UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

साबरीमला फ़ैसला: 2018 का निर्णय, दलीलें और नौ जजों का संदर्भ

साबरीमला फ़ैसला UPSC के लिए: 2018 में पाँच जजों का 4:1 निर्णय, अनुच्छेद 14, 17 और 25 की दलीलें, इंदु मल्होत्रा की असहमति, नौ जजों का संदर्भ और संवैधानिक नैतिकता।

Sabarimala temple at the centre of the 2018 Supreme Court verdict

साबरीमला फ़ैसला इक्कीसवीं सदी के उन सुप्रीम कोर्ट फ़ैसलों में है जिनका धार्मिक आज़ादी और संविधान की बराबरी की गारंटी के रिश्ते पर सबसे गहरा असर पड़ा। 28 सितंबर 2018 को पाँच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 से तय किया कि केरल के साबरीमला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र वाली महिलाओं के घुसने पर लगी रोक असंवैधानिक है। साबरीमला फ़ैसले ने कहा कि यह चलन अनुच्छेद 14, 15, 17 और 25 का उल्लंघन करता है और इसे अनुच्छेद 25 के तहत “ज़रूरी धार्मिक प्रथा” कहकर नहीं बचाया जा सकता।

इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (2018) के इस फ़ैसले ने संविधान की एक बड़ी बहस खोल दी, जो आज भी सुलझी नहीं है। नौ जजों की पीठ अब 2019 में भेजे गए उस संदर्भ को देख रही है, जिसमें कोर्ट से कहा गया है कि वह संवैधानिक नैतिकता का मतलब दोबारा तय करे, ज़रूरी धार्मिक प्रथा की कसौटी पर फिर से सोचे, और यह भी देखे कि मौलिक अधिकारों का समूह की धार्मिक स्वायत्तता से क्या रिश्ता है।

यह लेख साबरीमला मंदिर की पृष्ठभूमि, 1991 के उस केरल हाई कोर्ट फ़ैसले को जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पलटा, 2018 की पाँचों राय की दलीलें, जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अकेली असहमति, इसके बाद का राजनीतिक और सामाजिक हंगामा, और अब भी लंबित नौ जजों के संदर्भ को एक-एक कर देखता है।

साबरीमला फ़ैसले के मुख्य तथ्य

साबरीमला मंदिर, जो 2018 के सुप्रीम कोर्ट फ़ैसले के केंद्र में रहा
  • मुक़दमे का नाम। इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (2018) 11 SCC 1।
  • तारीख़। 28 सितंबर 2018।
  • पीठ। पाँच जज — CJI दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर, आर.एफ. नरीमन, डी.वाई. चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा।
  • फ़ैसला। 4:1 के बहुमत से हर उम्र की महिलाओं को साबरीमला मंदिर में जाने की इजाज़त।
  • याचिकाकर्ता। इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन और पाँच महिला वकील।
  • न्याय मित्र। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और के. रामामूर्ति।
  • चुनौती किस प्रावधान को। केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) नियम, 1965 का नियम 3(b)।
  • आगे क्या हुआ। नवंबर 2019 में नौ जजों की पीठ को भेजा गया संदर्भ अभी लंबित है।

साबरीमला क्या है और रोक क्यों थी

केरल के पथनमथिट्टा ज़िले के पेरियार टाइगर रिज़र्व में बसा साबरीमला मंदिर भगवान अय्यप्पा को समर्पित है। हर साल यहाँ चार करोड़ से ज़्यादा श्रद्धालु आते हैं, जिससे यह दुनिया के सबसे बड़े तीर्थ केंद्रों में गिना जाता है। मंदिर के मुख्य देवता अय्यप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है, यानी हमेशा के लिए ब्रह्मचर्य के व्रत में बँधा देवता।

सदियों से 10 से 50 साल की उम्र वाली महिलाओं को, यानी मोटे तौर पर प्रजनन उम्र वाली महिलाओं को, मंदिर में जाने की इजाज़त नहीं थी। मंदिर के लोग इसे भगवान अय्यप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत की हिफ़ाज़त बताते थे, और इसे उस 41 दिन के व्रतम से भी जोड़ते थे जो हर तीर्थयात्री को करना होता है।

1991 में केरल हाई कोर्ट ने एस. महेंद्रन बनाम सचिव, त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड में इस रोक को सही ठहराया था। कोर्ट ने कहा था कि यह पुरानी परंपरा है और ज़रूरी धार्मिक प्रथा है।

1965 के नियम और संविधान की चुनौती

केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) अधिनियम, 1965 का मक़सद यह पक्का करना था कि हर वर्ग और तबक़े के हिंदू सार्वजनिक मंदिरों में जा सकें। लेकिन इसी क़ानून के तहत बने नियमों के नियम 3(b) ने छूट दे दी कि “जिन समयों पर परंपरा और रिवाज़ के मुताबिक़ महिलाओं को सार्वजनिक पूजा स्थल में आने की इजाज़त नहीं है”, उन्हें रोका जा सकता है।

इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने 2006 में जनहित याचिका दायर की और कहा कि नियम 3(b) इनका उल्लंघन करता है:

  • अनुच्छेद 14। क़ानून का बराबर संरक्षण।
  • अनुच्छेद 15(1)। धर्म, नस्ल, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव पर रोक।
  • अनुच्छेद 17। छुआछूत का ख़ात्मा।
  • अनुच्छेद 25(1)। अंतरात्मा की आज़ादी और धर्म मानने-प्रचारने का हक़।

मामला 2017 में संविधान पीठ को भेजा गया और 2018 में इसकी सुनवाई हुई।

साबरीमला फ़ैसला: बहुमत की चार राय

साबरीमला फ़ैसले में चार अलग-अलग सहमति वाली राय आईं — CJI दीपक मिश्रा की, जस्टिस ए.एम. खानविलकर की जो CJI से सहमत थे, जस्टिस आर.एफ. नरीमन की, और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की। साथ में जस्टिस इंदु मल्होत्रा की असहमति भी।

CJI दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अय्यप्पा के भक्त अनुच्छेद 26 के तहत कोई अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं बनते, क्योंकि साबरीमला मंदिर आम तौर पर हिंदुओं के लिए खुला है। इसलिए मंदिर यह दावा नहीं कर सकता कि संप्रदाय की स्वायत्तता के नाम पर वह महिलाओं को बाहर रख सकता है।

सबसे अहम बात यह कि CJI ने संवैधानिक नैतिकता का सहारा लिया। उन्होंने लिखा कि “महिलाओं की जैविक बनावट से जुड़ा भेदभाव या अलगाव करने वाला कोई भी नियम न सिर्फ़ बेबुनियाद है, उसका बचाव नहीं किया जा सकता और वह मानने लायक़ भी नहीं, बल्कि वह संवैधानिक नैतिकता की कसौटी पर कभी खरा नहीं उतर सकता।”

जस्टिस आर.एफ. नरीमन

जस्टिस नरीमन ने तीखी सहमति वाली राय लिखी। उन्होंने कहा कि सिर्फ़ एक लिंग से जुड़ी शारीरिक बातों के आधार पर किसी को बाहर रखना अनुच्छेद 15(1) के तहत भेदभाव ही है। उन्होंने माना कि इस चलन को ज़रूरी धार्मिक प्रथा कहकर नहीं बचाया जा सकता, क्योंकि रोक माहवारी पर टिकी थी, अय्यप्पा पूजा के किसी सैद्धांतिक हिस्से पर नहीं।

जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़

सबसे विस्तार से लिखी राय जस्टिस चंद्रचूड़ की थी। उन्होंने मामले को “व्यक्ति की गरिमा बनाम समूह की स्वायत्तता” की टक्कर बताया और कहा कि समूह के अधिकार किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को नहीं दबा सकते। वे बाक़ी सब जजों से आगे गए और कहा कि यह रोक छुआछूत पर बने अनुच्छेद 17 का उल्लंघन है — यानी माहवारी से जुड़ा कलंक भी छुआछूत की ही एक शक्ल है, जिसे संविधान ख़त्म कर चुका है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने संवैधानिक नैतिकता को नए सिरे से परिभाषित भी किया — “वह नैतिकता जो ख़ुद संविधान में बैठी है”, न कि बहुमत की भावना या पुराना रिवाज़।

जस्टिस इंदु मल्होत्रा की असहमति

पेरियार रिज़र्व के रास्ते साबरीमला की चढ़ाई करते तीर्थयात्री

पीठ की इकलौती महिला जज, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने 90 पन्नों की बेहद मज़बूत असहमति लिखी। उनकी मुख्य दलीलें ये थीं:

  • याचिका बनती ही नहीं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं में कोई भी अय्यप्पा भक्त नहीं था, इसलिए उन्हें यह जनहित याचिका लाने का हक़ ही नहीं था। धर्म से जुड़े सवाल उसी धर्म के दुखी भक्तों को उठाने चाहिए।
  • बहुलता। “धर्म के मामलों में अदालतें तर्कसंगतता की बात नहीं उठा सकतीं।”
  • बराबरी बनाम धर्म। उन्होंने कहा कि जब तक भेदभाव शीशे की तरह साफ़ न हो, अनुच्छेद 14 ज़रूरी धार्मिक प्रथा को मिले अनुच्छेद 25 के संरक्षण को नहीं दबा सकता।
  • संप्रदाय का दर्जा। उन्होंने माना कि अय्यप्पा भक्त एक धार्मिक संप्रदाय हैं, जिसे अनुच्छेद 26 का संरक्षण मिला हुआ है।

जस्टिस मल्होत्रा की असहमति उस सोच की पहचान बन गई है जो मानती है कि धर्म के मामलों में अदालत का दख़ल बेहद सीमित रहना चाहिए।

संवैधानिक नैतिकता बनाम धार्मिक आज़ादी

साबरीमला फ़ैसले ने उस संवैधानिक विचार को साफ़ शक्ल दी जिसे बी.आर. आंबेडकर ने संविधान सभा में इस्तेमाल किया था। CJI दीपक मिश्रा और जस्टिस चंद्रचूड़, दोनों ने कहा कि संविधान की बराबरी, गरिमा और आज़ादी वाली धाराओं से निकली संवैधानिक नैतिकता, लोकप्रिय नैतिकता या पुराने रिवाज़ पर भारी पड़नी चाहिए।

आलोचकों ने, जिनमें अपनी असहमति में जस्टिस मल्होत्रा और बाद के विद्वान शामिल हैं, कहा कि “संवैधानिक नैतिकता” खुला-खुला विचार है और इससे जजों को धार्मिक स्वायत्तता को दबाने की छूट मिल जाती है। यह बहस इस मुक़दमे का सबसे बड़ा अनसुलझा सैद्धांतिक सवाल बनी हुई है।

इसके बाद: विरोध, पुनर्विचार और नौ जजों का संदर्भ

साबरीमला फ़ैसले पर अमल के वक़्त केरल में बड़े पैमाने पर विरोध हुआ। कई महिलाओं ने मंदिर में जाने की कोशिश की, जिन्हें भक्तों ने रोक दिया। मंदिर में असल में पहुँचने वाली पहली दो महिलाएँ बिंदु अम्मिनी और कनकदुर्गा थीं, जो 2 जनवरी 2019 की तड़के पुलिस सुरक्षा में अंदर गईं।

साबरीमला फ़ैसले के ख़िलाफ़ पैंसठ पुनर्विचार याचिकाएँ दायर हुईं। 14 नवंबर 2019 को CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पाँच जजों की पीठ ने 3:2 के बहुमत से 2018 के फ़ैसले को रद्द तो नहीं किया, लेकिन सवालों का एक बड़ा गुच्छा नौ जजों की पीठ को भेज दिया। इस संदर्भ में ये बातें थीं:

  • अनुच्छेद 25 और 26 की धार्मिक आज़ादी का बाक़ी मौलिक अधिकारों से रिश्ता, जिनमें अनुच्छेद 14, 15, 17 और 21 शामिल हैं।
  • अनुच्छेद 25 और 26 में इस्तेमाल हुए “नैतिकता” शब्द का दायरा।
  • अदालतों की बनाई हुई ज़रूरी धार्मिक प्रथा की कसौटी।
  • ज़रूरी धार्मिक प्रथा के दावों को साबित करने का पैमाना क्या हो।
  • इससे मिलते-जुलते सवाल, जैसे मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं का जाना और धर्म से बाहर शादी करने वाली पारसी महिलाओं का अग्नि मंदिर में जाने पर रोक।

नौ जजों की पीठ 2020 की शुरुआत में बनी। 2026 तक इस बड़े संदर्भ पर शुरुआती दलीलें सुनी जा चुकी हैं, लेकिन अंतिम फ़ैसला नहीं आया है। 2018 का साबरीमला फ़ैसला औपचारिक रूप से क़ायम है, लेकिन ज़मीन पर राजनीतिक और सामाजिक नतीजों ने उसके अमल को पीछे छोड़ दिया है।

न्याय मित्र के तौर पर इंदिरा जयसिंह

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह याचिकाकर्ताओं की ओर से न्याय मित्र के तौर पर पेश हुईं। उन्होंने दलील दी कि माहवारी वाली महिलाओं को बाहर रखने की जड़ छुआछूत और पितृसत्ता में है, और संविधान अदालत से माँग करता है कि वह लिंग के कलंक के ख़िलाफ़ खड़ी हो, भले ही उस पर धर्म का पर्दा पड़ा हो। जस्टिस चंद्रचूड़ और नरीमन ने उनकी दलीलें बड़े हिस्से में मानीं।

तुलना में इस फ़ैसले का संवैधानिक महत्व

साबरीमला फ़ैसला उन फ़ैसलों की क़तार में बैठता है जहाँ भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 14 की बराबरी को धार्मिक प्रथा पर लागू किया है। अहम मिसालें ये हैं:

  • शाह बानो (1985)। तलाक़शुदा मुस्लिम महिला को धर्मनिरपेक्ष धारा 125 CrPC के तहत गुज़ारा भत्ता। पूरा विश्लेषण शाह बानो मामले में देखिए।
  • शायरा बानो (2017)। तीन तलाक़ ख़त्म।
  • जोसेफ़ शाइन (2018)। IPC की धारा 497 के तहत व्यभिचार अपराध नहीं रहा।
  • नवतेज सिंह जौहर (2018)। रज़ामंदी से बने समलैंगिक रिश्तों के लिए धारा 377 ख़त्म।
  • पुट्टस्वामी (2017)। निजता मौलिक अधिकार।

ये सब मिलकर समूह के अधिकारों से हटकर व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की तरफ़ झुकाव दिखाते हैं। साबरीमला फ़ैसला उस झुकाव का सबसे ऊँचा निशान है, और ठीक इसीलिए उस पर सबसे ज़्यादा झगड़ा हुआ।

UPSC राजव्यवस्था की तैयारी पर साबरीमला फ़ैसले का असर

प्रीलिम्स के लिए याद रखिए: 4:1 का बहुमत, 28 सितंबर 2018 की तारीख़, पाँच जज, नियम 3(b) की चुनौती, और नवंबर 2019 में नौ जजों को भेजा गया संदर्भ। मेन्स के लिए साबरीमला फ़ैसला GS-II में न्यायिक समीक्षा और धार्मिक आज़ादी पर, और GS-IV में संवैधानिक नैतिकता बनाम पारंपरिक नैतिकता पर बहुत काम आने वाला विषय है।

यह फ़ैसला अपने आप अनुच्छेद 14 के बराबरी वाले ढाँचे से जुड़ता है, अनुच्छेद 20 की आपराधिक प्रक्रिया वाली सुरक्षाओं से भी, जिन्हें फैलाने में जस्टिस चंद्रचूड़ की भूमिका रही है, भारत में समान नागरिक संहिता में व्यक्तिगत क़ानून की बहस से भी, और महिला आरक्षण विधेयक की लैंगिक बराबरी वाली दलील से भी। जोड़ने वाला सूत्र यह सवाल है कि क्या संवैधानिक नैतिकता को हर व्यक्तिगत क़ानून और हर धार्मिक प्रथा पर एक जैसा लागू किया जा सकता है।

साबरीमला फ़ैसले से निकले मुख्य सिद्धांत

  • संवैधानिक नैतिकता। संविधान में बैठी नैतिकता, लोकप्रिय या पारंपरिक नैतिकता पर भारी पड़ती है।
  • ज़रूरी धार्मिक प्रथा की कसौटी। जिस चलन को धार्मिक बताया जा रहा हो, उसे अनुच्छेद 25 का संरक्षण तभी मिलेगा जब वह धर्म के सिद्धांत के लिहाज़ से ज़रूरी हो, सिर्फ़ रिवाज़ भर न हो।
  • संप्रदाय की कसौटी। अनुच्छेद 26 का संरक्षण पाने के लिए एक अलग धार्मिक समुदाय चाहिए, जिसकी अपनी साझा आस्था और अपना संगठन हो, और जो बड़े धर्म से अलग हो।
  • व्यक्ति बनाम समूह के अधिकार। अनुच्छेद 26 के तहत समूह की स्वायत्तता, अनुच्छेद 14 और 21 के तहत व्यक्ति के अधिकारों को हरा नहीं सकती।
  • अनुच्छेद 17 का फैलाव। जस्टिस चंद्रचूड़ ने छुआछूत में माहवारी के आधार पर की गई रोक को भी शामिल माना।

सामान्य प्रश्न

साबरीमला फ़ैसला क्या है?

साबरीमला फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट का 2018 का वह फ़ैसला है, इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य, जिसने 10 से 50 साल की महिलाओं को केरल के साबरीमला मंदिर में जाने की इजाज़त दी। पाँच जजों की पीठ ने 4:1 से तय किया कि यह रोक अनुच्छेद 14, 15, 17 और 25 का उल्लंघन करती है।

साबरीमला फ़ैसले में असहमति किसने लिखी?

पीठ की इकलौती महिला जज, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने असहमति लिखी। उन्होंने कहा कि अदालतों को धार्मिक प्रथाओं को तर्कसंगतता की कसौटी पर नहीं परखना चाहिए, और यह भी कि अय्यप्पा भक्त एक धार्मिक संप्रदाय हैं, जिन्हें अनुच्छेद 26 का संरक्षण मिला हुआ है।

साबरीमला के संदर्भ में संवैधानिक नैतिकता क्या है?

संवैधानिक नैतिकता का मतलब है वे मूल्य जो ख़ुद संविधान में बैठे हैं — बराबरी, गरिमा और आज़ादी। CJI मिश्रा और जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि टकराव की हालत में संवैधानिक नैतिकता को पारंपरिक या लोकप्रिय नैतिकता पर भारी पड़ना चाहिए।

क्या साबरीमला फ़ैसला पलट दिया गया है?

नहीं। 2018 का फ़ैसला औपचारिक रूप से क़ायम है। नवंबर 2019 में पाँच जजों की पीठ ने बड़े सवाल नौ जजों की पीठ को भेज दिए, जिसने शुरुआती दलीलें सुनी हैं, लेकिन अंतिम फ़ैसला अब तक नहीं दिया है।

1965 के केरल नियमों का नियम 3(b) क्या था?

केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) नियमों का नियम 3(b) उन समयों पर महिलाओं को बाहर रखने की छूट देता था जब रिवाज़ उन्हें अंदर आने की इजाज़त नहीं देता था। साबरीमला फ़ैसले ने इसे मूल क़ानून और संविधान, दोनों के दायरे से बाहर बताया।

साबरीमला मामले में अनुच्छेद 17 क्यों लाया गया?

जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि माहवारी वाली महिलाओं को बाहर रखना उन्हें अपवित्र मानने जैसा है और यह छुआछूत की ही एक शक्ल है, जिस पर अनुच्छेद 17 रोक लगाता है।

नौ जजों वाला संदर्भ किन बातों को देखता है?

नौ जजों का संदर्भ अनुच्छेद 25, 26 और 14 के आपसी रिश्ते, धार्मिक आज़ादी में नैतिकता के मतलब, ज़रूरी धार्मिक प्रथा के सिद्धांत, और मुस्लिम व पारसी महिलाओं को इसी तरह बाहर रखे जाने के सवालों को देखता है।

साबरीमला मामले में याचिकाकर्ता कौन थे?

याचिकाकर्ता इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन और पाँच महिला वकील थीं। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने याचिकाकर्ताओं की ओर से न्याय मित्र के तौर पर मदद की।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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