और थोड़े समय के लिए उसने यह दर्जा कमाया भी। इसे उस मोड़ के रूप में भी पढ़ाया जाता है, जब कांग्रेस ने पृथक निर्वाचन मंडल पर अपनी मुहर लगा दी। दोनों बातें सच हैं। अच्छा उत्तर दोनों को साथ लेकर चलता है।

समझौते के पक्ष में तर्क:

  • यह दोनों दलों की पहली साझा माँग थी। इसने उस डर का जवाब दिया, जो तिलक और बेसेंट जता चुके थे, कि अंग्रेज एक समूह को दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करेंगे।
  • इसने होम रूल अभियान को नई रफ्तार दी।
  • इतिहासकार ह्यू ओवेन ने 1972 में तर्क दिया कि दोनों पक्षों ने सच्चा त्याग किया, और ऐसा भरोसा बनाया, जिसके दम पर हिंदू और मुसलमान रॉलेट और खिलाफत आंदोलनों में साथ आ सके। ब्रिटानिका भी कहती है कि इसने खिलाफत आंदोलन और 1920 से चले असहयोग आंदोलन में सहयोग का रास्ता बनाया।

समझौते के खिलाफ तर्क:

  • इतिहासकार मुशीरुल हसन का तर्क था कि सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व पर राजी होकर कांग्रेस ने उन माँगों को वैधता दे दी, जिन्हें बाद में अलगाववादी कहकर कोसा गया। उनके मुताबिक कांग्रेस ने बाँटने वाली राजनीति के खिलाफ वैचारिक अभियान चलाने के बजाय जल्दबाजी के समझौतों से काम चला लिया।
  • यह हिसाब-किताब 1919 के सुधारों के लिए, और दूसरे समुदायों के लिए, एक मिसाल बन गया।
  • सौदा टिका नहीं। सांप्रदायिकता पर IGNOU का कोर्स बताता है कि खिलाफत और असहयोग आंदोलनों के बिखरने के बाद रिश्ते बिगड़ते गए। 1928 की नेहरू रिपोर्ट ने 1916 के समझौते को किनारे कर दिया, और जिन्ना पृथक निर्वाचन मंडल और आरक्षित सीटों पर छोटे-मोटे संशोधन तक नहीं करवा पाए।

1916 की रणनीति के तौर पर समझौता कामयाब रहा। जिस वक्त अंग्रेज युद्ध के बाद के सुधारों का मसौदा बना रहे थे, उसी वक्त इसने राष्ट्रीय माँग को एक आवाज दी। लेकिन सिद्धांत के तौर पर यह महँगा पड़ा, क्योंकि इसने धर्म के आधार पर हिस्से कांग्रेस के अपने कार्यक्रम में लिख दिए। समझदारी इसी में है कि एकता और उसकी कीमत, दोनों का जिक्र साथ किया जाए, क्योंकि समझौते ने एक चीज दूसरी के बदले ही खरीदी थी।

आज लखनऊ समझौता: संविधान ने क्या रखा और क्या छोड़ा

आज इस समझौते की कोई कानूनी ताकत नहीं है। संविधान ने इसके दोनों चुनावी औजार ठुकरा दिए, पृथक निर्वाचन मंडल भी और भारांक भी। हर कदम की तारीख दर्ज है:

  • 27-28 अगस्त 1947: संविधान सभा ने अल्पसंख्यक अधिकारों पर सलाहकार समिति की 8 अगस्त 1947 की रिपोर्ट पर विचार किया, और पृथक निर्वाचन मंडल की जगह संयुक्त निर्वाचन मंडल लाई। अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटें आबादी के हिसाब से होनी थीं। 28 अगस्त को अपनाई गई धारा में साफ कहा गया कि किसी भी समुदाय को भारांक नहीं मिलेगा।
  • मई 1949: सभा एक कदम और आगे गई। उसने विधायिकाओं में धार्मिक अल्पसंख्यकों का आरक्षण खत्म कर दिया, और इसे सिर्फ अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए रखा।
  • अनुच्छेद 325: संविधान हर प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक ही सामान्य मतदाता सूची का प्रावधान करता है। सिर्फ धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी को इससे बाहर नहीं रखा जा सकता, और न ही कोई अलग सूची का दावा कर सकता है।

1916 से मिलाकर पढ़िए, तो यह एक-एक बिंदु पर उलटा फैसला है। दो सूचियों की जगह एक सूची, और आबादी के हिसाब से सीटें, बिना किसी बोनस के। हाल का कोई कानूनी बदलाव इस समझौते को नहीं छूता। यह अनुच्छेद 325 के पीछे के इतिहास के रूप में जिंदा है।

परीक्षा के लिए लखनऊ समझौता कैसे पढ़ें

लखनऊ समझौता 1916 का टॉपिक GS पेपर I में आता है, स्वतंत्रता संघर्ष के उस दौर में, जो स्वदेशी के वर्षों और गांधी के उभार के बीच पड़ता है। यह इतिहास वैकल्पिक विषय में भी लौटता है, और सांप्रदायिकता वाले उत्तरों में भी। Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 184 इतिहास के हैं। इस टॉपिक पर सवाल मुख्य रूप से इसकी तारीखों, इसके अध्यक्षों और सुधारों के क्रम में इसकी जगह से बनते हैं। मुख्य परीक्षा में साइट पर मौजूद GS के किसी प्रश्न में समझौते का नाम नहीं है। यह सबूत के रूप में सामने आता है। मुख्य परीक्षा 2018 के GS पेपर I में पूछा गया था: “‘सांप्रदायिकता या तो सत्ता संघर्ष के कारण पैदा होती है या सापेक्ष वंचना के कारण।’ उपयुक्त उदाहरण देकर तर्क दीजिए।” सत्ता संघर्ष वाले नजरिए के लिए 1909 के सुधार और लखनऊ का सौदा सबसे स्वाभाविक उदाहरण हैं।

ये तथ्य तब तक दोहराइए, जब तक ये अपने आप याद न आने लगें:

  • तारीखें और अध्यक्ष: कांग्रेस ने 29 दिसंबर को और लीग ने 31 दिसंबर 1916 को अपनाया; अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार और मोहम्मद अली जिन्ना ने की।
  • प्रांतवार हिस्से: पंजाब आधा, बंबई एक-तिहाई, बंगाल 40%, संयुक्त प्रांत 30%, बिहार 25%, मध्य प्रांत और मद्रास दोनों 15%।
  • केंद्र: इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के निर्वाचित भारतीय सदस्यों का एक-तिहाई।
  • वीटो: किसी समुदाय से जुड़ा कदम तब रुक जाता, जब उस समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य उसका विरोध करें।
  • मिलन: 1907 के सूरत विभाजन के बाद पहला अधिवेशन, जिसमें नरमपंथी और गरमपंथी साथ बैठे।
  • अंग्रेजों का जवाब: मॉन्टेग्यू घोषणा (अगस्त 1917), मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट (1918) और मताधिकार समिति (1919), जिसने सीटों का बँटवारा बनाए रखा।

वे उलझनें जिनसे अंक कटते हैं, और उन्हें अलग रखने का तरीका:

  • तिलक और अध्यक्षता। तिलक गरमपंथियों को सौदे में लाए; कांग्रेस की अध्यक्षता मजूमदार ने की।
  • पृथक निर्वाचन मंडल कहाँ से शुरू हुए। इन्हें 1909 के सुधार लाए; 1916 वह साल है, जब कांग्रेस ने इन्हें माना।
  • लखनऊ और पूना। लखनऊ समझौता मुस्लिम सीटों पर कांग्रेस-लीग का सौदा था; 1932 का पूना समझौता दलित वर्गों (Depressed Classes) को लेकर गांधी और आंबेडकर के बीच का सौदा था।
  • क्या भारांक हर जगह था? नहीं। बंगाल और पंजाब के मुसलमानों को आबादी के हिस्से से कम सीटें मिलीं।
  • द्वैध शासन। यह मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट से आया, कुछ हद तक समझौते के जवाब में। यह समझौते से नहीं आया।

इस समझौते को इससे मिलती-जुलती दूसरी व्यवस्थाओं के साथ रखकर देखना सबसे आसान है:

व्यवस्थावर्षपक्षअलग प्रतिनिधित्व पर इसका असर
मॉर्ले-मिंटो सुधार1909ब्रिटिश सरकारमुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल शुरू किए
लखनऊ समझौता1916कांग्रेस और मुस्लिम लीगकांग्रेस ने प्रांतवार तय हिस्सों और भारांक के साथ मुस्लिम पृथक निर्वाचन मंडल माने
मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार1919ब्रिटिश सरकारसमझौते के हिस्सों को आधार बनाकर मुस्लिम पृथक निर्वाचन मंडल बनाए रखे; इन्हें सिखों, भारतीय ईसाइयों, यूरोपीयों और एंग्लो-इंडियनों तक बढ़ाया
नेहरू रिपोर्ट1928मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति1916 के समझौते को किनारे किया
पूना समझौता1932गांधी और आंबेडकरदलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल छोड़े, और बदले में सामान्य निर्वाचन मंडल के भीतर ज्यादा सीटें दीं

सीटों के हिस्से और दोनों अध्यक्ष अच्छी तरह याद कर लीजिए। लेकिन सोचने का समय उस सौदे पर लगाइए, जो इस समझौते ने किया। क्योंकि 1919 से अनुच्छेद 325 तक, प्रतिनिधित्व पर हुई हर बहस लखनऊ में तय शर्तों पर लौटती रहती है। जो उत्तर एकता और उसकी कीमत, दोनों दिखाता है, वह रटा हुआ नहीं, सोचा-समझा लगता है।

सामान्य प्रश्न

1916 का लखनऊ समझौता क्या था?

लखनऊ समझौता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच हुआ एक समझौता था, जिसे दिसंबर 1916 में दोनों के लखनऊ अधिवेशनों में अपनाया गया। दोनों दलों ने संवैधानिक सुधार की एक साझा योजना अंग्रेजों के सामने रखी, और कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल और तय सीट हिस्से मान लिए। यह स्वशासन के लिए दोनों संगठनों की पहली साझा माँग थी।

1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की?

दिसंबर 1916 में लखनऊ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 31वें अधिवेशन की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की। उसी शहर में, उसी समय हुए मुस्लिम लीग के नौवें अधिवेशन की अध्यक्षता मोहम्मद अली जिन्ना ने की। तिलक का नाम इस समझौते से गहराई से जुड़ा है, लेकिन उस साल उन्होंने कांग्रेस की अध्यक्षता नहीं की थी।

लखनऊ समझौते के मुख्य प्रावधान क्या थे?

कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल माने, और सात प्रांतों में निर्वाचित सीटों के तय हिस्से भी, जैसे पंजाब में आधा और संयुक्त प्रांत में 30 प्रतिशत। केंद्र में निर्वाचित भारतीय सदस्यों का एक-तिहाई मुसलमान होना था। किसी समुदाय से जुड़ा विधेयक तब छोड़ा जा सकता था, जब उस समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य उसका विरोध करें। साझा योजना ने स्वशासन भी माँगा, साथ में ऐसी परिषदें, जिनका चार-पाँचवाँ हिस्सा चुना हुआ हो, और हर कार्यकारी परिषद के आधे सदस्य निर्वाचित भारतीय हों।

लखनऊ समझौते को अहम क्यों माना जाता है?

इसने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक मंच पर ला दिया, और पहले विश्व युद्ध के दौरान भारत की स्वशासन की माँग को एक आवाज दी। इसने 1907 के सूरत विभाजन के बाद पहली बार कांग्रेस के नरमपंथियों और गरमपंथियों को भी फिर से एक किया। इतिहासकार इससे बने भरोसे को खिलाफत और असहयोग के वर्षों के साझा हिंदू-मुस्लिम आंदोलनों से जोड़ते हैं।

लखनऊ समझौते की आलोचना क्यों की जाती है?

आलोचकों का कहना है कि पृथक निर्वाचन मंडल और भारांक मानकर कांग्रेस ने धर्म के आधार पर मतदाताओं को बाँटने पर अपनी ही मुहर लगा दी। सीटों के हिस्से किसी सिद्धांत से नहीं, मोलभाव से तय हुए थे। फिर इन्हें 1919 के सुधारों में ले जाया गया और दूसरे समुदायों तक बढ़ा दिया गया। यह सौदा टिका भी नहीं, और 1928 की नेहरू रिपोर्ट ने इसे किनारे कर दिया।

लखनऊ समझौते ने भारत सरकार अधिनियम, 1919 को कैसे प्रभावित किया?

लॉर्ड साउथबरो की अध्यक्षता वाली मताधिकार समिति ने 1919 के सुधारों के तहत चुनावों की योजना बनाते समय समझौते के मुस्लिम सीट हिस्सों को आधार बनाया। लेकिन मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट ने समझौते का तीन-चौथाई वाला वीटो ठुकरा दिया। उसने वह योजना भी ठुकराई, जिसमें विधायिका ऐसी कार्यपालिका को बाँध सकती थी, जिसे वह हटा नहीं सकती थी। इस समस्या का रिपोर्ट का जवाब था प्रांतों में द्वैध शासन।

लखनऊ समझौते और पूना समझौते में क्या अंतर है?

1916 का लखनऊ समझौता कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हुआ था, जिसमें कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल माने। सितंबर 1932 का पूना समझौता दलित वर्गों को लेकर गांधी और आंबेडकर के बीच हुआ था। इसने पृथक निर्वाचन मंडल छोड़कर सामान्य निर्वाचन मंडल के भीतर ज्यादा सीटें दीं। एक ने मतदाताओं की अलग सूची को स्वीकार किया, दूसरे ने उसकी जगह नई व्यवस्था रखी।

क्या लखनऊ समझौते ने भारत में पृथक निर्वाचन मंडल बनाए?

नहीं। मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने शुरू किए थे, और तब कांग्रेस ने इनका विरोध किया था। 1916 का लखनऊ समझौता वह मोड़ है, जब कांग्रेस ने इन्हें मान लिया और हर प्रांत में मुसलमानों की सीटों का हिस्सा तय कर दिया।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. लखनऊ समझौते के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल स्वीकार किए। 2. 1916 में लखनऊ में हुए कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता बाल गंगाधर तिलक ने की थी। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a) लखनऊ कांग्रेस की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की थी; तिलक गरमपंथियों को समझौते में लाए थे।

2. 1916 की कांग्रेस-लीग योजना के तहत किस प्रांत की परिषद में निर्वाचित भारतीय सदस्यों का आधा हिस्सा मुसलमानों को मिलना था?

  • (a) बंगाल
  • (b) पंजाब
  • (c) संयुक्त प्रांत
  • (d) बंबई

उत्तर: (b) योजना ने पंजाब को आधा, बंगाल को 40 प्रतिशत, संयुक्त प्रांत को 30 प्रतिशत और बंबई को एक-तिहाई दिया।

3. 1916 की कांग्रेस-लीग योजना के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के निर्वाचित भारतीय सदस्यों में एक-तिहाई मुसलमान होने थे। 2. किसी समुदाय से जुड़ा विधेयक आगे नहीं बढ़ सकता था, अगर परिषद में उस समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य उसका विरोध करें। 3. इसने प्रांतों में द्वैध शासन का प्रस्ताव रखा। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) द्वैध शासन 1918 की मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट से आया, समझौते से नहीं।

4. निम्नलिखित को कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित कीजिए: 1. कांग्रेस का सूरत विभाजन 2. मॉर्ले-मिंटो सुधार 3. लखनऊ समझौता 4. उत्तरदायी शासन पर मॉन्टेग्यू घोषणा। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  • (a) 1-2-3-4
  • (b) 2-1-3-4
  • (c) 1-3-2-4
  • (d) 2-3-1-4

उत्तर: (a) सूरत 1907, मॉर्ले-मिंटो 1909, लखनऊ दिसंबर 1916 और मॉन्टेग्यू घोषणा अगस्त 1917।

5. निम्नलिखित में से किन प्रांतों में लखनऊ समझौते के तहत सीटों में मुसलमानों का हिस्सा आबादी में उनके हिस्से से कम था? 1. बंगाल 2. पंजाब 3. संयुक्त प्रांत। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 1 और 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) बंगाल को आबादी के 52.6 प्रतिशत हिस्से पर 40 प्रतिशत सीटें मिलीं और पंजाब को 54.8 पर 50, जबकि संयुक्त प्रांत को 14 पर 30 मिलीं।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. “लखनऊ समझौते ने पृथक निर्वाचन मंडल स्वीकार करने की कीमत पर हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक एकता खरीदी।” आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  2. 1911 से 1916 के बीच मुस्लिम राजनीति में कौन-से बदलाव आए, जिन्होंने लखनऊ में कांग्रेस-लीग समझौते को संभव बनाया? (10 अंक, 150 शब्द)
  3. मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट और मताधिकार समिति ने 1916 की कांग्रेस-लीग योजना का जवाब किस तरह दिया? (15 अंक, 250 शब्द)
  4. पहले विश्व युद्ध और होम रूल लीगों ने 1916 के लखनऊ अधिवेशन को किस तरह आकार दिया, इसका परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  5. मॉर्ले-मिंटो सुधारों से लेकर संविधान के अनुच्छेद 325 तक, भारत में पृथक निर्वाचन मंडल के सफर का विवरण दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

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Written by

Kaustubh Gaurh Sir

Kaustubh Gaurh teaches Ancient and Medieval History at Anantam IAS. He moves between dynasties, temple architecture and the Bhakti and Sufi traditions, and draws on Indian philosophical thought to ground GS IV ethics answers in more than the standard Western thinkers.

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