वी.पी. सिंह 2 दिसंबर 1989 से 10 नवंबर 1990 तक भारत के 7वें प्रधानमंत्री रहे — कुल 343 दिन, लेकिन इस छोटे दौर ने भारतीय राजनीति को कई लंबे कार्यकालों से ज़्यादा बदला। वी.पी. सिंह भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मिले जनादेश पर सत्ता में आए, जिसकी धुरी बोफ़ोर्स तोप सौदे में मिले कमीशन थे। उन्होंने नेशनल फ्रंट गठबंधन की अगुवाई की, जिसे BJP और वामपंथी दलों ने बाहर से समर्थन दिया, और 7 अगस्त 1990 को मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का ऐलान किया — यानी केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण। इस फ़ैसले ने BJP को रथ यात्रा की लामबंदी की ओर धकेला, नवंबर 1990 तक उनका गठबंधन तोड़ दिया, और जाति आधारित सामाजिक न्याय को राष्ट्रीय राजनीति की पक्की दरार बना दिया।
भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची में वी.पी. सिंह सातवें नंबर पर आते हैं — जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, चरण सिंह और राजीव गांधी के बाद, और चंद्रशेखर से पहले। 1947 से आज तक का पूरा सिलसिला देखने के लिए हमारी भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची देखिए।
वी.पी. सिंह में कई चीज़ें एक साथ थीं: रजवाड़े वाला राजपूत-ठाकुर परिवार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पढ़ाई, चित्रकार जैसी नज़र, सादा निजी जीवन, और साथ ही अपने ही संरक्षकों से टकरा जाने वाला राजनेता। उन्होंने कांग्रेस के भीतर रहते हुए राजीव गांधी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला, अपने ही गठबंधन के भीतर देवी लाल से भिड़े, और मंडल की सिफ़ारिशें मुख्यधारा में लाकर जाति के परंपरागत गणित को उलट दिया। 27 नवंबर 2008 को उनका निधन हुआ। उनकी विरासत पर बहस होती रहती है, लेकिन उसे नज़रअंदाज़ करना मुमकिन नहीं।
शुरुआती ज़िंदगी और कांग्रेस के साल

विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म 25 जून 1931 को इलाहाबाद में मांडा (दैया) के राजपरिवार में हुआ। उन्हें मांडा रियासत में गोद लिया गया था। पढ़ाई देहरादून के कर्नल ब्राउन कैंब्रिज स्कूल में हुई, BSc इलाहाबाद विश्वविद्यालय से और LLB पूना विश्वविद्यालय से किया। उन्होंने अपने पुश्तैनी ज़मींदारी हक़ छोड़ दिए — यह बात उनके चाहने वाले अक्सर याद दिलाते हैं — और राजनीति में इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के रास्ते आए।
वह 1969 में उत्तर प्रदेश विधानसभा और 1971 में लोकसभा के लिए चुने गए। इंदिरा गांधी ने उन्हें पहले उप वाणिज्य मंत्री और फिर वाणिज्य मंत्री बनाया। 1980 के चुनाव के बाद वह 1980 से 1982 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे — यह दौर चंबल के डाकुओं पर उनकी सख़्ती के लिए याद किया जाता है, जिसमें डाकुओं के हमले में अपने भाई की मौत के बाद इटावा का उनका निजी दौरा भी शामिल है।
वित्त मंत्री और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम
राजीव गांधी ने 1984 में वी.पी. सिंह को वित्त मंत्री बनाया। बड़े औद्योगिक घरानों पर टैक्स के छापों की वजह से उन्हें “रेड राजा” कहा जाने लगा — इनमें धीरूभाई अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज़ भी थी — और इन छापों ने कांग्रेस तथा बड़े कारोबार के बीच दिल्ली में चली आ रही अनकही समझ तोड़ दी। राजीव ने 1987 में उन्हें रक्षा मंत्रालय भेज दिया। वहाँ वी.पी. सिंह ने HDW पनडुब्बी सौदे के कमीशन की जाँच शुरू की और उसके फ़ौरन बाद बोफ़ोर्स तोप सौदे की। कुछ ही महीनों में उन्हें मंत्रिमंडल से और कांग्रेस से बाहर कर दिया गया।
जन मोर्चा से नेशनल फ्रंट तक
वी.पी. सिंह ने 1987 में जन मोर्चा शुरू किया, फिर अक्टूबर 1988 में लोक दल, जनता पार्टी और कांग्रेस (एस) के साथ मिलकर जनता दल बनाया। तेलुगु देशम पार्टी, DMK, AGP और दूसरे दलों के साथ बना नेशनल फ्रंट गठबंधन 1989 का चुनाव लड़ा। कांग्रेस हार गई। वी.पी. सिंह 2 दिसंबर 1989 को प्रधानमंत्री बने, और उन्हें BJP (85 सीटें) तथा वाम मोर्चे का बाहर से समर्थन मिला। यह इंतज़ाम अपने आप में डाँवाडोल था, लेकिन राजनीतिक संदेश बहुत साफ़ था।
मंडल वाला मोड़
बी.पी. मंडल की अध्यक्षता वाला मंडल आयोग 1979 में मोरारजी देसाई की जनता सरकार के दौर में बना था और उसने 1980 में अपनी रिपोर्ट दी। आयोग ने 3,743 जातियों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा बताया, OBC आबादी का अंदाज़ा 52 प्रतिशत लगाया, और केंद्र सरकार की नौकरियों तथा सार्वजनिक उपक्रमों में 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफ़ारिश की — यह 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर ही था, क्योंकि SC और ST कोटा 22.5 प्रतिशत था।
वी.पी. सिंह ने 7 अगस्त 1990 को संसद में इसे लागू करने का ऐलान किया। राजनीतिक असर तुरंत दिखा। दिल्ली, उत्तर भारत और पश्चिम के कुछ हिस्सों में मंडल विरोधी प्रदर्शन भड़क उठे। 19 सितंबर 1990 को देशबंधु कॉलेज के बाहर छात्र राजीव गोस्वामी के आत्मदाह की तस्वीर इस आंदोलन की सबसे चुभने वाली छवि बन गई। सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) में 27 प्रतिशत OBC आरक्षण को सही ठहराया, कुल आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा तय की, और “क्रीमी लेयर” को बाहर रखने का नियम जोड़ा।
रथ यात्रा और गठबंधन का टूटना
एल.के. आडवाणी की अगुवाई में BJP ने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से राम जन्मभूमि रथ यात्रा शुरू की। वी.पी. सिंह ने 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी की गिरफ़्तारी का आदेश दिया — मुख्यमंत्री के तौर पर यह लालू प्रसाद यादव का पहला बड़ा राजनीतिक पल था। BJP ने बाहर से दिया समर्थन वापस ले लिया। 7 नवंबर 1990 को वी.पी. सिंह विश्वास मत 142-346 से हार गए और 10 नवंबर को इस्तीफ़ा दे दिया।
मंडल और मंदिर, इसी क्रम में, अगले एक दशक की भारतीय राजनीति तय करते रहे — इसमें अटल बिहारी वाजपेयी और BJP का उभार, पी.वी. नरसिंह राव के दौर में कांग्रेस की नई शुरुआत, और आगे चलकर मनमोहन सिंह के दौर में कल्याणकारी अधिकारों का फैलाव, सब शामिल है।
वी.पी. सिंह के कार्यकाल के दूसरे क़दम
सिर्फ़ 11 महीने के कार्यकाल में वी.पी. सिंह ने मंडल के अलावा भी कई फ़ैसले लिए:
- 1990 में बी.आर. आंबेडकर को भारत रत्न दिया — यह सम्मान बहुत पहले मिल जाना चाहिए था, और यह मंडल वाले सामाजिक न्याय के ढाँचे से मेल भी खाता था।
- जम्मू और कश्मीर — जनवरी 1990 में जगमोहन को राज्यपाल बनाया। यह वह दौर था जब कश्मीर में उग्रवाद चरम पर था और कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ। केंद्र और राज्य के बीच का यह संकट आज भी बहस का विषय है।
- पंजाब — अकाली नेतृत्व से बातचीत की; उग्रवाद का दौर फिर भी चलता रहा।
- रक्षा और ख़ुफ़िया तंत्र में फेरबदल — रक्षा मंत्री रहते जो बोफ़ोर्स और HDW की फ़ाइलें उन्होंने खोली थीं, उनकी समीक्षा शुरू कराई।
- विदेशी मुद्रा पर दबाव — अगस्त 1990 के खाड़ी युद्ध से तेल की क़ीमतें उछल गईं, कुवैत से 1.7 लाख भारतीय कामगारों को निकालना पड़ा, और इसी से 1991 के भुगतान संतुलन संकट की नींव पड़ी, जो अगली सरकार के पाले में गिरा।
राजनीति, चित्रकारी और आख़िरी साल
वी.पी. सिंह जाने-माने लैंडस्केप चित्रकार थे और दिल्ली तथा मुंबई में उनकी प्रदर्शनियाँ लगीं। ज़िंदगी के आख़िरी दो दशक वह मल्टिपल मायलोमा और गुर्दे की ख़राबी से जूझते रहे, डायलिसिस कराते हुए भी सार्वजनिक मामलों पर बोलते रहे। उन्होंने उजड़े हुए लोगों के लिए आवाज़ उठाई, ख़ासकर सरदार सरोवर बाँध से प्रभावित लोगों और दिल्ली में झुग्गियाँ तोड़े जाने के मामलों में, और इसमें मेधा पाटकर जैसे कार्यकर्ता उनके साथ थे। 27 नवंबर 2008 को 77 साल की उम्र में AIIMS दिल्ली में उनका निधन हुआ।
1980 के दशक के आख़िर और 1990 के दशक की पूरी नीतिगत दुनिया को समझना हो — जिसमें योजना आयोग से नीति आयोग तक का संस्थाओं वाला बदलाव भी आता है — तो वी.पी. सिंह ही वह राजनीतिक धुरी हैं। मंडल न होता तो OBC की वह राजनीतिक एकजुटता नहीं बनती, जो 2020 के दशक तक राज्यों और देश के चुनाव तय करती है। और जिस भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम ने उन्हें सत्ता तक पहुँचाया, वह न होती तो ईमानदारी की भाषा भारतीय चुनावी बहस में इस तरह दाख़िल ही नहीं होती।
संघीय प्रयोग और आर्थिक दबाव
वी.पी. सिंह सरकार ने संघीय ढाँचे में भी कुछ नए प्रयोग किए। उसने अनुच्छेद 263 के तहत अंतर-राज्य परिषद बनाई — यह सरकारिया आयोग की सिफ़ारिश थी — और इस तरह वह तंत्र चालू किया जिसका इस्तेमाल बाद की सरकारों ने कभी ज़्यादा, कभी कम किया। उसने गाँवों में रोज़गार देने वाले लक्षित कार्यक्रमों के ज़रिए अंत्योदय पर ज़ोर बढ़ाया, जिनका ढाँचा आगे चलकर MGNREGA के रूप में क़ानून बना। मार्च 1993 में पी.वी. नरसिंह राव के दौर में बना राष्ट्रीय महिला कोष विचार के स्तर पर वी.पी. सिंह के महिला एवं बाल विकास विभाग वाले ज़ोर से ही निकला था। उन्होंने केंद्र-राज्य वित्तीय रिश्तों पर सरकारिया आयोग की सिफ़ारिशें भी फिर से आगे बढ़ाईं और करों के बँटवारे वाले पूल में ज़्यादा भरोसेमंद हिसाब की माँग रखी — यह बहस वित्त आयोग तब से लगातार आगे बढ़ाते रहे हैं। जनता दल की संघवाद वाली भाषा इसी छोटे से संस्थागत दौर से निकली थी।
अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर वी.पी. सिंह को राजीव गांधी के सालों से मिली वित्तीय तंगी विरासत में मिली। 2 अगस्त 1990 से शुरू हुए खाड़ी युद्ध ने ब्रेंट कच्चे तेल का दाम 40 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँचा दिया और कुवैत से क़रीब 1.7 लाख भारतीय कामगारों को निकालना पड़ा — ऑपरेशन डेज़र्ट सहायता। पतझड़ आते-आते विदेशी मुद्रा की हालत और बिगड़ गई। नवंबर 1990 में वी.पी. सिंह के बाद आई चंद्रशेखर सरकार ने मई 1991 में बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के पास 47 टन सोना गिरवी रखा — यही संकट का सबसे साफ़ दिखने वाला शिखर था, जिसे कुछ हफ़्तों बाद मनमोहन सिंह और पी.वी. नरसिंह राव ने सुलझाया।
इस तरह वी.पी. सिंह का कार्यकाल दो बड़े ढाँचागत बदलावों के बीच का कब्ज़ा है — मंडल से शुरू हुआ सामाजिक न्याय वाला बदलाव, और 1991 के भुगतान संतुलन झटके से मजबूरन आया आर्थिक बदलाव। दोनों ने राजनीतिक अर्थव्यवस्था को इस तरह बदला कि तीन दशक बाद भी उन पर फ़ैसला होना बाक़ी है।
सामान्य प्रश्न
वी.पी. सिंह कौन थे और कितने समय तक प्रधानमंत्री रहे?
वी.पी. सिंह भारत के 7वें प्रधानमंत्री थे, जो 2 दिसंबर 1989 से 10 नवंबर 1990 तक पद पर रहे — कुल 343 दिन। उन्होंने नेशनल फ्रंट गठबंधन की अगुवाई की, जिसे BJP और वामपंथी दलों का बाहर से समर्थन था। इससे पहले वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और राजीव गांधी की सरकार में केंद्रीय वित्त मंत्री तथा रक्षा मंत्री रहे।
मंडल आयोग क्या था और वी.पी. सिंह ने उसका क्या किया?
मंडल आयोग 1979 में बना और उसकी अध्यक्षता बी.पी. मंडल ने की। आयोग ने 1980 में सिफ़ारिश की कि केंद्र सरकार की 27 प्रतिशत नौकरियाँ अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित हों। वी.पी. सिंह ने 7 अगस्त 1990 को इसे लागू करने का ऐलान किया — रिपोर्ट आने के पूरे एक दशक बाद। सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) में इस क़दम को सही ठहराया, साथ में 50 प्रतिशत की सीमा और क्रीमी लेयर को बाहर रखने का नियम जोड़ा।
नवंबर 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार क्यों गिरी?
राम जन्मभूमि रथ यात्रा के दौरान 23 अक्टूबर 1990 को वी.पी. सिंह ने एल.के. आडवाणी की गिरफ़्तारी का आदेश दिया, जिसके बाद BJP ने बाहर से दिया समर्थन वापस ले लिया। 7 नवंबर 1990 को वी.पी. सिंह विश्वास मत 142-346 से हार गए और 10 नवंबर को इस्तीफ़ा दे दिया। इसके बाद चंद्रशेखर ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से थोड़े दिन चलने वाली सरकार बनाई।
बोफ़ोर्स मामले में वी.पी. सिंह की क्या भूमिका थी?
1987 में रक्षा मंत्री रहते वी.पी. सिंह ने बोफ़ोर्स तोप सौदे और HDW पनडुब्बी सौदे में कमीशन के भुगतान की जाँच के आदेश दिए। बिचौलियों को पैसा जाने के आरोप सामने आए, जिनमें हिंदुजा भाइयों और ओटावियो क्वात्रोकी के नाम आए। वी.पी. सिंह को मंत्रिमंडल से हटा दिया गया, उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी, और 1989 का अपना पूरा चुनाव अभियान बोफ़ोर्स के तीर पर खड़ा किया — इसके बाद राजीव चुनाव हार गए।
कश्मीरी पंडितों के पलायन में वी.पी. सिंह की क्या भूमिका रही?
वी.पी. सिंह की सरकार ने जनवरी 1990 में जगमोहन को जम्मू और कश्मीर का राज्यपाल बनाया। यह वही वक़्त था जब उग्रवाद तेज़ हो रहा था और कश्मीरी पंडित घाटी से पलायन कर रहे थे। आलोचक कहते हैं कि केंद्र पंडित समुदाय की हिफ़ाज़त नहीं कर सका; बचाव करने वाले कहते हैं कि राज्यपाल की नियुक्ति से पहले ही उग्रवाद पूरे उफ़ान पर था। इस पूरे प्रसंग पर इतिहासकारों में आज भी मतभेद है।
क्या वी.पी. सिंह ने बी.आर. आंबेडकर को भारत रत्न दिया था?
हाँ। वी.पी. सिंह की सरकार ने 31 मार्च 1990 को डॉ. बी.आर. आंबेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न दिया। यह सम्मान भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार और 20वीं सदी के सबसे बड़े दलित नेता के तौर पर उनकी भूमिका को मान्यता थी। यह फ़ैसला मंडल वाले सामाजिक न्याय के ढाँचे से मेल खाता था।
वी.पी. सिंह के मंडल वाले फ़ैसले ने भारतीय राजनीति को कैसे बदला?
मंडल लागू होने से OBC की वह राजनीतिक एकजुटता बनी, जो उत्तर भारत की चुनावी राजनीति चलाती है — लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार और पूरी जनता दल परंपरा OBC नेताओं के तौर पर उभरी। मंदिर बनाम मंडल की टक्कर ने BJP की लामबंदी का रूप बदल दिया। इंद्रा साहनी की 50 प्रतिशत सीमा और क्रीमी लेयर का सिद्धांत आरक्षण पर संवैधानिक क़ानून बन गए।
वी.पी. सिंह को आज कैसे याद किया जाता है?
वी.पी. सिंह को उस प्रधानमंत्री के तौर पर याद किया जाता है जिसने सामाजिक न्याय की राजनीति को शासन के बीचोबीच ला दिया, राष्ट्रीय राजनीति पर कांग्रेस की संगठनात्मक पकड़ तोड़ी, और इसकी राजनीतिक क़ीमत साल भर के भीतर चुका दी। चित्रकार वाली उनकी नज़र, कमज़ोर सेहत और प्रधानमंत्री पद के बाद उजड़े लोगों के लिए किया गया काम, इस छोटे लेकिन असरदार कार्यकाल में एक अलग नैतिक रंग जोड़ते हैं।