UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

वुलर झील: कश्मीर में भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील, झेलम का बाढ़ मैदान और तुलबुल विवाद

जम्मू और कश्मीर की वुलर झील एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में है और 1990 से रामसर स्थल। झेलम के बाढ़ मैदान का भूगोल, तुलबुल परियोजना का विवाद, गाद और संरक्षण प्राधिकरण।

Wular Lake

वुलर झील जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में बांदीपोरा और बारामुला ज़िलों के बीच, कश्मीर घाटी के कटोरे में बसी है। यह एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में से एक है और अपने सबसे बड़े फैलाव के हिसाब से भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है। यह झील झेलम नदी के बाढ़ के मैदान का जलाशय है, और पानी ऊँचा रहने पर पूरब से पश्चिम क़रीब 16 किलोमीटर और उत्तर से दक्षिण 9.6 किलोमीटर तक फैल जाती है। मौसम के साथ इसका सतही क्षेत्र बहुत बदलता है — सर्दियों में पानी कम होने पर क़रीब 30 वर्ग किलोमीटर, और बसंत में बर्फ़ पिघलने के चरम तथा दक्षिण-पश्चिम मानसून के बाद 130 से 260 वर्ग किलोमीटर तक, जब झेलम अपने किनारों से बाहर निकलकर आसपास के जलोढ़ पंखे को डुबो देती है। 23 मार्च 1990 को वुलर झील को अंतर्राष्ट्रीय महत्व की रामसर आर्द्रभूमि घोषित किया गया। कश्मीर घाटी की क़ुदरती बाढ़-सोख होने और झेलम के पाकिस्तान की तरफ़ निकलने के दरवाज़े होने की वजह से यह भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे रणनीतिक मीठे पानी वाले जलाशयों में गिनी जाती है।

बनने की कहानी और भौगोलिक बनावट

वुलर एक विवर्तनिक झील (tectonic lake) है, जो प्लायोसीन के आख़िर और प्लीस्टोसीन के दौर में कश्मीर बेसिन के धँसने से बनी। उस वक़्त उसके उत्तर और दक्षिण में पीर पंजाल शृंखला और वृहद हिमालय उठे, जिनके बीच पहाड़ों से घिरी एक द्रोणी बंद हो गई, और वह करेवा संरचना के झील तथा नदी वाले जमाव से भर गई। कश्मीर की मूल पुरा-झील (palaeo-lake) पिछले दस लाख साल में सिकुड़कर गिनी-चुनी बची हुई जल-निकायों में रह गई है, और उनमें सबसे बड़ी वुलर है। वुलर झील की तली औसत समुद्र तल से क़रीब 1,580 मीटर की ऊँचाई पर है। उत्तर में इसकी हद हरमुख शृंखला बनाती है और दक्षिण में झेलम का ढालू जलोढ़ मैदान।

झेलम नदी और वुलर झील

झेलम नदी वेरीनाग के अपने उद्गम से अनंतनाग, श्रीनगर और सोपोर से होकर क़रीब 170 किलोमीटर बहने के बाद बनयारी के पास दक्षिण-पूरब से वुलर झील में घुसती है। झील में घुसते ही नदी बहुत चौड़ी हो जाती है, अपनी ज़्यादातर गाद वहीं छोड़ देती है और उसका बहाव लगभग ठहर जाता है। इसके बाद झेलम वुलर के पश्चिमी सिरे से सोपोर के पास निकलती है और उत्तर-पश्चिम की तरफ़ बारामुला तथा उड़ी से होकर नियंत्रण रेखा पार करके पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर में चली जाती है। इस जल-भूगोल की वजह से वुलर झील झेलम का मुख्य नियंत्रक जलाशय बन जाती है, और उन बाढ़ों की एकमात्र क़ुदरती सोख भी — जो न होतीं तो ऊपर की तरफ़ घनी आबादी वाले श्रीनगर के बाढ़ मैदान और नीचे की तरफ़ बारामुला–उड़ी गलियारे को डुबो देतीं।

जलग्रहण क्षेत्र

वुलर झील का जलग्रहण क्षेत्र क़रीब 12,660 वर्ग किलोमीटर है, जो कश्मीर घाटी के पश्चिमी, उत्तरी और मध्य हिस्सों का पानी इसमें लाता है। हरमुख और गुरेज़ की तरफ़ से मधुमती तथा एरिन नाले भी पानी जोड़ते हैं, लेकिन इसमें आने वाले पानी का 90 प्रतिशत से ज़्यादा झेलम ही देती है। इस जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी हिस्सों में घने जंगल हैं और बीच तथा निचले हिस्सों में धान और बाग़ों की गहन खेती होती है। इसी जलग्रहण क्षेत्र में ज़मीन के इस्तेमाल का बदलना ही वुलर झील की बदलती हालत की सबसे बड़ी वजह रहा है।

वुलर झील की जैव विविधता

वुलर झील में ठंडे और मीठे पानी की उन प्रजातियों का भरपूर जमावड़ा है जो ऊँचाई वाली घाटी की जलवायु के हिसाब से ढल चुकी हैं। रामसर के दस्तावेज़ में इस झील को पक्षियों, मछलियों और पौधों की विविधता के लिहाज़ से बेहद अहम आर्द्रभूमि माना गया है।

पक्षी

वुलर झील मध्य एशियाई उड़ान मार्ग (Central Asian Flyway) पर आने वाले प्रवासी जलपक्षियों के लिए सर्दियों का बेहद ज़रूरी ठिकाना है, और चरम मौसम में यहाँ 1,00,000 से 5,00,000 तक पक्षी आते हैं। यहाँ दर्ज प्रजातियों में ग्रेलैग हंस, पट्टकंठी हंस, मैलार्ड, कॉमन पोचार्ड, नॉर्दर्न पिनटेल, कॉमन टील, टफ्टेड डक, यूरेशियन कूट, और पोचार्ड तथा ग्रीब की कई प्रजातियाँ शामिल हैं। दुनिया भर में ख़तरे में मानी जाने वाली पल्लास मछली-उकाब (Pallas’s Fish Eagle) जैसी प्रजातियाँ झील के किनारे के जंगलों में प्रजनन करते हुए दर्ज की गई हैं।

मछलियाँ और पौधे

वुलर झील में मछलियों की क़रीब 17 प्रजातियाँ हैं, जिनमें Schizothorax प्रजातियाँ (कश्मीरी स्नोट्राउट), Cyprinus carpio (बाहर से लाई गई) और Carassius carassius का दबदबा है। यह झील झेलम की स्नोट्राउट मछली के लिए अंडे देने की अहम जगह है और क़रीब 8,000 मछुआरा परिवारों की रोज़ी-रोटी चलाती है। पानी की वनस्पति में Nelumbo nucifera (भारतीय कमल) की बड़ी-बड़ी क्यारियाँ शामिल हैं, जिसके बीज (नादरू) और प्रकंद बाज़ार के लिए निकाले जाते हैं और कश्मीरी खाने का ख़ास हिस्सा हैं।

तुलबुल नौवहन परियोजना

भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे लंबे चलने वाले पानी के विवादों में से एक, तुलबुल नौवहन परियोजना, के केंद्र में वुलर झील ही है। भारत ने 1984 में सोपोर के पास झील के निकास पर एक रेगुलेटर और बैराज बनाने का प्रस्ताव रखा था, ताकि सर्दियों में पानी कम रहने वाले महीनों में झेलम में कम से कम 4.4 फुट की गहराई बनी रहे और बारामुला से श्रीनगर के बीच नावें चल सकें। इस ढाँचे से वुलर झील के ऊपरी हिस्सों में क़रीब 0.30 मिलियन एकड़ फुट पानी जमा होता।

पाकिस्तान ने आपत्ति की कि यह परियोजना एक पश्चिमी नदी पर पानी जमा करने जैसी है और इसलिए सिंधु जल संधि 1960 का उल्लंघन करती है, जिसने सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी के बेरोक इस्तेमाल का हक़ पाकिस्तान को दिया था और इन नदियों पर भारत के जमाव को कुछ तय ग़ैर-उपभोगी कामों तक सीमित रखा था। भारत का कहना रहा कि यह नौवहन का काम है, जिसकी संधि इजाज़त देती है। स्थायी सिंधु आयोग के तहत हुई बातचीत से कोई समझौता नहीं निकला, 1987 में परियोजना का काम रोक दिया गया, और तब से तुलबुल नौवहन परियोजना ठंडे बस्ते में है — दोतरफ़ा बातचीत में बीच-बीच में यह फिर उठती रही है। साझा नदियों पर सीमा-पार ढाँचे को सिंधु जल संधि ने कैसे संभाला, इसकी सबसे ज़्यादा दी जाने वाली मिसालों में वुलर झील का यह विवाद है।

वुलर झील पर ख़तरे

पिछले सौ साल में वुलर झील काफ़ी सिकुड़ चुकी है। सर्वे के रिकॉर्ड और सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना बताती है कि वुलर के खुले पानी का क्षेत्र 1911 के क़रीब 217 वर्ग किलोमीटर से घटकर 2008 में क़रीब 86 वर्ग किलोमीटर रह गया। इस सिकुड़न की तीन आपस में जुड़ी वजहें हैं। पहली, झेलम के जलग्रहण क्षेत्र में ज़मीन के इस्तेमाल में आए तेज़ बदलाव से आई गाद ने तलछट का एक पंखा खड़ा कर दिया है, जिससे झील की तली का बड़ा हिस्सा मौसमी दलदल में बदल गया है। दूसरी, दलदली किनारों पर धान की खेती और विलो के बाग़ान लगाकर किया गया अतिक्रमण — जिसमें 1950 और 1960 के दशकों में सरकार की तरफ़ से लगाए गए विलो के बाग़ान भी शामिल हैं — ने असली झील छोटी कर दी है। तीसरी, झील के आसपास के क़स्बों से बिना साफ़ किया गया सीवेज और ऊपर के बाग़ों से बहकर आने वाले कीटनाशकों ने पानी की गुणवत्ता बिगाड़ दी है और सुपोषण (eutrophication) को बढ़ावा दिया है।

वुलर संरक्षण और प्रबंधन प्राधिकरण

वुलर झील की लगातार बिगड़ती हालत को देखते हुए जम्मू और कश्मीर सरकार ने 2012 में वुलर संरक्षण और प्रबंधन प्राधिकरण बनाया, जो झील को दोबारा ठीक करने के लिए बनी ख़ास संस्था है। यह प्राधिकरण चरणों में गाद निकालने का कार्यक्रम चला रहा है, अतिक्रमण कर रहे विलो के बाग़ान हटा रहा है, झील की तली के भीतर बसे मछुआरा गाँवों को दूसरी जगह बसा रहा है, और केंद्र सरकार तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण की राष्ट्रीय योजना के पैसे से जलग्रहण क्षेत्र सुधार का कार्यक्रम चला रहा है। 2024 तक प्राधिकरण ने अनुमानित 1.7 करोड़ घन मीटर गाद हटाई थी और 27 वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा इलाक़े से विलो हटाए थे, जिससे मानसून के बाद के महीनों में खुले पानी के फैलाव में साफ़ फ़र्क़ नापा जा सका।

तुलना में वुलर झील

भौतिक भूगोल में भारत की चार बड़ी झील-आर्द्रभूमियाँ साथ पढ़ाई जाती हैं, और वुलर उनमें से एक है — बाक़ी तीन हैं ओडिशा की चिल्का झील, केरल की वेम्बनाड झील और मणिपुर की लोकटक झील। वुलर भारत के रामसर स्थलों में भी सबसे नामी है, और जिस कश्मीर घाटी में यह बसी है, वह पश्चिमी हिमालय और हिंदूकुश पारिस्थितिक क्षेत्रों के मिलने की जगह पर है — ये दोनों दुनिया के मान्यता प्राप्त जैव विविधता हॉटस्पॉट में से दो से लगे हुए हैं।

सामान्य प्रश्न

क्या वुलर भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है?

वुलर झील को आम तौर पर अपने सबसे बड़े मौसमी फैलाव के हिसाब से भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील बताया जाता है, जिसका ऊँचे पानी वाला क्षेत्र झेलम में बर्फ़ पिघलने और मानसून के बहाव के हिसाब से 130 से 260 वर्ग किलोमीटर के बीच रहता है। सर्दियों में पानी कम होने पर झील क़रीब 30 वर्ग किलोमीटर रह जाती है, इसलिए यह क्रम इस पर टिका है कि तुलना किस मौसम की हो रही है।

वुलर झील को रामसर स्थल कब घोषित किया गया?

वुलर झील को 23 मार्च 1990 को अंतर्राष्ट्रीय महत्व की रामसर आर्द्रभूमि घोषित किया गया। रामसर के दस्तावेज़ में यह झील और कश्मीर के बांदीपोरा तथा बारामुला ज़िलों में उससे जुड़े दलदल और बाढ़ मैदान वाले पर्यावास, दोनों शामिल हैं।

वुलर झील कैसे बनी?

वुलर एक विवर्तनिक झील है, जो प्लायोसीन के आख़िर और प्लीस्टोसीन में कश्मीर बेसिन के धँसने से बनी, जब पीर पंजाल और वृहद हिमालय के उठने से पहाड़ों के बीच की एक द्रोणी बंद हो गई। मूल पुरा-झील पिछले दस लाख साल में सिकुड़ती गई, और वुलर उसका सबसे बड़ा बचा हुआ हिस्सा है।

वुलर झील में पानी कौन-सी नदी लाती है?

वुलर झील में पानी झेलम नदी लाती है, जो बनयारी के पास दक्षिण-पूरब से घुसती है और पश्चिमी सिरे पर सोपोर के पास निकल जाती है। वुलर में आने वाले पानी का 90 प्रतिशत से ज़्यादा झेलम ही देती है। मधुमती और एरिन नाले भी पानी जोड़ते हैं।

तुलबुल नौवहन परियोजना का विवाद क्या है?

तुलबुल नौवहन परियोजना भारत का वह प्रस्ताव है जिसमें सोपोर के पास वुलर झील के निकास पर एक रेगुलेटर बनाया जाए, ताकि सर्दियों में बारामुला और श्रीनगर के बीच नावें चलाने के लिए झेलम में कम से कम 4.4 फुट की गहराई बनी रहे। पाकिस्तान की आपत्ति यह है कि यह परियोजना सिंधु जल संधि 1960 के तहत पश्चिमी नदियों पर पानी जमा करने की रोक का उल्लंघन करती है। 1987 में काम रोक दिया गया और विवाद अब तक हल नहीं हुआ।

वुलर झील क्यों सिकुड़ गई है?

वुलर के खुले पानी का क्षेत्र 1911 के क़रीब 217 वर्ग किलोमीटर से घटकर 2008 में क़रीब 86 वर्ग किलोमीटर रह गया, और इसकी तीन वजहें हैं: झेलम के जलग्रहण क्षेत्र में ज़मीन के इस्तेमाल के तेज़ बदलाव से आई गाद, दलदली किनारों पर धान और विलो के बाग़ान लगाकर किया गया अतिक्रमण, और बिना साफ़ किया गया सीवेज तथा कीटनाशकों का बहाव, जिससे सुपोषण बढ़ा।

वुलर संरक्षण और प्रबंधन प्राधिकरण क्या है?

वुलर संरक्षण और प्रबंधन प्राधिकरण जम्मू और कश्मीर सरकार ने 2012 में बनाया था, जो वुलर झील को दोबारा ठीक करने के लिए बनी ख़ास संस्था है। यह गाद निकालना, विलो हटाना, मछुआरा गाँवों को दूसरी जगह बसाना और जलग्रहण क्षेत्र सुधार के कार्यक्रम चलाता है, जिनके लिए पैसा केंद्र सरकार और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण की राष्ट्रीय योजना से आता है।

कश्मीर में बाढ़ रोकने के लिए वुलर झील क्यों ज़रूरी है?

कश्मीर घाटी के भीतर झेलम नदी पर वुलर ही एकमात्र क़ुदरती सोख है। ज़्यादा पानी आने पर बाढ़ को अपने 130 से 260 वर्ग किलोमीटर के बाढ़ मैदान में फैलाकर वुलर ऊपर की तरफ़ घनी आबादी वाले श्रीनगर के शहरी बाढ़ मैदान और नीचे की तरफ़ बारामुला–उड़ी गलियारे को कहीं ऊँचे बाढ़ स्तर से बचाती है।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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