सूर्य की संरचना एक-दूसरे के भीतर बैठी सात परतों से बनी है। तीन परतें भीतर हैं, जो ऊर्जा बनाती हैं और उसे बाहर तक पहुँचाती हैं। चार परतें बाहर हैं, जो उसका वायुमंडल बनाती हैं। केंद्र में हाइड्रोजन करीब 15 मिलियन °C पर जुड़कर हीलियम बनती है। दिखाई देने वाली सतह तक आते-आते गैस का तापमान घटकर करीब 5,500 °C रह जाता है। लेकिन सबसे बाहरी परत, यानी कोरोना, में यह फिर चढ़कर 1 मिलियन °C से ऊपर चला जाता है। यही परतें तय करती हैं कि धूप कैसे बनती है, सूर्य पर काले धब्बे क्यों दिखते हैं और पृथ्वी के उपग्रहों में खलल डालने वाले विस्फोट कहाँ से आते हैं। भारत की आदित्य-L1 वेधशाला जनवरी 2024 से अंतरिक्ष में अपनी जगह से इन्हीं बाहरी परतों पर नजर रखे हुए है।
सूर्य के बारे में दो धारणाएँ करीब से देखने पर टिकती नहीं। पहली यह कि उसकी कोई सतह है। नहीं है। सूर्य प्लाज्मा का एक गोला है, और जिसे हम सतह कहते हैं वह असल में प्रकाशमंडल है, यानी करीब 100 किलोमीटर मोटी एक चमकती परत। दूसरी धारणा यह कि कोर से दूर जाने पर सूर्य लगातार ठंडा होता जाना चाहिए। प्रकाशमंडल तक तो ऐसा ही होता है। फिर तापमान सौ गुना से भी ज्यादा बढ़ जाता है, और इसकी वजह पर अब तक कोई पक्का फैसला नहीं हो पाया है। यह नोट हर परत को NASA के आंकड़ों के साथ समझाता है, और जो भौतिकी तय हो चुकी है उसे खुले सवाल से अलग रखता है।
सूर्य की संरचना क्या है?
सूर्य एक G2 V पीला बौना तारा (yellow dwarf) है, यानी अपनी उम्र के बीच में चल रहा एक साधारण तारा। वह लगभग पूरा हाइड्रोजन और हीलियम से बना है, और उसे उसका अपना गुरुत्व बाँधे रखता है। NASA उसे तीन क्षेत्रों वाले भीतरी हिस्से और चार परतों वाले वायुमंडल में बाँटता है। सबसे बाहरी परत से जो गैस निकल भागती है, वही सौर पवन बन जाती है। नीचे दिए आंकड़े NASA की सूर्य फैक्ट शीट और उसके ‘सन फैक्ट्स’ पेज से लिए गए हैं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| तारे का प्रकार | G2 V पीला बौना तारा, मुख्य अनुक्रम (main-sequence) का तारा |
| उम्र | करीब 4.6 अरब साल पहले गैस और धूल के सिकुड़ते बादल से बना |
| पृथ्वी से औसत दूरी | 149.6 मिलियन किलोमीटर; प्रकाश इसे करीब 8 मिनट 20 सेकंड में तय करता है |
| त्रिज्या | 695,700 किलोमीटर, यानी पृथ्वी की करीब 109 गुना |
| द्रव्यमान | करीब 332,900 पृथ्वियों के बराबर, यानी सौरमंडल के कुल द्रव्यमान का 99.8% |
| प्रकाशमंडल की बनावट | परमाणुओं में करीब 91% हाइड्रोजन और करीब 8.9% हीलियम |
| कोर का तापमान | करीब 15 मिलियन °C |
| दिखाई देने वाली सतह | प्रकाशमंडल, करीब 5,500 °C पर (प्रभावी तापमान 5,772 केल्विन) |
| कोरोना | 1 मिलियन °C से ऊपर, करीब 2 मिलियन °C तक |
सूर्य की परतें: अंदर से बाहर की ओर
केंद्र से बाहर की ओर पढ़ें तो सूर्य में सात परतें हैं, और आखिरी परत के आगे सौर पवन बहती है। तालिका में सिर्फ एक स्रोत इस्तेमाल हुआ है, NASA का मार्शल स्पेस फ्लाइट सेंटर। इसलिए इसकी पंक्तियों की सीधी तुलना की जा सकती है।
| परत | कहाँ है | तापमान | वहाँ क्या होता है |
|---|---|---|---|
| कोर (क्रोड) | केंद्र से त्रिज्या के करीब 25% तक (175,000 किलोमीटर) | केंद्र में करीब 15,000,000 °C, किनारे पर उसका आधा | हाइड्रोजन के नाभिक जुड़कर हीलियम बनाते हैं और सूर्य की ऊर्जा छोड़ते हैं |
| विकिरण क्षेत्र | त्रिज्या के 25% से 70% तक | 7,000,000 °C से घटकर करीब 2,000,000 °C | ऊर्जा प्रकाश के रूप में बाहर बढ़ती है, जो एक कण से दूसरे कण पर टकराकर उछलता रहता है |
| टैकोक्लाइन (tachocline) | त्रिज्या के करीब 70% पर एक पतली सीमा | करीब 2,000,000 °C, इसके दोनों ओर यही मान | माना जाता है कि सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र यहीं पैदा होता है |
| संवहन क्षेत्र | बाहरी 30%, करीब 200,000 किलोमीटर की गहराई से सतह तक | तली पर करीब 2,000,000 °C, ऊपर 5,700 केल्विन | गर्म प्लाज्मा ऊपर उठता है, फैलता है, ठंडा होता है और फिर नीचे बैठ जाता है |
| प्रकाशमंडल | करीब 100 किलोमीटर मोटी परत | करीब 5,700 केल्विन | ज्यादातर दृश्य प्रकाश यहीं से निकलता है; सौर कलंक, फैकुले और कणिकाएँ यहीं दिखते हैं |
| वर्णमंडल | प्रकाशमंडल के ऊपर एक असमान परत | 6,000 °C से बढ़कर करीब 20,000 °C | हाइड्रोजन की लाल चमक; प्रॉमिनेंस, स्पिक्यूल और प्लाज |
| संक्रमण क्षेत्र | पतली, बहुत असमान परत | करीब 20,000 °C से उछलकर 1,000,000 °C | पराबैंगनी प्रकाश छोड़ता है, जिसे सिर्फ अंतरिक्ष से देखा जा सकता है |
| कोरोना | बाहरी वायुमंडल, जो दूर अंतरिक्ष तक फैला है | 1,000,000 °C से ऊपर | पूर्ण सूर्यग्रहण में मोती जैसा सफेद मुकुट; स्ट्रीमर, प्लूम और लूप |
| सौर पवन | कोरोना से हर दिशा में बाहर बहती है | कोरोना की गैस, जो इतनी गर्म है कि सूर्य का गुरुत्व उसे थाम नहीं पाता | करीब 400 किलोमीटर प्रति सेकंड; कोरोनल होल के ऊपर 800 किलोमीटर प्रति सेकंड, स्ट्रीमर के ऊपर 300 किलोमीटर प्रति सेकंड |
मोटाई के मामले में NASA के अपने पेज अलग-अलग बात कहते हैं, क्योंकि गर्म गैस का कोई साफ किनारा नहीं होता। मार्शल प्रकाशमंडल को करीब 100 किलोमीटर मोटा बताता है, ‘सन फैक्ट्स’ पेज करीब 400 किलोमीटर और फैक्ट शीट करीब 500 किलोमीटर। हर स्रोत सीमा अलग जगह खींचता है। लेकिन जो बात मायने रखती है, उस पर सब सहमत हैं: 500 किलोमीटर भी सूर्य की त्रिज्या के हजारवें हिस्से से कम है। यानी दिखाई देने वाली सतह बस एक पतली झिल्ली है।
ऊर्जा कोर से सतह तक कैसे पहुँचती है
ऊर्जा कोर में बनती है। फिर वह विकिरण क्षेत्र में प्रकाश के रूप में रेंगती हुई आगे बढ़ती है, और आखिरी हिस्सा संवहन क्षेत्र में ऊपर उठता प्लाज्मा उसे ढोकर पूरा करता है। सूर्य की आंतरिक संरचना को इसी सफर से समझना सबसे आसान है।
कोर नाभिकीय संलयन से चलता है। हाइड्रोजन के नाभिक धनावेशित होते हैं और एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं। इसलिए वे तभी जुड़ते हैं जब गर्मी और दबाव उन्हें पूरी ताकत से एक-दूसरे पर धकेल दें। NASA के मुताबिक कोर का घनत्व करीब 150 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है, यानी सोने का करीब 8 गुना। सूर्य जैसे तारे में संलयन प्रोटॉन-प्रोटॉन श्रृंखला से होता है, जिसे NASA मार्शल तीन चरणों में समझाता है:
- दो प्रोटॉन टकराकर ड्यूटेरियम, एक पॉजिट्रॉन और एक न्यूट्रिनो बनाते हैं;
- एक प्रोटॉन ड्यूटेरियम से टकराकर हीलियम-3 और एक गामा किरण बनाता है;
- हीलियम-3 के दो नाभिक टकराकर हीलियम-4 बनाते हैं और दो प्रोटॉन छोड़ देते हैं।
बनी हुई हीलियम का वजन अंदर गई हाइड्रोजन से थोड़ा कम होता है, और यही गायब द्रव्यमान ऊर्जा बनकर निकलता है। NASA की फैक्ट शीट के मुताबिक सूर्य हर सेकंड 4,260 मिलियन किलोग्राम द्रव्यमान खोता है। यानी हर सेकंड 4 मिलियन टन से कुछ ज्यादा पदार्थ प्रकाश में बदल जाता है। यही प्रक्रिया, और पृथ्वी पर इसकी नकल करने की कोशिश, नाभिकीय संलयन वाले नोट में दी गई है।
विकिरण क्षेत्र में यह ऊर्जा प्रकाश के रूप में चलती है, लेकिन सीधी रेखा में नहीं। एक फोटॉन इतनी बार सोखा जाता है और किसी भी दिशा में दोबारा छोड़ा जाता है कि इस सफर के समय पर NASA के पेज ही एकमत नहीं हैं। मार्शल के आंकड़े के हिसाब से टैकोक्लाइन तक पहुँचने में करीब दस लाख साल लगते हैं। ‘सन फैक्ट्स’ पेज के हिसाब से संवहन क्षेत्र के ऊपरी सिरे तक करीब 170,000 साल लगते हैं। इसके बाद पृथ्वी तक का आखिरी 150 मिलियन किलोमीटर का रास्ता सिर्फ करीब 8 मिनट 20 सेकंड में तय हो जाता है।
त्रिज्या के करीब 70% पर, जहाँ गैस ठंडी होकर करीब 2 मिलियन °C रह जाती है, संवहन कमान संभाल लेता है। चूल्हे पर रखे पानी के बर्तन की कल्पना कीजिए। गर्म पानी ऊपर उठता है, सतह पर फैलता है, ठंडा होता है और किनारों पर नीचे बैठ जाता है। गति के मामले में यह उदाहरण ठीक बैठता है। इन कोशिकाओं के ऊपरी सिरे प्रकाशमंडल पर कणिकाओं के रूप में दिखते हैं, और इसी को कणिकायन (granulation) कहते हैं। लेकिन एक जरूरी जगह पर यह उदाहरण टूट जाता है। सौर प्लाज्मा में चुंबकीय क्षेत्र पिरोया होता है, जो बर्तन के पानी में नहीं होता। यही क्षेत्र आगे चलकर सौर कलंक, सौर ज्वालाएँ और गतिविधि का चक्र बनाता है। मार्शल इसके स्रोत, यानी सौर डायनेमो, को दोनों क्षेत्रों के बीच की पतली टैकोक्लाइन में रखता है।
प्रकाशमंडल: सूर्य की सतह जैसी दिखने की वजह
प्रकाशमंडल वह परत है जहाँ सूर्य की गैस अपारदर्शी से पारदर्शी हो जाती है। इसलिए इसका प्रकाश अंतरिक्ष में निकल पाता है और हमारी आँखें इसे सतह मान लेती हैं। मार्शल के आंकड़े पर यह करीब 100 किलोमीटर मोटा है, जबकि सूर्य की त्रिज्या 700,000 किलोमीटर है। डिस्क के बीच में देखिए, तो आप ज्यादा गहरी और गर्म गैस देखते हैं। किनारे पर देखिए, तो आपकी नजर सिर्फ ऊपर की ठंडी परत को छूकर निकल जाती है। इसीलिए सूर्य का किनारा धुँधला दिखता है। इस असर को लिंब डार्कनिंग (limb darkening) कहते हैं।
फिल्टर लगी दूरबीन से प्रकाशमंडल पर चार चीजें दिखती हैं:
- कणिकाएँ (granules): करीब 1,000 किलोमीटर चौड़ी कोशिकाएँ, जिनमें से हर एक करीब 20 मिनट टिकती है; ये संवहन कोशिकाओं के ऊपरी सिरे हैं, जिनमें प्रवाह 7 किलोमीटर प्रति सेकंड से भी तेज होता है।
- सुपरग्रेन्यूल्स (supergranules): कहीं बड़ी कोशिकाएँ, करीब 35,000 किलोमीटर चौड़ी, जो एक-दो दिन टिकती हैं।
- सौर कलंक (सनस्पॉट): काले धब्बे, जिनका केंद्र करीब 3,700 केल्विन तक गिर जाता है, जबकि आसपास 5,700 केल्विन रहता है; इनका चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से हजारों गुना ताकतवर होता है, और ये कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ्तों तक टिकते हैं।
- फैकुले (faculae): चमकीले चुंबकीय धब्बे, जो डिस्क के किनारे के पास सबसे अच्छे दिखते हैं।
सौर कलंक काला दिखता है, इसलिए लोग उसे छेद या जला हुआ धब्बा कहने लगते हैं। वह इन दोनों में से कुछ नहीं है। वह ऐसी गैस है जो ठंडी है, गायब नहीं। उसे एक ताकतवर चुंबकीय क्षेत्र रोके रखता है, जो नीचे से गर्मी ऊपर लाने वाले संवहन का रास्ता बंद कर देता है।
इसे आंकड़ों में देखिए। 3,700 केल्विन, 5,700 केल्विन का करीब दो-तिहाई है। किसी गर्म सतह से निकलने वाला प्रकाश उसके तापमान की चौथी घात के हिसाब से बढ़ता है। दो-तिहाई की चौथी घात करीब 0.18 होती है। यानी सौर कलंक का हर हिस्सा अपने बगल के प्रकाशमंडल के मुकाबले मोटे तौर पर पाँचवाँ हिस्सा प्रकाश ही छोड़ता है। अकेले में वह खूब चमकता। प्रकाशमंडल के बगल में वह काला दिखता है।
यहाँ एक सजग पाठक आपत्ति उठाएगा: अगर सौर कलंक काले हैं, तो उनसे भरा सूर्य ज्यादा धुँधला होना चाहिए। मार्शल कहता है कि होता इसका उल्टा है। सौर कलंकों के साथ आने वाले फैकुले भारी पड़ते हैं, और सौर कलंक अधिकतम (sunspot maximum) के समय सूर्य न्यूनतम की तुलना में करीब 0.1% ज्यादा चमकीला होता है।
सूर्य का वायुमंडल: वर्णमंडल, संक्रमण क्षेत्र और कोरोना
प्रकाशमंडल के ऊपर तापमान वह करता है जिसकी उम्मीद नहीं होती: वह चढ़ने लगता है। वर्णमंडल गर्म होकर करीब 20,000 °C तक पहुँचता है। पतला संक्रमण क्षेत्र उछलकर 1 मिलियन °C पर पहुँच जाता है, और कोरोना उससे ऊपर ही बना रहता है।
वर्णमंडल (chromosphere), यानी रंगों का मंडल, अपना नाम उस लाल प्रकाश से पाता है जो इन तापमानों पर हाइड्रोजन छोड़ती है। इस प्रकाश को H-अल्फा कहते हैं। आम तौर पर प्रकाशमंडल की चमक इसे दबा देती है। पूर्ण सूर्यग्रहण में, जब चंद्रमा प्रकाशमंडल को ढक लेता है, तब वर्णमंडल एक पतले लाल घेरे की तरह दिखता है और कोरोना उसके चारों ओर सफेद मुकुट की तरह; इसकी ज्यामिति सूर्यग्रहण वाले नोट में है। प्रॉमिनेंस (prominences) भी वर्णमंडल में ही लटके रहते हैं। ये घने, अपेक्षाकृत ठंडे बादल हैं, जिन्हें चुंबकीय क्षेत्र के लूप सतह के ऊपर थामे रहते हैं। चमकती डिस्क के सामने यही बादल काले दिखते हैं और फिलामेंट (filaments) कहलाते हैं। स्पिक्यूल नाम की छोटी धाराएँ इसके बीच से ऊपर उछलती हैं और सिर्फ कुछ मिनट टिकती हैं।
संक्रमण क्षेत्र वह पतली, असमान परत है जहाँ तापमान करीब 20,000 °C से उछलकर दस लाख डिग्री तक पहुँच जाता है। इसके पराबैंगनी प्रकाश को पृथ्वी का वायुमंडल सोख लेता है, इसलिए इसका अध्ययन सिर्फ अंतरिक्ष से हो सकता है।
सूर्य का कोरोना उसका बाहरी वायुमंडल है। ग्रहण में यह स्ट्रीमर, प्लूम और लूप के रूप में दिखता है, और इनका आकार सौर चक्र के साथ बदलता रहता है। कोरोना के शुरुआती स्पेक्ट्रम में ऐसी चमकीली रेखाएँ दिखीं जो किसी ज्ञात तत्व से मेल नहीं खाती थीं। इसलिए खगोलविदों ने एक नए तत्व का अनुमान लगाया और उसे कोरोनियम नाम दिया। कोरोनियम जैसा कोई तत्व था ही नहीं। ये रेखाएँ ऐसे लोहे और कैल्शियम से आ रही थीं जिनके कई इलेक्ट्रॉन छिन चुके थे, और ऐसा सिर्फ 1 मिलियन °C से ऊपर के तापमान पर होता है। इसके बाद कोरोना सौर पवन बनकर आगे बढ़ता रहता है। यह पवन हेलियोस्फीयर नाम का एक चुंबकीय बुलबुला फुलाती है, जो सभी ग्रहों की कक्षाओं से भी आगे तक जाता है। NASA के शब्दों में, पृथ्वी सूर्य के वायुमंडल के भीतर ही बैठी है।
कोरोना प्रकाशमंडल से ज्यादा गर्म क्यों है?
पक्के तौर पर कोई नहीं जानता। यही कोरोना तापन की समस्या (coronal heating problem) है, और NASA इसे सूर्य के अध्ययन की एक बड़ी अनसुलझी पहेली कहता है। यह पहेली इसलिए है क्योंकि गर्मी आम तौर पर गर्म से ठंडे की ओर बहती है। तो कोर से दूर की परतें ज्यादा ठंडी होनी चाहिए, और प्रकाशमंडल तक वे हैं भी। संक्रमण क्षेत्र इस पहेली को और तीखा कर देता है। NASA मार्शल बताता है कि वहाँ गर्मी नीचे की ओर बहती है, यानी कोरोना से बाहर निकलती है। इसलिए कोरोना नीचे से ऊपर आती गर्मी से गर्म नहीं हो सकता। कोई चीज उस तक सीधे ऊर्जा पहुँचा रही होगी।
NASA मार्शल सबसे ज्यादा सुझाई जाने वाली दो व्याख्याएँ गिनाता है:
- तरंग तापन (wave heating): चुंबकीय तरंगें उबलती-मथती सतह से ऊर्जा ऊपर ले जाती हैं और उसे कोरोना में छोड़ देती हैं।
- नैनोफ्लेयर तापन (nanoflare heating): अनगिनत छोटी ज्वालाएँ, जिनमें से हर एक अकेले देखने के लिए बहुत छोटी है, जमा चुंबकीय ऊर्जा लगातार छोड़ती रहती हैं।
इनमें से कोई भी व्याख्या साबित नहीं हुई है, और दोनों ही चुंबकीय क्षेत्र को केंद्र में रखती हैं। यही खुला सवाल एक बड़ी वजह है कि आदित्य-L1, पार्कर सोलर प्रोब और प्रोबा-3 बनाए गए।
सौर कलंक, सौर ज्वाला, CME और 11 साल का सौर चक्र
सूर्य की गतिविधि करीब 11 साल के चक्र में बढ़ती और घटती है, और इसे मापने का सबसे पुराना तरीका सौर कलंकों को गिनना है। NASA बताता है कि सूर्य शांत दौर से बेहद सक्रिय दौर में जाता है और फिर लौटता है। इसी दौरान करीब हर 11 साल में उसके चुंबकीय ध्रुव आपस में जगह बदल लेते हैं। मार्शल गिनती का वह नियम बताता है जो आज भी इस्तेमाल होता है: सौर कलंक संख्या (sunspot number) अलग-अलग धब्बों की संख्या और समूहों की संख्या के दस गुने का जोड़ है।
सौर कलंकों के रिकॉर्ड में दो पैटर्न याद रखने लायक हैं:
- मॉन्डर मिनिमम (Maunder Minimum): करीब 1645 से 1715 तक बहुत कम सौर कलंक दिखे। यह शांत दौर लघु हिमयुग (Little Ice Age) से मेल खाता है; मार्शल सौर गतिविधि और जलवायु के संबंध को अभी जारी शोध का विषय बताता है।
- तितली आरेख (butterfly diagram): धब्बे मध्य अक्षांशों पर दो पट्टियों में बनते हैं, और जैसे-जैसे चक्र आगे बढ़ता है, ये पट्टियाँ भूमध्य रेखा की ओर खिसकती जाती हैं।
सौर ज्वाला और कोरोनल मास इजेक्शन को आपस में मिला देना आसान है, इसलिए इन्हें अलग-अलग रखिए:
- सौर ज्वाला (solar flare): चुंबकीय ऊर्जा के अचानक निकलने से होने वाला प्रकाश और कणों का विस्फोट; इसका प्रकाश करीब 8 मिनट में पृथ्वी तक पहुँच जाता है।
- कोरोनल मास इजेक्शन (CME): चुंबकीय प्लाज्मा का एक बादल, जो दस लाख मील प्रति घंटे से ज्यादा रफ्तार से बाहर फेंका जाता है, अक्सर किसी ज्वाला के बाद; 1.6 मिलियन किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पर इसे 150 मिलियन किलोमीटर तय करने में करीब चार दिन लगते हैं, और तेज CME इससे पहले पहुँच जाते हैं।
- प्रॉमिनेंस विस्फोट (prominence eruption): ऐसा प्रॉमिनेंस जिसका चुंबकीय सहारा टूट जाए और उसका प्लाज्मा CME बनकर बाहर फिंक जाए।
अगर CME का रुख पृथ्वी की ओर हो, तो वह आसमान में ध्रुवीय ज्योति (aurora) जगा सकता है। उपग्रह और पावर ग्रिड भी इससे गड़बड़ा सकते हैं। NASA ने अब तक के सबसे ताकतवर भू-चुंबकीय तूफान के रूप में कैरिंगटन घटना (Carrington Event) को दर्ज किया है, जो 1 सितंबर 1859 की एक ज्वाला से शुरू हुई थी। उसने 13 मार्च 1989 का एक तूफान भी दर्ज किया है, जिसने क्यूबेक में 6 मिलियन लोगों को 9 घंटे तक बिना बिजली के छोड़ दिया। इन घटनाओं का पृथ्वी वाला पहलू सौर तूफान और उत्तरी ध्रुवीय ज्योति वाले नोट्स में है।
मौजूदा चक्र, यानी सौर चक्र 25, दिसंबर 2019 में सौर न्यूनतम (solar minimum) पर शुरू हुआ। NASA और NOAA के साझा सहयोग वाले 2019 के एक पैनल ने एक मामूली चरम का अनुमान लगाया था: नवंबर 2024 से मार्च 2026 के बीच 105 से 125 की स्मूद्ड (smoothed) सौर कलंक संख्या। सूर्य इस पूर्वानुमान से आगे निकल गया। 15 अक्टूबर 2024 को NASA, NOAA और सोलर साइकिल प्रेडिक्शन पैनल ने घोषणा की कि सूर्य अपने सौर अधिकतम (solar maximum) के दौर में पहुँच गया है। फिर 2025 में बेल्जियम की रॉयल ऑब्जर्वेटरी की सौर कलंक सूचकांक सेवा ने पुष्टि की कि स्मूद्ड मासिक सौर कलंक संख्या अक्टूबर 2024 में 161 पर चरम पर पहुँची थी। NOAA को उम्मीद है कि सौर चक्र 26 जनवरी 2029 से दिसंबर 2032 के बीच शुरू होगा। चरम वाला साल अपने आप में सौर अधिकतम और सौर चक्र वाले नोट में है।
सूर्य की संरचना पर आज की नजर: आदित्य-L1 और दूसरे मिशन
भारत अब अपनी खुद की वेधशाला से इन परतों पर नजर रखता है। आदित्य-L1, अंतरिक्ष में स्थित भारत की पहली सौर वेधशाला, 2 सितंबर 2023 को PSLV-C57 से लॉन्च हुई। 6 जनवरी 2024 को इसे सूर्य-पृथ्वी लग्रांज बिंदु L1 के चारों ओर एक हेलो कक्षा (halo orbit) में स्थापित किया गया। L1 पृथ्वी से करीब 1.5 मिलियन किलोमीटर दूर है, यानी सूर्य तक के रास्ते का करीब 1%। वहाँ से कोई अंतरिक्ष यान ग्रहणों की रुकावट के बिना लगातार सूर्य को देख सकता है। मिशन की पूरी कहानी आदित्य-L1 वाले नोट में है, और ISRO का मिशन पेज इसके सात पेलोड गिनाता है:
- VELC (Visible Emission Line Coronagraph): कोरोना की तस्वीरें और स्पेक्ट्रम।
- SUIT (Solar Ultraviolet Imaging Telescope): निकट-पराबैंगनी प्रकाश में प्रकाशमंडल और वर्णमंडल की तस्वीरें।
- SoLEXS (Solar Low Energy X-ray Spectrometer): पूरे सूर्य से आने वाली सॉफ्ट एक्स-रे।
- HEL1OS (High Energy L1 Orbiting X-ray Spectrometer): पूरे सूर्य से आने वाली हार्ड एक्स-रे।
- ASPEX (Aditya Solar wind Particle Experiment): सौर पवन में प्रोटॉन और भारी आयन।
- PAPA (Plasma Analyser Package for Aditya): सौर पवन में इलेक्ट्रॉन और भारी आयन।
- मैग्नेटोमीटर: L1 पर चुंबकीय क्षेत्र।
पहले चार पेलोड सूर्य को देखते हैं; आखिरी तीन L1 तक पहुँचने वाले कणों और क्षेत्रों के नमूने लेते हैं। ISRO ने मिशन के उद्देश्यों में कोरोना तापन, अंतरिक्ष मौसम, और सौर ज्वालाओं व CME की शुरुआत को गिनाया है। अब तक के नतीजे, हर एक की तारीख के साथ:
- 7 नवंबर 2023: HEL1OS ने सौर ज्वालाओं का अपना पहला उच्च-ऊर्जा एक्स-रे दृश्य दर्ज किया, जब यान अभी L1 के रास्ते में ही था।
- 22 फरवरी 2024: SUIT ने एक X6.3 ज्वाला देखी और उसके ‘कर्नेल’ को, यानी प्रकाशमंडल और वर्णमंडल में होने वाली चमक को, 200 से 400 नैनोमीटर की रेंज में कैद किया; PIB ने यह नतीजा 28 फरवरी 2025 को घोषित किया।
- 16 जुलाई 2024: VELC ने X1.9 ज्वाला से जुड़े एक CME की शुरुआत दर्ज की; कोरोनल मास इजेक्शन पर आदित्य-L1 की नजर वाले ब्रीफ में इसका ब्योरा है।
- 28 अगस्त 2026: ISRO ने बताया कि SUIT, SoLEXS और HEL1OS ने कुछ पल की ऐसी चमकें पकड़ी हैं जो उन्हीं जगहों पर जुटती हैं जहाँ बाद में कोई बड़ी ज्वाला फूटती है, जो एक संभावित पूर्व-चेतावनी हो सकती है; आदित्य-L1 और ज्वालाओं के पूर्व-संकेत वाला ब्रीफ इसे कवर करता है।
दो और मिशन इसके साथ खड़े हैं। NASA का पार्कर सोलर प्रोब खुद कोरोना के बीच से उड़ता है: 24 दिसंबर 2024 को यह सूर्य की सतह से करीब 6.1 मिलियन किलोमीटर की दूरी से 692,000 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से गुजरा। कोई भी मानव-निर्मित वस्तु किसी तारे के इतने करीब पहले कभी नहीं पहुँची।
ESA के प्रोबा-3 को ISRO ने 5 दिसंबर 2024 को श्रीहरिकोटा से PSLV-C59 पर लॉन्च किया। यह न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड का एक व्यावसायिक मिशन था; रॉकेट के बारे में PSLV वाला नोट पढ़िए। इसके दो अंतरिक्ष यान 150 मीटर की दूरी पर साथ उड़ते हैं, ताकि एक यान पर लगी 1.4 मीटर की डिस्क दूसरे के कोरोनाग्राफ पर छाया डाल सके। ESA ने पहली कृत्रिम ग्रहण तस्वीरें 16 जून 2025 को जारी कीं। 14 और 15 फरवरी 2026 को एक खराबी से कोरोनाग्राफ यान से संपर्क टूट गया; ESA ने मार्च 2026 में इसे बहाल कर दिया।
परीक्षा के लिए सूर्य की संरचना कैसे पढ़ें
सूर्य की संरचना सिलेबस में तीन जगह आती है:
- GS पेपर I में, भौतिक भूगोल के तहत, जहाँ सौरमंडल, सूर्यातप (insolation) और पृथ्वी पर सूर्य के असर की पढ़ाई शुरू होती है;
- GS पेपर III में, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के तहत, भारत के अंतरिक्ष मिशनों और अंतरिक्ष मौसम के जरिए;
- प्रीलिम्स में, सामान्य विज्ञान और अंतरिक्ष से जुड़े करेंट अफेयर्स में।
यह टॉपिक नाम लेकर कम, अपने असर के जरिए ज्यादा पूछा जाता है। मुख्य परीक्षा 2024 के GS पेपर I में सवाल आया था: “ऑरोरा ऑस्ट्रेलिस और ऑरोरा बोरियालिस क्या हैं? ये कैसे उत्पन्न होते हैं?“। इसका पूरा उत्तर कोरोना से शुरू होकर सौर पवन और CME से होते हुए पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र तक जाता है। प्रीलिम्स की बात करें, तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 2013 से 2026 तक के 1,403 सवालों में से 192 विज्ञान और प्रौद्योगिकी के तहत टैग किए गए हैं।
इन बातों को तब तक दोहराइए, जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएँ:
- क्रम: कोर, विकिरण क्षेत्र, संवहन क्षेत्र, प्रकाशमंडल, वर्णमंडल, संक्रमण क्षेत्र, कोरोना; उसके आगे सौर पवन।
- तापमान: कोर में करीब 15 मिलियन °C, प्रकाशमंडल पर करीब 5,500 °C, कोरोना में 1 मिलियन °C से ऊपर।
- संलयन: प्रोटॉन-प्रोटॉन श्रृंखला त्रिज्या के सबसे भीतरी 25% हिस्से में हाइड्रोजन को हीलियम में बदलती है।
- सौर कलंक: करीब 3,700 केल्विन बनाम 5,700 केल्विन; सिर्फ तुलना में काले दिखते हैं और इनमें ताकतवर चुंबकीय क्षेत्र होता है।
- सौर चक्र: करीब 11 साल; सौर चक्र 25 दिसंबर 2019 में शुरू हुआ और इसका स्मूद्ड चरम अक्टूबर 2024 में आया।
- आदित्य-L1: 2 सितंबर 2023 को PSLV-C57, 6 जनवरी 2024 को L1 के चारों ओर हेलो कक्षा, 7 पेलोड (4 रिमोट सेंसिंग, 3 इन-सीटू)।
पाँच गलतफहमियाँ नंबर कटवाती हैं:
- सतह या प्रकाशमंडल। सूर्य की कोई ठोस सतह नहीं है। प्रकाशमंडल दिखने वाली परत है, और वायुमंडल की पहली परत भी।
- लाल घेरा या सफेद मुकुट। पूर्ण सूर्यग्रहण में लाल घेरा वर्णमंडल होता है और सफेद मुकुट कोरोना।
- प्रॉमिनेंस या फिलामेंट। दोनों प्लाज्मा का एक ही बादल हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि एक को डिस्क के किनारे पर देखा जाता है और दूसरे को डिस्क के सामने।
- सौर ज्वाला या CME। ज्वाला प्रकाश का विस्फोट है, जो मिनटों में पहुँचता है; CME पदार्थ का बादल है, जो दिनों में पहुँचता है।
- L1 कहाँ है। 1.5 मिलियन किलोमीटर पर स्थित L1 सूर्य तक के रास्ते का करीब 1% है; आदित्य-L1 वहीं से देखता है, जबकि पार्कर सोलर प्रोब सूर्य के करीब जाकर उड़ता है।
भारत के मिशन को बाकी दो मिशनों के साथ रखकर देखना भी मदद करता है:
| मिशन | एजेंसी | कहाँ से देखता है | क्या अध्ययन करता है |
|---|---|---|---|
| आदित्य-L1 | ISRO | सूर्य-पृथ्वी L1 के चारों ओर हेलो कक्षा, पृथ्वी से करीब 1.5 मिलियन किलोमीटर | प्रकाशमंडल, वर्णमंडल और कोरोना, साथ में L1 पर सौर पवन और चुंबकीय क्षेत्र |
| पार्कर सोलर प्रोब | NASA | कोरोना के बीच से गुजरता है, सबसे करीब होने पर सतह से करीब 6.1 मिलियन किलोमीटर | कोरोना, और वह जगह जहाँ से सौर पवन शुरू होती है |
| प्रोबा-3 | ESA | पृथ्वी की अत्यधिक दीर्घवृत्ताकार कक्षा, जहाँ यह PSLV-C59 से पहुँचा | भीतरी कोरोना, साथ उड़ते दो अंतरिक्ष यानों से बनाए गए कृत्रिम ग्रहणों के जरिए |
सूर्य की संरचना उस अभ्यर्थी का साथ देती है जो इसे सात नामों की जगह तापमान के एक वक्र की तरह याद करता है: कोर से प्रकाशमंडल तक गिरता हुआ, फिर कोरोना में चढ़ता हुआ। यह वक्र पकड़ लीजिए, तो कोरोना तापन की समस्या, ग्रहण के रंग और आदित्य-L1 का मकसद, सब इसी से निकल आते हैं। यह छूट गया, तो ध्रुवीय ज्योति या अंतरिक्ष मौसम पर लिखे उत्तर को शुरू करने की कोई जमीन ही नहीं बचती।
सामान्य प्रश्न
सूर्य की परतें अंदर से बाहर की ओर कौन-सी हैं?
केंद्र से बाहर की ओर सूर्य की परतें हैं: कोर, विकिरण क्षेत्र, संवहन क्षेत्र, प्रकाशमंडल, वर्णमंडल, संक्रमण क्षेत्र और कोरोना। पहली तीन परतें भीतरी हिस्सा बनाती हैं और आखिरी चार वायुमंडल। कोरोना के आगे गैस सौर पवन बनकर बाहर बहती रहती है।
सूर्य की सबसे गर्म परत कौन-सी है?
सबसे गर्म परत कोर है, करीब 15 मिलियन °C पर। यह तापमान हाइड्रोजन को जोड़कर हीलियम बनाने के लिए काफी है। वायुमंडल में सबसे गर्म परत कोरोना है, जो 1 मिलियन °C से ऊपर और करीब 2 मिलियन °C तक पहुँचता है। यह करीब 5,500 °C वाले प्रकाशमंडल से कहीं ज्यादा गर्म है।
कोरोना सूर्य की सतह से ज्यादा गर्म क्यों है?
पक्के तौर पर कोई नहीं जानता। यही कोरोना तापन की समस्या है, जिसे NASA एक बड़ी अनसुलझी पहेली कहता है। गर्मी कोरोना से नीचे की परतों में बहती है, इसलिए कोरोना को सीधे गर्म किया जा रहा होगा। दो प्रमुख व्याख्याएँ हैं: चुंबकीय तरंगों से ऊपर पहुँचाई गई ऊर्जा, और नैनोफ्लेयर कहलाने वाली छोटी ज्वालाओं की लगातार चलती धारा।
सूर्य का प्रकाशमंडल क्या है?
प्रकाशमंडल वह परत है जो सूर्य का ज्यादातर दृश्य प्रकाश छोड़ती है, इसलिए हमें यही सतह के रूप में दिखती है। NASA मार्शल इसे करीब 100 किलोमीटर मोटा और करीब 5,700 केल्विन गर्म बताता है। सौर कलंक, फैकुले और कणिकाएँ, सब इसी पर दिखते हैं।
सौर कलंक क्या हैं और वे काले क्यों दिखते हैं?
सौर कलंक प्रकाशमंडल पर ऐसे चुंबकीय इलाके हैं जहाँ ताकतवर चुंबकीय क्षेत्र नीचे से ऊपर उठती गर्मी को रोक देते हैं। इनका केंद्र करीब 3,700 केल्विन होता है, जबकि आसपास करीब 5,700 केल्विन। इसलिए ये बहुत कम प्रकाश छोड़ते हैं और सिर्फ तुलना में काले दिखते हैं। ये 11 साल के सौर चक्र के साथ आते-जाते रहते हैं।
11 साल का सौर चक्र क्या है, और सौर चक्र 25 अभी कहाँ है?
सौर चक्र करीब 11 साल में सूर्य की गतिविधि का बढ़ना और घटना है, और इसी दौरान उसके चुंबकीय ध्रुव जगह बदल लेते हैं। सौर चक्र 25 दिसंबर 2019 में शुरू हुआ, और इसकी स्मूद्ड सौर कलंक संख्या अक्टूबर 2024 में 161 पर चरम पर पहुँची। NOAA को उम्मीद है कि सौर चक्र 26 जनवरी 2029 से दिसंबर 2032 के बीच शुरू होगा।
आदित्य-L1 सूर्य के किन हिस्सों का अध्ययन करता है?
आदित्य-L1 के चार रिमोट-सेंसिंग पेलोड दृश्य, पराबैंगनी और एक्स-रे प्रकाश में प्रकाशमंडल, वर्णमंडल और कोरोना को देखते हैं। इसके तीन इन-सीटू पेलोड L1 पर सौर पवन के कणों और चुंबकीय क्षेत्र को मापते हैं। मिशन के लक्ष्यों में कोरोना तापन, ज्वालाओं और CME की शुरुआत, और अंतरिक्ष मौसम को चलाने वाले कारण शामिल हैं।
क्या सूर्य की कोई ठोस सतह है?
नहीं। सूर्य प्लाज्मा का गोला है, यानी विद्युत आवेश वाली गैस का, और उसकी कहीं भी कोई ठोस सतह नहीं है। प्रकाशमंडल सतह जैसा इसलिए दिखता है क्योंकि यही वह परत है जहाँ गैस इतनी पारदर्शी हो जाती है कि प्रकाश अंतरिक्ष में निकल सके।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. सूर्य के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संक्रमण क्षेत्र वर्णमंडल और कोरोना के बीच स्थित है। 2. प्रकाशमंडल ऊपरी वर्णमंडल से ज्यादा गर्म है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) वर्णमंडल अपने ऊपरी सिरे पर करीब 20,000 °C तक गर्म हो जाता है, जो प्रकाशमंडल के 5,700 केल्विन से काफी ऊपर है।
2. सूर्य की निम्नलिखित परतों को अंदर से बाहर की ओर क्रम में लगाइए: 1. संवहन क्षेत्र 2. विकिरण क्षेत्र 3. वर्णमंडल 4. प्रकाशमंडल। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a) 2-1-4-3
- (b) 1-2-4-3
- (c) 2-1-3-4
- (d) 1-2-3-4
उत्तर: (a) ऊर्जा विकिरण क्षेत्र से संवहन क्षेत्र में जाती है, फिर प्रकाशमंडल में और उसके ऊपर के वर्णमंडल में।
3. आदित्य-L1 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसे PSLV-C57 से लॉन्च किया गया। 2. यह सूर्य-पृथ्वी L1 बिंदु के चारों ओर एक हेलो कक्षा से सूर्य को देखता है। 3. इसके सातों पेलोड सीधे सूर्य की ओर देखते हैं। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) चार पेलोड सूर्य को देखते हैं; बाकी तीन L1 पर कणों और क्षेत्रों को मापते हैं।
4. सौर कलंक मुख्य रूप से काले क्यों दिखते हैं? क्योंकि वे:
- (a) ऐसे छेद हैं जिनसे सूर्य का भीतरी हिस्सा दिखता है
- (b) आसपास के प्रकाशमंडल से ठंडे हैं
- (c) कोरोना के पीछे छिपे हैं
- (d) उनमें कोई चुंबकीय क्षेत्र नहीं होता
उत्तर: (b) इनका केंद्र करीब 3,700 केल्विन होता है, जबकि आसपास 5,700 केल्विन, इसलिए ये कहीं कम प्रकाश छोड़ते हैं।
5. प्रोबा-3 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का मिशन है, जिसे भारत के PSLV से लॉन्च किया गया। 2. यह अपनी डिस्क वाले एक ही अंतरिक्ष यान से कृत्रिम सूर्यग्रहण बनाता है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) प्रोबा-3 में दो अंतरिक्ष यान 150 मीटर की दूरी पर साथ उड़ते हैं, और एक यान दूसरे के कोरोनाग्राफ पर छाया डालता है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- ऑरोरा ऑस्ट्रेलिस और ऑरोरा बोरियालिस क्या हैं? ये कैसे उत्पन्न होते हैं? (15 अंक, 250 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2024, GS पेपर I।
- सूर्य का कोरोना अपने नीचे के प्रकाशमंडल से कहीं ज्यादा गर्म है। समझाइए कि इसे एक समस्या क्यों माना जाता है, और सुझाई गई व्याख्याओं की चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- समझाइए कि सूर्य के कोर में बनी ऊर्जा उसकी दिखाई देने वाली सतह तक कैसे पहुँचती है। इसमें शामिल परतों के नाम बताइए, और यह भी बताइए कि हर परत में ऊर्जा किस तरह आगे बढ़ती है। (10 अंक, 150 शब्द)
- सौर चक्र क्या है? सौर चक्र 25 के संदर्भ में उपग्रहों, पावर ग्रिड और संचार प्रणालियों पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- आदित्य-L1 के वैज्ञानिक उद्देश्यों की चर्चा कीजिए, और समझाइए कि सूर्य-पृथ्वी L1 बिंदु किसी सौर वेधशाला के लिए उपयुक्त क्यों है। (15 अंक, 250 शब्द)