UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

वामपंथी और दक्षिणपंथी: मतलब, फ्रांसीसी जड़ें और भारत में धुँधली होती रेखा

वामपंथी और दक्षिणपंथी को समझिए: 1789 की बैठक व्यवस्था से शुरुआत, दोनों पक्ष किसके लिए खड़े हैं, बॉबियो की दो धुरियाँ और भारतीय दलों पर ये लेबल कैसे लागू होते हैं।

The semicircular chamber of France's National Assembly in Paris, with tiers of red benches facing the rostrum

वामपंथी और दक्षिणपंथी, राजनीतिक राय के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नक्शे, यानी राजनीतिक स्पेक्ट्रम, के दो छोर हैं। यह जोड़ी असल में बैठने की एक व्यवस्था से शुरू हुई थी। 1789 की फ्रांसीसी नेशनल असेंबली में जो प्रतिनिधि चाहते थे कि राजा के पास पूर्ण वीटो बना रहे, वे असेंबली के अध्यक्ष के दाईं ओर बैठे। जो इसके विरोध में थे, वे उनके बाईं ओर बैठे। तब से दो सदियों से ज्यादा समय बीत चुका है। आज वामपंथ को आम तौर पर समानता और अर्थव्यवस्था में राज्य की बड़ी भूमिका से जोड़ा जाता है। दक्षिणपंथ को परंपरा और ज्यादा खुले बाजार से जोड़ा जाता है।

ज्यादातर पाठक इन दोनों लेबलों को पक्की टीमों की तरह देखते हैं। मानो हर दल को किसी एक तरफ होना ही है, और हर विचार का एक स्थायी पता है। ये दोनों बातें सही नहीं हैं। हर लेबल का मतलब सदी दर सदी बदला है। विद्वानों ने दशकों तक एक दूसरी धुरी जोड़ने पर काम किया है, क्योंकि एक अकेली रेखा हर सवाल को नहीं समेट सकती। भारत में यह मेल और भी ढीला है। NCERT के वर्णन में 1950 के दशक की कांग्रेस एक ही समय में “दक्षिणपंथ, वामपंथ और मध्य के सभी रंगों” को अपने भीतर रखती थी। यह नोट वामपंथ और दक्षिणपंथ के स्थिर मूल को उनके बदलते हिस्सों से अलग करता है। फिर यह भारतीय राजनीति में वामपंथ और दक्षिणपंथ की कहानी तक जाता है।

वामपंथी और दक्षिणपंथी का मतलब क्या है

वाम और दक्षिण एक रेखा पर सापेक्ष स्थितियों (relative positions) के नाम हैं, सदस्यता के कार्ड नहीं। ब्रिटानिका वामपंथ को दो बातों से परिभाषित करती है: समतावाद (egalitarianism), और राजनीतिक-आर्थिक जीवन की प्रमुख संस्थाओं पर जनता या राज्य का नियंत्रण। दक्षिणपंथ की जड़ वह रूढ़िवादी विचार में देखती है, जो 19वीं सदी में सत्ता और परंपरा के पक्ष में खड़ा था।

NCERT की बारहवीं कक्षा की किताब भारतीय छात्रों के लिए इसका एक काम चलाऊ रूप देती है। उसके मुताबिक वामपंथ मुक्त प्रतिस्पर्धा के बजाय अर्थव्यवस्था पर राज्य के नियंत्रण और नियमन को पसंद करता है। दक्षिणपंथ मानता है कि प्रतिस्पर्धा और बाजार अर्थव्यवस्था ही तरक्की पक्की करते हैं। वह यह भी मानता है कि सरकार को बिना जरूरत अर्थव्यवस्था में दखल नहीं देना चाहिए।

तथ्यविवरण
ये शब्द कहाँ से शुरू हुए1789 की फ्रांसीसी नेशनल असेंबली, राजा के वीटो पर बहस के दौरान
कौन कहाँ बैठाराजा के पूर्ण वीटो के समर्थक अध्यक्ष के दाईं ओर; विरोधी उनके बाईं ओर
आम इस्तेमाल में वामपंथसमतावाद; प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं पर जनता या राज्य का नियंत्रण (ब्रिटानिका)
आम इस्तेमाल में दक्षिणपंथरूढ़िवादी विचार; 19वीं सदी में सत्ता, परंपरा और संपत्ति का समर्थन (ब्रिटानिका)
सबसे जानी-मानी कसौटीनॉर्बर्टो बॉबियो (1994): समानता के प्रति रवैया वाम को दक्षिण से अलग करता है
दो धुरी वाला सुधारहैंस आइजेंक (1954) ने आमूलवाद (radicalism) बनाम रूढ़िवाद के साथ कोमल-मन बनाम कठोर-मन की धुरी रखी
भारत का शुरुआती वामपंथकांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (1934) और 1920 के दशक का कम्युनिस्ट आंदोलन
भारत का मुक्त-बाजार वाला दक्षिणपंथस्वतंत्र पार्टी (1959), जिसका नेतृत्व सी. राजगोपालाचारी ने किया
भारत में कानूनी स्थितिहर पंजीकृत दल को “समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र” के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी होती है (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A(5))

हर लेबल सापेक्ष है। इसलिए एक दल अपने एक प्रतिद्वंद्वी से बाईं ओर और दूसरे से दाईं ओर हो सकता है।

ये शब्द कहाँ से आए: 1789 की बैठक व्यवस्था

ये शब्द बैठने के एक चार्ट से पैदा हुए। 1789 की गर्मियों में बास्तील का पतन हो चुका था। उसके बाद फ्रांस की नई नेशनल असेंबली में बहस छिड़ी कि राजा लुई सोलहवें के पास कितनी ताकत बची रहे। सबसे बड़ा सवाल यह था कि असेंबली के बनाए कानूनों पर उनके पास पूर्ण वीटो (absolute veto) रहे या नहीं। वीटो के समर्थक प्रतिनिधि असेंबली के अध्यक्ष के दाईं ओर जमा हुए। इसके विरोधियों ने, यानी ज्यादा आमूलवादी खेमे ने, उनके बाईं ओर की सीटें लीं। टाइम पत्रिका ने इतिहासकार डेविड ए. बेल को उद्धृत किया है, जो इस बँटवारे को एक सीधे विरोध में समेट देते हैं: दाईं ओर परंपरा, बाईं ओर बदलाव।

फ्रांस के बाहर यह जोड़ी धीरे-धीरे फैली। इतिहासकार मार्सेल गौशे दाएँ और बाएँ पर लिखे अपने निबंध में इसे पौन सदी से भी लंबी प्रक्रिया बताते हैं। तब जाकर 20वीं सदी की शुरुआत में ये दोनों शब्द राजनीतिक जीवन की मुख्य श्रेणियाँ बने। संदर्भ ग्रंथ इस क्षण की तारीख मोटे तौर पर ही बताते हैं। ब्रिटानिका इसकी शुरुआत 1790 के दशक की फ्रांसीसी क्रांतिकारी संसद में रखती है। लेकिन इतिहासकार जिस सटीक क्षण की ओर इशारा करते हैं, वह 1789 की वीटो बहस है। पूरी क्रांति की कहानी 1789 की फ्रांसीसी क्रांति वाले नोट में है।

इन लेबलों को ऐसे समझिए: बैठने का एक चार्ट, जो आगे चलकर नक्शा बन गया। यह तुलना इसलिए काम की है क्योंकि इससे साफ होता है कि ये शब्द जगह बताने वाले और सापेक्ष क्यों हैं। आप हमेशा किसी न किसी के बाएँ या दाएँ होते हैं। लेकिन एक जगह यह तुलना टूट जाती है। नक्शे से उम्मीद होती है कि वह स्थिर रहे, और यह नक्शा कभी स्थिर नहीं रहा। 1789 का दक्षिणपंथ राजा के वीटो का बचाव करता था। ब्रिटानिका बताती है कि 19वीं सदी तक यह शब्द उन रूढ़िवादियों के लिए इस्तेमाल होने लगा जो सत्ता और संपत्ति का बचाव करते थे। फिर 20वीं सदी में दक्षिणपंथ का एक उग्र रूप फासीवाद के रूप में सामने आया।

दोनों पक्ष आम तौर पर किस बात के लिए खड़े होते हैं

वामपंथी और दक्षिणपंथी में अंतर आम तौर पर तीन सवालों पर दिखता है, और इनके जवाब अक्सर साथ-साथ चलते हैं:

  • समानता। वामपंथ दौलत और हैसियत की बड़ी असमानताओं को सामाजिक व्यवस्थाओं की उपज मानता है, जिन्हें सार्वजनिक कदमों से घटाया जा सकता है। दक्षिणपंथ इन्हें स्वाभाविक, या मेहनत का उचित नतीजा मानकर स्वीकार करने को ज्यादा तैयार रहता है।
  • बदलाव। वामपंथ आम तौर पर मौजूदा संस्थाओं में सुधार पर जोर देता है। दक्षिणपंथ परंपरा और व्यवस्था को ज्यादा वजन देता है।
  • राज्य और बाजार। वामपंथ प्रमुख क्षेत्रों में राज्य के नियमन या स्वामित्व के पक्ष में है। दक्षिणपंथ विकास के लिए प्रतिस्पर्धा और निजी संपत्ति पर भरोसा करता है।

NCERT की ग्यारहवीं कक्षा की किताब का समानता वाला अध्याय विचारों के दो परिवारों के बीच यही रेखा खींचता है। वह समझाता है कि समाजवाद औद्योगिक पूँजीवाद की असमानताओं के जवाब में पनपा। उसकी मुख्य चिंता मौजूदा असमानता को घटाना और संसाधनों का न्यायपूर्ण बँटवारा करना है। इसके लिए वह शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सरकारी नियमन और योजना की बात करता है। उदारवादियों को असमानता से अपने आप में आपत्ति नहीं है। उनकी दिक्कत उस असमानता से है जो अन्यायपूर्ण हो और जड़ जमा चुकी हो। वे इनाम बाँटने का सबसे उचित तरीका प्रतिस्पर्धा को मानते हैं। इन दोनों परिवारों को PSIR के उदारवाद, समाजवाद और मार्क्सवाद वाले नोट में विस्तार से पढ़ाया गया है।

कुछ भारतीय समाजवादियों ने समानता के विचार को वर्ग से आगे तक फैलाया। NCERT बताती है कि राममनोहर लोहिया ने पाँच असमानताएँ गिनाईं, जिनसे एक साथ लड़ना जरूरी था:

  • स्त्री और पुरुष के बीच की असमानता;
  • चमड़ी के रंग पर टिकी असमानता;
  • जाति पर टिकी असमानता;
  • कुछ देशों के दूसरे देशों पर औपनिवेशिक शासन की असमानता;
  • दौलत की असमानता, यानी वह आर्थिक असमानता जिसे उनके दौर के ज्यादातर समाजवादी लड़ने लायक इकलौती असमानता मानते थे।

उन्होंने दो और संघर्ष जोड़े: नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए और अहिंसा के लिए। इन सातों को मिलाकर उन्होंने सप्त क्रांति, यानी सात क्रांतियाँ, कहा। लोहिया की यह सूची याद दिलाती है कि भारत में “वामपंथ” कभी सिर्फ वर्ग का मामला नहीं रहा।

1960 के दशक का एक उदाहरण

एक अकेली रेखा तब अच्छा काम करती है, जब हर विवाद अर्थव्यवस्था पर हो। 1960 के दशक के दो विपक्षी दलों को इस रेखा पर रखिए, और देखिए कि यह कैसे नाकाम होती है।

स्वतंत्र पार्टी की पहचान अर्थनीति से बनी थी। NCERT के एक अभ्यास में इसके मार्गदर्शक सिद्धांतों में राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था गिनाई गई है। ब्रिटानिका भी इसे मुक्त उद्यम का समर्थक बताती है। 1951 में बने भारतीय जनसंघ का वर्णन NCERT मुख्य रूप से संस्कृति के जरिए करती है। इसमें एक संस्कृति से बँधे एक राष्ट्र का विचार शामिल है, और अंग्रेजी की जगह हिंदी को राजभाषा बनाने का अभियान भी। ब्रिटानिका दर्ज करती है कि स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक सी. राजगोपालाचारी चाहते थे कि अंग्रेजी ही राजभाषा बनी रहे।

एक रेखा वाला नक्शा सिर्फ यह पूछता है कि हर दल अर्थव्यवस्था चलाने का कितना काम राज्य को देना चाहता था। इसलिए इन दो विपक्षी दलों के बीच भाषा के झगड़े को दर्ज करने की इस नक्शे में कोई जगह नहीं है। यही छूटा हुआ आयाम दूसरी धुरी के पक्ष में पूरी दलील है।

एक रेखा काफी क्यों नहीं: बॉबियो और दो धुरी वाले मॉडल

राजनीति विज्ञानी वाम-दक्षिण रेखा को छोड़ते नहीं, लेकिन उसमें एक दूसरा सवाल जोड़ देते हैं। यह सवाल आम तौर पर स्वतंत्रता बनाम सत्ता का होता है। इसकी सबसे जानी-मानी दलील इतालवी दार्शनिक नॉर्बर्टो बॉबियो ने Destra e sinistra (1994) में दी। यह किताब 1996 में अंग्रेजी में Left and Right: The Significance of a Political Distinction नाम से छपी। बॉबियो का तर्क था कि लेबलों के भीतर की सामग्री चाहे जितनी बदले, उसके नीचे की स्थायी विभाजक रेखा समानता के प्रति रवैया है। वामपंथ ज्यादा समतावादी पक्ष है और दक्षिणपंथ कम समतावादी। दूसरी कसौटी, यानी स्वतंत्रता के प्रति रवैया, हर पक्ष के नरमपंथियों को उसके अतिवादियों से अलग करती है।

दोनों कसौटियों को साथ रखिए, तो बॉबियो के नक्शे में चार क्षेत्र बनते हैं:

स्थितिसमानता परस्वतंत्रता परबॉबियो के उदाहरण
अति-वामसमतावादीसत्तावादीजैकोबिनवाद
मध्य-वामसमतावादीस्वतंत्रतावादीउदार समाजवाद और सामाजिक-लोकतांत्रिक दल
मध्य-दक्षिणअसमानतावादीस्वतंत्रतावादीलोकतांत्रिक तरीके के प्रति वफादार रहने वाले रूढ़िवादी दल
अति-दक्षिणसमानता-विरोधीउदारवाद-विरोधीफासीवाद और नाजीवाद

यह योजना एक आम आपत्ति का जवाब देती है। आपत्ति यह है कि वाम-दक्षिण का भेद साम्यवाद को लोकतांत्रिक समाजवाद के साथ एक खाने में डाल देता है, और फासीवाद को रूढ़िवाद के साथ। बॉबियो का जवाब है कि हर जोड़ी समानता पर एक ही पक्ष में है, लेकिन स्वतंत्रता पर बँट जाती है। यही तथ्य यह भी समझाता है कि ऐसे बेमेल आंदोलन असाधारण मौकों पर साथी क्यों बन सकते हैं।

एक मनोवैज्ञानिक चार दशक पहले ही मिलती-जुलती तस्वीर तक पहुँच चुके थे। हैंस आइजेंक ने The Psychology of Politics (1954) में ब्रिटिश मतदाताओं के रवैयों का अध्ययन किया। उनका तर्क था कि आमूलवादी से रूढ़िवादी तक चलने वाला एक अकेला पैमाना इन मतदाताओं को समझाने के लिए काफी नहीं है। इसलिए उन्होंने विलियम जेम्स के शब्द उधार लेकर एक दूसरा आयाम जोड़ा: कोमल-मन बनाम कठोर-मन (tender-mindedness versus tough-mindedness)। इसे उन्होंने T-फैक्टर कहा। उनका प्रस्ताव था कि कठोर-मन की प्रवृत्ति कम्युनिस्टों और फासीवादियों को एक छोर पर साथ रखती है, लोकतांत्रिक दलों से अलग।

यहीं पर मध्यमार्गी (centrist) की जगह बनती है। एक रेखा वाले नक्शे पर मध्य बस बीच का हिस्सा है। बॉबियो के नक्शे पर एक मध्य-वाम है और एक मध्य-दक्षिण। दोनों लोकतांत्रिक नियमों के प्रति वफादारी साझा करते हैं, जबकि समानता पर उनकी राय अलग रहती है। बॉबियो जिन दो मूल्यों के साथ काम करते हैं, वे खुद भी विवादित विचार हैं। उन्हें समानता और स्वतंत्रता वाले नोट में समझाया गया है।

ये लेबल भारत कैसे पहुँचे

भारत में वामपंथ पहले संगठित हुआ, और वह भी राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर। बाजार के पक्ष में खुलकर बोलने वाला दल आजादी के बाद ही आया।

वामपंथ: समाजवादी और कम्युनिस्ट

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) का गठन 1934 में कांग्रेस के भीतर हुआ। इसे उन युवा नेताओं ने बनाया जो संगठन को ज्यादा आमूलवादी और ज्यादा समतावादी बनाना चाहते थे। आचार्य नरेंद्र देव इसके संस्थापक अध्यक्ष थे, और ब्रिटानिका इसे कांग्रेस के भीतर का एक वामपंथी समूह बताती है। इसके नेताओं में जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया शामिल थे। 1948 में कांग्रेस ने दोहरी पार्टी सदस्यता पर रोक लगा दी। तब समाजवादियों ने कांग्रेस छोड़ी और सोशलिस्ट पार्टी बनाई। NCERT बताती है कि उनकी असली मुश्किल 1955 में आई, जब कांग्रेस ने खुद समाज के समाजवादी ढाँचे (socialist pattern of society) को अपना लक्ष्य बना लिया। इससे समाजवादियों के पास अलग दिखने की जगह बहुत कम बची। लोहिया और नारायण के विचार PSIR के एम. एन. रॉय, लोहिया और जयप्रकाश नारायण वाले नोट में हैं।

कम्युनिस्ट समूह 1920 के दशक की शुरुआत में सामने आए। इन्हें रूस की बोल्शेविक क्रांति से प्रेरणा मिली थी। पार्टी की स्थापना की तारीख तक पर विवाद है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) अपनी गिनती 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में हुए एक सम्मेलन से करती है। वहीं CPI(M) पार्टी की शुरुआत 17 अक्टूबर 1920 को ताशकंद में मानती है। पार्टी का पूरा इतिहास भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी वाले नोट में है।

NCERT के मुताबिक, 1951 में हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़ने के बाद CPI ने पहले आम चुनाव में 16 सीटें जीतीं और सबसे बड़ा विपक्षी दल बनी। मार्च 1957 में उसने केरल विधानसभा की 126 में से 60 सीटें जीतीं। फिर पाँच निर्दलियों के समर्थन से ई. एम. एस. नंबूदरीपाद ने सरकार बनाई। NCERT इसे दुनिया में कहीं भी लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए सत्ता में आई पहली कम्युनिस्ट सरकार कहती है। केंद्र सरकार ने 1959 में अनुच्छेद 356 के तहत इसे बर्खास्त कर दिया। 1964 में सोवियत संघ और चीन के बीच की दरार को लेकर पार्टी टूट गई। सोवियत-समर्थक गुट CPI बना रहा, और बाकी ने CPI(M) बनाई।

दक्षिणपंथ: स्वतंत्र पार्टी

सी. राजगोपालाचारी गवर्नर-जनरल के पद पर रहने वाले इकलौते भारतीय थे। उन्होंने 1957 में कांग्रेस छोड़ दी। जून 1959 में उनकी कांग्रेस रिफॉर्म कमेटी का मद्रास में नई बनी स्वतंत्र पार्टी में विलय हो गया। ब्रिटानिका इस पार्टी को बुनियादी तौर पर रूढ़िवादी और साम्यवाद-विरोधी कहती है। उसके मुताबिक पार्टी मुक्त उद्यम के पक्ष में थी, और चाहती थी कि राज्यों के ऊपर केंद्र सरकार की भूमिका छोटी रहे। मीनू मसानी इसके नेताओं में से एक थे।

चुनावों में इस पार्टी का प्रदर्शन उसकी छोटी उम्र के हिसाब से बेहतर रहा। चुनाव आयोग की सांख्यिकीय रिपोर्टें बताती हैं कि 1962 में उसने लोकसभा की 494 में से 18 सीटें जीतीं, और उसे 7.89 प्रतिशत वैध वोट मिले। 1967 में उसने 8.67 प्रतिशत वोट के साथ 520 में से 44 सीटें जीतीं। यह कांग्रेस को छोड़कर किसी भी दूसरे दल से ज्यादा था।

यूरोपीय लेबल भारतीय दलों पर ठीक से क्यों नहीं बैठते

यूरोप के दल वर्ग और अर्थव्यवस्था के सवालों पर लड़ते हुए बड़े हुए। भारतीय दलों का मुकाबला ज्यादातर दूसरे सवालों पर रहा है। विद्वानों ने यह बात तीन दिशाओं से कही है।

पहली दिशा है कांग्रेस प्रणाली। NCERT आजादी के बाद के पहले दशक की कांग्रेस को एक सामाजिक और वैचारिक गठबंधन बताती है, जिसके गुट अलग-अलग रुख अपनाते थे। इसलिए पार्टी एक बड़े मध्यमार्गी दल जैसी दिखती थी। मुकाबला दलों के बीच कम, और पार्टी के भीतर ज्यादा होता था। यह अध्याय NCERT की वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध है। बाद की दलीय व्यवस्था की कहानी PSIR के दलीय व्यवस्था, गठबंधन राजनीति और दबाव समूह वाले नोट में है।

दूसरी दिशा वर्ग से जुड़ी दलील है। लॉयड और सुजैन रुडॉल्फ ने In Pursuit of Lakshmi (1987) में तर्क दिया कि भारत का कोई भी राष्ट्रीय दल, चाहे दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, वर्ग की राजनीति नहीं करता। इसकी वजह वे खुद राज्य को मानते हैं। निजी पूँजी और संगठित मजदूर, दोनों के सामने राज्य एक तीसरे पक्ष के रूप में खड़ा होता है। राज्य का यह दबदबा राजनीति को एक मध्यमार्गी बहुलवाद की ओर खींच लेता है।

तीसरी दिशा एक नया दावा है: भारतीय राजनीति में विचारधारा है, बस यूरोपीय ढंग की नहीं। प्रदीप छिब्बर और राहुल वर्मा ने Ideology and Identity (2018) में इंडियन नेशनल इलेक्शन स्टडीज के सर्वे आँकड़ों और संविधान सभा की बहसों का इस्तेमाल किया। इनके आधार पर उनका तर्क है कि भारत के वैचारिक मुकाबले दो रेखाओं पर चलते हैं:

  • राज्यवाद (statism), यानी राज्य को समाज पर कितना हावी होना चाहिए और उसका कितना नियमन करना चाहिए;
  • मान्यता (recognition), यानी क्या राज्य को हाशिये के समूहों को जगह देनी चाहिए और अल्पसंख्यकों की रक्षा करनी चाहिए, और अगर हाँ तो कैसे।

कानून भी एक व्यावहारिक वजह जोड़ता है। 15 जून 1989 से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A(5) एक शर्त लगाती है। राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन करने वाले हर संगठन को अपने ज्ञापन (memorandum) में एक शपथ लिखनी होती है। यह शपथ संविधान के प्रति निष्ठा की होती है, और “समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र” के सिद्धांतों के प्रति भी। इसका पाठ इंडिया कोड पर है। मुक्त बाजार के लिए प्रचार करने वाला दल भी कागज पर समाजवाद के प्रति वचन देता है। इसलिए यह शब्द किसी दल की असली अर्थनीति के बारे में बहुत कम बताता है। यह प्रक्रिया राजनीतिक दलों के पंजीकरण और पंजीकरण रद्द करने वाले नोट में समझाई गई है।

इन सबका मतलब यह नहीं कि भारत में यह जोड़ी बेकार है। समझदारी इसमें है कि वाम और दक्षिण का इस्तेमाल उस सवाल के लिए करें जिसे ये अच्छी तरह मापते हैं, यानी राज्य बनाम बाजार। और जब कोई भारतीय बहस मान्यता या भाषा पर टिकी हो, तो इन्हें अलग धुरियाँ मानिए। किसी भी तरफ अति पर जाना बिलकुल ठीक नहीं है। लेबलों को फेंक देने से एक असली संकेत हाथ से निकल जाता है। हर दल को एक ही रेखा पर ठूँसने से वे असहमतियाँ छिप जाती हैं जो असल में मायने रखती हैं।

आज के भारत में वामपंथ और दक्षिणपंथ

यह जोड़ी आज भी रोज इस्तेमाल होती है, लेकिन संवैधानिक कानून ने किसी एक पक्ष को चुनने से इनकार कर दिया है। 25 नवंबर 2024 को मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ मामले की याचिकाएँ खारिज कर दीं। इन याचिकाओं में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्दों को चुनौती दी गई थी। ये शब्द 1976 का 42वाँ संशोधन प्रस्तावना में लाया था।

बेंच ने माना कि न तो संविधान और न ही प्रस्तावना कोई खास आर्थिक नीति या ढाँचा अनिवार्य बनाती है, “चाहे वह वाम हो या दक्षिण”। अदालत ने कहा कि भारतीय ढाँचे में समाजवाद का मतलब है राज्य की यह प्रतिबद्धता कि वह कल्याणकारी राज्य बने और अवसर की समानता पक्की करे। यह निजी उद्यम पर रोक नहीं लगाता, और न ही अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार और कारोबार के अधिकार पर। अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि आपातकाल के दौरान किया गया यह जोड़ अवैध था। उसने माना कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संशोधन शक्ति प्रस्तावना तक पहुँचती है। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि भारत लगातार मिश्रित अर्थव्यवस्था पर चला है, जिसमें निजी क्षेत्र बढ़ा है।

दलों की तरफ देखें, तो CPI ने कानपुर सम्मेलन से गिनती करते हुए 26 दिसंबर 2025 को अपनी शताब्दी मनाई। वहीं CPI(M) अब भी पार्टी की स्थापना 1920 से ही मानती है।

परीक्षा के लिए वामपंथ और दक्षिणपंथ कैसे पढ़ें

यह विषय सिलेबस के चार हिस्सों में आता है:

  • GS पेपर I: विश्व इतिहास में फ्रांसीसी क्रांति, और आधुनिक भारत में राष्ट्रीय आंदोलन की वैचारिक धाराएँ।
  • GS पेपर II: प्रस्तावना का “समाजवादी” शब्द और राजनीतिक दलों का पंजीकरण।
  • PSIR पेपर I: राजनीतिक विचारधाराओं वाली इकाई और समानता की अवधारणा।
  • निबंध: पूँजीवाद और राज्य की भूमिका पर सवाल।

मुख्य परीक्षा शायद ही कभी परिभाषा पूछती है। वह पूछती है कि इन विचारों ने असल में किया क्या। मुख्य परीक्षा 2020 के GS पेपर I में पूछा गया: “1920 के दशक से राष्ट्रीय आंदोलन ने कई वैचारिक धाराओं को अपनाया और इस तरह अपने सामाजिक आधार का विस्तार किया। चर्चा कीजिए।” यह इस नोट की समाजवादी और कम्युनिस्ट कहानी का ही परीक्षा वाला रूप है। मुख्य परीक्षा 2016 के GS पेपर II में पूछा गया: “‘भारतीय दलीय व्यवस्था संक्रमण के एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जो अंतर्विरोधों और विरोधाभासों से भरा दिखता है।’ चर्चा कीजिए।” कांग्रेस प्रणाली वाली दलील इस सवाल का अच्छा जवाब देती है। प्रीलिम्स की बात करें, तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 2013 से 2026 तक के 1,403 प्रश्नों में से 240 पर भारतीय राजव्यवस्था का टैग है। प्रस्तावना और दलों का पंजीकरण इसी विषय के तहत आते हैं।

इन्हें तब तक दोहराइए, जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएँ:

  • 1789: वीटो बहस में राजा के पूर्ण वीटो के समर्थक अध्यक्ष के दाईं ओर बैठे और विरोधी उनके बाईं ओर।
  • ब्रिटानिका का मूल: वामपंथ यानी समतावाद और जनता या राज्य का नियंत्रण; 19वीं सदी के दक्षिणपंथ का मतलब था सत्ता और परंपरा का बचाव।
  • बॉबियो (1994): समानता वाम को दक्षिण से अलग करती है; स्वतंत्रता नरमपंथियों को अतिवादियों से अलग करती है।
  • आइजेंक (1954): आमूलवाद बनाम रूढ़िवाद के साथ कोमल-मन बनाम कठोर-मन की एक दूसरी धुरी।
  • 1934 और 1964: CSP कांग्रेस के भीतर बनी; CPI टूटी और CPI(M) का जन्म हुआ।
  • स्वतंत्र पार्टी (1959): 1962 में लोकसभा की 18 सीटें और 1967 में 44।
  • कानून: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A(5), जो 15 जून 1989 से लागू है, और प्रस्तावना के “समाजवादी” शब्द पर सुप्रीम कोर्ट का 25 नवंबर 2024 का फैसला।

तीन उलझनें नंबर कटवाती हैं:

  • वामपंथ और वामपंथी उग्रवाद। वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) माओवादी सशस्त्र आंदोलन के लिए केंद्र सरकार का शब्द है। यह सुरक्षा की एक श्रेणी है, जिसे वामपंथी उग्रवाद वाले नोट में समझाया गया है। चुनाव लड़ने वाले वाम दल एक अलग विषय हैं।
  • प्रस्तावना का “समाजवादी” और समाजवादी दल। सुप्रीम कोर्ट प्रस्तावना के इस शब्द को कल्याणकारी राज्य की प्रतिबद्धता के रूप में पढ़ता है। वह इसे किसी दल के कार्यक्रम या राज्य के स्वामित्व की प्रतिबद्धता नहीं मानता।
  • अतिवादी और दृढ़। बॉबियो के अर्थ में अतिवादी वे हैं जो लोकतांत्रिक नियमों को नकारते हैं, न कि पक्की राय रखने वाले लोग। एक नरमपंथी भी समानता पर दृढ़ राय रख सकता है।

पड़ोसी विचारधाराओं को भी इस रेखा पर रखकर देखिए, इससे मदद मिलती है:

विचारआम तौर पर जगहमूल चिंताइतिहास में भारतीय उदाहरण
साम्यवादधुर वामवर्ग असमानता खत्म करनाCPI, जिसकी अपनी गणना के मुताबिक स्थापना 1925 में कानपुर में हुई
लोकतांत्रिक समाजवादमध्य-वामलोकतांत्रिक तरीकों से समानता1948 की सोशलिस्ट पार्टी, जो NCERT के अनुसार लोकतांत्रिक समाजवाद में विश्वास करती थी
मुक्त-बाजार उदारवादअर्थनीति में दक्षिणव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिस्पर्धास्वतंत्र पार्टी (1959)
रूढ़िवाददक्षिणपरंपरा और व्यवस्थाफिर से स्वतंत्र पार्टी, जिसे ब्रिटानिका बुनियादी तौर पर रूढ़िवादी कहती है
फासीवादअति-दक्षिणस्वतंत्रता और समानता दोनों को नकारता है (बॉबियो)कोई भारतीय उदाहरण नहीं; बॉबियो के उदाहरण इतालवी फासीवाद और नाजीवाद हैं

वाम और दक्षिण सबसे अच्छा काम कंपास की तरह करते हैं, फैसले की तरह नहीं। यह कंपास एक सवाल पर भरोसे से दिशा बताता है: राज्य को अर्थव्यवस्था को कितना आकार देना चाहिए। लेकिन जैसे ही बहस में पहचान या भाषा आती है, इसे एक दूसरी धुरी चाहिए। जो उत्तर इस जोड़ी का इस्तेमाल करता है और फिर ठीक-ठीक दिखाता है कि यह कहाँ रुकती है, वह रटा हुआ नहीं, समझा हुआ लगता है।

सामान्य प्रश्न

आसान शब्दों में वामपंथी और दक्षिणपंथी का मतलब क्या है?

वामपंथी और दक्षिणपंथी, राजनीतिक राय के दो बड़े पक्षों के लेबल हैं। वामपंथ आम तौर पर ज्यादा समानता और अर्थव्यवस्था में राज्य की बड़ी भूमिका के पक्ष में होता है, जबकि दक्षिणपंथ आम तौर पर परंपरा और ज्यादा खुले बाजार के पक्ष में। ये लेबल सापेक्ष हैं, इसलिए एक दल अपने एक प्रतिद्वंद्वी से बाईं ओर और दूसरे से दाईं ओर हो सकता है।

वामपंथी और दक्षिणपंथी शब्द कहाँ से आए?

ये शब्द 1789 की फ्रांसीसी नेशनल असेंबली से आए। तब बहस चल रही थी कि राजा लुई सोलहवें के पास पूर्ण वीटो रहे या नहीं। वीटो के समर्थक असेंबली के अध्यक्ष के दाईं ओर बैठे और विरोधी उनके बाईं ओर। फिर जगह बताने वाले ये लेबल धीरे-धीरे पूरे यूरोप और उसके बाहर फैल गए।

राजनीति में मध्यमार्गी का क्या मतलब है?

मध्यमार्गी वह है जिसके रुख वाम और दक्षिण के बीच होते हैं, और जो दोनों की अतियों से बचता है। नॉर्बर्टो बॉबियो ने बीच के हिस्से को मध्य-वाम और मध्य-दक्षिण में बाँटा। दोनों लोकतांत्रिक नियमों को मानते हैं, लेकिन इस पर असहमत रहते हैं कि कितनी समानता की कोशिश की जाए।

क्या प्रस्तावना में "समाजवादी" लिखा होने से भारत का संविधान वामपंथी है?

नहीं। 25 नवंबर 2024 को तय हुए डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संविधान कोई खास आर्थिक नीति अनिवार्य नहीं करता, चाहे वह वाम हो या दक्षिण। अदालत ने "समाजवादी" शब्द को कल्याणकारी राज्य और अवसर की समानता की प्रतिबद्धता के रूप में पढ़ा, जो निजी उद्यम पर रोक नहीं लगाती।

क्या वामपंथी राजनीति और वामपंथी उग्रवाद एक ही चीज हैं?

नहीं। वामपंथी राजनीति उन दलों और विचारों को कहते हैं जो समानता और राज्य की बड़ी भूमिका के पक्ष में हैं, और भारत में ऐसे दल चुनाव लड़ते हैं। वामपंथी उग्रवाद माओवादी सशस्त्र आंदोलन के लिए आधिकारिक शब्द है, जिसे आंतरिक सुरक्षा की समस्या माना जाता है।

नॉर्बर्टो बॉबियो ने वाम और दक्षिण के बारे में क्या कहा?

इतालवी दार्शनिक बॉबियो ने अपनी 1994 की किताब में तर्क दिया कि समानता के प्रति रवैया ही वह स्थायी कसौटी है जो वामपंथ को दक्षिणपंथ से अलग करती है। नरमपंथियों को अतिवादियों से अलग करने के लिए उन्होंने स्वतंत्रता के प्रति रवैये को जोड़ा। इससे उन्हें अति-वाम से अति-दक्षिण तक चार स्थितियाँ मिलीं।

स्वतंत्र पार्टी क्या थी?

स्वतंत्र पार्टी 1959 में बनी, और सी. राजगोपालाचारी इसके प्रमुख चेहरे थे। ब्रिटानिका इसे मुक्त उद्यम का समर्थन करने वाली एक रूढ़िवादी पार्टी बताती है। इसने 1962 में लोकसभा की 18 सीटें और 1967 में 44 सीटें जीतीं। 1967 में कांग्रेस को छोड़कर इसके पास किसी भी दूसरे दल से ज्यादा सीटें थीं।

वाम और दक्षिण के लेबल भारतीय दलों पर ठीक से क्यों नहीं बैठते?

विद्वान इसकी कई वजहें बताते हैं। NCERT शुरुआती कांग्रेस को इतना बड़ा गठबंधन बताती है कि उसमें वाम और दक्षिण दोनों एक साथ समा जाते थे। रुडॉल्फ दंपती ने तर्क दिया कि भारत का कोई भी राष्ट्रीय दल वर्ग की राजनीति नहीं करता। छिब्बर और वर्मा जोड़ते हैं कि भारत की वैचारिक बहसें यूरोपीय वर्ग-विभाजन के बजाय राज्यवाद पर और हाशिये के समूहों की मान्यता पर टिकी हैं।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. राजनीति में वाम और दक्षिण शब्दों की उत्पत्ति के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. ये 1789 की फ्रांसीसी नेशनल असेंबली में प्रतिनिधियों के बैठने की व्यवस्था से निकले। 2. राजा के पूर्ण वीटो का समर्थन करने वाले प्रतिनिधि असेंबली के अध्यक्ष के बाईं ओर बैठे थे। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a) वीटो के समर्थक अध्यक्ष के दाईं ओर बैठे थे और उसके विरोधी उनके बाईं ओर।

2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन 1934 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर हुआ था। 2. पहले आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरी। 3. स्वतंत्र पार्टी की स्थापना जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुई थी। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) स्वतंत्र पार्टी का नेतृत्व सी. राजगोपालाचारी ने किया था; जयप्रकाश नारायण समाजवादियों के नेता थे।

3. नॉर्बर्टो बॉबियो के अनुसार, वाम को दक्षिण से सबसे लगातार अलग करने वाली कसौटी इनमें से किसके प्रति रवैया है:

  • (a) धर्म
  • (b) समानता
  • (c) राष्ट्रीय संप्रभुता
  • (d) विदेश नीति

उत्तर: (b) बॉबियो ने समानता के प्रति रवैये को विभाजक रेखा बनाया, और नरमपंथियों को अतिवादियों से अलग करने के लिए स्वतंत्रता के प्रति रवैये का इस्तेमाल किया।

4. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A(5) के तहत, राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन करने वाले संगठन के ज्ञापन में किन सिद्धांतों के प्रति निष्ठा की शपथ होनी चाहिए:

  • (a) समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र
  • (b) स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व
  • (c) न्याय, स्वतंत्रता और समानता
  • (d) संघवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र

उत्तर: (a) 15 जून 1989 से लागू यह प्रावधान समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र के साथ भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता का भी नाम लेता है।

5. डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 25 नवंबर 2024 के फैसले के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसने प्रस्तावना से “समाजवादी” शब्द हटा दिया। 2. इसने माना कि भारतीय ढाँचे में समाजवाद अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार और कारोबार के अधिकार पर रोक नहीं लगाता। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b) अदालत ने चुनौती खारिज कर दी और “समाजवादी” शब्द को कल्याणकारी राज्य की प्रतिबद्धता के रूप में पढ़ा।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. वाम और दक्षिण शब्द 1789 में बैठने की एक व्यवस्था के रूप में शुरू हुए, फिर भी ये आज राजनीतिक राय का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला नक्शा हैं। नॉर्बर्टो बॉबियो के तर्क के संदर्भ में समझाइए कि यह भेद टिका क्यों रहा। (15 अंक, 250 शब्द)
  2. परीक्षण कीजिए कि यूरोपीय वाम-दक्षिण स्पेक्ट्रम भारतीय राजनीतिक दलों का केवल आंशिक वर्णन क्यों कर पाता है। (15 अंक, 250 शब्द)
  3. राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा और तरीकों में अंतर स्पष्ट कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  4. प्रस्तावना का “समाजवादी” शब्द राज्य को किसी खास आर्थिक नीति से नहीं बाँधता। नवंबर 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  5. फ्रांसीसी क्रांति की समकालीन विश्व के लिए स्थायी प्रासंगिकता है। समझाइए। (15 अंक, 250 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2025, GS पेपर I।

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Written by

Rahul Puri Sir

Director & Mentor · Anantam IAS

Rahul Puri is the Director & Mentor at Anantam IAS. He leads the institution's teaching philosophy — focused not on syllabus completion but on the thinking, clarity and consistency that actually crack UPSC. A long-time mentor to hundreds of civil services aspirants and interview toppers (including AIR 28, 48, 56, 73, 96, 106, 116, 143 in CSE 2025), he anchors Anantam's flagship Interview Guidance Programme.

Specialises in · Institutional leadership, mentoring and programme design Experience · 10+ years Visit website ↗

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